कहानी- लम्हे 1 (Story Serie...

कहानी- लम्हे 1 (Story Series- Lamhe 1)

कुछ अजीब-सा आकर्षण था उसके व्यक्तित्व में. अभी छह माह पहले ही तो एक अतिथि शिक्षक के रूप में इस विश्‍वविद्यालय में आई थी मैं. साधिकार मेरी सारी कठिनाइयां ले ली थीं उसने. उसका सहयोगी व्यवहार था, स्वभाव का अपनापन था या विचारों और जीवन दर्शन में बिल्कुल अपने जैसे होने के कारण पनपा लगाव… जैसे-जैसे लौटने के दिन क़रीब आ रहे थे, इस सुरम्य पर्वतीय स्थल के साथ उससे बिछड़ने की, एकांत में जीभर बतिया न पाने की ख़लिश भी बढ़ती जा रही थी. जितना रूहानी सुकून इन छह महीनों में उसके सान्निध्य में मिला था, उतना तो भरी-पूरी कहलानेवाली पूरी ज़िंदगी में नहीं जिया था.

रसोई की खिड़की एक झटके के साथ खटाक से खुल गई थी और इससे पहले कि मैं कुछ संभलती-संभालती, बारिश की चंचल बूंदों से लबरेज़ शोख़ हवा पूरी स्वच्छंदता से मेरे बालों से होती हुई रोम-रोम को सहलाने लगी थी. डिब्बे और बर्तन धड़ाधड़ गिरने लगे थे और शरारती जल कण कतार बनाकर कड़ाही में कूदने लगे थे. कुल मिलाकर स्थिति मेरे नियंत्रण से पूरी तरह बाहर थी.

शुक्र था कि वो आवाज़ें सुनकर तेज़ी से रसोई में पहुंचा और लपककर खिड़की बंद करके उसके हैंडल में एक लकड़ी का टुकड़ा फंसा दिया, ताकि वो दोबारा खुल न जाए.

“आई एम सॉरी, क्या अब आप ठीक हैं?” उसने बिखरे हुए सामान को देखकर यूं झिझकते हुए पूछा जैसे ये सामान उसी ने बिखेरे हों.

“अरे नहीं, सॉरी की क्या बात है, बल्कि सॉरी तो मुझे कहना चाहिए. मैंने ही ध्यान नहीं दिया कि खिड़की खुली है. मैंने काम कम करने की बजाय बढ़ा दिया शायद.”

“ध्यान दिया भी होता, तो आप मेरी इस सिटकिनी के बारे में कैसे जान सकती थीं.  ग़लती मेरी ही है. ठीक कराना है किसी दिन, मगर जब तक काम चल रहा हो, आलस छूटता नहीं. ये दूसरी खिड़की तो किसी भी तरह पूरी बंद नहीं होती. ध्यान रखिएगा.” कहकर वो फिर जाकर सोफे पर बैठ गया.

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हवा की ख़ुमारी अपना असर दिखा चुकी थी. कड़ाही में कलछी चलाते हुए ये तीसरी बार था, जब मुझे लगा कि उसने मेरे गालों पर गिर आई लट को बड़ी नफ़ासत के साथ उठाकर कान के पीछे खोंस दिया है. हर बार चौंककर पीछे मुड़ती और वहां किसी को न पाकर राहत की सांस लेती, पर अबकी तो हद ही हो गई. लगा कि उसने पीछे से आकर कमर में बांहें कस दी हैं. हड़बड़ाकर झटके के साथ मुड़ी, तो पाया ये शैतानी हवा की थी. किचन टॉवेल हवा के झोंके के साथ उड़कर कमर से लिपट गया था. राहत की सांस के साथ एक शैतान प्रश्‍न मन में कुलबुला गया. ‘मैं डर रही हूं या चाह रही हूं कि वो? क्या…? नहीं… ऐसा नहीं हो सकता. उफ़़्फ्! मन की ये कौन-सी खिड़की है, जिसमें सिटकिनी लगाने का काम मैंने टाल दिया था? टाल दिया था या संभव ही नहीं था.’

