कहानी- तर्पण 2 (Story Series- Tarpan 2)

रमा बहुत ही स्वाभिमानी थी, वो अपना ख़र्च-खुद उठाना चाहती थी. हालांकि रमा ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, पर वो गृहकार्यों में बहुत कुशल थी. उसकी प्रतिभा को देखकर शारदा देवी ने टिफिन सर्विस खोलने का प्रस्ताव रखा. अजय और अरुणा ने ऑर्डर दिलाने में मदद की तो नीरज और सुनंदा ने कॉलोनी में प्रचार किया. शारदा देवी सब्ज़ी काटने में सहायता कर देती थीं. धीरे-धीरे काम बढ़ता ही चला गया. एक साल में रमा के पास दो सौ लोगों के टिफ़िन के ऑर्डर आ चुके थे.

समय बीतता जा रहा था. सरल हदया रमा के दुख कम होने के बजाए और बढ़ने लगे. इकलौते सुपुत्र को तो आख़िर पिता की विलासिता में भागीदार बनना था, दुर्बल काया वाली मां से उसे मिल ही क्या सकता था. इसलिए पिता को ही अपना सब कुछ माना था दिनेश ने.

रमा को जो घर किले की भंाति मज़बूत प्रतीत होता था, अब वो घर रेत के ढेर की भांति फिसलने लगा था. उस पर अब छल-कपट भरे वार होने लगे. अंगे्रज़ी स्कूल की महंगी शिक्षा और ऐशो-आराम के महंगे साधनों ने दिनेश के जीवन को बदल कर रख दिया. अपने पिता की भांति वो भी बाहरी चकाचौंध में अंधा हो गया. बेबस स्त्री दंभी पुरुषों से हारने लगी. परायी स्त्रियों में सुख तलाशता शशिभूषण एक दिन उससे दासी का उपेक्षित स्थान तक छीन लेगा, इसकी कल्पना तो रमा ने कभी सपने में भी नहीं की थी.

एक दिन शशिभूषण जब घर लौटा तो साथ में तन पर नाम मात्र के वस्त्र पहने एक काया भी साथ लाया, जिसे देखते ही रमा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई. रोने के सिवाय कुछ सूझता ही नहीं था. दिनेश, उसकी अपनी कोख का जाया भी उसका अपना नहीं?था. पिता के साथ-साथ वो भी उसके साथ हंस-हंसकर बातें करता और मां को ताने देता. अपने कमरे में जाकर वो भगवान के सामने चीख उठती- “हे प्रभु, हे विधाता, तू इतना कठोर न बन. मेरी इतनी परीक्षा तो न ले कि मैं अपने प्राण ही तेरे चरणों में अर्पण कर दूं. एक बेटे का सहारा बचा था, वो भी अब छीन चुका है. जगतपिता, सबका पालनहार है, मेरी भी परेशानियों और दुखों का निवारण कर दे.”

जब घर में पति और बेटे के ताने हृदय को छलनी कर देते तो रमा मंदिर चली जाती. एक दिन जब वो मंदिर गई तो वहां उसे अपनी प्रिय सहेली अरुणा मिल गई. अरुणा ने जब अपनी सखी की दशा देखी तो उसकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली. सैंतीस साल की रमा दुख और कष्टों को सहते-सहते पचास साल की दिखने लगी थी. रमा का हाथ पकड़कर अरुणा उसे अपने घर ले गई. घर में उसके पति अजय, उसकी सास शारदा देवी, बेटा नीरज और बेटी सुनंदा थी. बच्चे अपनी रमा मौसी को देखकर बहुत ख़ुश हुए, क्योंकि उनकी मां अक्सर रमा के बारे में बातें किया करती थी. शारदा देवी बहुत ही अच्छी महिला थीं, उन्होंने रमा को अपनी बेटी बना लिया. अजय निजी कंपनी में मैनेजर थे और अरुणा टीचर थी. अरुणा ने रमा को बताया कि उसकी शादी होने के एक साल बाद उसकी भी शादी हो गयी. उस समय उसने रमा को शादी में आने के लिए तीन-चार पत्र भी लिखे थे, शादी के दिन तक उसने अपनी सहेली के आने की बाट जोही थी, पर

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सब व्यर्थ. रमा किस तरह बताती कि जब उसने अरुणा की शादी में जाने की अनुमति शशिभूषण से मांगी थी तो उसे कितनी गालियां और कितनी मार खानी पड़ी थी.

