कहानी- यशोदा का सच 2 (Story Series- Yashoda Ka Sach 2)

सपना किचन में स्वीटी का दूध तैयार कर रही थी. मानी ने यूं ही पेज पलट दिए. सपना की ही लिखावट थी.

अक्सर

किसी उनींदी-सी रात में

कुनमुनाता-सा

आंचल को ढूंढ़ता है

लिपट जाने को उसमें…

चेहरा छिपाने

गुदगुदा मुलायम-सा शैतान

वह

छूता है मेरे गालों को

नन्हीं-नन्हीं उंगलियों से

मुठ्ठी में खींचता है मेरे बालों को.

मोहक

मुस्कान के संग

फिर दुबक कर सो जाता है

मेरी गर्म-गर्म सांसों में डूबकर

आंचल को मुट्ठी में भर

निश्‍चिंत होकर…

मानी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया. अपना पता बताकर सपना से विदा ली उसने. घर लौटी तो सागर घर पर ही थे. पेपर पढ़ रहे थे.

“क्या बात है. बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी लौट रही हो मार्केट से. क्या ख़ज़ाना पाया वहां?”

“ख़ज़ाने से भी बढ़कर पाया है. सपना मिल गई शॉपिंग करती हुई. वो यहीं है तीन सालों से और आज मिली है. जहांगीराबाद में उसके तीन-तीन मेडिकल शॉप हैं.”

“अच्छा! किस नाम से हैं मेडिकल शॉप उनकी?”

“शर्मा मेडिकल बता रही थी. सबसे बड़ी शॉप उन्हीं की है मार्केट में.”

सागर की मुस्कुराहट एकाएक ख़ामोशी में बदल गई.

“ओह! तो ये विवेक की वाइफ़ है. तीन साल हो गए ना सपना की शादी को.”

“हां सागर.”

“उफ.” सागर उठकर जाने लगे. दर्द की लकीरें उनके चेहरे पर छा गई थीं.

“क्या हुआ आपको अचानक?” हाथ पकड़कर सागर को सो़फे पर दुबारा बिठाते हुए मानी बोली, “आप कुछ छुपा रहे हैं. आज बरसों बाद सपना मिली है मुझे. रास्ते भर मैं उन लोगों को डिनर पर बुलाने का प्रोग्राम बनाती आई हूं. बरसों की भूली बिसरी बातें करेंगे. बच्चे भी ख़ुश होंगे…”

“बच्चे नहीं स़िर्फ सपना मानी. और सपना शायद ही तुम्हारे घर आए. तुम्हारी सपना एक निरीह, बेबस और मानसिक रोगी है मानी. उसके कोई बच्चा नहीं है, न अब भविष्य में कोई उम्मीद है. फिर भी झूठी उम्मीदों पर जी रही है वह.”

पत्नी का हाथ हाथों में लेकर सांत्वना देते हुए सागर ने आगे कहा.

“सपना, विवेक की शादी के व़क़्त मैं टूर पर इटारसी में ही था, सो शामिल हो गया उनकी शादी में. बड़ा ख़ुश था विवेक अपनी वाइफ़ से. जब सपना प्रेगनेंट हुई, तब तो दस हज़ार से भी ज़्यादा विवेक ने मिठाई व पार्टी में ही उड़ा दिये. बहुत ख़ुश था वो. बहुत ध्यान रखता था सपना का. ज़्यादातर व़क़्त उसी के साथ बिताता. फिर न जाने किसकी नज़र लग गई… बच्चा फिलोपियन्स ट्यूब में चला गया. अबॉर्शन हुआ और ट्यूब काट दी गई. छ: महीने बाद वो फिर प्रेगनेंट हुई और वही सब कुछ फिर दोहराया गया. दोनों ट्यूब कटते ही भविष्य की सारी उम्मीदें ही ख़त्म हो गईं. अब मां न बनने का दुख तुम्हारी सपना को जीते जी मार रहा है. विवेक भीतर-ही-भीतर घुट रहा है. सपना के आगे ख़ुश रहने का नाटक करते-करते थकने लगा है अब वह…” सागर उठकर भीतर चले गए.

दर्द से भर उठी मानी… नहीं सपना को हताशा के अंधेरों से उबारना होगा. सच्चाई को स्वीकारने, उसका सामना करने का हौसला देना होगा. मुझे वही पुरानी वाली सपना चाहिए, चाहे जो हो.

