कहानी- शुभचिंतक 3 (Story Series- Shubhchintak 3)

 

“ये कैसा प्यार किया आपने? अपने प्रिय का ऐसा अहित? आदमी जिसे प्यार करता है, उसकी ख़ुशियों से सुख पाता है. ये कैसा प्यार था जो प्रिय को कलंक देकर तुष्ट हुआ. उसकी सारी ख़ुशियां छीन लीं. आप शुभचिंतक नहीं शिकारी थे. उस पत्र को लेकर कितनी ही रातें मैंने आंखों में काटीं. क्यों किया आपने ऐसा? कैसे कर सके इतना अहित मेरा? मेरे मां-बाबा का?” असहनीय पीड़ा मन में अनंत शूल चुभोने लगी थी.

 

फिर 30 वर्षीया प्रतिमा तथा 41 वर्षीय विजय वर्मा का ब्याह सादगीपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया. सचमुच ही मैं उनकी परम् आकांक्षा थी. ब्याह के बाद उनके व्यक्तित्व में और निखार आ गया. चेहरा दमकने लगा. जिसने भी देखा, इतना तो ज़रूर कहा कि कौन-सी जड़ी-बूटी पिलाई है? क्या खिलाती हो, जो दिन-पर-दिन युवा होते जा रहे हैं. विजय ऐसी बातों से तटस्थ रहते, किंतु मैं चिहुंक उठती, “देखा, यदि मैं न मिलती तो अब तक बुड्ढे हो जाते.” उस रात विजय कुछ ज़्यादा ही मूड में आ गए, बोले, “कैसे न मिलती? मैं एक साध्य बना लेने पर लक्ष्य प्राप्त करके ही साधना छोड़ता हूं. देख लो, छल, बल, प्यार, दया व सहानुभुति से आख़िर तुम्हें पा ही लिया.” छल शब्द ने जैसे मेरी छठी इंद्रिय को झंझोड़ कर जागृत कर दिया. मैं चौंक उठी. मेरे चेहरे पर उभरे भावों को देख वर्माजी सहम गए थे. मुझे वही पुराना पत्र याद आ गया.
मस्तिष्क में ‘शुभचिंतक’ स्पष्ट हो गया. बिना कुछ सवाल किए मैं एकटक उनकी ओर देखती रह गई. विजय वर्मा का चेहरा अपराधबोध से स्याह पड़ने लगा था. अपराध छोटा हो या बड़ा कभी-न-कभी सामने आता ही है. बिना किसी भूमिका के मैंने सीधा ही वार किया, “तो आप ही थे?”
वर्माजी पल भर को चुप रहे, फिर शब्द मुंह से बाहर निकले, “प्रतिमा, मुझे ग़लत मत समझो. तुम नहीं जानती कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं. हां, अपराध मेरा भयंकर है, इसकी जो चाहे सज़ा दे लो, पर मेरे प्यार को ग़लत मत समझना.” और मेरा हाथ उठाकर विजय ने तड़ातड़ थप्पड़ अपने गाल पर लगा दिए. हाथ छुड़ा मैं सिसक उठी. आज तक जिस व्यक्ति के प्रति असीम आदर व प्रेम था, क्या कहे, क्या करे उसके साथ?

“ये कैसा प्यार किया आपने? अपने प्रिय का ऐसा अहित? आदमी जिसे प्यार करता है, उसकी ख़ुशियों से सुख पाता है. ये कैसा प्यार था जो प्रिय को कलंक देकर तुष्ट हुआ. उसकी सारी ख़ुशियां छीन लीं. आप शुभचिंतक नहीं शिकारी थे. उस पत्र को लेकर कितनी ही रातें मैंने आंखों में काटीं. क्यों किया आपने ऐसा? कैसे कर सके इतना अहित मेरा? मेरे मां-बाबा का?” असहनीय पीड़ा मन में अनंत शूल चुभोने लगी थी. बार-बार मेरा मन एक ही प्रश्‍न पर अटक रहा था, “क्या नारी-पुरुष के बीच एक ही रिश्ता होता है…? नहीं रहना मुझे एक मानसिक रोगी के साथ. इससे तो बेहतर होगा मैं मां-बाबा के पास लौट जाऊं. मैं उठकर दूसरे कमरे में आ गई. आंसुओं के धुंधलके में भी उस पत्र का एक-एक अक्षर अंतःस्थल से बाहर आकर स्पष्ट आकृति ले चुका था. पत्र मां के नाम था-

आदरणीय माता जी,
मुझे कोई अधिकार नहीं है कि मैं किसी की जातीय ज़िंदगी में हस्तक्षेप करूं. ना ही मेरी अंतर्रात्मा ऐसे मामलों में बोलने की गवाही देती है. फिर भी आप जैसी सज्जन व शालीन मां की बेटी व्यभिचार का रास्ता अपना रही हो तो सूचना देना अपना कर्त्तव्य समझता हूं. (आगे आप स्वयं समझदार हैं) आपकी बेटी राजकुमार जैसे चरित्रहीन व्यक्ति के जाल में फंसती जा रही है.

आपका शुभचिंतक

मुंह में कड़वाहट भर आई, छीः शुभचिंतक. धूर्त व विकृत मानसिकता युक्त व्यक्ति भी कभी किसी का शुभचिंतक हो सकता है. राजू भाई ठीक ही कहते हैं. असामान्य ज़िंदगी जीने वाले लोगों में स्वस्थ मानसिकता हो ही नहीं सकती. उनके चेहरे पर आदर्श का मुखौटा चढ़ा होता है. आंसू थमने लगे, हृदय का आवेश एक निश्‍चय का रूप लेने लगा था. हां, संबंध-विच्छेद के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. सबेरा होते ही वह मां के घर चली जाएगी. सोचते-सोचते आंख लग गई, तो सुबह दूधवाले की घंटी से ही खुली. दूध लेकर रसोई में रखा और अटैची हाथ में लेकर बाहर निकल आई. वर्माजी मेरी हर क्रिया को बेचैनी से देख रहे थे, किंतु कुछ भी बोल पाने का साहस उनमें नहीं था…

प्रसून भार्गव
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