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पहला अफेयर: मेरा प्यार ही मेरी प्रेरणा बन गया… (Pahla Affair: Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya)

Pahla Affair, Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya

Pahla Affair, Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya

पहला अफेयर: मेरा प्यार ही मेरी प्रेरणा बन गया… (Pahla Affair: Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya)

पहले प्यार का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर

सच्चे प्यार का एहसास भटके हुए को सही राह दिखाता है. कभी किसी की कमज़ोरी नहीं बनता, बल्कि किसी की ताक़त बन उसे जीने की प्रेरणा देता है. ऐसी प्रेरणा, जो उसके जीवन को किसी मुक़ाम तक पहुंचाए. मीना भी मेरे जीवन की वह प्रेरणा है, जिसने  मुझे नई राह दिखाई. इस मुक़ाम तक पहुंचने में मेरी प्रेरणा बनी.

बात उन दिनों की है, जब मैं कॉलेज में पढ़ता था. मीना नाम की बेहद ख़ूबसूरत लड़की मेरी क्लास में पढ़ती थी. उसकी नीली, झील-सी आंखों में ऐसी कशिश थी कि मैं उसमें बंधता जा रहा था. धीरे-धीरे आलम यह हो गया कि उसे देखे बिना मेरा दिन कटना मुश्किल होता जा रहा था. पढ़ने में मेरा मन बिल्कुल नहीं लगता था. बस, हर पल आंखों में उसी की तस्वीर रहती थी. सच पूछो तो मैं उसके प्यार में अंधा हो गया था.

एक दिन मीना से मैंने अपने प्यार का इज़हार कर ही दिया. मेरी बात का कोई उत्तर दिए बिना वो चली गई. अगले दिन उसने क्लास में खड़े होकर कहा, “आज सर नहीं आए, तो क्यों न एक परिचर्चा पर विचार-विमर्श हो जाए.” पूरी क्लास ने एक स्वर में कहा, “आइडिया अच्छा है. पर विषय तो बताओ?”

मीना बोली, “हमारी कॉलेज लाइफ़ और प्यार. अब आप लोग इस पर अपने विचार व्यक्त करें.” पीछे की बेंच पर बैठे लड़के चिल्लाए, “बहुत ज़रूरी है प्यार लाइफ़ में…”

नेहा नाम की एक दबंग लड़की बोली, “प्यार का मतलब बकवास है. इसका फेवर वे लोग ही करेंगे, जो कॉलेज को मौज-मस्ती का अड्डा मानते हैं.” यह सुनकर लड़के होहल्ला मचाने लगे. यह सुनकर मीना ने सबको शांत किया और क्लास के सबसे बुद्धिमान लड़के
राकेश की ओर मुखातिब होकर बोली, “तुम अपने विचार व्यक्त करो.”

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राकेश बोला, “प्यार वह ख़ूबसूरत एहसास है, जिसके बिना ज़िंदगी जीना संभव नहीं. सबसे पहला और अद्भुत प्यार तो वात्सल्य होता है, जो जन्म से ही हमें माता-पिता से मिलता है. यह प्यार निस्वार्थ और निष्कपट होता है, जो जीवन के अंतिम पड़ाव तक हमें संरक्षण प्रदान करता है. प्यार का दूसरा रूप है- स्नेह. यह हमें अपने भाई-बहनों, गुरुजनों, मित्रों-रिश्तेदारों से मिलता है. यह प्यार हमें अपने गुणों और अच्छे व्यवहार के कारण मिलता है. हां, यदि परिचर्चा का विषय प्रेमी-प्रेमिका वाले प्यार सेे है, तो उससे तो तौबा-तौबा, क्योंकि अभी हमारे पढ़ने की उम्र है. बीता व़क़्त तरकश से निकले तीर की तरह होता है, जो दोबारा लौटकर नहीं आता. कॉलेज लाइफ़ का एक-एक दिन क़ीमती है. हमें ऐसे प्यार के चक्कर में न पड़कर अपना भविष्य संवारना चाहिए.”

मीना के चेहरे पर एक विशेष प्रकार की संतुष्टि थी, वो मेरी तरफ़ मखातिब होकर बोली, “ओमेशजी, क्या आप भी राकेशजी के विचारों से सहमत हैं?” मेरे मुंह से बस इतना ही निकला, “हां, पूरी तरह से.”

उस दिन यदि मीना ने मुझे सही राह न दिखाई होती, तो मैं आज जिस मुक़ाम पर खड़ा हूं, वहां तक कभी न पहुंच पाता. पहले प्यार के एहसास जब याद आते हैं, तो आज भी आंखें उसके प्रति श्रद्धा से झुक जाती हैं.

– डॉ. ओ. पी. दास गुप्ता

 

 

पहला अफेयर: मेरी क्या ख़ता थी…? (Pahla Affair: Meri Kya Khata Thi?)

Pahla Affair, Meri Kya Khata Thi

पहला अफेयर: मेरी क्या ख़ता थी…? (Pahla Affair: Meri Kya Khata Thi?)

लगभग 20 साल पुरानी है. तब मेरी उम्र 17 साल थी. हमारे पड़ोस में एक कपूर परिवार रहता था. उनके परिवार से मैं बहुत घुल-मिल गई थी. उनकी पत्नी अपनी स्कूटी की चाबी हमेशा उसमेंं ही लगाकर भूल जाती थीं. मैं उनकी इस आदत का फ़ायदा उठाते हुए अक्सर उनसे बिना कहे उनकी स्कूटी लेकर घूमने चली जाती थी.

एक दिन इसी तरह मैं उनकी स्कूटी लेकर अपनी बुआ के घर चली गई. वापस लौटी तो पता चला कि कपूर साहब के भाई, जो चंडीगढ़ से यहां किसी इंटरव्यू के लिए आए थे, उनकी ट्रेन छूट गई, क्योंकि उनका टिकट स्कूटी की डिक्की में रखा हुआ था.

मैं अपने किए पर शर्मिंदा हो रही थी कि वो साहब बोले, “शायद वाहे गुरु की मर्ज़ी कुछ और है. मेरी मंज़िल चंडीगढ़ नहीं, कहीं और है.” मैं शरमाकर वहां से भाग गई. पर उनका चेहरा मेरे ख़यालों में और बातें मेरे कानों में गूंज रही थीं. अब तो मैं कुछ न कुछ बहाना करके उनके घर के चक्कर लगाने लगी थी.

उस ज़माने में खुलकर मिलने की बात तो हम सोच भी नहीं सकते थे. अत: हमारी बातों का ज़रिया था- गोलू, कपूर साहब का बेटा. वे लोग आपस में पंजाबी में बातें किया करते थे, जो मुझे समझ में नहीं आती थीं.

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एक दिन मैंने खीझकर कहा, “रहते बिहार में हो, तो आपको यहां की भाषा अपनानी चाहिए.” बस, उन्होंने झट से एक काग़ज़ पर कुछ लिखा और शरारतभरी मुस्कुराहट के साथ कहा, “अगर आप कहें तो मैं यहीं का बन जाऊं और मुझे तो हिंदी लिखनी भी आती है. आप पढ़कर सुनाओ तो जानूं.” मैंने उस काग़ज़ को पढ़ना शुरू ही किया था कि मेरी बोलती बंद हो गई. उसमें लिखा था, ‘झील-सी आंखों में डूब जाऊं, ऐतराज़ न करना, इन बांहों में ही चाहूं अब जीना-मरना.’

इस तरह हमारा प्यार चुपके-चुपके अपनी मंज़िल की ओेर बढ़ रहा था कि एक आंधी ने सब तहस-नहस कर दिया. मेरी दीदी ने एक तमिल लड़के से कोर्ट-मैरिज कर ली. वे जानती थीं कि इस रिश्ते को हमारा कट्टरपंथी ब्राह्मण परिवार और समाज अपनी स्वीकृति नहीं देगा. पापा इस सदमे को सह नहीं पाए और उन्होंने नींद की गोलियां खाकर अपनी जान देने की कोशिश की.

ईश्‍वर की कृपा से पापा बच गए. पर मैं जैसेे हक़ीक़त के धरातल पर उतर आई थी. मैं भी तो एक पंजाबी लड़के से प्यार करने लगी थी. पापा शायद दूसरे सदमे को सह नहीं पाएंगे. मुझे अपने बढ़ते क़दमों को रोकना होगा. उस दिन से मैंने कपूर साहब के घर जाना बंद कर दिया. लेकिन मैं इतना समझ चुकी थी कि उनके सामने रहूंगी, तो टूट जाऊंगी. अत: मैंने अपनी आगे की पढ़ाई कोलकाता में अपनी मौसी के घर रहकर पूरी करने का निर्णय लिया.

जिस दिन मैं कोलकाता जा रही थी, गोलू ने मुझे एक काग़ज़ का टुकड़ा दिया, जिसमें लिखा था, ‘मेरी क्या ख़ता थी?’ आज भी मैं इसका उत्तर खोजती हूं, तो अपराधबोध से भर जाती हूं. पर इसके लिए भी समाज कम दोषी नहीं. पता नहीं हम ग़लत थे या यह रूढ़िवादी समाज. शायद कच्ची उम्र का प्यार ही ग़लत होता है, जो वास्तविकताओं से दूर केवल दिल को ही पहचानता है. लेकिन ये एक अनमोल ख़्वाब की तरह है, जो कभी भुलाए नहीं भूलता.

