कहानी- लौटती बहार 3 (Story Series- Lautati Bahar 3)

जयपुर आने से पहले वे भी नहीं चाहते थे विवाह करना, पर यहां आकर, वंदना से मिलकर एक ख़्वाब पलने लगा है मन में. जीवन में फिर से वो बहार लौटती लग रही है. उधर वंदना के परिजन भी उसकी संपत्ति चाहते हैं. हम किसी की परवाह नहीं करेंगे. हम विवाह ज़रूर करेंगे. यह तय करते ही उनका मन उत्साह से भर उठा. वे सुखद कल्पनाओं में विचरण करने लगे. सुनीता और वंदना… वंदना और सुनीता… दोनों चेहरे एकमेव हो रहे थे. वही एहसास… वही चाहत… वही आकर्षण और वही जलतरंग…

गुबरेलेजी को वंदना का बोलना अच्छा लग रहा था. अचानक वंदना ने गुबरेलेजी की ओर देखा. उन्हें अपनी ओर ताकता हुआ पाकर वह सकुचा गई. वंदना की आंखों में उन्हें अपने प्रति आकर्षण की गहराई

दिखाई दी. उन्हें भी उससे जुड़ाव महसूस होने लगा. बातों से पता चला कि वंदना गुबरेलेजी से शादी करना चाहती है, लेकिन चूंकि गुबरेलेजी बच्चों के विरोध के कारण फैसला नहीं ले पा रहे हैं, इसलिए समस्या का समाधान नहीं हो पाया.

रात को खाना खाते समय गुबरेलेजी ने विमला से कहा, “मैं कल वापस जा रहा हूं, अब क्या करना यहां रुककर?”

नवीन ने कहा, “अभी आप क्या करेंगे वहां जाकर?” तभी गुबरेलेजी के मोबाइल पर रिंग बजी. वे चौंक गए. विमला उनके चेहरे के भावों को पढ़ते हुए बोली, “किसका फ़ोन है?”

“अरे, आज तो वरुण का फ़ोन आया है.” गुबरेलेजी सहित सभी लोग आश्‍चर्यमिश्रित हर्षातिरेक में आ गए. गुबरेलेजी ने स्पीकर ऑन कर दिया. कॉल रिसीव करके उत्साहित होते हुए कहा, “बेटा, कैसे हो?”

इस प्रश्‍न का कोई उत्तर नहीं आया, बल्कि उनसे ही प्रश्‍न पूछा गया, “पापा, क्या आप शादी कर रहे हैं?”

वे अचकचा गए. क्या उत्तर दें? “तुम्हें किसने बताया? सात समंदर दूर मेरी बीमारी की ख़बर तो नहीं पहुंची, अलबत्ता शादी की ख़बर ज़रूर पहुंच गई.”

“अप्पू का फ़ोन आया था.”

“क्या कहा अप्पू ने?”

उधर से झल्लाया हुआ वरुण बोला, “पापा, आप शादी न करें. इस उम्र में शोभा देगा क्या? देखिए, हम लोगों की भी इमेज का सवाल है?”

पश्‍चिमी सभ्यता में रचा-बसा उनका बेटा आज अच्छे-बुरे की वकालत कर रहा है.

“फिर आप समझते क्यों नहीं? प्रॉपर्टी का क्या होगा?” इस वाक्य ने उनके पैरों तले ज़मीन खिसका दी. अब उन्हें समझ आया कि वरुण क्यों ज़िद कर रहा था कि सब कुछ बेचकर उसके पास चले आओ.

गुबरेलेजी बेटे के मोह में सब कुछ बेचकर जाने को तैयार भी हो गए थे. अख़बार में विज्ञापन भी दे दिया था. उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी फ़ोन करके बेटे को इसकी सूचना भी देनी चाही, पर बातों-बातों में पता लगा कि वो उन्हें अपने साथ नहीं, वरन् ‘सीनियर सिटीज़न हाउस’ में रखना चाहता है, जो एक तरह से वृद्धाश्रम है.

उन्होंने वरुण को कोई उत्तर नहीं दिया, मोबाइल बंद कर दिया. वे कुछ फैसला नहीं ले पा रहे थे. विमला और नवीन भी अचंभित थे वरुण की बात सुनकर. इतने वर्षों बाद फ़ोन, वो भी इस तरह से.