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मानी ने निश्‍चय किया… फिर एक ह़फ़्ते बाद स्वीटी को लेकर सपना के घर गई. बड़ा संभ्रांत, संस्कारी व मिलनसार परिवार था. सपना को बड़ी बहन-सा सम्मान मिला. फिर सपना उसे अपने कमरे में ले आई. वहीं सपना की डायरी हाथ में आ गई. सपना किचन में स्वीटी का दूध तैयार कर रही थी. मानी ने यूं ही पेज पलट दिए. सपना की ही लिखावट थी.

अक्सर

किसी उनींदी-सी रात में

कुनमुनाता-सा

आंचल को ढूंढ़ता है

लिपट जाने को उसमें…

चेहरा छिपाने

गुदगुदा मुलायम-सा शैतान

वह

छूता है मेरे गालों को

नन्हीं-नन्हीं उंगलियों से

मुठ्ठी में खींचता है मेरे बालों को.

मोहक

मुस्कान के संग

फिर दुबक कर सो जाता है

मेरी गर्म-गर्म सांसों में डूबकर

आंचल को मुट्ठी में भर

निश्‍चिंत होकर…

और सुबह

बिस्तर की खाली सिलवटें

कमरे का सूनापन

और…

खाली आंचल को थामे

सिसकती मैं…

उफ़

सुबह की रोशनी से

तो अच्छा है रात का अंधेरा

जो सच्चाई का सूरज तो

साथ नहीं लाता…

सपना… बदनसीब मां.

तड़प उठी मानी. सपना की टूटन का एहसास भीतर तक भेद गया. नहीं… वह नहीं ज़ाहिर होने देगी अपने दर्द को, क्योंकि पुरानी सपना को पाने का बीड़ा जो उठाया है.

थोड़ी देर रुककर मानी घर आ गई.

अब स्वीटी प्राय: सपना के पास ही रहती. सपना की मुस्कुराहट वापस लौट आई थी. दर्द की तड़प कम हो गई थी.

“सपना, कुदरत ने अगर तुमसे मातृत्व का सुख छीन लिया है तो कोई बच्चा गोद लेकर उसके इस फैसले को बदल दो.”

“नहीं मानी दी, अपना बच्चा अपना ही होता है. उसे जन्म देने की वेदना और पा लेने का सुख… इसकी पूर्ति तो संभव ही नहीं…”

“सपना, बच्चा तो बच्चा ही होता है. ज़रा सोचो, तुम्हारे कारण एक बच्चे का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा. उसे तुम्हारी ममता की छांव और पिता का साया मिलेगा. एक अनाथ तुम्हारा नाम पाकर तुम्हारा नाम रोशन करेगा. डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पुलिस अफ़सर या बिज़नेस मैन, जो चाहो उसे बनाना… सपना तुम एक बच्चा नहीं, बल्कि एक पीढ़ी की नींव मज़बूत करोगी, क्योंकि हर पुरुष एक पीढ़ी का प्रतिनिधि होता है. मैंने हर बार तुम्हारा कहा किया है सपना, प्लीज़ मेरी एक बात मान लो…”

“मानी दी, संस्कार तो ख़ून से मिलते हैं ना. पता नहीं, किसका कैसा ख़ून हो. नहीं मानी दी, मैं नहीं सोच सकती कुछ… मेरी आत्मा गवाही नहीं देती…”

“नहीं सपना…” मानी मनुहार पर उतर आई थी, “संस्कार ख़ून से नहीं, परवरिश से ज़िंदा होते हैं. यशोदा क्या जानती थी कि कृष्ण का ख़ून क्या है, लेकिन जब मां का नाम आता है तो यशोदा को पहले फिर देवकी को मां कहते हैं सब. मां की महत्ता और ममता ही यशोदा का पर्यायवाची बन गई है. फिर तुम तो पढ़ी-लिखी हो. सच्चाई को स्वीकारना सीखो. तुम्हारा एक क़दम तुम्हारे परिवार को जीवनदान दे देगा.”

सपना चुप थी. उसकी आंखों से लगातार आंसू बहे जा रहे थे. “मानी दी… मैं बदनसीब मर क्यूं नहीं जाती? भला ठूंठ का जीवन भी कोई जीवन होता है?”

– प्रीतरीता श्रीवास्तव

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कहानी- यशोदा का सच 2 (Story Series- Yashoda Ka Sach 2) | Stories in Hindi
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“क्या हुआ आपको अचानक?” हाथ पकड़कर सागर को सो़फे पर दुबारा बिठाते हुए मानी बोली, “आप कुछ छुपा रहे हैं. आज बरसों बाद सपना मिली है मुझे. रास्ते भर मैं उन लोगों को डिनर पर बुलाने का प्रोग्राम बनाती आई हूं. बरसों की भूली बिसरी बातें करेंगे. बच्चे भी ख़ुश होंगे
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