– पूनम

पहला अफेयर: रूठ गया वसंत… (Pahla Affair: Rooth Gaya Vasant)

Pahla Affair, Rooth Gaya Vasant

 

पहला अफेयर: रूठ गया वसंत… (Pahla Affair: Rooth Gaya Vasant)

क्यों रूठा हमसे बसंत
हमने तो सुदूर नीलांबर के इंद्रधनुष में
प्यार के कुछ रंग भरने चाहे थे
ज़माने की आंधी चली कुछ ऐसी
ज़िंदगी में हमेशा के लिए पतझड़ छा गया

फिर वसंत आ गया. बसंत का यह मौसम दिल में एक अजीब-सी हूक जगा देता है. कॉलेज के वो दिन आंखों के सामने घूम जाते हैं, जो मेरी ज़िंदगी में बहार लेकर आए थे.

मेरे लिए यह शहर भी अजनबी था और यहां के लोग भी. मैंने मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया था. कॉन्वेंट स्कूल के सख़्त अनुशासन के पश्‍चात् यहां का सहशिक्षा वाला वातावरण उन्मुक्त प्रतीत हुआ. शुरू-शुरू में थोड़ी मुश्किलें ज़रूर आईं, पर जल्दी ही मैंने नए माहौल में अपने आप को ढाल लिया, कई साथी भी बन गए.

कॉलेज में सांस्कृतिक सप्ताह का आयोजन होनेवाला था. मेरे एक सहपाठी ने मुझसे उसके साथ युगल गान प्रतियोगिता में भाग लेने का अनुरोध किया. मैंने उससे स्पष्ट कहा कि मुझे गीत-संगीत सुनने का शौक़ तो बहुत है, किंतु मैं स्वयं अच्छा नहीं गा पाती हूं, इसलिए वह कोई और पार्टनर चुन ले. गायन प्रतियोगिता वाले दिन उस छात्र को जब एक ख़ूबसूरत छात्रा के साथ स्टेज पर गाते देखा तो न जाने क्यों कुछ अच्छा नहीं लगा. मुझे ईर्ष्या का अनुभव हुआ. फिर तो मैं भी नृत्य, नाटक, लेखन आदि प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगी और इसके लिए अनेक पुरस्कार भी जीते. धीरे-धीरे मैंने उस लड़के से दोस्ती भी बढ़ा ली.

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हम दोनों में ख़ूब पटने लगी. एक गहरे आकर्षण के मोहपाश में हम बंधते चले गए. जूही-चंपा व गुलमोहर से हरी-भरी कॉलेज की बगिया हमारी मुलाक़ातों की मौन साक्षी बनी. एक-दूसरे के साथ के सिवाय हमें कुछ अच्छा ही नहीं लगता. साथ उठते-बैठते, लड़ते-झगड़ते कब हम भावी जीवन के मधुर स्वप्न देखने लगे, पता ही नहीं चला. मगर ख़्वाब देखते हुए शायद हम ये भूल गए कि हमारे समाज में जाति-पाति, वर्ग-भेद बहुत गहरा पैठा हुआ है.

परिवार की रज़ामंदी तो दूर, हमारे प्रेम पथ पर दुखों के कांटे बिछा दिए उन्होंने. जीवनभर अपने प्रियजनों से अलगाव झेलने का सामर्थ्य नहीं था हममें, न ही आर्थिक रूप से हम सक्षम थे कि समाज से दूर अपनी नई दुनिया बसा पाते. कठोर यथार्थ के दानव ने हमारा स्वप्न-लोक नष्ट कर दिया. हमारे ख़्वाब अधूरे रह गए. मेरा राजकुमार स़फेद घोड़े पर सवार हो मुझे ब्याहने नहीं आ पाया. अश्रुओं का अथाह सागर अंदर ही शुष्क हो गया. मैंने आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लिया और मेरे इस निश्‍चय को कोई नहीं डिगा पाया.
मेरा प्यार कहां है, कैसा है, यह जानने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाई मैं. नेह के गुलाबों की सुरभित पंखुड़ियां मेरी स्मृतियों की क़िताब के पृष्ठों के बीच आज भी दबी हुई हैं. कभी अनजाने में मेरे पहले और अंतिम प्यार ने गीत गाते हुए जीवन की सच्चाई बयां कर दी थी.

जीवन के सफ़र में राही
मिलते हैं बिछड़ जाने को
और दे जाते हैं यादें
तन्हाई में तड़पाने को.

– डॉ. महिमा

शादीशुदा से प्यार अब परहेज़ नहीं (Having An Affair With Married Man?)

Having An Affair With Married Man
बदलते ज़माने के दौर में बहुत कुछ बदला है. पर सबसे अधिक जीने के नज़रिए में बदलाव आया है. एक व़क़्त था, जब शादीशुदा के प्यार के बारे में ख़्याल को भी ग़लत माना जाता था, पर अब ऐसा नहीं रहा. आइए, इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर एक नज़र डालें.

Having An Affair With Married Man

  • एक का हो गया, वह दूसरे का नहीं हो सकता. एक ज़माने में लोग ऐसा ही सोचते थे. इसीलिए एकदो दशक पहले तक ऐसी घटनाएं कम ही देखने को मिलती थीं कि किसी लड़की को शादीशुदा पुरुष से प्यार हो जाए. उस ज़माने में लड़कियों के बुनियादी स्त्रियोचित गुणों में सौतिया डाह का स्थान सर्वोपरि था. यह कल्पना करना मुश्किल था कि अविवाहित लड़की किसी अन्य स्त्री के पति के साथ प्यार की पींगे बढ़ा सकती है.
  • लेकिन स्त्री और पुरुष की इस बनावट और उनके संबंधों की बुनावट में पिछले कुछ अरसे से काफ़ी बदलाव आया है. आज लड़कियां न केवल शादीशुदा पुरुष को प्यार के क़ाबिल समझ रही हैं, बल्कि समाज भी ऐसे संबंधों पर ऐतराज़ करता नज़र नहीं आ रहा. समाज और जीवन के ये फ़लस़फे यूं ही नहीं बदल गए. इनके लिए देशदुनिया में हो रहे तमाम परिवर्तन ज़िम्मेदार हैं.

लड़कियों का कामकाजी होनाः शादीशुदा पुरुष के प्रति लड़की के झुकाव, लगाव और प्यार की सबसे बड़ी वजह आज के ज़माने में लड़कियों का कामकाजी होना है. किसी ऑफ़िस में काम करती लड़की सुबह 10 से शाम 5 बजे तक का समय अपने पुरुष सहकर्मी के साथ बिताती है. लंबे समय तक साथ काम करना, चाय पीना, लंच करना, हंसीमज़ाक जैसी रोज़मर्रा की घटनाएं चाहेअनचाहे दिलों को क़रीब लाती हैं. काम के दौरान एकदूसरे का सहयोग करने, सीखनेसिखाने, सुखदुख बांटने का सिलसिला कब प्यार में तब्दील हो जाता है, पता ही नहीं चलता. इसके अलावा करियर की सीढ़ियां चढ़ने की चाहत भी प्यार का चोला पहनकर आती है.

सीरियल, हॉलीवुड व बॉलीवुड का असरः भारतीय महिलाओं की मनःस्थिति में आए इस बदलाव में धारावाहिकों की भी ख़ास भूमिका रही है. आजकल हर धारावाहिक में मसाला डालने के लिए जो तानेबाने बुने जाते हैं, उनमें विवाहित पुरुषों से रिश्ते बनानेवाली नायिकाओं ने आम युवतियों को भी प्रेरित किया है. आज लड़कियां शादी से पहले अथवा शादी के बाद भी अपनी मर्ज़ी से ऐसा कोई क़दम उठाने में नहीं झिझक रही हैं.

भारतीय महिलाओं के मन को इस रूप में ढालने में दूसरी सबसे अहम् भूमिका बॉलीवुड और हॉलीवुड के सितारों की भी रही है. नायकनायिकाओं को अपनी पसंद की ज़िंदगी जीने और अपनी पसंद की स्त्री/पुरुष को चुनने की आज़ादी ने धारावाहिकों में चल रही काल्पनिक कहानियों पर सच्चाई की मुहर लगा दी है. बदलाव आपके सामने है. आज से दो दशक पहले कोई युवती शादीशुदा पुरुष के साथ संबंध बनाकर अपने घर तो क्या, दूर किसी शहर में भी रहने की नहीं सोच सकती थी जबकि आज ऐसे रिश्ते के बावजूद लड़कियां अपने परिवार में ही रह रही हैं और कहीं से भी विरोध के स्वर उठते नहीं दिखते.