गुबरेलेजी के हृदय में तूफ़ान उठ रहा था. उन्हें अब समझ आ रहा था कि अब तक वरुण शांत था, क्योंकि उनकी सारी संपत्ति उसी की तो थी, पर अब संपत्ति छिनने का भय उसके मस्तिष्क पर हावी हो रहा था. वे कमरे में चहलक़दमी करने लगे. सब शांत थे, पर अंदर हलचल लिए. उन्होंने सबके चेहरों की ओर देखा, फिर मोबाइल पर कॉल करने लगे. उधर अमिता थी.

उसने पापा से सबसे पहला प्रश्‍न किया, “पापा, आपने क्या सोचा?”

“बेटा, तुम क्या चाहती हो ?”

“पापा, इतनी उम्र गुज़र गई, अब क्या करेंगे शादी करके…?”

यह भी पढ़ें: करें नई इनिंग की शुरुआत

“वंदना को भी ज़रूरत है मेरी…”

“दो दिन में ही आप अपने ख़ून के रिश्तों को भूलकर दूसरे के बारे में सोचने लगे?”

“नहीं, यह बात नहीं है बेटा. मुझे समझने की कोशिश करो…”

“तो ठीक है, लुटा देना अपना पूरा पैसा उस दूसरी औरत पर…”

यह दूसरा अवसर था, जब गुबरेलेजी हक्के-बक्के रह गए. अब उन्हें समझ आ रहा था कि बच्चे उनकी शादी का विरोध क्यों कर रहे हैं.

वे रातभर करवटें बदलते रहे, एक निश्‍चित किंतु दृढ़ निर्णय लेने के लिए, जैसे दही मथने के बाद मक्खन ऊपर तैर आता है.

वे निरंतर सोच में डूबे रहे. मैंने अपने बच्चों के सुख के लिए, अपने सुख-वैभव के दिन यों ही अकेले गुज़ार दिए. जब जिसने जो इच्छा की, हर संभव पूरी की. बेटे ने विदेशी लड़की से शादी करनी चाही, मैंने विरोध नहीं किया. लड़की ने अंतरजातीय विवाह करना चाहा, मैंने सहमति दी. समाज और रीति-रिवाज़ों, परंपराओं के विरुद्ध जाकर उन लोगों के हर सुख के आगे अपनी इच्छाएं, आकांक्षाएं सब कुर्बान कर दीं. सुनीता की मृत्यु के बाद कितने रिश्ते आए थे कुंवारी लड़कियों के भी. आख़िर मैं बैंक की नौकरी में था और हर दृष्टि से योग्य भी. बच्चों को कोई असुविधा न हो या समाज बच्चों के मन में ‘सौतेला’ शब्द न उगा दे, यही सोचकर मैं बच्चों में ही डूबा रहा. अब मैं अकेला हूं. नितांत अकेला. पर उन लोगों को मेरी संपत्ति से मोह है, मुझसे कोई सरोकार नहीं. मेरे प्यार का, मेरे विश्‍वास का, मेरी आत्मीयता का अच्छा सिला दे रहे हैं ये लोग. उनके मन में एक ज़िद पलने लगी.

जयपुर आने से पहले वे भी नहीं चाहते थे विवाह करना, पर यहां आकर, वंदना से मिलकर एक ख़्वाब पलने लगा है मन में. जीवन में फिर से वो बहार लौटती लग रही है. उधर वंदना के परिजन भी उसकी संपत्ति चाहते हैं. हम किसी की परवाह नहीं करेंगे. हम विवाह ज़रूर करेंगे. यह तय करते ही उनका मन उत्साह से भर उठा. वे सुखद कल्पनाओं में विचरण करने लगे. सुनीता और वंदना… वंदना और सुनीता… दोनों चेहरे एकमेव हो रहे थे. वही एहसास… वही चाहत… वही आकर्षण और वही जलतरंग…

इसी ऊहापोह में सुबह हो गई. सुबह की सैर के लिए लोग निकलने लगे थे. आज गुबरेलेजी ने जल्दी ही बिस्तर छोड़ दिया और नित्य कर्म से निबट गए. उन्होंने विमला और नवीन को बुलाकर अपना फ़ैसला सुना दिया कि वे वंदना को ही अपना जीवनसाथी बनाएंगे. वे तैयार हुए और वंदना के घर की ओर चल दिए.

       डॉ. पद्मा शर्मा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES