कहानी- रूहानी रिश्ता 1 (Story Series- Ruhani Rishta 1)

जो भी लोग शादी में शामिल थे, सभी ने दबी ज़ुबान से जीजाजी के व्यक्तित्व को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रिया की थी. जीजाजी का व्यक्तित्व दीदी के सामने एकदम बौना था. गहरा रंग, छोटा क़द और कुछ भारी शरीर. कुछ महिलाओं ने तो दबी ज़ुबान में यह भी कह दिया था, “कृष्णा के लिए यही लड़का इनको नज़र आया? चांद में ग्रहण लग गया-सा प्रतीत होता है.” कुछेक इससे भी आगे निकल गईं, “अपनी कृष्णा की तो छूने भर से मैली हो जानेवाली रंगत है. इसके साथ रहकर तो वह भी काली हो जाएगी. संगत का असर तो होता ही है न…” कनखियों से इशारेबाज़ी, हंसी-ठट्ठा होता रहा, लेकिन इन सबसे बेख़बर मौसा-मौसी बड़े चाव, उत्साह, उमंग से शादी की रस्मों को पूरा करने में व्यस्त रहे.

जीजाजी यानी मेरी मौसेरी बहन कृष्णा के पति का फ़ोन था, “क्या बात है सालीजी, आजकल याद ही नहीं करतीं? तुम्हारी दीदी कुछ बीमार चल रही है, बहुत याद कर रही है तुम्हें. थोड़ा समय निकालकर मिलने आ जाओगी तो उसे अच्छा लगेगा.”

“क्या हो गया दीदी को? कोई सीरियस बात तो नहीं…” अनायास मेरी आवाज़ में गंभीरता आ गई थी.

“नहीं, ऐसी भी कोई सीरियस बात नहीं है, तुम परेशान मत हो, लेकिन आ जाओगी तो उसे ख़ुशी होगी.”

“ठीक है जीजाजी, मैं जल्दी ही आने का प्रोग्राम बनाऊंगी.” कहकर मैंने फ़ोन रख दिया. सोचने लगी, कितने दिन हो गए कृष्णा दीदी से मिले. हां, लगभग दो साल का व़क़्त बीत चुका है. यह तो विज्ञान की मेहरबानी है कि फ़ोन, मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट पर चैटिंग, वेब कैम से प्रत्यक्ष बातचीत हो जाती है. दीदी और मेरे बीच भी फ़ोन पर महीने में एक-दो बार तो अवश्य बातचीत होती थी. अभी कुछ दिन पहले फ़ोन लगाया था, पर दीदी से बात नहीं हो सकी थी. जीजाजी ने ही फ़ोन उठाया था और कहा था, “तुम्हारी दीदी सोई हुई हैं. आजकल थोड़ा-सा काम करने पर ही थक जाती हैं.”

“तबियत तो ठीक है न? डॉक्टर को दिखाया…?” मेरी आवाज़ में चिंता महसूस कर वे बोले, “पूरा चेकअप कराया है, चिंता की कोई बात नहीं.” फिर मैं भी अपनी पारिवारिक और सामाजिक व्यस्तताओं में खो गई और दीदी का भी फ़ोन नहीं आया.

बेशक जीजाजी ने दीदी के स्वास्थ्य के बारे में चिंता जैसी बात से इंकार किया था, लेकिन मुझे अंदर से महसूस हो रहा था कि दीदी के साथ ज़रूर कुछ प्रॉब्लम है, वरना वे ख़ुद फ़ोन पर बात करतीं. उनसे मिलने की इच्छा बलवती होने लगी. दो वर्ष में तो मनुष्य के जीवन में कितना कुछ बदल जाता है. पता नहीं, दीदी के साथ सब ठीक चल रहा है या नहीं?