ग्लोबलाइज़ेशन व सूचना क्रांतिः सूचना क्रांति और वैश्‍वीकरण ने सारी दुनिया को एक गांव की शक्ल दे डाली है. दुनिया की सारी संस्कृतियां एकदूसरे को काफ़ी नज़दीक से देख रही हैं. टीवी चैनलों पर दूरदराज़ की ख़बरें पलभर में हर जगह पहुंच जाती हैं. ऐसे में पश्‍चिमी सभ्यता के खुलेपन का असर भारतीय समाज पर भी पड़ा है और भारतीय युवाओं और युवतियों के मन में भी खुली हवा में सांस लेने की चाहत जागी है. वह अपनी पसंद के पुरुष के साथ जीवन जीना चाहती है. वह पुरुष अविवाहित है या विवाहित, इससे उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

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Having An Affair With Married Man
बड़े धोखे हैं इस राह में

नोएडा की एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत जयचंद विवाहित है. उसकी पत्नी और बच्चे गांव में हैं. वह और उसके साथ काम करनेवाली वर्षा एक ही बिल्डिंग में रहते हैं. एक ही ऑफ़िस में साथसाथ काम करते हुए और एक ही बिल्डिंग में रहते हुए वर्षा न जाने कब जयचंद के मोहपाश में बंधकर उससे प्रेम करने लगी, वह जयचंद को अपना सर्वस्व मानने लगी. लेकिन क्या ऐसा जयचंद के साथ भी है? क्या वह भी वर्षा को उसी शिद्दत के साथ चाहता है? नहीं! वर्षा अब यह अच्छी तरह जान चुकी है. जिस प्रेम ने उसके अंदर कभी उमंगें भरी थीं, वह अब एक बोझ बनकर रह गया है. वर्षा इस असहनीय स्थिति से छुटकारा पाना तो चाहती है, लेकिन जयचंद से अलग होकर जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती. इसलिए इस कशमकश भरे रिश्ते को प्यार के नाम पर निभाए जा रही है.

यह मात्र एक वर्षा और जयचंद की कहानी नहीं है. ऐसी न जाने कितनी वर्षाएं अपने प्यार से न जाने कितने जयचंदों की दुनिया हरीभरी कर रही हैं. लेकिन क्या उनकी अपनी दुनिया हरीभरी है, वे ख़ुद भी आश्‍वस्त होकर नहीं कह सकती हैं.

ज़ाहिर है, शादीशुदा पुरुष से प्यार की राह पर ख़तरे तो हर क़दम पर हैं, लेकिन ज़िंदगी की अजीब दास्तां का क्या ठिकाना? वह ऐसे मोड़ पर पहुंच सकती है, जहां कोई ऐसा मिल जाए, जो हो तो चुका हो किसी और का, पर बना आपके लिए है. ऐसे में क्या करेंगी आप? क्या ज़िंदगी जीने के लिए कभीकभी ख़तरों से नहीं खेलना पड़ता?

भ्रमित जीवन की शिकार

दरअसल अविवाहित लड़कियां अपने प्यार को चाहे जितना सच्चा मानें, ख़ुद को चाहे जितना स्मार्ट समझें, शादीशुदा पुरुष की निगाह में वे बस इच्छाओं की पूर्ति का एक साधन होती हैं. अपनी समझ से जब वे प्यार कर रही होती हैं, तब वस्तुतः वे शिकार बन रही होती हैं. इसके कई कारण हैं

कम उम्र वाली लड़कियों की चाहत होती है कि पुरुष उन पर ध्यान दें, उनके काम की प्रशंसा करें, उनकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ करें. शादीशुदा पुरुष की अनुभवी आंखें उनकी इन चाहतों को बख़ूबी भांप जाती हैं. मन में तरहतरह के मंसूबे बांधे हुए पुरुष बाहरी तौर पर तो अच्छा बनते हुए व मदद करते हुए बड़े सहज भाव से लड़की की इच्छाएं पूरी करता है, पर साथ ही प्यार के नाम पर इसकी क़ीमत भी वसूलता जाता है.

स्त्री पुरुष से अपना पूरा वजूद, सारी भावनाएं जोड़ लेती है, लेकिन पुरुष इसका बस दिखावा करता है. स्त्री के दिल व भावनाओं से खेलते हुए पुरुष की असल ज़रूरत महज जिस्मानी होती है. स्त्री को इसका पता तब चलता है, जब बहुत देर हो चुकी होती है. उसके सारे सपने चूरचूर हो जाते हैं और वह डिप्रेशन से घिर जाती है.

अपने प्रेम या यूं कहें कि प्रेमी की ख़ातिर स्त्री को जितना सहना पड़ता है, उसके मुक़ाबले शादीशुदा पुरुष को कोई त्याग नहीं करना पड़ता. प्रेम का खुलासा होने पर लड़की को परिवार, पैरेंट्स की नाराज़गी के साथ समाज की तोहमत और बदनामी भी झेलनी पड़ती है, जिससे आगे चलकर शादी में अड़चनें भी आती हैं. इतना सब कुछ झेलने के बाद आख़िर स्त्री को मिलता क्या है? दोहरी ज़िंदगी जीनेवाले फरेबी पुरुष का दिखावटी और झूठा प्रेम. ऐसा प्रेम जो दूर से तो नज़र आता है, लेकिन नज़दीक जाने पर मृगमरीचिका साबित होता है.

इंडियन साइको सोशल फ़ाउंडेशन की सायकोलॉजिस्ट डॉ. समीक्षा कौर शादीशुदा पुरुषों से बढ़ते प्यार के लिए करियर को लेकर आई जागरूकता और इसके कारण शादी में देर, दहेज व वैवाहिक जीवन की समस्याओं से भागने की प्रवृत्ति को मानती हैं. वे इसे परिस्थितिवश हुआ समझौता करार देती हैं और कहती हैं, ”जहां तक पुरुषों की बात है, तो पार्टनर से विचारों में तालमेल का अभाव, पत्नी का गैरज़िम्मेदाराना रवैया जैसी चीज़ें उन्हें दूसरी स्त्री, ख़ासकर अपनी कलीग की ओर खींचते है. वहीं युवतियों में करियर को लेकर आई जागरूकता व वैवाहिक जीवन के झंझटों से दूर स्वच्छंद जीवन जीने की चाह ने ऐसी परिस्थितियां पैदा की हैं. करियर की भागमभाग में युवतियों को मानसिक, शारीरिक तृप्ति के लिए सुरक्षित बांहों की तलाश होती है, जहां उनकी महत्वाकांक्षाएं प्रभावित न होती हों. ऐसे में उन्हें साथ में काम करनेवाले विवाहित पुरुष ज़्यादा उपयुक्त दिखते हैं.”

डॉ. कौर ऐसे संबंधों में ठगे जाने की बात को भी स्वीकारती हैं. ”स्त्री पहले प्यार करती है और बाद में शारीरिक संबंधों के लिए तैयार होती है, जबकि पुरुष पहले शारीरिक संबंध बनाता है और बाद में वह भावनात्मक रूप से जुड़ भी सकता है, नहीं भी. ऐसी युवतियां ऐसे क़दम उठा तो लेती हैं, लेकिन उनकी सुख की तलाश ख़त्म नहीं होती, क्योंकि उनकी कल्पना में जो प्रेम होता है, वह दूसरी स्त्री के रूप में कभी हासिल नहीं होता. उन्हें सौतिया डाह तो नहीं होता, मगर अपने साथी की पत्नी को नीचा दिखाने की चाह ज़रूर होती है. ऐसे संबंधों को अब मौन सामाजिक स्वीकृति भी मिल चुकी है. अभिभावक तो नहीं, पर भाईबहन ऐसी बातें आपस में शेयर कर ही लेते हैं. कुछ मामलों में मांबाप भी इन संबंधों को स्वीकार कर लेते हैं.”

संजय श्रीवास्तव

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पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया… (Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya)

Wo Meri Taqdeer Ban Gaya

Wo Meri Taqdeer Ban Gaya

पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया… (Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya)

वो मेरी तक़दीर बन गया…
बरसात में हम पानी बनकर बह जाएंगे
पतझड़ में फूल बनकर झर जाएंगे
क्या हुआ आज तुम्हें इतना तंग करते हैं
एक दिन बिना बताए इस दुनिया से चले जाएंगे.

उसने तो शायरी की चंद पंक्तियां सुनाकर सबकी वाहवाही लूट ली. लेकिन मेरा दिल उन ल़फ़्ज़ों की आंच से धीमे-धीमे पिघलने लगा. कई दिनों से वह मेरा पीछा कर रहा था. वह मुझे अपनी हरकतों से इस अंदाज़ से छेड़ता कि मैं चाहकर भी कुछ न कह पाती. मन ही मन उसकी अदाएं, बदमाशियां और उसका इस तरह से मुझे छेड़ना अच्छा भी लगता, लेकिन मैं यह बात उस पर ज़ाहिर न होने देती. एक दिन वह अचानक मेरे सामने आ खड़ा हुआ और कहने लगा, “आख़िर आप मुझसे बात क्यों नहीं करना चाहती हैं? मैं एक शरीफ़ और अच्छे घर का लड़का हूं. आपको पसंद करता हूं, इसलिए आपसे दोस्ती करना चाहता हूं.”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और पलटकर चल दी. कई दिनों तक वो कोशिश करता रहा कि मैं एक बार नज़र उठाकर उसकी तरफ़ देख लूं. मन तो मेरा भी चाहता था कि सबकी नज़रें चुराकर उसकी एक झलक देख लूं, लेकिन एक अनजाना डर हमेशा मुझे इस बात से रोक देता था.

