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जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

Medical Consumer Rights

जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

एबी पॉज़िटिव मरीज़ को एबी निगेटिव का खून चढ़ाना, दाएं पैर की बजाय बाएं पैर की सर्जरी करना, मलेरिया के मरीज़ को डेंगू की दवाइयां देना, दवाइयों का इतना ओवरडोज़ कि मरीज़ की जान पर बन आए… आए दिन हमें मेडिकल लापरवाही की ऐसी ख़बरें

देखने-सुनने को मिलती हैं. क्या हो, अगर उनकी जगह हमारे परिवार का कोई सदस्य या हम ख़ुद हों? ऐसी लापरवाही किसी के साथ भी हो सकती है, इसलिए ज़रूरी है कि आप अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें, ताकि सही समय पर सही कार्रवाई कर सकें.

अपनी भलाई के लिए हम डॉक्टर की हर बात पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं, जबकि हमें अपनी आंखें और कान हमेशा खुले रखने चाहिए. किसी ज़माने में नोबल प्रोफेशन माना जानेवाला मेडिकल प्रोफेशन आज प्रॉफिट मेकिंग बिज़नेस बन गया है. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि हम अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और किसी भी तरह की मेडिकल लापरवाही होने पर सही जगह उसकी शिकायत करें.

क्या है मेडिकल लापरवाही?

यह डॉक्टर की नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पास आनेवाले सभी मरीज़ों का सही तरी़के से इलाज या कंस्लटेशन करे. अपने कर्त्तव्यों को ईमानदारीपूर्वक निभाए, लेकिन जब डॉक्टर अपने कर्त्तव्यों को सही तरी़के से न निभाए और उसकी लापरवाही से मरीज़ को शारीरिक क्षति पहुंचे या जान चली जाए, तो यह मेडिकल लापरवाही होगी.

किन मामलों में कर सकते हैं शिकायत?

किसी भी सर्जरी से पहले डॉक्टर्स कुछ पेपर्स पर आपके सिग्नेचर लेते हैं, ताकि कुछ गड़बड़ होने पर वो ज़िम्मेदार न ठहराए जाएं. लेकिन वो इससे पूरी तरह बच नहीं सकते. आइए देखें, कौन-से हैं वो मामले, जो मेडिकल लापरवाही की श्रेणी में आते हैं.

–   लापरवाही के कारण ग़लत दवा देना.

–    सही तरी़के से इलाज न करना.

–    मरीज़ को ऐसी जगह रखना, जिससे उसे संक्रामक रोग हो जाए.

–    अस्पताल में स्टाफ की कमी के कारण मरीज़ की सही तरी़के से देखभाल न हो पाना.

–    मरीज़ की परेशानियों को अनसुना करना.

–    बीमारी के लक्षणों को पहचानने में ग़लती करना.

–    ग़लत लक्षण के कारण बेवजह सर्जरी कर देना.

–    लक्षणों को पहचानने में बहुत ज़्यादा देर करना, जिससे मरीज़ की जान पर बन आए.

–    सर्जरी के दौरान किसी और अंग को नुक़सान पहुंचाना.

–    सर्जरी के दौरान ग़लती करना, जिससे किसी तरह का इंफेक्शन हो जाए या फिर इम्यून सिस्टम फेल हो जाए.

–    सर्जरी के दौरान किसी चीज़ का अंदर छूट जाना, सर्जरी के कारण बहुत ज़्यादा खून बहना, ग़लत बॉडी पार्ट की सर्जरी कर देना.

–    एनेस्थीसिया देने में ग़लती करना.

–    बच्चे के जन्म के दौरान किसी तरह की ग़लती से बच्चे का नर्व डैमेज होना या फिर जान पर बन आना आदि.

भले ही डॉक्टर ने लापरवाहियां ग़लती से कर दी हों, फिर भी वह दोषी माना जाएगा.

 

क्या है टाइम लिमिट?

यह जानना बहुत ज़रूरी है कि आपको मेडिकल लापरवाही के तीन साल के भीतर शिकायत दर्ज करनी है, वरना उसके बाद भले ही आपका केस कितना भी मज़बूत क्यों न हो, आपको एक पैसा नहीं मिलेगा.

–    यहां यह ध्यान देने की ज़रूरत है कि लापरवाही के बारे में आपको पता कब चला, क्योंकि ऐसे कई मामले होते हैं, जहां कई सालों बाद इसके बारे में पता चलता है. उदाहरण के लिए अगर कैंसर ट्रीटमेंट के दौरान बहुत ज़्यादा रेडिएशन का इस्तेमाल किया गया हो, तो उसका असर कुछ सालों बाद दिखेगा और जब असर दिखने लगे, तब से लेकर तीन साल के भीतर आप शिकायत कर सकते हैं.

कौन कर सकता है शिकायत?

मरीज़ या मरीज़ के परिवारवालों के अलावा कोई रजिस्टडर्र् ग़ैरसरकारी  संस्था  भी मरीज़ की तरफ़ से शिकायत दर्ज कर सकती है. मेडिकल लापरवाही को साबित करने की ज़िम्मेदारी पीड़ित पर होती है, इसलिए आपको सभी पेपर्स संभालकर रखने चाहिए.

शिकायत से पहले ध्यान में रखें ये बातें

–    अगर आपको संदेह है कि डॉक्टर सही इलाज नहीं कर रहा है, तो किसी और डॉक्टर से सलाह लें और मरीज़ को किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती कराएं. उसके ठीक होने के बाद ही इस मामले को उठाएं. मरीज़ को प्राथमिकता दें.

–    सबसे पहले इस बात की पुष्टि के लिए कि मेडिकल लापरवाही हुई है, आपको किसी सरकारी अस्पताल के डॉक्टर या उसी फील्ड के एक्सपर्ट से एक रिपोर्ट लेनी होगी, जिसमें वो इस बात की पुष्टि करे कि मेडिकल लापरवाही हुई है.

