कहानी- यशोदा का सच 3 (Story Series- Yashoda Ka Sach 3)

“मानी दी, आपके जाने के बाद बहुत अकेली हो गई थी मैं. स्वीटी के बिना बार-बार बीमार होती. इसी क्रम में आपकी समझाई वो बातें मन में घर करने लगीं. मुझे लगने लगा कि अपने बच्चे का कौन-सा एहसास ज़िन्दा रहता है? प्रसव वेदना की एक हल्की-सी याद…कोई विशेष दिन विशेष याद? कौन-सी यादें अमिट रह पाती हैं भला? अधखुली सीप-सी उनींदी आंखें, आंखें मलता कुनमुनाता-सा मां के आंचल को मुट्ठी में भरे मुस्कुराता नवजात शिशु-बस यही ना? पर जैसे-जैसे वो बड़ा होता है, उसका हंसना-मुस्कुराना, खिलखिलाना, घुटने चलना, डगमग क़दमों से मां का सहारा पाना यही तो सच बनता जाता है और पिछला सब धुंधला होने लगता है.”

“तुम बदनसीब नहीं हो सपना. विवेक भैया तुम्हें बहुत चाहते हैं… ये उनकी चाहत का प्रमाण है कि उनका परिवार तुम्हारा विरोध नहीं कर पा रहा. आज शादीशुदा बच्चे वाले पुरुष अवैध संबंध बनाने में नहीं चूकते. एक पत्नी के होते दूसरी पत्नी घर ले आते हैं, लेकिन विवेक भैया? उनके त्याग और महानता की क़ीमत मत आंको. उनकी मानसिक स्थिति और दर्द को हमने महसूस किया है. अपने दु:ख-दर्द के समन्दर से बाहर निकलो. अंधा कुंआ कुछ नहीं देता सपना, लेकिन खुला आसमान जीने के लिए सांसें ज़रूर देता है…”

यही सब बातें घुमा-फिराकर मानी व सपना के बीच होतीं. मानी को विश्‍वास था सपना बदलेगी, लेकिन सपना अब भी झूठी आस पर जी रही थी.

फिर सागर का ट्रांसफ़र यहां दिल्ली हो गया. मानी अपनी घर-गृहस्थी और परिवार में डूब गई.

स्वीटी हर पल चहक रही थी. मम्मी के सारे काम वही जो कर रही थी. बाथरूम का गीजर ऑन था. कपड़े बाक़ायदा बाथरूम में लगे थे. मानी नहाकर बेडरूम में आई तो पलंग पर गुलाबी साड़ी गुलाब के फूल के संग सजाकर रखी हुई थी. पास ही छोटा-सा कार्ड था. लिखा था-प्यारी मम्मीजी गुलाब लगाएंगी ना?’

“ओह. मेरी प्यारी स्वीटी.” रोने को हो उठी मानी. इतना प्यार, इतना मान-सम्मान, इतना अपनत्व ऊंचाइयों का ये सिंहासन आंदोलित करने लगा था मानी को. काश… सागर पास होते. ऊंचाइयों भरे ये पल उनके साथ बंटकर अनमोल हो जाते.

शाम पांच बजने को थे. मानी ने सोचा स्वीटी को लेकर गार्डन हो आए थोड़ी देर. वैसे भी स्कूल की छुट्टियां और गर्मी का मौसम- व़क़्त काटे नहीं कटता बच्चों का. वो स्वीटी को आवाज़ देने ही वाली थी कि कॉलबेल बज उठी.

मानी ने उठकर दरवाज़ा खोला और आश्‍चर्यचकित रह गई. कहां तीन साल पहले की दर्द में डूबी मुरझाई-सी सपना और कहां ये खिली-खिली मोहक और प्यारी-सी सपना…

“दीदी वो भी हैं, नीचे टैक्सी से सामान उतरवा रहे हैं.” फिर बोली, “मानी दी… आप नाराज़ थीं ना… तभी तो भूल गईं… एक फ़ोन भी नहीं किया कभी…”

“अब शिकायत ख़त्म कर और भीतर चल.” मुस्कुराकर बोली मानी… फिर स्वीटी को आवाज़ दे उठी…

“बेटा स्वीटी… स्वीटी… देखो कौन आया है… तुम्हारी सपना मौसी और मौसाजी…”

स्वीटी दौड़ती-सी आई. सपना ने प्यार से बांहों में भरते हुए कहा, “अरे कित्ती बड़ी हो गई मेरी स्वीटी… क्यों भूल गई मौसी को?” स्वीटी शर्मा गई. फिर चहकती-सी बोली… “मौसी पानी लाऊं आपके लिए? आज ‘मदर्स डे’ है ना. आज सब काम मैं करूंगी, मौसी शाम को मम्मी की ग़ि़फ़्ट आप ही खोलियेगा.”