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मैं अपने परिवार से बहुत प्यार करती थी और नहीं चाहती थी कि मेरा कोई भी ग़लत क़दम मुझे उनसे अलग कर दे. हालांकि उसकी लगातार मेरे क़रीब आने और बात करने की कोशिशों से मेरा दिल विद्रोही हो उठा था और बगावत करने पर उतारू हो गया था. लेकिन मैं तो जैसे दिल की बात सुनने को तैयार ही नहीं थी. मैं प्यार के चक्कर में पड़ना नहीं चाहती थी. इतना तो मैं जानती थी कि ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनका प्यार सही अंजाम तक पहुंचता है. मैं प्यार का दर्द लेकर जीना नहीं चाहती थी. इसलिए मैंने उससे दूर रहना ही ठीक समझा.

एक दिन पापा ने मुझसे कहा, “बेटे आज एक पार्टी में जाना है, जहां लड़केवाले आएंगे. मैं चाहता हूं तुम उन लोगों से मिलो. लड़के से भी बात करके देख लो. हमें जल्दी ही तुम्हारी शादी का फैसला लेना है.” मैंने भी पापा की बात को सहमति देते हुए कहा, “पापा, जैसा आप ठीक समझें. मुझे पता है, आपका फैसला ग़लत नहीं होगा.”

जब हम पार्टी में पहुंचे तो मैं सबसे औपचारिक बातें करने में मशग़ूल थी कि माइक पर आवाज़ गूंजी,
अजनबी लोग भी देने लगे इल्ज़ाम मुझे
कहां ले जाएगी तेरी पहचान मुझे
भुलाना चाहूं तो भुलाऊं कैसे,
लोग ले ले के बुलाते हैं तेरा नाम मुझे.

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच जो चेहरा मेरे सामने आया, वो उसका ही था. मैं मुड़कर जाने ही लगी कि पापा बोले, “बेटे, यही मधुर है, जिसे हमने तेरे लिए चुना है. अब फैसला तुझे करना है.” मेरी आंखें छलक पड़ीं. जब पलकें उठाकर उसे मुस्कुराते देखा तो मैं रोते-रोते मुस्कुरा उठी और अपनी क़िस्मत पर इतराने लगी-

जिस प्यार को मैं ठुकरा रही थी
वही मेरी क़िस्मत बन गया
जिसे ज़ुबां पर लाना मुश्किल था
वो नाम मेरे माथे का सिंदूर
मेरी तक़दीर बन गया…

– वीना साधवानी

हर कपल को जानने चाहिए सेक्स से जुड़े ये 10 सवाल-जवाब (10 Sex Q&A’s Every Couple Must Know)

Sex Q 7 A, Every Couple Must Know

कहने को तो हर कोई सेक्स के ख़ूबसूरत एहसास में हर समय डूबा रहना चाहता है, लेकिन जिस तरह हर चीज़ के नियम बनाए गए हैं, उसी तरह सेक्स को लेकर भी कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं. सेक्स किस समय करना चाहिए, किस स्थिति में करना चाहिए और किस दिन करना चाहिए आदि को ध्यान में रख कर जो सेक्स करता है वह चरम आनंद प्राप्त करता है और उसकी सेहत अच्छी बनी रहती है. सेक्स जहां हर इंसान की एक ज़रूरत है, वहीं एक सुंदर एहसास भी है और उसे अच्छी भावना के साथ करना भी ज़रूरी है. आनंददायक सेक्स के लिए सेक्स के प्रति समर्पण के साथ-साथ आपके साथी का सहयोग और सहमति भी ज़रूरी है. अगर वह अनिच्छा दिखाए तो उस दिन सेक्स न करें. याद रखें, सेक्स का मतलब आपसी प्यार दर्शाना होता है, न कि ज़बर्दस्ती करना.

1. किन परिस्थितियों में सेक्स करने से बचना चाहिए और क्यों?

बहुत से दंपत्ति इन बातों को प्रायः नहीं जानते कि कब सेक्स किया जाए और कब नहीं. कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं जब सेक्स से परहेज़ करना ज़रूरी हो जाता है. अगर ऐसे में सेक्स किया जाता है तो सेक्स का पूरा सुख नहीं मिलता, साथ ही स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है. अत: जहां तक संभव हो, शारीरिक या मानसिक अस्वस्थता की स्थिति में सेक्स करने से बचना चाहिए-

2. शारीरिक तकलीफ़, विशेषकर दिल के दौरे के बाद सेक्स करना क्यों वर्जित है?

जब आपको या आपके साथी को कोई भी शारीरिक या मानसिक तकलीफ़ या परेशानी हो तो उस दौरान सेक्स न करें, विशेषकर तब जब डॉक्टर ने बेड रेस्ट की सलाह दी हो. दिल के दौरे जैसी किसी भी तकलीफ़ के समय जब सचमुच आराम की ज़रूरत होती है, ऐसे में कोई भी सेक्स क्रिया दिल पर दबाव डालकर आपको परेशानी में डाल सकती है.

3. मानसिक बीमारी की स्थिति में सेक्स क्यों नहीं करना चाहिए?

सेक्स न सिर्फ शरीर का, बल्कि मन का भी मिलन है. कोई भी मानसिक रोग आप या आपके साथी के लिए सेक्स का आनंद उठाने में बाधा बन सकता है. आप में से किसी एक को मानसिक रोग- डिप्रेशन, तनाव, नर्वस ब्रेक डाउन जैसी कोई भी शिकायत हो, तो सेक्स की इच्छा ख़ुद-ब-ख़ुद मर जाती है. ऐसे में बोझिल मन से सेक्स करना ठीक नहीं होगा और न ही ऐसे में आप सेक्स का सुख उठा पाएंगे.

4. सर्जरी के कितने दिनों बाद सेक्स करना चाहिए?

किसी भी सर्जरी के बाद यह बेहतर होता है कि आप सेक्स से परहेज़ करें. जब तक डॉक्टर सही तरह से आपका परीक्षण कर आपके पूरी तरह से ठीक होने का आश्‍वासन न दे दे. ताज़ा सर्जरी के बाद सेक्स करने से आपके टांके खुलने या खून बहने से लेकर गंभीर दर्द जैसी कोई भी घटना हो सकती है जो आपको मुसीबत में डाल सकती है.

5. एस टी डी (सेक्सुअल ट्रांसमीटेड डिसीज़) होने की स्थिति में सेक्स करने पर क्या पार्टनर को भी यह रोग हो सकता है?

एस टी डी जैसे किसी भी संसर्गजन्य रोग के होने पर इसे फैलने से रोकने का एकमात्र उपाय है सेक्स को टालना. एचआईवी, एड्स जैसी गंभीर बीमारी भी सेक्स के ज़रिए एक साथी से दूसरे साथी को मिल सकती है. इसलिए ऐसी स्थिति में सेक्स करने से बचें. डॉक्टर तो इस तरह के रोग की आशंका होने पर जब तक सच्चाई की पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक शारीरिक संबंधों से दूर रहने की सलाह देते हैं.

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6. कभी-कभी इंटरकोर्स के समय साथी को दर्द की शिकायत होती है ऐसी स्थिति में सेक्स से बचना क्यों ज़रूरी है?

जब इंटरकोर्स के समय साथी (पत्नी) को दर्द महसूस हो रहा हो तो समझ लीजिए कि ये खतरे की घंटी है. ऐसे में सेक्स करने से बचें. अगर दर्द लगातार हो तो तुरंत पत्नी के साथ अपने डॉक्टर से संपर्क करें. दर्द भरा सेक्स शारीरिक तकलीफ़ के साथ-साथ मानसिक तकलीफ़ में भी डाल सकता है. आपके लिए यही सही होगा कि आप अपने साथी के दर्द का ख़याल रखें और दर्द के बग़ैर सेक्स का आनंद उठाएं.

7. कुछ लोगों का कहना है कि गर्भावस्था में सेक्स नहीं करना चाहिए, जबकि कुछ लोगों की मान्यता है कि गर्भावस्था में सेक्स किया जा सकता है. वास्तविकता क्या है?

गर्भावस्था में सेक्स को लेकर अक्सर उलझन रहती है कि गर्भावस्था के दौरान सेक्स किया जाए या नहीं. विशेषज्ञ मानते हैं कि गर्भावस्था के छठे हफ्ते से लेकर बारहवें हफ्ते तक सेक्स नहीं करना चाहिए, क्योंकि इस दौरान गर्भपात की संभावना बनी रहती है. यही नहीं, गर्भधारण के आखिरी दो महीनों में भी सेक्स करना ख़तरनाक हो सकता है. गर्भधारण के चौथे और सातवें महीने में ही सेक्स किया जा सकता है.

8. ऐसा कहा जाता है कि सेक्स करने से पति-पत्नी के आपसी झगड़े सुलझ जाते हैं, लेकिन जब मानसिक स्थिति ठीक न हो तो क्या सेक्स का आनंद उठाया जा सकता है?

