कहानी- गणित का घर 3 (Story Series- Ganit Ka Ghar 3)

“दीदी, आपके घर का ख़र्च कौन चलाता है?”

“कौन का क्या अर्थ है. अरे! ये तो घर है, इसमें कौन की तो कोई जगह ही नहीं है.”

“फिर भी….!” अब की गौरव ने सवाल किया.

“अरे भई, एक आलमारी में पैसा रखा रहता है, उसी में से, जब काम पड़ता है, कोई भी निकाल लेता है.”

“फिर भी कोई हिसाब तो रखता ही होगा?”

“इसमें हिसाब कैसा और किसी से पूछने की भी क्या ज़रूरत?”

“अरे दीदी, आप और भाईसाहब दोनों कमा रहे हैं, कुछ तो….”

“सुमन, दोनों कौन? पति-पत्नी तो एक ही होते हैं. अगर अलग-अलग हुए, तो घर कहां रह जाएगा, नरक हो जाएगा. अरे यार, ये कोई ऑफिस या दुकान थोड़ी है जो गुणाभाग हो.”

एकाएक मन के विचारों को व्यावहारिक रूप देना कभी-कभी बहुत मुश्किल होता है, लेकिन अंदर के आह्लाद ने उसे तितली-सा बना दिया था. गौरव के लिए गीज़र ऑन कर दिया और उसकी मेज़ पर फैली फाइलें दुरुस्त करने लगी. बार-बार मन हुआ, जगा ले उसे और चाय बनाने को कहे, लेकिन ऐसा कर ना सकी. नहाकर आई, तो गौरव अभी भी सोया हुआ था. चेहरा देखा, तो छोटा भोला-भाला बच्चा-सा नज़र आया. वात्सल्य उमड़ पड़ा, जिससे वशीभूत हो वह उसके पास ही लेेट गई. गौरव इससे अनजान बेसुध सोता रहा. थोड़ी देर तक वह उसके चेहरे को निहारती रही, लगा लिपट जाए, लेकिन ऐसा कर नहीं सकी. थोड़ी देर में उठी और कमरा ठीक करने लगी.

गौरव जागा तो उसे सुमन की पीठ दिखाई दी, काफ़ी कुछ खुली हुई. एकटक निहारने के बाद उसने ठंडी-सी आह भरी, फिर बाथरूम में घुस गया. फ्रेश होकर आया, तो डाइनिंग टेबल पर सुमन बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी. गौरव ने एक पल उसके चेहरे को देखा, बोला कुछ नहीं. बहुत दिनों से बंजर पड़ी संवादों की ज़मीन पर एकाएक शब्दों की हरियाली आए भी तो कैसे!

अहं से मुक्त हो बात शुरू की सुमन ने ही, “चलो, सुलेखा दीदी के घर चलते हैं, बहुत दिन हो गए मिले.”

गौरव चौंका. कई दिनों से ना तो वो दोनों किसी के घर गए थे और ना ही कोई उनके घर आया था, फिर किसी के मानने-ना मानने की वजह ही कैसी? सुमन की बढ़ती आत्मीयता से उसके अंदर भी प्रेम उमड़ पड़ा, बोला, “ठीक है.”

कॉलोनी में सुलेखा का परिवार क़रीब दो साल पहले ही आया था, जब उसके पति अभिनव की एक कंपनी में अकाउंट विभाग में नौकरी लगी थी. कुछ दिनों बाद सुलेेखा ने घर में ही प्ले स्कूल खोल लिया था. दो बच्चों की ज़िम्मेदारी को दोनों बख़ूबी निभा रहे थे. आज शाम को विवाह की पांचवीं सालगिरह थी उनकी, ऐसा सुलेखा ने उसे दो दिन पहले बताया था.

कॉलबेल बजाने पर सुलेखा ने दरवाज़ा खोला, “अरे आओ, आओ. बहुत दिनों बाद दर्शन दिए महारानीजी ने!” उसके साथ दोनों लॉबी के सोफे पर बैठ गए.

“शाम को डिनर तो याद है ना! छोटा-सा कार्यक्रम है.” शब्दों में ना कोई औपचारिकता, ना कोई तनाव.

“अभिनव भाईसाहब कहां हैं?” सुमन ने पूछा.

