कहानी- तर्पण 1 (Story Series- Tarpan 1)

ढोलक की थाप पर सखियों ने बन्नो को सुखी रहने और पति का प्यार पाने की हज़ारों बधाइयां दी थीं. अरुणा तो बड़े ज़ोर-शोर से नाची थी अपनी प्यारी सहेली की शादी में. सात फेरों के बंधन में बंधते ही मायके से नाता टूट गया. ससुराल में क़दम रखते ही पति के असली स्वभाव के दर्शन हो गए रमा को. शशिभूषण बहुत ही क्रोधी और रंगीन तबीयत का इंसान था.

हैलो, नमस्ते शर्माजी, अरुणा बोल रही हूं. कल के प्रोग्राम में आपको आना है. बस यही याद दिलाने के लिए फ़ोन किया था. अच्छा, तो कल मुलाक़ात होगी. नमस्ते.” फ़ोन रखते ही उसने कहा. “रमा, मैंने सबको कल आने का रिमाइंडर दे दिया है. मुझे नहीं लगता कोई छूटा होगा. एक बार लिस्ट देखकर तुम भी तसल्ली कर लो.”

“नहीं, कोई भी नहीं बचा. सबको निमंत्रण दे दिए गए हैं. पति एवं बेटे को तो मैंने ख़ुद ही फ़ोन कर दिया था.” रमादेवी ने जवाब दिया.

पूरे शहर में चर्चा गरम थी कि रमादेवी एक बहुत बड़ा आयोजन कर रही हैं. एक बड़े पार्क में कार्यक्रम रखा है. और तो और पूरे शहर को इसमें बुलाया है. किस कारण से यह आयोजन हो रहा है, इसे कोई नहीं जानता. ख़ास बात तो यह है कि वो पितृपक्ष में इतना बड़ा आयोजन कर रही हैं. वैसे तो इन दिनों कुछ करना परंपरा से परे है, पर बांसठ वर्षीया रमादेवी जो शहर की एक जानी-मानी समाज सेविका हैं और सब लोगों जिन्हें ममतामयी मां के नाम से पुकारते हैं, जिन्होंने अपनी जीवन संध्या  में न जाने कितने ही अनाथ बच्चों और महिलाओं को नवजीवन प्रदान किया है, उनके लिए तो मानव की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है. तो फिर दिन एवं माह का क्या महत्व?

कोई कहता, ‘लगता है रमादेवी कोई धार्मिक आयोजन कर रही हैं.’ तो कोई कहता, ‘शायद कोई नया स्कूल या अनाथालय का शिलान्यास हो रहा होगा.’

जितने मुंह उतनी ही तरह की बातें. छोटे-बड़े, बच्चे-वृद्ध, स्त्री-पुरुष, सभी को आमंत्रण दिया है रमादेवी ने. दोपहर दो बजे से देर रात तक भोजन की व्यवस्था. आख़िर है क्या? चलो चल चलकर पता करें. वैसे भी मां ने बुलाया है, जाना तो पड़ेगा ही.

अरुणा पिछले पांच दिनों से रमादेवी की मदद कर रही है. वो रमादेवी की बचपन की सखी है. स्कूली दिनों की मित्रता आज तक कायम है दोनों के बीच. तभी तो अपने सारे कामकाज छोड़कर वो अपनी सहेली के कामों में परिवार सहित लगी हुई है.

यह भी पढ़ें: ज़िंदगी रुकती नहीं (Life Doesn’t Stop And Neither Should You)

“रमा, काफ़ी रात हो गयी है. अब मैं चलती हूं. ह़फ़्ते भर की परेड का कल अच्छे से समापन हो जाए तो मन को चैन मिले. तुम भी थोड़ी देर आराम कर लो. कल तो सारा दिन बहुत व्यस्त रहोगी. अजय भी टेंट की व्यवस्था देखने गए हैं. कल वो सुबह जल्दी आयोजन स्थल पर पहुंचकर भोजन बनवाने की व्यवस्था संभाल लेंगे. नीरज और सुनंदा अतिथियों का स्वागत करने के लिए मुख्य द्वार पर मौजूद रहेंगे. कल ठीक सात बजे मैं आ जाऊंगी.” इतना कहकर अरुणा चली गई.

धीमे क़दमों से जाकर जैसे-तैसे रमादेवी ने दरवाज़ा बंद किया और ड्रॉइंगरूम में बिछे कालीन पर ही लेट गयी. आंखों से नींद कोसों दूर थी. बीते दिनों की यादें मन में हिलोरे लेने लगीं. बरसों पुरानी स्मृतियां फिर से सजीव हो उठीं. “रमा ओ रमा… अरी सुन तो. चल जरा मौसी के साथ गेहूं तो बिनवा.” मां अपनी लाडली को हज़ार आवाज़ें लगाती, पर उसके कानों पर जूं तक न रेंगती. वो तो कभी छुपा-छुपी खेलने में मगन रहती, तो कभी गुड़िया का ब्याह रचाने में. मां पहले तो ग़ुस्सा करती, पर बाद में सोचती लाडो कितने दिन और रहेगी, इसलिए जब तक घर में है, हंस-खेल ले, बाद में तो घर-गृहस्थी के चूल्हा-चौकी में फंसना ही है.