अधिकतर लोग समझते हैं कि सेक्स पति-पत्नी के आपसी झगड़ों को निपटाने का एक कारगर तरीक़ा है. तुरंत सेक्स कर लेने से आपसी टकराहट दूर हो जाती है लेकिन यह सही नहीं है, क्योंकि सेक्स के लिए तन और मन का एक होना ज़रूरी है. ऐसी किसी भी टकराहट की स्थिति में सेक्स न करें. अगर मन में कड़ुवाहट हो और तन से आप सेक्स कर रहे हों तो यह सिर्फ एक काम होगा, जिसे जबरन निपटाया जाएगा. इसमें कोई भावना नहीं होगी तो चरम आनंद कैसे प्राप्त होगा. याद रखें, सेक्स के लिए आपको शरीर और मन से एक होना पड़ेगा तभी आप सही अर्थों में सेक्स का आनंद उठा पाएंगे.

9. क्या पुरुषों की तरह महिलाएं सेक्स के बारे में कभी नहीं सोचतीं?

हम ये कह सकते हैं कि पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं सेक्स के बारे में कम सोचती हैं, मगर ये कतई नहीं कह सकते कि महिलाएं सेक्स के विषय में सोचती ही नहीं हैं. रिसर्च की मानें तो न स़िर्फ पुरुष, बल्कि महिलाएं भी सेक्स के बारे में सोचती हैं, लेकिन ऐसा उस वक़्त होता है, जब वो हार्मोनल बदलाव के दौर से गुज़रती हैं.

10. अगर पहली बार आप सेक्स में असफल हो जाते हैं, तो क्या इसका मतलब आपमें कमी है?

ये एक ग़लत धारणा है. जिस तरह हर चीज़ की प्रैक्टिस ज़रूरी होती है, उसी तरह बेहतर सेक्स का आनंद भी कई बार प्रैक्टिस करने के बाद मिलता है. हो सकता है, शुरुआती दौर में आप सेक्स को उस तरह एंजॉय न कर पाएं, जिस तरह कई बार प्रैक्टिस के बाद.

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पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू… (Pahla Affair: Yadon Ki Khushbu)

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पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू… (Pahla Affair: Yadon Ki Khushbu)

चली हवा छाई घटा, चुनरी क्यों लहराई
बैठी-बैठी सोच रही मैं, बेबात क्यों हिचकी आई
उस रोज़ स्वेटर सीने बैठी उंगली में सुई ऐसी चुभी कि उस चुभन का एहसास आज भी ताज़ा है. ख़ून आज भी रिस रहा है. सूई की पीड़ा की अथाह परतें आज भी मन को मथने लगती हैं. मम्मी उठकर पास चली आईं. शायद उसने मेरा दर्द महसूस किया. मम्मी के बगल में बैठा मनुज ज़ोर-ज़ोर से ठहाका लगाकर हंस पड़ा. कभी-कभी बातों को हंसी में उड़ा देना और फिर एकदम गंभीर हो जाना, जैसे कोई रहस्यमयी क़िताब पढ़ रहा हो, ये सब उसकी आदतों में शामिल था. मैं खीझ उठती, “मनु, किसी नाटक कंपनी में भरती हो जाओ या मंच पर मिमिक्री का रोल…” मेरी बात को काटकर मम्मी से कहता, “भई स्वेटर के उल्टे फंदों में उलझेगी तो हादसा तो होगा ही.” मैं कटकर रह जाती. वह फिर ठहाका लगाता और… मैं उसकी हंसी की आवाज़ में खो जाती.

उसका छोटा-सा परिचय- वह हमारे गेस्ट हाउस में रहने आया. पापा के किसी ख़ास दोस्त का सिरफिरा साहबज़ादा. उसकी कही हुई एक-एक बात आज भी दुधारी तलवार-सी चीरती है मुझे. हर व़क़्त तोते-सी रटी-रटाई बात कहता, “शिल्पी, ज्यों ही मुझे वीज़ा मिल जाएगा, मैं हवा में फुर्र हो जाऊंगा.”

“उ़़फ्! लंदन जाकर पढ़ने का इतना ही शौक़ था तो फिर प्यार की पींगें बढ़ाने का यह जुनून क्यों पाला?” मैं चिढ़कर कहती.
बेशक कसकर बंद कर लूं आंखें. विचार चलचित्र की भांति चलते रहते हैं. चैन कहां लेने देते हैं? सुना था, चूक गए अवसर अपने पीछे पछतावे की लंबी कतारें छोड़ जाते हैं. कैसे यक़ीन की कश्ती पर मुझे बिठा चुपचाप समंदर पार कर गया… और छोड़ गया मेरे लिए यादों की लंबी कतारें. अब तो रूह से एक मायूस गज़ल फूटती है-

अब न लौट के आनेवाला
वो घर छोड़ के जानेवाला
हो गई उधर बात कुछ ऐसी
रुक गया रोज़ का आनेवाला

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जिस रोज़ उसे वीज़ा मिला, उस रोज़ वह बेहद ख़ुश आया. हवा के झोंके-सा आया था मेरे घर. छत पर हम कुछ पल बतियाए. रुख़सत होते व़क़्त मेरे दोनों हाथ पकड़कर वह बोला, “शिल्पी, उदासी उतार फेंको. मेडिकल की पढ़ाई ख़त्म होते ही लौटूंगा अपनी शिल्पी के पास, विवाह बंधन में बंधने.” मैं पगली गुलमोहर के फूलों में भी लाल जोड़े की कल्पना करने लगी.

उसका सच इतना झंझावाती था कि सपनों के तमाम घरौंदों को रौंदता आगे निकल गया. वह जा बसा सात समंदर पार…
मैं यहां बिलखती रही अकेली. कभी-कभी मेरी यादों के परिंदे जाकर मेरे पहले प्यार को छू आते हैं. उन हवाओं में आज भी रची-बसी हैं तुम्हारे यादों की ख़ुशबू… डरती हूं. इन यादों को कहां उखाड़ फेंकूं. ये तो कैक्टस की तरह फिर उग आएंगी.

रात आंखों में कटी, पलकों पे जुगनू आए
हम हवा की तरह जा के उसे छू आए.

– मीरा हिंगोरानी

पहला अफेयर: तुम्हारा जाना… (Pahla Affair: Tumhara Jana)

 

पहला अफेयर: तुम्हारा जाना... (Pahla Affair: Tumhara Jana)

पहला अफेयर: तुम्हारा जाना… (Pahla Affair: Tumhara Jana)

ट्रेन जिस तेज़ी से भाग रही थी, उससे भी ज़्यादा तेज़ी से मन अतीत की ओर दौड़ा जा रहा था. दूर-दूर तक दिखते अलसाए से मैदान और उदासीन खड़े पहाड़ एक अजीब-सा खालीपन पैदा कर रहे थे. रह-रहकर आंखों के कोनों में गीलेपन का एहसास हो रहा था. दिल किसी अपने के कंधे पर सिर रखकर अंदर के गुबार को आंखों के रास्ते बाहर निकाल देना चाहता था. पर नीला, तुम्हारे ये शब्द मुझे रोकने की कोशिश कर रहे थे कि  “लड़के रोते हुए अच्छे नहीं लगते, रोने का काम तो हम लड़कियों का है, सो हमें ही रोने दिया करो.”

इस शहर से जब अजनबीयत का ही रिश्ता था, तब एक अलसाई-सी दोपहर, बस से जाते हुए सड़क के किनारे खड़े देखा था तुम्हें. उस गर्म दोपहर में भी सुबह की ओस जैसी ताज़गी तुम्हारे चेहरे पर खिली हुई थी. इससे पहले कि मैं उस शीतलता को अनुभव कर पाता, बस आगे बढ़ गई थी. लाल बत्ती पर जैसे ही बस रुकी, बिजली-सी फुर्ती से ख़ुद को नीचे खड़ा पाया. आज भी यह सोचकर हैरानी होती है कि मुझ में कहां से इतना साहस आ गया था उस समय. पहली बार मिलने पर भी अजनबीपन को हमारे बीच की दीवार बनने का मौक़ा नहीं मिला. वर्षों पुरानी पहचान के ये संकेत तुम्हें भी मिले थे उस दिन.

तुम्हारी गहरी आंखों में अक्सर नीले आसमान-सा सूनापन दिखता था तो कभी नीली झील-सी गहरी ख़ामोशी, जिसका अनुमान लगाना मुश्किल होता था. शायद इसी वजह से मैंने तुम्हें नाम दिया था “नीला.”

गरजती हुई ट्रेन अचानक एक सुरंग में प्रवेश कर गई. घुप्प अंधेरा आंखों के आगे छा गया. पहाड़ी से उतरते हुए उस दिन शायद ऐसा ही अंधेरा तुम्हारी आंखों में भी छाया था. कुछ क्षणों के लिए चेतनाशून्य हो गई थी तुम. चेहरा एकदम पीला पड़ गया था तुम्हारा. थोड़ा ठीक होने पर सिरदर्द का बहाना बनाकर टाल गई थी. उस दिन के बाद तुम्हारे चेहरे के भावों को पढ़ना मुश्किल लगने लगा था. जिस घर की एक-एक चीज़ को तुमने अपने हाथों से संवारा था, अचानक ही उसे मेरे नाम करने की घोषणा कर दी थी तुमने. तब भी तुम्हारी आंखों की भाषा को पढ़ने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं की मैंने उस दिन.