कुछ अजीब-सा आकर्षण था उसके व्यक्तित्व में. अभी छह माह पहले ही तो एक अतिथि शिक्षक के रूप में इस विश्‍वविद्यालय में आई थी मैं. साधिकार मेरी सारी कठिनाइयां ले ली थीं उसने. उसका सहयोगी व्यवहार था, स्वभाव का अपनापन था या विचारों और जीवन दर्शन में बिल्कुल अपने जैसे होने के कारण पनपा लगाव… जैसे-जैसे लौटने के दिन क़रीब आ रहे थे, इस सुरम्य पर्वतीय स्थल के साथ उससे बिछड़ने की, एकांत में जीभर बतिया न पाने की ख़लिश भी बढ़ती जा रही थी. जितना रूहानी सुकून इन छह महीनों में उसके सान्निध्य में मिला था, उतना तो भरी-पूरी कहलानेवाली पूरी ज़िंदगी में नहीं जिया था. उसमें वो सब कुछ था, जो मुझे अभिजात से नहीं मिला था, जिसकी ख़लिश उससे मिलने के बाद बढ़ती जा रही थी. उसकी नि:स्वार्थ फ़िक़्र, सहेजने की आदत, मैं चाहूं, तो हर सहायता को तत्पर, न चाहूं, तो पूरी तरह निर्लिप्त. उसकी शिष्टता ने चुंबक बनकर मन के सारे तालों की चूलें हिला दी थीं. मन खुलने लगा था. उससे बात करने में वो नैसर्गिक आनंद मिलने लगा था, जिससे मुंह मोड़ना मेरे वश के बाहर हो चुका था. दिल होता था, वो मन को सहलाए और सहलाता ही जाए. क्या यही कारण था कि आज ये जानते हुए भी कि उसकी पत्नी यहां नहीं है, मैंने भीगते हुए घर जाने की बजाय बारिश रुकने तक उसके घर पर रुकने का उसका आमंत्रण स्वीकार कर लिया था?

चाय-नाश्ता लेकर ड्रॉइंगरूम में पहुंची, तो उसकी मुद्रा संकोच से भर गई.

“सॉरी, घर में कुछ बना हुआ नहीं था, आपको मेहनत करनी पड़ी.” मैंने मुस्कान से ही ‘इट्स ओके’ कह दिया.

“क्या लगता है आपको? कितनी देर में थम जाएगी ये बारिश?” बहुत सोचने के बाद भी इसके अलावा और कोई वाक्य मेरे समझ में नहीं आया.

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“जल्द ही. धीमी तो हो गई है शायद.” उसने सांत्वना देने की कोशिश तो की, मगर तुरंत ही टीन की छत पर बारिश का शोर यूं बढ़ गया, जैसे उसके झूठ पर अपना प्रतिरोध प्रकट कर रही हो. और इस शोर पर बहुत नन्हीं-सी हंसी हम दोनों के ही होंठों पर कूदकर, फिर छिप गई. टीन की छत पर धीमी-तेज़ होती आवाज़ें बता रही थीं कि तूफ़ान तेज़ था, पर बारिश यों बरस रही थी जैसे जल्दी कहीं पहुंचना हो, लेकिन बहुत सारे गति-अवरोधकोंवाली सड़क पर गाड़ी चलानी पड़ रही हो. लाइट नहीं आ रही थी. कमरे में सिगड़ी का मध्यम प्रकाश था, रूह में उतरने को आतुर रूमानी हवा और उसकी बोलते जाने की आग्रही मुद्रा और निगाहों की सौम्य पिपासा मुझे ख़ुद से डराने लगी थी. दर्शन, अध्यात्म, साहित्य या कॉलेज की समस्याएं… कोई भी विषय मेरी अचकचाहट कम नहीं कर पा रहा था.

 

 

bhavana prakash

भावना प्रकाश

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