“ठीक है स्वीटी… तुम्हारी मम्मी के लिए एक ग़िफ़्ट मैं भी लाई हूं.”

“मैं भी जानूं क्या है भई…?” मानी बोली

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“दीदी जानने की नहीं, देखने की चीज़ है आपकी ग़िफ़्ट.” दरवाज़े में प्रवेश करते हुए विवेक ने मुस्कुराते हुए कहा. फिर मानी ने जो देखा, विश्‍वास ही नहीं हुआ. विवेक की गोद में प्यारा गुड्डे-सा साल भर का बेटा था. मुंह में अंगूठा डाले टुकुर-टुकुर सबको देख रहा था. उसकी नन्हीं-नन्हीं चमकती आंखों में आश्‍चर्य ही आश्‍चर्य था.

सपना को देखते ही उसके पास जाने को मचल उठा. विवेक ने नीचे उतार दिया उसे. गर्दन नीची किए सबसे शर्मा रहा था. डगमग-डगमग करता सपना तक पहुंचा और उसकी गोद में मुंह छिपा लिया… मानी मुग्ध होती उसके सर पर हाथ फेरती हुई बोली.

“ये प्यारा-सा चमत्कार कैसे हो गया? क्या नाम है इस चमत्कार का?”

“शरद नाम है मानी दी, वैसे लकी कहते हैं सब और इस चमत्कार का श्रेय तो आपको ही जाता है दीदी…”

“मुझे? वो कैसे?”

“मानी दी, आपके जाने के बाद बहुत अकेली हो गई थी मैं. स्वीटी के बिना बार-बार बीमार होती. इसी क्रम में आपकी समझाई वो बातें मन में घर करने लगीं. मुझे लगने लगा कि अपने बच्चे का कौन-सा एहसास ज़िन्दा रहता है? प्रसव वेदना की एक हल्की-सी याद…कोई विशेष दिन विशेष याद? कौन-सी यादें अमिट रह पाती हैं भला? अधखुली सीप-सी उनींदी आंखें, आंखें मलता कुनमुनाता-सा मां के आंचल को मुट्ठी में भरे मुस्कुराता नवजात शिशु-बस यही ना? पर जैसे-जैसे वो बड़ा होता है, उसका हंसना-मुस्कुराना, खिलखिलाना, घुटने चलना, डगमग क़दमों से मां का सहारा पाना यही तो सच बनता जाता है और पिछला सब धुंधला होने लगता है. मानी दी पिछले साल जेठ की बेटी को सूरदास पढ़ाते व़क़्त कृष्ण और यशोदा से गुज़रते मैं आपकी बातों तक पहुंच जाती. मानी दी… यशोदा बनकर जब मैंने जीया तो मेरी तो दुनिया ही बदल गई… आज लकी के बिना मैं एक पल भी नहीं रह सकती. सच ही कहा था दीदी आपने कि बच्चा स़िर्फ ममता जानता है. तुम उसे जन्म दो या ना दो. दस दिन का गोद लिया था हॉस्पिटल से. इसके जन्म देते ही मां नहीं रही. पेपर में न्यूज़ आई कि जो लेने का इच्छुक हो, संपर्क करे. सौभाग्य के इस द्वार तक पहुंचने में फिर देर नहीं की हमने दीदी…  और प्यारा शैतान-सा लकी हमारा हो गया…” आंखें भर आईं थीं सपना की और मानी की भी…

मानी ने देखा, सपना का गरिमामय मातृत्व रूप. एकदम तृप्त और संतुष्ट थी वो. विवेक उसे मोहक ढंग से एकटक निहार रहा था. कुंठा और तनाव की जगह पितृत्व का अनोखा गर्व उसके चेहरे पर चमक रहा था. पत्नी के प्रति एकनिष्ठा कायम रखकर सात फेरों के सच को ईमानदारी से जिया था विवेक ने…

मानी से उसने कहा, “दीदी ये सब आपकी ही देन है. अंधे कुएं से उबारकर आसमान की ठंडी हवा में ये जीवनदान आपकी ही प्रेरणा से मिल पाया हमें…” वो उठकर मानी के चरण-स्पर्श को झुक गया…

– प्रीतरीता श्रीवास्तव

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