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कुछ दिन बाद मुझे दूसरे शहर से पेंटिंग्स की शृंखला तैयार करने का प्रस्ताव मिला. शायद ये तुम्हारी ही कोशिशों का परिणाम था. अपना वास्ता देकर तुमने मुझे वहां भेजा था. छह महीने लग गए थे काम पूरा करने में. सभी ने मेरे काम की ख़ूब सराहना की.

वापस लौटने पर पता चला कि तुम इस शहर से जा चुकी हो. कोई निशान भी बाकी नहीं छोड़े थे तुमने, सारी कोशिशें बेकार गईं तुम्हें ढूंढ़ने की. मन में शायद उम्मीद की किरण बाकी थी, सो महीनों तक भटकने के बाद फिर वापस मैं इसी शहर में आया और अचानक ही तुम्हारी बहन से मुलाक़ात हुई. उन्होंने जो बताया, उसे सुनकर होश उड़ गए थे मेरे. तुम इस शहर को तो क्या, दुनिया को भी अलविदा कह चुकी थी. बहाना ब्रेन ट्यूमर. मेरी भावुकता को तुम जानती थी. इसलिए अपने दर्द में बिल्कुल भी शामिल नहीं किया था तुमने. ऐसा लग रहा था पिघलता हुआ शीशा किसी ने मेरे कानों में उड़ेल दिया होे. शहर खाली कैनवास की तरह लग रहा था-बिल्कुल सूना. आज हमेशा के लिए छोड़ आया हूं मैं इस शहर को.

नीला प्लीज़, आज बिल्कुल भी मत रोकना, मन में घुमड़ते इस सैलाब को बहने से, वरना नासूर बनकर सारे शरीर से रिसने लगेगा. ट्रेन के टॉयलेट में बच्चे की तरह फूट-फूटकर रो रहा हूं मैं और सचमुच रोते हुए बहुत बुरा लग रहा हूं मैं.

– ब्रजेश नामदेव

ये प्यार इतना कॉम्प्लिकेटेड क्यों होता है? देखें वीडियो:

 

 

प्यार, सेक्स और कमिटमेंट… कितना बदला रिश्ता? (Why Our Relationship Changes Over Time?)

Why Our Relationship Changes Over Time

समाज जितनी तेज़ी से बदल रहा है, उतनी ही तेज़ी से प्यार, सेक्स और कमिटमेंट की परिभाषा व अहमियत भी बदल रही है. नई पीढ़ी संबंधों के अर्थ को पुनः परिभाषित कर रही है. इस दौर में जब इंस्टेंट कॉफी, फास्ट फूड, फेसबुक, ट्विटर और नेट चैट एक ट्रेंड व इन-थिंग बन गया है, प्यार का अर्थ बदला है और उसके साथ ही सेक्स व कमिटमेंट को लेकर भी धारणाएं बदली हैं.  सेक्स को प्यार माना जा रहा है और कमिटमेंट को बंधन. विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण बरक़रार है, पर आज का युगल कमिटमेंट से डरता है. आज प्यार में सेक्स घुल गया है और जब रिश्तों में प्यार न हो, तो कमिटमेंट का सवाल ही नहीं उठता है. प्यार शॉर्ट एंड स्वीट और लिव-इन के चारों ओर चक्कर लगा रहा है.

आज सामाजिक संबंधों के साथ-साथ परिवार के आत्मीय रिश्तों से जुड़े सरोकार भी बहुत कमज़ोर पड़ रहे हैं. हर जगह स्वार्थ पसर गया है. परिवार के आत्मीय संबंधों पर चोट करनेवाली तमाम घटनाएं आज देखने में आ रही हैं.

Why Our Relationship Changes Over Time
शॉर्टकट रिश्तों में भी

प्यार, रिश्ते और अपनापन जैसी भावनाओं पर स्वार्थ और शारीरिक आकर्षण हावी हो गया है. कमिटमेंट अब लोगों को बंधन लगता है, ऐसे में ज़िम्मेदारियां निभाना भी बोझ लगता है. हर कोई अपनी तरह से जीने का नारा लगाता हुआ लगता है. रिश्तों में भी शॉर्टकट अपनाया जाने लगा है. मिलो, बैठो कुछ पल और फिर एक दूरी बना लो. हर कोई अपनी एक स्पेस की चाह में अपनों से ही दूर होता जा रहा है. आज रिश्ता चीन के उस उत्पाद की तरह हो गया है, जो सस्ता तो है, पर टिकाऊ है या नहीं, इसका पता नहीं.

वर्तमान समय में रिश्तों की अहमियत इतनी बदल चुकी है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे अपनी व्यस्तता के कारण हो या निजी स्वार्थवश, बस रिश्तों को निभाने की बजाय उसे ढो रहा है.

समाजशास्त्री नेहा बजाज मानती हैं कि यह बबलगम प्यार का दौर है और इसमें युवा लड़का और लड़की दोनों ही की सोच एक जैसी है. जिस तरह आप बबलगम चबाते रहते हैं और जब मन भर जाता है, तब उसे थूक देते हैं, उसी तरह प्यार भी हो गया है. इसलिए आज के युग में कमिटमेंट का स़िर्फयही मतलब रह गया है कि फिल्में जाओ, पब और पार्टी में जाओ और अच्छे दोस्तों की तरह चिलआउट करो. इस बदलते दृष्टिकोण या व्यवहार का मुख्य कारण व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, क्योंकि कोई भी अपनी आज़ादी नहीं खोना चाहता.

कमिटमेंट से डरने लगे हैं लोग

रिश्ते बनाना तो आसान है, मगर निभाना मुश्किल है, क्योंकि निभाने के लिए चाहिए होता है कमिटमेंट. पर आजकल लोग रिश्तों को स़िर्फ सोशल मीडिया से ही निभा रहे हैं.

आज बिना किसी ज़िम्मेदारीवाले संबंध आसान और आरामदायक होते जा रहे हैं. दीर्घकालीन संबंध बोरिंग लगने लगे हैं. विडंबना तो यह है कि आज रिश्तों में न तो कोई उम्मीद रख रहा है, न ही आश्‍वस्त कर पा रहा है कि हम हैं तुम्हारे साथ. कमिटमेंट बदलते हैं, लोग बदल जाते हैं और किसी को भी इससे शिकायत नहीं होती. दीर्घकालीन संबंध तेज़ी से इतिहास का हिस्सा बनते जा रहे हैं. युवा कमिटमेंट से बहुत अधिक डरे और सहमे हुए हैं और जब अफेयर गंभीर होने लगे, तो उन्हें परेशानी होने लगती है. उन्हें लगता है कि परंपरागत और ओल्ड फैशंड अफेयर का मतलब ग़ुलामी और स्वतंत्रता खो देना है.

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हालांकि अभी भी ऐसा वर्ग है, जो प्यार को महत्वपूर्ण मानता है और सेक्स को मर्यादित दृष्टि से देखता है व कमिटमेंट करने को भी तत्पर है. सारे रिश्ते बबलगम की तरह नहीं हो गए हैं. आज भी लोग प्रेम को गंभीरता से लेते हैं. उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है सही साथी की तलाश. और तलाश ख़त्म होने पर जब उनका आपसी तालमेल बैठता जाता है, तो फिर पीछे मुड़कर देखने की कोई आवश्यकता नहीं होती.

Why Our Relationship Changes Over Time

निजी स्वार्थ बढ़ रहा है

वर्तमान की इस तेज़ी से भागती ज़िंदगी के मद्देनज़र अब यह बहस चल पड़ी है कि क्या सामाजिक रिश्तों में अभी और कड़वाहट बढ़ेगी? क्या भविष्य में विवाह और परिवार का सामाजिक-वैधानिक ढांचा बच पाएगा? क्या बच्चों को परिवार का वात्सल्य, संवेदनाओं का एहसास, मूल्यों तथा संस्कारों की सीख मिल पाएगी? क्या भविष्य के भारतीय समाज में एकल परिवार के साथ में लिव-इन जैसे संबंध ही जीवन की सच्चाई बनकर उभरेंगे?

छोटे-छोटे निजी स्वार्थों को लेकर रिश्तों में व्यापक बदलाव देखने को मिल रहा है. आज हर रिश्ता एक तनाव के दौर से गुज़र रहा है. वह चाहे माता-पिता का हो या पति-पत्नी का, भाई-बहन, दोस्त या अधिकारी व कर्मचारी का. इन सभी रिश्तों के बीच ठंडापन पनप रहा है.

