कहानी- प्रेम ना बाड़ी उपजे ...

कहानी- प्रेम ना बाड़ी उपजे 4 (Story Series- Prem Na Badi Upje 4)

किवाड़ राधिका ने ही खोला था. भैया साथ न होते, तो वह मुझे पहचानती भी न. कैसा तो अजब सन्नाटा पसरा था घर में. किसी व्यक्ति के कुछ समय के लिए कहीं जाने और सदैव के लिए चले जाने का इतना फ़र्क़ पड़ता है क्या उस घर के माहौल पर?

 

… आयुष की ड्यूटी कोविड वाॅर्ड में लगी हुई थी और वहीं से उसे संक्रमण हुआ था. गंभीर हालत होने के बावजूद उसका बुखार उतर गया था, कोविड भी ठीक हो गया था, परन्तु फेफड़ों पर गहरा असर कर गया था और बहुत इलाज के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका था.
अवसर मिलते ही मैंने भैया से कहा, “भैया, आपने मुझे बताया नहीं? हर रोज़ ही तो हमारी बात होती रहती थी.”
“तुम उसे एक बार पहले भी खोने का दर्द सहन कर चुकी थी बहना. अब दुबारा ही दर्द नहीं देना चाहता था.”
“आप जानते थे भैया?”
“जानता था मेरी बहना. तुम्हारा दर्द समझता था, पर प्यार मांगा नहीं जाता. दोषी वह भी नहीं था. उसे तुम अच्छी लगती थी, परन्तु उस तरह से नहीं जैसा तुम चाहती थी और इसीलिए तुम्हें बताया भी नहीं. तुम अकेली वहां इस हादसे का सामना कैसे करती?
इतना भला आदमी और इतनी कम उम्र लिखवा कर लाया था.
आयुष की बीमारी के दिन हमारे बहुत मुश्किल से बीते. दिन-रात उधर ही ध्यान लगा रहता. बुआ और उसकी पत्नी छवि को क्या कहकर दिलासा देते? कोविड १९ के मरीज़ों से मिलने की इजाज़त किसी को नहीं दी जाती थी. अस्पतालवालों ने उसके इलाज में कोई कमी नहीं छोड़ी, पर एक फेफड़ा बहुत ख़राब हो चुका था. सब कोशिशों के बावजूद भी उसे बचाया नहीं जा सका. कैसी बेबसी से भरे दिन थे वह छवि, बयान नहीं कर सकता. सामने खड़े शत्रु से लड़ने के तो सौ उपाय हैं, पर एक अदृश्य शत्रु से कैसे लड़ा जाए?
अंत समय उस का चेहरा भी किसी ने नहीं देखा. रिश्तेदारों में से कोई कैसे आता? बिना कुछ कहे, बिना किसी से विदा लिए चुपचाप चला गया मेरा बाल सखा. हमारा यह हाल है तो उसकी पत्नी की सोचो. बुआ तो तब से बिस्तर पर ही हो गई हैं. ऐसा लगता है कि हम सब स्वयं को किसी तरह दिन रात ठेल रहे हैं.”
उस घर में मैं हज़ारों बार गई हू, पर आज अकेली जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. मैंने भैया को साथ चलने को कहा.
किवाड़ राधिका ने ही खोला था. भैया साथ न होते, तो वह मुझे पहचानती भी न. कैसा तो अजब सन्नाटा पसरा था घर में. किसी व्यक्ति के कुछ समय के लिए कहीं जाने और सदैव के लिए चले जाने का इतना फ़र्क़ पड़ता है क्या उस घर के माहौल पर?

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बुआ भीतर लेटी थीं, निर्जीव किसी गठरी सी. सब कुछ तो पहचाना हुआ था. हम सोफा पर बैठ गए. बच्चा नीचे खिलौनों से खेल रहा था. राधिका अपने बेटे के पास ज़मीन पर जा बैठी. उस दिन तो हम थोड़ी ही देर बैठे, परन्तु उसके बाद मुझे जब भी अवसर मिलता मैं राधिका के पास जा बैठती. उसे आयुष की बातें करना अच्छा लगता था. किसी और से खुलकर उसकी बातें करती भी तो किससे? अनेक बार उसे याद कर रो पड़ती. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार भी अपने दुख को बाहर निकालना बहुत आवश्यक है, उसके बाद ही ज़ख़्म भरने शुरू हो सकते हैं. अत: मैं जी कड़ा कर सुनती रहती.

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

Usha Wadhwa

उषा वधवा

 

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