शादी के बाद अरुणा ने पढ़ाई ज़ारी रखी, इसमें शारदा देवी ने उसकी बहुत सहायता की, जिसके कारण आज वो स्कूल में टीचर है. यहां-वहां की बातें करके रमा घर वापस लौटने लगी तो अरुणा ख़ुद उसे स्कूटर से छोड़ने आयी. रमा के पति और बेटे के रंग-ढंग को देखकर वो सारा माजरा समझ गई.

एक दिन शशिभूषण ने अपनी आधुनिका प्रेयसी के कहने पर रमा को बाहर फेंक दिया जैसे कि वो घर का कचरा हो. रमा बहुत गिड़गिड़ायी कि उसे एक कोने में पड़े रहने दो, पर उसकी बातों का उसके पति पर कोई असर नहीं हुआ. उस समय जब रमा को घसीटा जा रहा था, दिनेश आराम से डाइनिंग टेबल पर नाश्ते का लुत्फ़ उठा रहा था. उसने एक बार भी मां की ओर नहीं देखा. गेट से टकराकर रमा का माथा लहूलुहान हो गया. मैले-कुचैले उसके वस्त्र जगह-जगह से फट गए. उसी हालत में वो अरुणा के घर पहुंची. उसकी दशा को देखकर शारदा देवी घबरा गईं. उन्होंने फ़ौरन अपने बेटे-बहू के ऑफ़िस में फ़ोन किया और तुरंत घर आने को कहा. अरुणा एवं अजय तुरंत आए. रमा की दशा देखकर दोनों को भी बहुत दुख पहुंचा. अजय ने डॉक्टर को बुलाया और रमा की मरहम-पट्टी करवायी. रोते हुए रमा ने सारी घटना बयान की. अरुणा और अजय ने पुलिस में शिकायत करने को कहा तो रमा ने भगवान पर सब छोड़ने की बात कहकर मना कर दिया. शारदा देवी ने रमा को बेटी बनाकर घर में रख लिया.

रमा बहुत ही स्वाभिमानी थी, वो अपना ख़र्च-खुद उठाना चाहती थी. हालांकि रमा ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, पर वो गृहकार्यों में बहुत कुशल थी. उसकी प्रतिभा को देखकर शारदा देवी ने टिफिन सर्विस खोलने का प्रस्ताव रखा. अजय और अरुणा ने ऑर्डर दिलाने में मदद की तो नीरज और सुनंदा ने कॉलोनी में प्रचार किया. शारदा देवी सब्ज़ी काटने में सहायता कर देती थीं. धीरे-धीरे काम बढ़ता ही चला गया. एक साल में रमा के पास दो सौ लोगों के टिफ़िन के ऑर्डर आ चुके थे. अब उसकी मदद के लिए तीन-चार ज़रूरतमंद महिलाओं को रखा गया. जैसे-जैसे काम बढ़ता गया, और भी महिलाओं को रोज़गार दिया रमा ने. दो साल बाद जब घर छोटा पड़ने लगा तो पड़ोस के दो कमरों में काम को स्थानांतरित किया गया. बीते तीन सालों में एक बार भी न तो वो पति और बेटे से मिलने गई और न ही कभी उन लोगों ने उसकी सुध ली. शारदा देवी ने उसे मां की कमी महसूस नहीं होने दी, तो अजय ने अपनी छोटी बहन के समान दुलार किया, बच्चे तो अपनी बुआ के फैन थे.

दीदी से कब रमा अम्माजी बन गई, उसे पता ही नहीं चला.

– दीपाली शुक्ला

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रमा बहुत ही स्वाभिमानी थी, वो अपना ख़र्च-खुद उठाना चाहती थी. हालांकि रमा ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, पर वो गृहकार्यों में बहुत कुशल थी. उसकी प्रतिभा को देखकर शारदा देवी ने टिफिन सर्विस खोलने का प्रस्ताव रखा. अजय और अरुणा ने ऑर्डर दिलाने में मदद की तो नीरज और सुनंदा ने कॉलोनी में प्रचार किया. शारदा देवी सब्ज़ी काटने में सहायता कर देती थीं. धीरे-धीरे काम बढ़ता ही चला गया. एक साल में रमा के पास दो सौ लोगों के टिफ़िन के ऑर्डर आ चुके थे.
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