संवादहीनता और व्यस्तता की वजह से प्यार रिश्तों के बीच से सरक रहा है और सेक्स मात्र रूटीन बनकर रह गया है. स्त्री-पुरुष दोनों आर्थिक रूप से सक्षम हैं, इसलिए अपनी-अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करते हुए कमिटमेंट से बचना चाहते हैं. अपने साथी से पहले जो भी बात कहनी होती थी, वह या तो साथ बैठकर एक-दूसरे से कही जाती थी या फोन पर बातचीत करके. आज इसकी जगह ले ली है व्हाट्सऐप ने. आप मैसेज छोड़ देते हैं. कई बार सामनेवाला पढ़ नहीं पाता और फिर झगड़ा होना तय होता है. कहीं से घूमकर आने के बाद पहले जहां मिल-जुलकर फोटो देखने का मज़ा लेते थे, वहीं आज फेसबुक पर एक-दूसरे की फोटो देखी जाती है.

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रिलेशनशिप में प्यार कम, लस्ट (वासना) ज़्यादा होता है. अगर आपका रिश्ता प्यार पर नहीं, वासना पर टिका है, तो वह रिश्ता ज़्यादा दिनों तक नहीं रहता. आमतौर पर रिश्ते टूटने की वजह भी यही बन रहा है. रिश्ते में फिज़िकल कनेक्शन ज़रूर बनता है, लेकिन भावनात्मक रूप से जुड़ाव देखने को नहीं मिलता. तो किस तरह का रिश्ता है यह? केवल आकर्षण या प्यार या फिर केवल लस्ट?

प्रोफेशनल होते रिश्ते

आजकल उन रिश्तों को ज़्यादा अहमियत दी जाती है, जो प्रोफेशनल होते हैं, क्योंकि वो हमारे फ़ायदे के होते हैं. रिश्तों में भी अब हम फ़ायदा-नुक़सान ही देखते हैं. जो कामयाब है, रसूखवाले हैं, पैसेवाले हैं, उनसे संबंध रखने में ही फ़ायदा है. इसके चलते कुछ रिश्ते ऐसे ही ख़त्म हो जाते हैं. हम अब उन रिश्तों को ही अहमियत देते हैं, जिनसे बिज़नेस में और लाइफ में भी ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा हो. युवापीढ़ी प्रैक्टिकल और कैलकुलेटिव हो गई है. ऐसे में रिश्तों की अहमियत घटना स्वाभाविक ही है.

कमिटमेंट करने के लिए या प्यार निभाने के लिए सच्चाई व ईमानदारी की ज़रूरत होती है. अपने साथी की भावनाओं को समझने की ज़रूरत होती है. सेक्स को प्यार के साथ जोड़ने और रिश्ते में कमिटमेंट के जुड़ने से रिश्ता टिका रहता है. प्लास्टिक के फूलों की ख़ुशबू के साथ कृत्रिम ज़िंदगी जीने से अच्छा है कि प्यार और विश्‍वास के ताज़ा फूलों से रिश्तों को सजा लिया जाए.

– सुमन बाजपेयी

पहला अफेयर: मुहब्बत पर यक़ीन है मुझे (Pahla Affair: Mohabbat Per Yakeen Hai Mujhe)

Pahla Affair, Mohabbat Per Yakeen Hai Mujhe

Pahla Affair, Mohabbat Per Yakeen Hai Mujhe

पहला अफेयर: मुहब्बत पर यक़ीन है मुझे (Pahla Affair: Mohabbat Per Yakeen Hai Mujhe)

मुहब्बत हो जाती है किसी से… आपका दिल इस तरह किसी और का हो जाता है कुछ ही पलों में… वो भी आपको बिना बताए… ऐसे दगा दे जाता है, कभी सोचा ही नहीं था मैंने. मैं तो हमेशा कहा करती थी, “प्यार-व्यार बेकार की बातें हैं. और शादी का तो सवाल ही नहीं उठता.” मेरे विचार सुनकर कभी किसी ने मुझसे प्यार करने की शायद सोची ही नहीं या शायद मैंने कभी किसी के एहसास को महसूस ही नहीं किया.

वैसे तो मैं प्रतीक के प्रति अपनी चाहत को भी नहीं समझ पाई थी. उससे मेरी पहली मुलाक़ात पहले दिन ही ऑफ़िस में हुई. पहली ही नज़र में वो मुझे अपना-सा लगा और मेरी उससे अच्छी दोस्ती हो गई. खाली वक्त में हम अक्सर शेरो-शायरी, राजनीति, फ़िल्में और साहित्य की बातें करते. शादी के बारे में मेरे और उसके विचार बहुत मिलते थे. प्यार पर उसे भी विश्‍वास नहीं था, लेकिन कई लड़कियों के साथ उसका चक्कर था. जब भी मैं उससे पूछती, “जब प्यार पर विश्‍वास ही नहीं है तो प्यार करते क्यों हो?”
तो वो कहता, “अरे, मैं प्यार थोड़े ही करता हूं. वो तो बस, लड़कियों को ये यक़ीन दिलाने के लिए कि प्यार विश्‍वास की चीज़ है ही नहीं, यूं ही थोड़ा टाइम पास कर लेता हूं.” वो मुझसे भी फ्लर्ट करता, पर मैं उसे डांट देती.

मन ही मन मुझे उसका छेड़ना अच्छा लगने लगा था और दूसरी लड़कियों के साथ उसका घूमना-फिरना और बातें करना बुरा. उसे टोकती तो मज़ाकिया लहज़े में कहता, “बुरा लगता है तो तुम प्यार करो मुझे. देखो, सब लड़कियों को छोड़ दूंगा.” ऐसी बातें उसने कई बार कीं, मगर मैंने हर बार मज़ाक में टाल दिया.

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इधर कुछ दिनों से मैं महसूस करने लगी थी कि एक-दो दिन भी उसे देखे बिना, उससे बात किए बिना मुझे खालीपन-सा लगता. मैं हर किसी से उसके बारे में ही पूछती रहती. मेरी फ्रेंड श्‍वेता ने शायद मेरे मन को पढ़ लिया था. एक दिन उसने कहा, “अदिति, तुझे प्रतीक से प्यार हो गया है…” मैंने तो कभी ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि मुझे भी प्यार होगा किसी से. लेकिन श्‍वेता से बातें करने के बाद मुझे लगा कि सचमुच मुझे प्रतीक से प्यार होने लगा है, लेकिन उससे कैसे कहूं और क्या फ़ायदा उसे कहने का? वो तो हंसेगा मुझ पर. मेरे प्यार का मज़ाक उड़ाएगा. बस, इसी ऊहापोह में 4-5 दिन निकल गए.

इधर प्रतीक भी गायब था पिछले दो दिनों से. मैंने उसके सारे दोस्तों को फ़ोन करके पूछा तो उसके सबसे क़रीबी दोस्त राज ने बताया कि वो तो लॉन्ग लीव पर गया है अपने मम्मी-पापा के पास लंदन और एक पत्र छोड़ गया है मेरे लिए.
मैं फौरन वो पत्र लेने पहुंच गई, पत्र हाथ में आते ही मेरे दिल की धड़कन बढ गई.

प्रिय अदिति,
नहीं जानता था कि यूं मुहब्बत हो जाएगी. दिल्लगी करते-करते सचमुच किसी को दिल दे बैठूंगा, नहीं सोचा था. हां, मैं तुमसे प्यार करता हूं… सच्चा प्यार. कई बार कोशिश की तुम्हें बताने की, लेकिन तुम्हें यक़ीन नहीं दिला सका. अब मुझे प्यार पर विश्‍वास होने लगा है. मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं. मैं लंदन जा रहा हूं अपने मम्मी-पापा के पास. अगर तुम मेरे प्यार पर यक़ीन कर लो तो लौट आऊंगा छह महीने के बाद, वरना तुम्हारी यादों के सहारे पूरी ज़िंदगी काट लूंगा. फ़ोन करूंगा तुम्हें, तुम्हारा जवाब जानने के लिए. उम्मीद है तुम मेरे प्यार को, मेरी भावनाओं को समझोगी.

पत्र पढ़ते-पढ़ते न जाने कब मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे. शायद ये ख़ुशी के आंसू थे, जिससे प्यार पर अविश्‍वास करने की मेरी सोच पूरी तरह धुल गई थी. अब बस, मुझे उसके फ़ोन का बेसब्री से इंतज़ार है. उसके प्यार पर विश्‍वास जो हो गया है मुझे.

– प्रीति तिवारी

पहला अफेयर: बहुत देर कर दी… (Pahla Affair: Bahot Der Kar Di)

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पहला अफेयर: बहुत देर कर दी… (Pahla Affair: Bahot Der Kar Di)

गुनाहों का देवता यह वही उपन्यास है, जिसे मैं अपने पढ़ाई के दिनों में सबसे ज़्यादा पसंद किया करता था. मुहब्बत की इस दास्तां को न जाने कितनी बार पढ़ डाला था मैंने. रैक पर से क़िताब तो उठा ली, पर याद ही नहीं आ रहा था कि यह उपन्यास मेरे पास कैसे आया? पहला पृष्ठ खोलते ही नज़र पड़ी, सुषमा की ओर से सप्रेम भेंट. ओह! अब याद आया, यह तो सुषमा ने दिया था कॉलेज के दिनों में, जब विदाई समारोह में आई थी और कहा था, “इसे खोलकर ज़रूर पढ़ना.” लेकिन चूंकि दर्जनों बार यह उपन्यास पढ़ चुका था, इसलिए इसे बिना पढ़े रैक में रख दिया. कब नौकरी लगी, कब शादी हुई और कैसे 35 साल गुज़र गए, पता ही नहीं चला.

