कहानी- शुभचिंतक 1 (Story Series- Shubhchintak 1)

पत्र देखकर मां घबरा उठी थीं. ये हमारा नाम कैसे जानता है? अरे, ये तो राजकुमार को भी जानता है? बाबा के आते ही बोली थीं, “देखो तो, किसी ने कैसा ग़ज़ब किया है. पहले ही सांवले रंग के कारण रिश्तों का अकाल है. अब ऐसी चिट्ठी के बाद कौन करेगा रिश्ता?” कहारिन के हाथ बर्तन घिस रहे थे, लेकिन कान मां के शब्दों का ज़ायका ले रहे थे. बाबा ने चिट्ठी अपने हाथ में ले ली थी और एक ही सांस में पढ़ गए. फिर हंसते हुए चिट्ठी मेरे हाथ में थमा दी थी. चिट्ठी पढ़कर मैं पसीने-पसीने हो गई थी. फिर भी हंसने की कोशिश की थी, “पर बाबा….”

उस कलंक की पीड़ा थी, जो कभी भी अपनी कालिमा से उसके अंतर्मन को मुक्त नहीं होने देगा. कलंक की पीड़ा झेलने से ज़्यादा कष्टदायी स्थिति तो यह थी कि जिस व्यक्ति के कारण मान-सम्मान पर गहरा-आघात लगा, वो महानता और सज्जनता का पर्याय बना बरसों, बल्कि कहूंगी आजीवन प्रशंसा के फूल बटोरता रहा. जिस झटके से मैं उठी थी और जिस मनोवेग में आकर प्रबलता से सामान बांधा था, वह टूटने व क्षीण होने लगा. सहसा ही हाथ-पैर बोझिल व शिथिल होने लगे. नारीशक्ति, आत्मविश्‍वास, इच्छाशक्ति जैसे शब्द संबलहीन हो ढहने लगे. क्या यही मेरी असली पहचान है? क्या वाकई डॉ. प्रतिमा वर्मा, हिंदी विभाग इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के विभागाध्यक्ष डॉ. विजय वर्मा की पत्नी इतनी कमज़ोर, लाचार व असहाय होनी चाहिए? नहीं! लेकिन सच यही है. इधर पति है, सम्मान है, उसकी अपनी एक पहचान है, उधर मां-बाप हैं, जो उसके सुख में आनंद पाते हैं, उसके दुख से आकुल-व्याकुल हो उठते हैं. कुछ निर्णय ले सकूं या तय कर पाऊं ये तो दूर की बात है. पहले इस आघात को सहने की शक्ति तो मिले. जो सोच रही हूं या जो चाहत होगी वो मां-बाबा के समक्ष रख पाऊंगी? क्या चालबाज को चालबाज कह पाऊंगी? क्या मां-बाबा को इस बात का विश्‍वास दिला पाऊंगी?
मां तर्क भाषा तो मानेंगी, किंतु समाज के डर से उनका मन उन तर्कों को दिल से बाहर आने ही नहीं देगा. बाबा जितने शांत थे, मां उतना ही हल्ला मचाए रहती थीं और मां का यही रवैया ज़िम्मेदार था कि घर की चारदीवारी से उठकर तूफ़ान दीवारों से आर-पार हो जाता था. उस पत्र के साथ भी यही हुआ था.
नुक्कड़-नुक्कड़ पर पान की हर छोटी-बड़ी दुकान पर उस चिट्ठी की चर्चा हुई थी. बड़े शहर के छोटे-मोटे मोहल्लों में कोई बात घर की दीवारों तक सीमित नहीं रह पाती है. वो गुमनाम पत्र भी तो मां के नाम आया था. भेजनेवाला जैसे मां के स्वभाव से परिचित था. पत्र देखकर मां घबरा उठी थीं. ये हमारा नाम कैसे जानता है? अरे, ये तो राजकुमार को भी जानता है? बाबा के आते ही बोली थीं, “देखो तो, किसी ने कैसा ग़ज़ब किया है. पहले ही सांवले रंग के कारण रिश्तों का अकाल है. अब ऐसी चिट्ठी के बाद कौन करेगा रिश्ता?” कहारिन के हाथ बर्तन घिस रहे थे, लेकिन कान मां के शब्दों का ज़ायका ले रहे थे. बाबा ने चिट्ठी अपने हाथ में ले ली थी और एक ही सांस में पढ़ गए. फिर हंसते हुए चिट्ठी मेरे हाथ में थमा दी थी. चिट्ठी पढ़कर मैं पसीने-पसीने हो गई थी. फिर भी हंसने की कोशिश की थी, “पर बाबा….”