एक दिन वो भी आ गया जब रमा का ब्याह पक्का हो गया. संपन्न परिवार था. उनका इकलौता बेटा था शशिभूषण. उसका ख़ुद का व्यवसाय था और मकान भी… वो रमा से दस साल बड़ा था, पर चूंकि घर-बार अच्छा था तो उम्र से क्या फ़र्क़ पड़ता- यही सोचकर रमा के पिता ने हां कर दी. रमा की गोद भरायी की रस्म में महंगे-महंगे ज़री के कपड़े और भारी सोने के गहने चढ़ाए थे उसकी होने वाली सास ने, जिसे देखकर सत्रह साल की रमा तो ख़ुशी से फूली नहीं समायी थी. सारे मोहल्ले की औरतों ने देखे थे उसके ज़ेवर-कपड़े.

ढोलक की थाप पर सखियों ने बन्नो को सुखी रहने और पति का प्यार पाने की हज़ारों बधाइयां दी थीं. अरुणा तो बड़े ज़ोर-शोर से नाची थी अपनी प्यारी सहेली की शादी में. सात फेरों के बंधन में बंधते ही मायके से नाता टूट गया. ससुराल में क़दम रखते ही पति के असली स्वभाव के दर्शन हो गए रमा को. शशिभूषण बहुत ही क्रोधी और रंगीन तबीयत का इंसान था. रमा को उसने कभी पत्नी का दर्ज़ा नहीं दिया, बस अपनी वासना की पूर्ति करने का एक साधन मात्र समझा. सास-ससुर बहुत अच्छे थे. रमा को आस थी कि एक दिन पति सुधर जाएंगे. रमा रात-दिन पति और सास-ससुर की सेवा-टहल करती. कभी किसी काम को करने में यदि क्षण भर की भी देर हो जाती तो शशिभूषण उस पर हाथ उठाने से भी नहीं चूकता. पर सास-ससुर के स्नेह के कारण वो चुपचाप सब कुछ सहन करती. ‘पति सेवा परमोधर्म’ में विश्‍वास  करने वाली रमा पति की दासी बनकर रह गयी. रमा के शांत रहने से पति के अंदर का अहम बढ़ता ही चला गया. वह बात-बात पर रमा को गंवार, ज़ाहिल, अनपढ़ जैसे शब्दों से सबके सामने नवाजता. अंदर-ही-अंदर घुटकर रह जाती बेचारी रमा, पर अपने मन की व्यथा किससे कहे. एक साल बाद ही उसकी गोद में दिनेश आ गया. रमा को लगा शायद बेटे के बाद पति का स्वभाव बदल जाए, पर यह सोच भी निरर्थक साबित हुई.

रमा के जीवन में दुख के बादल गहराने लगे. जब तक सास-ससुर जीवित थे, रमा अपना दुखड़ा उनके आगे रो लिया करती थी, पर एक दिन सड़क दुर्घटना में वो दोनों भी दिवंगत हो गए. उसके बाद से तो रमा का जीवन मानो नारकीय बन गया. पर रमा मिट्टी की माधो बनकर सब कुछ सहती रही. कभी उसने प्रतिकार नहीं किया. पति परमेश्‍वर का ही तो रूप है. मेरे भाग्य में शायद यही लिखा था, रमा अपने मन को समझाती. ईश्‍वर के प्रति उसकी आस्था की डोर मज़बूत होती जा रही थी. दिनेश तो उसका अपना ख़ून है, वो ज़रूर उसे समझेगा. अपनी मां के सारे दुख-तकलीफ़ हर लेगा. बेटे से उसके मन में एक आशा बंध गई थी.

– दीपाली शुक्ला

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

Summary
कहानी- तर्पण 1 (Story Series- Tarpan 1) | Hindi Stories | Kahaniya
Article Name
कहानी- तर्पण 1 (Story Series- Tarpan 1) | Hindi Stories | Kahaniya
Description
ढोलक की थाप पर सखियों ने बन्नो को सुखी रहने और पति का प्यार पाने की हज़ारों बधाइयां दी थीं. अरुणा तो बड़े ज़ोर-शोर से नाची थी अपनी प्यारी सहेली की शादी में. सात फेरों के बंधन में बंधते ही मायके से नाता टूट गया. ससुराल में क़दम रखते ही पति के असली स्वभाव के दर्शन हो गए रमा को. शशिभूषण बहुत ही क्रोधी और रंगीन तबीयत का इंसान था.
Author
Publisher Name
Pioneer Book Company Pvt Ltd
Publisher Logo