कहानी- रूहानी रिश्ता 2 (Story Series- Ruhani Rishta 2)

दीदी के साथ जीजाजी अक्सर कार्यक्रमों में शामिल होते थे. वहां उन दोनों का प्रेम चर्चा का विषय बन जाता था. जीजाजी जब तैयार होते तो दीदी के सम्मुख खड़े हो बड़े प्यार से पूछते, “कृष्णा, देखो ठीक लग रहा हूं न?” हम सभी मुस्कुरा उठते. दीदी भी ठीक उसी अंदाज़ में जब पूछतीं, “सुनिए, ठीक लग रही हूं?” तो जीजाजी कहते, “ठीक नहीं, बेहद ख़ूबसूरत लग रही हो. काला टीका भी लगा लेना, कहीं किसी की नज़र न लग जाए.”

जीवन सहजता से गुज़रता रहा. शादी के पश्‍चात् मैं भी दूसरे शहर चली गई, लेकिन हमारे बीच पत्र-व्यवहार और फ़ोन द्वारा संपर्क बना रहा. पारिवारिक कार्यक्रमों में साल-दो साल में मिलना हो ही जाता था. दीदी के साथ जीजाजी अक्सर कार्यक्रमों में शामिल होते थे. वहां उन दोनों का प्रेम चर्चा का विषय बन जाता था. जीजाजी जब तैयार होते तो दीदी के सम्मुख खड़े हो बड़े प्यार से पूछते, “कृष्णा, देखो ठीक लग रहा हूं न?” हम सभी मुस्कुरा उठते. दीदी भी ठीक उसी अंदाज़ में जब पूछतीं, “सुनिए, ठीक लग रही हूं?” तो जीजाजी कहते, “ठीक नहीं, बेहद ख़ूबसूरत लग रही हो. काला टीका भी लगा लेना, कहीं किसी की नज़र न लग जाए.”

मौसी बताती थीं कि जब कृष्णा दीदी मायके आती थीं तो जीजाजी की लिखी एक चिट्ठी रोज़ डाकिया लेकर आता. छोटे भाई-बहन उसे छेड़ते थे कि इतना भी क्या दीवानापन है, रोज़ चिट्ठी लिखने बैठ जाते हैं. उनसे कहो थोड़ा सब्र रखें. पंद्रह-बीस दिन इतने लंबे तो नहीं होते… दीदी केवल मुस्कुरा देतीं, लेकिन उनके चेहरे की लालिमा और ख़ुशी देख सभी संतुष्ट होते कि बेटी अपने घर सुखी है.

समय का चक्र अपनी गति से चलता रहा. दीदी के बच्चे पढ़-लिखकर उच्च शिक्षित हो गए. बेटे की एक अच्छी कंपनी में नौकरी लग गई, लेकिन दूसरे शहर में. इधर बेटी के लिए अच्छा वर मिल गया तो उसकी  भी आनन-फानन में शादी हो गई. अब दीदी-जीजाजी अकेले रह गए थे. कई बार उनका फ़ोन आता, “क्या कर रही हो? अब तो तुम्हारे दोनों बेटे भी बड़े हो गए हैं. कॉलेज जा रहे हैं. आ जाओ न कुछ दिनों के लिए, साथ रहेंगे.” पति व बच्चों की तरफ़ से हरी झंडी मिलने पर मैं सप्ताह भर के लिए कृष्णा दीदी के पास चली गई.

