कहानी- शुभचिंतक 2 (Story Series- Shubhchintak 2)

 

“बाबा, मैं किसी की दया या एहसान का बोझ आजीवन नहीं उठा पाऊंगी.”
सुनकर वर्माजी ने मुझसे एकांत में बात करनी चाही. फिर मौका देखते ही बोले, “प्रतिमा, शायद तुम्हें विश्‍वास नहीं होगा, लेकिन जिस दिन से तुम्हें देखा है, मेरे हृदय की हर धड़कन में तुम, केवल तुम ही समायी हो. मेरा मौन प्रेम तुम्हारा शुभचिंतक रहा है. आज तक तुम्हारा हाथ न मांगना मेरी अपनी कमज़ोरी थी.”

खोला, तो देखा वर्माजी थे. बहुत अरसे के बाद आए थे. इसके पहले कुल जमा तीन बार तो हमारे घर आए थे. इन तीन मुलाक़ातों में ही उनकी पारखी दृष्टि ने हम सबको परख लिया था. धीरे-धीरे उनसे हमारी घनिष्ठता-सी हो गई. वर्माजी हमारी यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष थे. मैं उनके अंतर्गत शोध कर रही थी. औपचारिकता निभाते हुए मैंने दोनों का परिचय कराया, तो राजू भाई बोले, “हम एक-दूसरे से परिचित हैं.”
पिछले ह़फ़्ते मेरे पैर में फोड़ा हो जाने के कारण मैं कॉलेज नहीं जा पाई थी. अतः बड़े आग्रह से मैंने उन्हें आमंत्रित किया था. वैसे भी वर्माजी की मेरे ऊपर विशेष कृपा थी. वे पूरी दिलचस्पी से मेरे शोधकार्य में सहायता कर रहे थे.
वर्माजी वो अभी तक अविवाहित थे. बचपन में पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद उन्होंने अपने तीनों भाई-बहनों की शिक्षा-विवाह आदि की ज़िम्मेदारी उठाई. घर-बाहर उनके त्याग व आदर्श की चर्चा थी. परिवारों के बीच उनका उदाहरण दिया जाता था. राजू भाई के सामने भी उनके आदर्श का ज़िक्र होता था. लेकिन उन्होंने कभी उन्हें आदर्श नहीं माना. उनका मानना था कि जो व्यक्ति असामान्य ज़िंदगी जीते हैं, दुनिया की सराहना मिलने से एक आदर्श का मुखौटा चढ़ा तो लेते हैं, परंतु मानसिक तौर पर हमेशा सकारात्मक सोच नहीं रख पाते. कभी-कभी तो वे असामान्य व विकृत मानसिकता के शिकार हो जाते हैं. लेकिन प्रत्यक्ष में उन्होंने सदा ही वर्माजी का आदर किया. जबकि वर्माजी कई बार राजूभाई की कमज़ोरियों को दर्शा चुके थे. अपरोक्ष रूप से जता चुके थे कि राजू भाई की संगत उचित नहीं है. परिणामस्वरूप वर्माजी का हमारे घर आना-जाना बढ़ गया और राजूभाई का कम हो गया.
समय बीतता गया, मेरा शोधकार्य पूरा हो गया था. मैं अपने कॉलेज में पढ़ाने लगी थीं. मां मेरे विवाह को लेकर बेहद चिंतित रहने लगी थी. लेकिन उस पत्र की चर्चा हर जाने-पहचाने घर में हो चुकी थी. यदि कहीं सब कुछ ठीक रहता, तो ये आधारहीन दोष दस्तक दे जाता था. देखते-देखते मां-बाबा की लाड़ली इकलौती बिटिया 30 बसंत पार कर गई और मनोनुकूल वर का संयोग न जुट पाया. आए दिन आनेवाले वर्माजी से बाबा की अधीरता व मां की चिंतायुक्त आकुल-व्याकुल अवस्था नहीं देखी गई. अपनी सज्जनता व भलमनसाहत के साथ-साथ उदार व परोपकारी प्रवृत्ति का उदाहरण दर्शाते हुए उन्होंने ख़ुद को समर्पित कर दिया. एकबारगी तो हम सब ठगे-से रह गए. धीर-गंभीर, उम्र में 10-12 साल बड़े अध्यापक को मैं पति के रूप में नहीं पचा पा रही थी. फिर दयाभाव से स्वीकारा जाना मुझे अपना अपमान लगा था. मुझमें कोई कमी तो थी नहीं, चेहरा ख़ूबसूरत भले ही न हो, किंतु सलोना आकर्षण तो था ही. न गुणों में कमी थी, न पिता के दान-दहेज में. अवगुण था तो बस इतना कि रंग सांवला था और उस सांवले रंग के साथ जुड़ा आधारहीन कलंक.
मां-बाबा तो उनके इस प्रस्ताव के सामने नतमस्तक हो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर उठे रहे थे, लेकिन मैंने खुले शब्दों में विरोध किया था, “बाबा, मैं किसी की दया या एहसान का बोझ आजीवन नहीं उठा पाऊंगी.”
सुनकर वर्माजी ने मुझसे एकांत में बात करनी चाही. फिर मौका देखते ही बोले, “प्रतिमा, शायद तुम्हें विश्‍वास नहीं होगा, लेकिन जिस दिन से तुम्हें देखा है, मेरे हृदय की हर धड़कन में तुम, केवल तुम ही समायी हो. मेरा मौन प्रेम तुम्हारा शुभचिंतक रहा है. आज तक तुम्हारा हाथ न मांगना मेरी अपनी कमज़ोरी थी. एक तो उम्र का फ़ासला. दूसरे, डरता था कि कहीं तुम लोग इसे मेरी धृष्टता समझ मुझसे बिल्कुल ही किनारा न कर लो. तुम्हारी ना के बाद तो आत्महत्या के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता. सच मानो, मन ही मन प्रभु से प्रार्थना करता था कि मुझे मेरी प्रतिमा का साथ जीवनभर के लिए मिल जाए. तुम किसी और से बात करती या हंसती तो मेरा मन ईर्ष्या से भर उठता था. तुमने ध्यान दिया होगा कि राजकुमार के आने पर मैं उठकर चला जाया करता था.” टकटकी बांधे मैं विजय वर्मा का चेहरा देखती रह गई थी.
“प्रतिमा, ना मत कहना, मैं कोई दया या एहसान नहीं कर रहा हूं. तुमसे अपना सर्वस्व मांग रहा हूं.” उनकी दयनीय स्थिति देख मेरे आंसू निकल गए और फिर मैंने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया था. सोचा, सागर जैसा गहरा और विशाल प्यार नसीबवालों को ही मिलता है. बरसों से किसी के मन की राजरानी बनने की चाहत फूलों-सी महक गई.

प्रसून भार्गव

 

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