“हां, हां! मैं जानता हूं तुम्हारा इस पत्र से कोई संबंध नहीं है, किसी विकृत मनःस्थिति वाले व्यक्ति की निकृष्ट हरकत है यें. कुछ लोग इतनी नीच प्रकृति के होते हैं कि उनसे दूसरे की सुख-शांति देखी नहीं जाती. दूसरों को मानसिक यातना देने में ऐसे लोगों को सुख मिलता है.”

फिर मेरे हैरान-परेशान चेहरे को देख बोले, “बेटी, जो दूसरों को पीड़ा देने में सुख का अनुभव करे उसे तो मानसिक रोगी ही माना जाएगा ना? इसे एक दुःस्वप्न समझ कर भूल जाओ.”
मां चिंतित तो हुई थीं, परंतु बाबा की इस व्याख्या व रवैये से हल्की हो गई थीं. मैंने पत्र को मुट्ठी में ज़ोर से दबा दिया, मानो वो चिट्ठी न होकर लिखने वाले की गर्दन हो. बाद में उसे आलमारी में रख दिया. सोचा, शिल्पा को दिखाऊंगी, वो पक्की जासूस है. कुछ तो पता करेगी. लेकिन तुरंत ही ख़याल आया, यदि उसने अन्य सहेलियों को बता दिया तो? नहीं, दिखाना ग़लत होगा. बाबा ठीक कहते हैं, इसे भूल जाना ही बेहतर है. लेकिन अर्धचेतन मन में वो पत्र सदा ही साफ़ शब्दों में ज्यों का त्यों अंकित रहा.
कभी शक़ होता- स्वयं राजकुमार ने ही तो नहीं लिखी…? मुझे बदनाम करके अपने नाम के साथ मेरा नाम जोड़कर कोई अतृप्त अभिलाषा पूरी करना चाहता हो? लेकिन भला वो ऐसा क्यों करेगा? वो बुरा आदमी है दुनिया की नज़र में, लेकिन हमारे साथ उसका बिल्कुल अलग व्यवहार है. और फिर मुझे बदनाम करने की उसे क्या ज़रूरत है.
राजकुमार हमारे पड़ोसी हैं, दुनिया उन्हें बुरा आदमी कहती है. हमारे घर उनका आना-जाना नीता के कारण शुरू हुआ. नीता मेरी कॉलेज की सहेली थी. राजकुमार नीता के बड़े भाई हैं. नीता उन्हें राजू भाई कहती थी, इसलिए हम सहेलियां भी उन्हें राजू भाई कहने लगीं. उम्र में वो नीता से 5-6 साल बड़े थे. उन्हें शराब की आदत थी. रोज़ ही पीते थे, साथ ही हर तरह के जुए का शौक़ था. नीता के घर खानदानी पैसा था. माता-पिता की मृत्यु के बाद बहन की ज़िम्मेदारी राजू भाई ने ही संभाली थी. अपनी अनेक कमज़ोरियों के बावजूद वो अंग्रेज़ी साहित्य के अच्छे विद्वान थे, शौकिया तौर पर कॉलेज में इंग्लिश पढ़ाते थे. हम सहेलियां अक्सर उनसे पढ़ने पहुंच जाया करती थीं. नीता की शादी के बाद भी हमारे घर उनका आना-जाना यथावत बना रहा. कभी अपने अकेलेपन को बांटने, तो कभी बाबा से सलाह-मशविरा लेने. बाबा को राजू भाई पर इतना भरोसा था कि मुझे अकेले कहीं जाना होता तो राजूभाई ही साथ जाते थे. राजू भाई ने भी बाबा के इस विश्‍वास का शतप्रतिशत मान रखा.
एक शाम मां-बाबा किसी प्रसंग में गए हुए थे. उनकी अनुपस्थिति में राजू भाई आ गए. मां-बाबा घर पर नही हैं ये जानते ही वो लौटने को हुए कि मैंने आग्रह कर उन्हें थोड़ी देर के लिए रोक लिया. अकेली बहुत बोर हो रही थी. रजनीश के दर्शन पर चर्चा छिड़ी तो समय का अंदाज़ ही नहीं रहा. अचानक दरवाज़े की घंटी बजी…

प्रसून भार्गव

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