ये वही सुषमा थी, जिससे मैं बेइंतहा मुहब्बत करता था, लेकिन कभी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. तभी हवा का ज़ोर का झोंका आया और उपन्यास मेरे हाथ से गिरकर फ़र्श पर जा गिरा. काग़ज़ का एक पुर्जा क़िताब के पन्नों से निकलकर बाहर आ गिरा. उठाकर पढ़ा. लिखा था-प्रिय कमल, मुझे ख़ुद नहीं पता कि प्रेम क्या होता है? प्रेम की परिभाषा क्या होती है? लेकिन मैं जब भी तुम्हें देखती हूं मुझे अजीब-सी ख़ुशी होती है और तुम्हारा भोला-भाला चेहरा देखना अच्छा लगता है. शायद यही प्रेम है. आज हमारे कॉलेज का आख़िरी दिन है. तुम मुझे चाहते हो या नहीं, मैं नहीं जानती, लेकिन मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. परसों शाम मैं अपने परिवार के साथ यह शहर छोड़कर जा रही हूं. न जाने फिर मिलना हो न हो. तुम कल शाम चार बजे आनंद भवन में आना. मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. यह क़िताब हमारी नई पहचान का प्रतीक होगी.
                                             – तुम्हारी सुषमा

पढ़ते ही मेरे पैर लड़खड़ाने लगे. “हे ईश्‍वर कितनी देर कर दी मैंने.” आज से 38 साल पहले के दृश्य किसी चलचित्र की भांति मेरी आंखों के सामने से गुज़रने लगे, जब मैं पहली बार गांव से इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में पढ़ने के लिए आया था. पहली क्लास, पहला साल गांव का सीधा-सादा लड़का, उस पर रैगिंग का डर. मैं क्लास में लड़कों के बीच सहमा-सा बैठा हुआ था. हल्ला होने पर पता चला कि सीनियर्स आ रहे हैं रैगिंग के लिए. मेरा तो डर के मारे ख़ून सूख गया. सीनियर्स तो आए, पर रैगिंग नहीं कर पाए. कारण- लड़कियों की ग्रुप लीडर सुषमा ने सब जूनियर्स को संगठित कर लिया. सीनियर्स अपना-सा मुंह लेकर चले गए और वह लड़की क्लास की लीडर बन गई. उसने गर्व से हेय दृष्टि से मेरी ओर देखा, जैसे मेरा मज़ाक उड़ा रही हो. उस दिन के बाद से वह क्लास की ‘मिस शेरनी’ और मैं ‘मिस्टर दब्बू’ के नाम से मशहूर हो गया. गाहे-बगाहे वह उसे छेड़ दिया करती थी. पहले मुझे ख़राब लगता था, पर धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा. लेकिन प्यार का इज़हार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. कॉलेज के आख़िरी दिन विदाई समारोह में सुषमा ने सभी छात्रों को ग़िफ़्ट दिए, बड़े बाप की बेटी जो ठहरी. अंत में मेरे सामने आकर बोली, “मिस्टर दब्बू, इस ग़िफ़्ट में रखी क़िताब तुम्हारे लिए. शायद यह क़िताब तुमने पहले पढ़ी हो, फिर भी इसे खोलकर ज़रूर पढ़ना.” लेकिन उपन्यास का शीर्षक देखकर ही मैंने क़िताब रैक में रख दी थी.

दो साल बाद मेरी शादी हो गई. दो बच्चे छोड़कर पत्नी दुनिया से विदा हो गई. बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं. रिटायरमेंट की उम्र में, ज़िंदगी के इस मोड़ पर आज मेरी ज़िंदगी अकेलेपन में गुज़र रही है.

अचानक तेज़ हवा के झोंके के साथ बारिश की बौछारें मेरे चेहरे को भिगो गईं. मेरी तंद्रा टूटी और हाथ से काग़ज़ का टुकड़ा छूटकर उड़ गया, जैसे हवा का झोंका मुझसे कह रहा हो, ‘व़क़्त गुज़र चुका है- शायद इसे पढ़ने में तुमने बहुत देर कर दी…’

– दिलीप द्विवेदी

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पहला अफेयर: रॉन्ग नंबर (Pahla Affair: Wrong Number)

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पहला अफेयर: रॉन्ग नंबर (Pahla Affair: Wrong Number)

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी ये मखमली, सुकोमल एहसास ज़रूर होता है, जिसमें आपको दुनिया की हर चीज़ अचानक यूं ही अच्छी लगने लगती है. बेवजह मुस्कुराना अच्छा लगता है, जब दिल ज़ोर-ज़ोर से किसी के आने की आहट पर धड़कने लगता है, तो उस पर काबू न कर पाना अच्छा लगता है. मेरे साथ भी कुछ ऐसी ही घटना घटित हुई.

उन दिनों हमारे यहां लैंडलाइन फोन हुआ करता था. उस दिन शाम फोन अचानक घनघनाकर बज उठा था. घर के सभी लोग काम में बिज़ी थे, सो फोन मैंने ही उठाया. उधर से ‘हैलो’ के संबोधन ने मेरे मन-मस्तिष्क के तारों को झंकृत-सा कर दिया था. कितना अपनापन और सुकून था उस आवाज़ में, लेकिन दुर्भाग्य से वो रॉन्ग नंबर था, सो सॉरी कहकर रख दिया. मगर रिसीवर रखने के बाद भी दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़के जा रहा था और मैं समझ नहीं पा रही थी कि ये किस तरह का एहसास है, मगर… वो ‘हैलो’ अभी तक मेरे कानों में गूंज रही थी.

मन कर रहा था कि दोबारा उस अजनबी की आवाज़ सुनने को मिल जाए. मेरे मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. इसी बीच कई दिन गुज़र गए, मगर कोई फोन नहीं आया. कुछ दिनों के बाद उसी समय फोन ‘ट्रिन ट्रिन’ कर फिर बजा और मुझे भी ये एहसास हुआ कि ज़रूर ये उसी अजनबी का कॉल है. मैंने लपककर कॉल लिया और वही निकला, जिसकी मुझे उम्मीद थी. उसकी ‘हैलो’ सुनकर काफ़ी सुकून मिला. मैं जिस तरह उसकी आवाज़ सुनने को बेचैन थी, उसका भी वही हाल था, इसका मतलब अंजाने में दोनों के दिल के तार एक-दूसरे से जुड़ने की कोशिश में थे. अब तो घरवालों से नज़रें चुराकर, बच-बचाकर घंटों एक-दूसरे से फोन पर हम बातें करते और कब हम इतने क़रीब आ गए कि एक-दूसरे की ज़िंदगी का अहम् हिस्सा बन गए, पता भी नहीं चला. हमारी फोन पर दोस्ती को दो साल बीत चुके थे. काफ़ी कुछ जान गए थे हम एक-दूसरे के बारे में, वो भी बिना मिले और देखे.

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ख़ैर, व़क्त अपनी रफ़्तार से चल रहा था. घर में सब मेरी शादी के लिए लड़का तलाशने लगे. मेरा दिल तो डूबा जा रहा था. उस अजनबी के बिना जीना मुश्किल लग रहा था. मगर अपने डर और संकोच के आगे घरवालों को कुछ भी नहीं बता पाई मैं उस फोन फ्रेंड के बारे में.

आख़िर वो पल भी आ गया, जब मुझे लड़केवाले देखने आए. मुझे पहली नज़र में ही पसंद कर लिया गया था. मगर लड़के ने मुझसे अकेले में मिलने की मंशा ज़ाहिर की. मिलने के दौरान उसने मुझे बताया कि उसके जीवन में कोई लड़की है, जिसे वो अपनी ज़िंदगी मानता है. घरवालों के दबाव में आकर वो यहां मुझे देखने आ गया था. हमने सोचा इस व़क्त शादी के लिए इंकार किया, तो दोनों के घरवालों को समझाना मुश्किल होगा. उसने मुझे अपनी जेब से एक फोन निकालकर दिया और कहा कि घर जाकर वो फोन करेगा, ताकि सोचा जा सके कि किस तरह से शादी को रोक सकते हैं. मैंने भी अनमने मन से फोन ले लिया.

जाने के लगभग तीन दिन बाद उस मोबाइल पर फोन आया और ‘हैलो’ का संबोधन सुन मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. अचानक लगा कि वो अजनबी इस फोन पर कैसे हो सकता है, मगर सच्चाई यही थी कि वो अजनबी ही मुझे देखने आया था, लेकिन हम दोनों ही इस बात से अंजान थे. क़िस्मत भी कभी-कभी कितने अजीबो-ग़रीब खेल खेलती है. अब तो हम दोनों ने ही ख़ुशी-ख़ुशी शादी के लिए ‘हां’ कर दी थी. आख़िर करते भी क्यों न, रॉन्ग नंबर मेरे जीवन का राइट नंबर जो बन चुका था.

– मंजू यादव