कहानी- यशोदा का सच 1 (Story Series- Yashoda Ka Sach 1)

आज स्वीटी को सीने से लगाकर जिस गर्माहट और ममता के एहसास से मानी भीगी, उस भीगेपन में सपना की याद हो आई उसे… सपना क्या याद आई, गुज़रे व़क़्त की गंध बहुत पीछे ले गई उसे. कॉलेज की जूनियर थी सपना- बी.एससी. सेकेण्ड ईयर की स्टूडेंट. हर व़क़्त मानी दी… मानी दी कहती उसके आगे-पीछे घूमा करती. कभी नोट्स बनवाने कभी लायब्रेरी से बुक इशु करने, कभी साइंस के फीगर ड्रॉ करने तो कभी प्रैक्टिकल समझने यानी उसके हर काम में मानी दी ज़रूरी होती. जूनियर कम छोटी बहन का अधिकार ज़्यादा था उसमें. इतनी प्यारी और प्यार करनेवाली सपना मानी के दिल और दुनिया का वो हिस्सा बन गई कि उसके बिना सब कुछ अधूरा-सा लगने लगा मानी को.

घड़ी के अलार्म से मानी की आंख खुल गई, घड़ी देखी सात बजे थे. करवट बदलकर उठने को हुई तो पास में सोई सात वर्षीय स्वीटी गले में बांहें डालकर और भी कसकर लिपट गई.

“मम्मीजी प्लीज़ अभी मत उठिये… अभी बहुत नींद आ रही है मुझे… आज सन्डे भी है और पापा भी तो टूर पर हैं.”

कुनमुनाती-सी नन्हीं स्वीटी को छोड़कर उठने का मन नहीं हुआ मानी का. स्वीटी के बाल सहलाती वह फिर से सो गयी.

“उठिये मम्मीजी. आपकी चाय तैयार है, नाश्ता भी तैयार है. उठिये ना मम्मीजी.”

उनींदी-सी मानी उठ बैठी. सामने चाय की ट्रे लिए स्वीटी बैठी थी.

“मम्मी शक्कर कितनी?”

मानी आश्‍चर्य से बेटी को निहार रही थी. दूध का ग्लास पकड़कर उठनेवाली, हज़ारों ख़ुशामदों के बाद आंखें खोलनेवाली स्वीटी आज इतनी सलीकेदार बेटी बनकर पेश आ रही है!

अपनी मोहक मुस्कान के संग स्वीटी बोली, “आज ‘मदर्स डे’ है ना मम्मी. मेरी सारी सहेलियां अपनी मम्मी को बेड टी देनेवाली हैं आज.”

“ओह! तो ये बात है. ‘मदर्स डे’ का तोहफ़ा है ये बेड टी और नाश्ता.” मानी ने देखा प्लेट में बटर लगी ब्रेड और बिस्किट करीने से सजे थे.

ज़ोर से खींचकर बेटी को गले से चिपका लिया मानी ने. भीतर कुछ भरा-भरा-सा महसूस होने लगा था. अचानक कितनी ऊंची जगह बिठाकर महत्वपूर्ण बना दिया स्वीटी ने. भले ही एक दिन के लिए सही, लेकिन नन्हीं-नन्हीं लहरों ने उसके सीने में उछलकर समंदर का एहसास करा दिया है. ममता का आवेग रोके न रुका तो आंखें छलक उठीं.

“लो मैंने चाय बनाई तो मम्मीजी रोने लगीं. अब नाश्ता करेंगी तो और रोएंगी… ओ गॉड, ज़रा शैला से पूछूं क्या उसकी मम्मी भी रो रही हैं?”

कहती-कहती फुदककर ड्रॉइंगरूम में रखे फ़ोन तक पहुंचकर वो नम्बर डायल करने लगी.

आज स्वीटी को सीने से लगाकर जिस गर्माहट और ममता के एहसास से मानी भीगी, उस भीगेपन में सपना की याद हो आई उसे… सपना क्या याद आई, गुज़रे व़क़्त की गंध बहुत पीछे ले गई उसे. कॉलेज की जूनियर थी सपना- बी.एससी. सेकेण्ड ईयर की स्टूडेंट. हर व़क़्त मानी दी… मानी दी कहती उसके आगे-पीछे घूमा करती. कभी नोट्स बनवाने कभी लायब्रेरी से बुक इशु करने, कभी साइंस के फीगर ड्रॉ करने तो कभी प्रैक्टिकल समझने यानी उसके हर काम में मानी दी ज़रूरी होती. जूनियर कम छोटी बहन का अधिकार ज़्यादा था उसमें. इतनी प्यारी और प्यार करनेवाली सपना मानी के दिल और दुनिया का वो हिस्सा बन गई कि उसके बिना सब कुछ अधूरा-सा लगने लगा मानी को.