“शाम के प्रोग्राम के लिए कुछ सामान लेने गए हैं.”

चाय पीने के दौरान बात घूम-फिरकर आ गई घर के ख़र्च पर. “दीदी, आपके घर का ख़र्च कौन चलाता है?”

“कौन का क्या अर्थ है. अरे! ये तो घर है, इसमें कौन की तो कोई जगह ही नहीं है.”

“फिर भी….!” अब की गौरव ने सवाल किया.

“अरे भई, एक आलमारी में पैसा रखा रहता है, उसी में से, जब काम पड़ता है, कोई भी निकाल लेता है.”

“फिर भी कोई हिसाब तो रखता ही होगा?”

“इसमें हिसाब कैसा और किसी से पूछने की भी क्या ज़रूरत?”

“अरे दीदी, आप और भाईसाहब दोनों कमा रहे हैं, कुछ तो….”

“सुमन, दोनों कौन? पति-पत्नी तो एक ही होते हैं. अगर अलग-अलग हुए, तो घर कहां रह जाएगा, नरक हो जाएगा. अरे यार, ये कोई ऑफिस या दुकान थोड़ी है जो गुणाभाग हो.”

सुमन कुछ कहती कि तब तक अभिनव आ गया. “अरे भई, तुम्हें तो शाम को बुलाया था, अभी से आ धमके.” अभिनव की चुटकी पर सभी ठहाका लगा बैठे.

“बस छुट्टी थी, आप लोगों की याद आई, चले आए.” सुमन बोली.

“और आते ही घर का हिसाब-किताब मांगने लगी.” सुलेखा की बात पर सब हंस पड़े.

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“अरे नहीं, मैं तो….”

“कैसा हिसाब-किताब भई ?” अभिनव ने हंसते हुए पूछा.

“यही कि घर का ख़र्चा कौन चलाता है, कैसे मैनेज होता है, मैंने तो कह दिया कि सारा मैं ही ख़र्च करती हूं.” सुलेखा ने अभिनव को चिकोटी काटी.

“ठीक कहा, अरे डार्लिंग, जब मैं तुम्हारा हो गया, तो जो मेरा है वो सब तुम्हारा ही तो है. अपन तो तुम्हारे टुकड़ों पर ही पल रहे हैं मोहतरमाजी.”

फिर सब खिलखिला पड़े. थोड़ी देर में सुलेखा बोली, “नहीं, नहीं, मेरा कुछ नहीं, सब इन्हीं के कारण है. ॠणी और निर्भर हूं इन पर. इनके बिना तो एक क़दम नहीं चल सकती. मैं तो धन्य हूं इन्हें पाकर.”

अभिनव के फ्लैट से लौटते समय गौरव और सुमन को लगा जैसे हवा में उड़ रहे हों. सारा तनाव, सारा भारीपन और गंभीरता न जाने कहां चली गई. विला में पहुंचने पर सुमन ने अपनी आलमारी से सारे पैसे निकालकर गौरव की आलमारी में रख दिए.

“ये क्या कर रही हो?”

“मुझे नहीं रखना हिसाब-किताब. एक तो घर का काम करो और फिर पैसों और ख़र्च में माथापच्ची करो.” सुमन ने प्यारभरी उलाहना दी, “मेरी सारी ज़िम्मेदारी तुम उठाओगे, पत्नी हूं तुम्हारी, समझे!”

“अरे, हर हाइनेसजी, मैं भी तो आपके बिना एक क़दम नहीं चल सकता. नज़रें इनायत बनाए रखना मैडम.” गौरव ने उसकी बांहें पकड़कर सीने से लगा लिया. सुमन ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन असफल रही. गौरव ने उसे कसकर बांहों में भींच लिया और फिर थोड़ी ही देर में दोनों बेड पर गिर पड़े.

Asalam Kohara

असलम कोहरा

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एकाएक मन के विचारों को व्यावहारिक रूप देना कभी-कभी बहुत मुश्किल होता है, लेकिन अंदर के आह्लाद ने उसे तितली-सा बना दिया था. गौरव के लिए गीज़र ऑन कर दिया और उसकी मेज़ पर फैली फाइलें दुरुस्त करने लगी. बार-बार मन हुआ, जगा ले उसे और चाय बनाने को कहे, लेकिन ऐसा कर ना सकी.
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