कृष्णा दीदी और मेरी उम्र में चार-पांच वर्ष का अंतर था. एक ही शहर और एक ही मोहल्ले में रहने के कारण हमारा रोज़ ही मेल-मिलाप होता था. हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ती थीं. स्कूल घर से एक किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर था, लेकिन हम दोनों पैदल ही बड़ी सहजता से जाती-आती थीं. मोहल्ले की और दो-तीन लड़कियां भी हमारे साथ चल पड़तीं. बातें करते, गप्पे लड़ाते दूरी का एहसास ही नहीं होता था. शाम को हम सब मोहल्ले के सार्वजनिक बगीचे में इकट्ठे होते. कुछ देर खेलते, कुछ क़िस्से-कहानियां सुनते-सुनाते और शाम ढलने से पहले अपने-अपने घर लौट जाते. कितने ही वर्षों तक हमारी यही दिनचर्या रही. चूंकि हमारे घर फ़िल्में, नाटक आदि देखने पर पाबंदी थी, अतः दीदी जब भी कोई फ़िल्म देखकर आती तो उसकी कहानी हमें बगीचे में बैठकर सुनाती. हम सब बड़े चाव से सुनते. ऐसा महसूस होता, जैसे वास्तव में हम फ़िल्म ही देख रहे हों. दीदी की हायर सेकेंडरी की स्कूली शिक्षा पूरी हुई तो उनकी पढ़ाई बंद करा दी गई. घरेलू काम, जैसे- खाना बनाना, सिलाई-बुनाई उन्हें सिखाया जाने लगा, क्योंकि साल-दो साल में उनकी शादी होनी थी. दीदी काफ़ी सुंदर थीं- गोरा रंग, ऊंची क़द-काठी, आकर्षक नैन-ऩक़्श. उन्हें तो कोई भी पहली नज़र में ही पसंद कर लेता. मौसी का कहना था- स़िर्फ सूरत से कुछ नहीं होता, सीरत ज़रूरी है. लड़की में सभी गुण होने चाहिए.

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अट्ठारह वर्ष की होते ही कृष्णा दीदी की शादी तय हो गई. उनके पति पढ़े-लिखे, कॉलेज में प्राध्यापक थे. उन दिनों लड़के-लड़की के माता-पिता ही शादी तय करते थे. लड़के-लड़की का आपस में देखना, मिलना, बातचीत करने जैसी औपचारिकताओं का महत्व नहीं होता था. अगर माता-पिता को रिश्ता पसंद आ गया तो लड़के-लड़की को केवल सूचित किया जाता था. उनकी राय जानने की आवश्यकता नहीं समझी जाती थी. शादी के बाद ही दीदी व जीजाजी ने एक-दूसरे को देखा था. जो भी लोग शादी में शामिल थे, सभी ने दबी ज़ुबान से जीजाजी के व्यक्तित्व को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रिया की थी. जीजाजी का व्यक्तित्व दीदी के सामने एकदम बौना था. गहरा रंग, छोटा क़द और कुछ भारी शरीर. कुछ महिलाओं ने तो दबी ज़ुबान में यह भी कह दिया था, “कृष्णा के लिए यही लड़का इनको नज़र आया? चांद में ग्रहण लग गया-सा प्रतीत होता है.” कुछेक इससे भी आगे निकल गईं, “अपनी कृष्णा की तो छूने भर से मैली हो जानेवाली रंगत है. इसके साथ रहकर तो वह भी काली हो जाएगी. संगत का असर तो होता ही है न…” कनखियों से इशारेबाज़ी, हंसी-ठट्ठा होता रहा, लेकिन इन सबसे बेख़बर मौसा-मौसी बड़े चाव, उत्साह, उमंग से शादी की रस्मों को पूरा करने में व्यस्त रहे.

शादी के बाद जब-जब दीदी मायके आतीं, उनकी खिली-खिली रंगत और दमकता चेहरा उनकी ख़ुशहाल ज़िंदगी के सबूत पेश करते. पांच वर्षों में वे दो बच्चों की मां बन अपनी घर-गृहस्थी में पूरी तरह रम गई थीं. अपने सुखी वैवाहिक जीवन के बारे में बताते हुए वे हमेशा कहतीं, “मैं बड़ी भाग्यशाली हूं, जो मुझे ऐसा पति मिला है, जिसमें सभी मानवीय गुण हैं. मुझे उनसे प्रेम, अपनापन, सहयोग, प्रेरणा सभी कुछ मिला है.”

Narendra Kaur Chhabra

नरेंद्र कौर छाबड़ा

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जो भी लोग शादी में शामिल थे, सभी ने दबी ज़ुबान से जीजाजी के व्यक्तित्व को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रिया की थी. जीजाजी का व्यक्तित्व दीदी के सामने एकदम बौना था. गहरा रंग, छोटा क़द और कुछ भारी शरीर. कुछ महिलाओं ने तो दबी ज़ुबान में यह भी कह दिया था, “कृष्णा के लिए यही लड़का इनको नज़र आया?
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