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लेकिन ज़िंदगी इंसान के मन मुताबिक नहीं चलती ना कभी. फ़ाइनल करते ही मानी के लिए सागर का रिश्ता आया. मेडिकल रिप्रेज़ेंटेटिव सागर बेहद स्मार्ट, एक्टिव और आकर्षक व्यक्तित्ववाला संस्कारी व संयुक्त परिवार का मंझला बेटा था. मानी को देखते ही पूरा परिवार उस पर ऐसा रीझा कि आनन-फानन महीने भर में ही वो दुलहन बनकर अपनी ससुराल आ गई. सागर क्या मिला, मानी का जीवन ही बदल गया. फिर स्वीटी ने आकर उसका परिवार पूरा कर दिया. वर्तमान से ख़ुश और जीवन से संतुष्ट मानी को सपना की कमी फिर भी महसूस होती.

सपना थी ही ऐसी, घर में उसे थोड़ी भी डांट पड़ती या उसकी ज़िद पूरी ना होती तो कॉलेज आकर वहां का चप्पा-चप्पा घूमकर वो मानी को ढूंढ़ निकालती, चुपचाप उसका हाथ पकड़कर कैन्टिन ले जाती. और ख़ामोश होकर बैठी रहती. मानी समझ जाती, आज कुछ गड़बड़ है. फिर धीरे-धीरे पूछना शुरू करती. फिर सपना के मन की गांठें खुलने लगतीं. सच बात सामने आ जाती. मानी उसे समझाती, सही रास्ता बताती. थोड़ी देर बाद रोती-बिसूरती उदास सपना मुस्कुराती-उछलती अपनी क्लास में चल देती. मानी अपने घर-संसार में ख़ुश थी. चार साल की स्वीटी की शरारतों व बातों से तो मानी और सागर का बचपन ही लौट आता.

तीन साल पहले न्यू मार्केट में क्रॉकरी शॉप पर क्रॉकरी ख़रीदती सपना अचानक दिखाई दी. न्यू मार्केट में भोपाल की असली रौनक बसी है वैसे भी. मानी स्वीटी के लिए ड्रेसेस ख़रीद रही थी, क्रॉकरी शॉप के सामने ही, दोनों की नज़रें टकराईं तो लगभग दौड़ती मानी सपना तक पहुंची और सपना…वो तो मानी से क्या लिपटी, हिचकियों में ही डूब गई.

“मानी दी आप यहां?”

“शादी के बाद से यहीं तो हूं मैं. अरे शादी करके तो बड़ी प्यारी दिखने लगी है तू. यहां कहां रहती है? क्या करते हैं तेरे मियां? और कब हुई तेरी शादी? न कार्ड न ख़बर, भूल गई ना मानी दी को?”

“अरे बाप रे मानी दी. सांस तो ले लो. सब बताती हूं. तीन साल हो गए शादी को. यहां जहांगीराबाद में हम लोगों के तीन मेडीकल शॉप हैं.”

“और बच्चे?” मानी की बात पूरी होने से पहले ही स्वीटी उन दोनों के बीच आ खड़ी हुई.

“मम्मीजी… वो बार्बी डॉल दिलवा दीजिए.” सामने दुकान के शोकेस में रखी बार्बी स्वीटी को मोह रही थी.

“अरे ये आपकी बेटी है मानी दी. हाए कित्ती प्यारी कित्ती सुंदर कित्ती स्वीट है.”

स्वीटी शर्मा गई. उसकी मोहक मुस्कान ने सपना को निहाल कर दिया.

“देखो बेटा, मैं तुम्हारी सपना मौसी हूं. चलो हम दोनों लेकर आएंगे तुम्हारी बार्बी डॉल को. और मम्मी को मत देखना, क्योंकि तुम्हारी मम्मी मौसी के आगे कुछ नहीं बोल सकतीं. क्यों है ना मानी दी?”

मानी हंस दी. वो रोकती रही, लेकिन सपना तो वही पुरानी सपना थी. लौटी तो बार्बी के संग-संग खिलौनों का ढेर लेकर लौटी.

“अरे इतना सब क्यों उठा लाई सपना? घर पर खिलौनों का ढेर लगा है.”

सपना का चेहरा उतर गया. मानी को अपनी ग़लती महसूस हुई. बात संभालते हुए वो बोली.

“स्वीटी मौसी को थैंक्यू बोलो और जब वो छोटे भैया के संग घर आएंगी, तब भैया के संग सारे खिलौने खेलना… मौसी को पूछो भैया को लेकर कब आएंगी?”

सपना चुप थी. उसने कोई जवाब नहीं दिया.

– प्रीतरीता श्रीवास्तव

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आज स्वीटी को सीने से लगाकर जिस गर्माहट और ममता के एहसास से मानी भीगी, उस भीगेपन में सपना की याद हो आई उसे... सपना क्या याद आई, गुज़रे व़क़्त की गंध बहुत पीछे ले गई उसे. कॉलेज की जूनियर थी सपना- बी.एससी. सेकेण्ड ईयर की स्टूडेंट. हर व़क़्त मानी दी... मानी दी कहती उसके आगे-पीछे घूमा करती. कभी नोट्स बनवाने कभी लायब्रेरी से बुक इशु करने, कभी साइंस के फीगर ड्रॉ करने तो कभी प्रैक्टिकल समझने यानी उसके हर काम में मानी दी ज़रूरी होती.
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