कहानी- शुभचिंतक 4 (Story Series- Shubhchintak 4)

 

“जहां तक मैं सोचता हूं, वैवाहिक-संबंध मात्र पति-पत्नी को ही प्रभावित नहीं करते, वो पूरे परिवार, निकट मित्रों की मान-मर्यादा सभी को कहीं न कहीं प्रभावित करते हैं. एक सीमा तक तुम्हारे फैसले से सहमत होने को जी चाहता है, लेकिन दुनिया देखी है मैंने. संबंध-विच्छेद समस्या का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है.”

गेट खोलकर सड़क तक पहुंच पाती कि उससे पहले ही किसी और को गेट खोल अंदर आते देखा. “अरे राजूभाई आप, इतनी सुबह?” मैं सकपका गई थी.
“क्यों, क्या आ नहीं सकता तेरे घर?” उन्होंने मेरा चेहरा गौर से देखा. अटैची पर उनका ध्यान नहीं गया था.
“वर्माजी कहां हैं?” वर्माजी भी तब तक बाहर आ गए थे. राजूभाई की पारखी दृष्टि ने हमारे चेहरे पढ़ लिए थे. लेकिन अनजान बन सहज रूप से बोले, “मैं दरअसल, तुम्हें एक ख़ुशख़बरी देना चाहता था. सोचा फ़ोन के बजाय ख़ुद ही दूं तो तुम्हारे चेहरे की रौनक भी देख सकूंगा, क्यों?”
“अब बताइए भी क्या ख़बर है.” मेरी उत्सुकता बढ़ चली थी.
“अरे भई, तुम्हारी सहेली कल अपने बेटे को लेकर पहली बार आ रही है. उसका जन्मदिन यहीं मनाया जाएगा. तैयारी का दायित्व विशेष रूप से तुम्हारे ज़िम्मे सौंपने का आदेश है. ह़फ़्तेभर यहां रहनेवाली है और आग्रह है कि तुम भी ह़फ़्ते भर के लिए अपने मां-बाबा के पास जाओ. बोलो क्या कहती हो?”

मैं कुछ प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर पाती, उसके पहले वर्माजी बोल उठे, “इसमें कहना क्या है? आपकी बहन है, जब चाहे बुला लीजिए.” वर्माजी के हृदय परिवर्तन का कारण मैं तो समझ गई, लेकिन राजूभाई चकित थे. वर्मा जी क्षमा मांग मॉर्निंग वॉक के लिए निकल गए. राजू भाई को दुविधा में देख मैंने पूरा क़िस्सा सुना देना बेहतर समझा. मेरे आंसू झरते रहे और राजूभाई मेरे सिर पर हाथ फेरते रहे. आज मैंने जाना कि वास्तविक शुभचिंतक कौन है. पत्र की चर्चा राजूभाई सुन चुके थे. लेकिन उस पत्र का ज़िक्र उन्होंने कभी नहीं किया, क्योंकि वो हमारा और अधिक अपमान नहीं करना चाहते थे.

पूरी बात सुनकर बोले थे, “प्रतिमा, जहां तक मैं सोचता हूं, वैवाहिक-संबंध मात्र पति-पत्नी को ही प्रभावित नहीं करते, वो पूरे परिवार, निकट मित्रों की मान-मर्यादा सभी को कहीं न कहीं प्रभावित करते हैं. एक सीमा तक तुम्हारे फैसले से सहमत होने को जी चाहता है, लेकिन दुनिया देखी है मैंने. संबंध-विच्छेद समस्या का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है.”

फिर मीठी हंसी से छेड़ते हुए बोले, “एव्रीथिंग इज़ फेयर इन लव एंड वार. इतना प्यार करनेवाला तो क़िस्मत से मिलता है. चलो, आंसू पोछो और मुस्कुराओ. जल्दी में कोई क़दम मत उठाओ. निर्णय तुम्हीं को लेना है, लेकिन सोच-विचारने के बाद.” मैं आंसू पोंछ ही रही थी कि वर्माजी लौट आए थे. उनका चेहरा स़फेद पड़ चुका था. रात भर में ही जैसे उम्र बहुत बढ़ गई.

मैं चाय बनाने रसोई में चली गई, मेरे कानों में शब्द सुनाई दिए, “राजकुमारजी, मैं आपका अपराधी हूं.” और राजूभाई का सहज स्वर, “ग़लत, आप मेरे बहनोई हैं.” उनकी महानता ने, उनकी क्षमा ने मुझे भी सोचने पर मजबूर कर दिया.
चाय के साथ औपचारिक बातें होती रहीं. फिर राजूभाई चलने को हुए तो मेरा मन फिर दुविधा में हुआ और स्वाभिमान बोल उठा, “मैं भी आपके साथ चल रही हूं.” उन दोनों को मौन छोड़ मैं अपनी अटैची उठा लाई. वर्माजी का क्लांत व अनमना चेहरा उनकी क्षमा प्रार्थना का साक्षी था.

मैंने बस इतना ही कहा, “नीता के जाते ही लौट आऊंगी.” कहने के बाद देखा तो वर्माजी के चेहरे पर राहत थी. राजूभाई के चेहरे पर एक शुभचिंतक को मिली आनन्दानुभूति थी. और मेरे चेहरे पर स्व को मिला एक सुकून था कि आज मैं उन्हीं राजूभाई के साथ क़दम मिलाकर चल पा रही हूं, जिनका साया भी विजय वर्मा को नागवार था. साथ ही मन की कड़ुवाहट छट गई थी. मां-बाबा के प्रति होने वाले अन्याय से बच गई थी. अपने जीवन को एक-दूसरे अभिशाप यानी तलाक़ से बचा लिया था. हां, प्रेम और युद्ध में जायज़ है सब कुछ. और ऐसा चाहनेवाला पति नसीबवालों को ही मिलता है.

प्रसून भार्गव

अधिक कहानी/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां पर क्लिक करें – SHORT STORIES