कृष्णा दीदी कभी चाय नहीं पीती थीं. यहां मैंने देखा, सवेरे ट्रे में तीन प्याले चाय व बिस्किट रखकर वे बोलीं, “अनु, चलो बेड टी ले लें.” मैंने हैरानी से पूछा, “दीदी, आप तो चाय के नाम से ही चिढ़ती थीं. ज़िंदगी में कभी चाय पीते आपको नहीं देखा. यह करिश्मा कब से हो गया?” वे मुस्कुराते हुए बोलीं, “जब ज़िंदगी में कोई टूटकर चाहनेवाला मिल जाए, जिसे आपसे शारीरिक नहीं आत्मिक प्रेम हो तो जीवन में करिश्मे होते ही रहते हैं. मैं तो स़िर्फ चाय पीने लगी हूं, जबकि ये तो मेरी पसंद की फ़िल्में, नाटक, प्रदर्शनी तक देखने चल पड़ते हैं. इनको ऐसा कोई शौक़ ही नहीं था. क्रिकेट मैच से मेरा कभी वास्ता नहीं रहा, लेकिन अब इनके साथ बैठकर टी.वी. पर पूरा मैच शौक़ से देखती हूं. इन्हें बहुत पसंद है न!” मैं मंत्रमुग्ध-सी उनकी बातें सुनती रही.

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“जीवनसाथी का अर्थ ही होता है- जीवन साथ-साथ जीना. जिनमें परस्पर प्यार, विश्‍वास, समर्पण, आदर, अपनत्व होगा, उन्हीं का जीवन सहज होगा, उमंग-उत्साह से भरा होगा, वरना दो ध्रुवों की तरह हो जाएगा, जो आपस में कभी नहीं मिलते. अब तक बिताई अपनी ज़िंदगी से मैंने यही अनुभव किया है. अगर सच्चे दिल व पूरे निष्ठा से प्रयास किया जाए तो हम जीवन को बड़ी ख़ूबसूरती से अपने ढंग से जी सकते हैं.”

रात के खाने के बाद हम दोनों बैठ पुरानी स्मृतियों को यादकर गपशप में मशगूल थीं. ठंड के शुरुआती दिन थे. हल्की ठंडी हवा खिड़की के रास्ते बीच-बीच में आकर ख़ुशनुमा एहसास दिला रही थी. दीदी शायद थक गई थीं. कुछ देर बाद ही उनींदी-सी हालत में बोलीं, “मुझे नींद आ रही है. तुम भी सो जाओ, बाकी बातें कल करेंगे?” मुझे अभी नींद नहीं आ रही थी. अतः क़िताब पढ़ने लगी. कुछ देर बाद जीजाजी वहां आए. दीदी को सोते हुए देखा तो आलमारी में से कंबल निकालकर उन पर ओढ़ाते हुए बोले, “जब से कृष्णा को थायरॉइड की बीमारी हुई है, इसे ठंडी अधिक लगती है, पर अपना ख़याल ही नहीं रखती. ऐसे ही सो गई, लेकिन मेरे नाश्ते से लेकर खाने, पहनने-ओढ़ने, दवा आदि सब का ख़याल इसे रहता है. हर कार्य समय से करती है. सचमुच इसके बगैर तो मैं अधूरा हूं.”

अगले दिन दीदी उठीं तो बोलीं, “रात को नींद तो अच्छी आई, फिर भी न जाने क्यों सिरदर्द हो रहा है.” जीजाजी फौरन बोले, “तुम आराम करो. मैं चाय बना लेता हूं.” मैं जब चाय बनाने के ख़याल से उठने लगी तो उन्होंने यह कहकर मुझे बैठा दिया कि सालीजी कभी हमारे हाथ की चाय पीकर भी देखिए. ट्रे में चाय के साथ मठरी व बिस्किट लेकर वे कुछ ही देर में प्रकट हो गए. चाय वाकई बहुत अच्छी बनी थी. मैंने कहा, “दीदी, सचमुच तुम ख़ुशक़िस्मत हो, जिसे जीजाजी जैसा जीवनसाथी मिला है.” दीदी स्वीकृति में मुस्कुरा दीं. उनकी शादी के बाद से जीजाजी का दीदी के प्रति जो निर्मल, निश्छल प्रेम-स्नेह देखा था, वह ज्यों का त्यों बरक़रार था.

अब दो वर्षों के बाद दीदी से मिलने गई थी. ताज्जुब हुआ कि इस बार वे पहले की तरह चुस्त, ख़ुश व उत्साहित नहीं हैं. चेहरे से ही स्पष्ट हो रहा था कुछ तनाव में हैं.

Narendra Kaur Chhabra

नरेंद्र कौर छाबड़ा

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