–    आप चाहें, तो कंज़्यूमर कोर्ट में भी गुहार लगा सकते हैं कि वो अपनी तरफ़ से मेडिकल बोर्ड को जांच के आदेश दे, ताकि आपको रिपोर्ट मिल जाए.

–    शिकायत करने के लिए सबसे ज़रूरी है डॉक्यूमेंट्स. इलाज से जुड़े सभी एडमिशन पेपर्स से लेकर रिपोर्ट्स, दवाई के बिल्स वगैरह सभी जमा करके रखें.

–    अगर अस्पताल आपको मेडिकल रिकॉर्ड्स नहीं दे रहा, तो आप कोर्ट में जा सकते हैं. कोर्ट के आदेश पर उन्हें मेडिकल रिकॉर्ड्स देने ही पड़ेंगे.

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कहां करें शिकायत?

मेडिकल लापरवाही के मामले में आपको सही कड़ी का इस्तेमाल करना चाहिए. सबसे पहले अस्पताल से ही शुरुआत करें, अगर वहां आपकी सुनवाई नहीं होती, तो न्याय मांगने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने से न हिचकिचाएं.

मेडिकल सुप्रिटेंडेंट

–    डॉक्टर की लापरवाही हो या फिर स्टाफ की ग़ैरज़िम्मेदारी, उसकी शिकायत तुरंत अस्पताल के मेडिकल सुप्रिटेंडेंट से करें.

–    आप उनसे उचित कार्रवाई के साथ हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं.

स्टेट मेडिकल काउंसिल

–   डॉक्टर या अस्पताल से जुड़ी किसी भी तरह की शिकायत आपको पहले मेडिकल काउंसिल में करनी चाहिए. वो अपने लेवल पर जांच करके उचित कार्रवाई करते हैं.

–   अगर काउंसिल की जांच में डॉक्टर्स दोषी पाए जाते हैं, तो काउंसिल उनका लाइसेंस तक रद्द कर सकती है.

–    अगर आपको लगता है कि मामले को जान-बूझकर टाला जा रहा है, तो आप अपनी शिकायत नेशनल मेडिकल काउंसिल में भी कर सकते हैं. ये दोनों ही गवर्निंग बॉडीज़ हैं, जो दोषी पाए जाने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हैं.

कंज़्यूमर कोर्ट

जब आप किसी डॉक्टर या अस्पताल में जाकर इलाज करवाते हैं और उनकी सेवा के बदले उन्हें फीस देते हैं, तो आप उनके ग्राहक माने जाते हैं और क्योंकि आप ग्राहक हैं, तो आप मेडिकल लापरवाही के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत कंज़्यूमर कोर्ट में कर सकते हैं.

–    आप अपनी शिकायत डिस्ट्रिक्ट फोरम में कर सकते हैं.

–    यहां आपको एक बात ध्यान में रखनी होगी किकंज़्यूमर कोर्ट में आपको स़िर्फ मुआवज़ा मिलेगा.

–    यहां आप डॉक्टर के ख़िलाफ़ किसी तरह की क्रिमिनल कार्रवाई की मांग नहीं कर सकते.

–    हाल ही में लोकसभा में कंज़्यूमर प्रोटेक्शन बिल 2018 पास हुआ है, जिसमें कई नए बदलाव किए गए हैं, ताकि ग्राहकों की शिकायत पर जल्द सुनवाई हो सके. इस बिल के क़ानून बन जाने से मेडिकल लापरवाही के मामलों को और आसानी से सुलझाया जा सकेगा.

सज़ा का प्रावधान

इंडियन पीनल कोड की धारा 304ए के तहत लापरवाही के कारण होनेवाली मौत के लिए दो  साल की जेल और जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है.

ख़राब है देश में मेडिकल कंडीशन

–    मेडिकल लापरवाही में ह्यूमन एरर के कारण हर साल हमारे देश में लगभग 52 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 44 हज़ार से 98 हज़ार का है.

–    साल 2016 में हुई एक स्टडी के मुताबिक़ हर साल इंडिया में मेडिकल लापरवाही के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. आंकड़ों में बात की जाए, तो हर साल इन मामलों में 110% बढ़ोतरी हो रही है.

–    हमारे देश में मेडिकल बजट हमारे पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका से भी बहुत कम है. देश के जीडीपी का महज़ 1% मेडिकल बजट के लिए दिया जाता है.

– अनीता सिंह

 

हॉस्पिटल में कितने सेफ़ हैं आप? (A Patient’s Guide: How To Stay Safe In a Hospital)

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Patient's Guide, hospital safetyअस्पताल की सबसे पहली ज़िम्मेदारी है, मरीज़ की सही देखभाल करना. हॉस्पिटल की छोटी-सी लापरवाही से मरीज़ की जान जा सकती है. एक अनुमान के मुताबिक़, विकसित देशों में 10 में से एक मरीज़ अस्पताल की लापरवाही का शिकार बनता है. अस्पताल और मरीज़ दोनों को ही सुरक्षा की दिशा में किन बातों का ख़्याल रखना चाहिए? आइए, जानते हैं.

अस्पताल में मरीज़ की सुरक्षा के मुद्दे

– इलाज करने में ग़लती, लापरवाही या अनजाने में इलाज में देरी.
– अस्पताल में मरीज़ के एडमिट होने के दौरान होनेवाली ग़लतियां, जैसे- स्वास्थ्य सेवा देने में कमी जिसकी वजह से मरीज़ किसी इंफेक्शन की चपेट में आ जाए.
– दवाइयां देने में ग़लती या मरीज़ को सही दवा दी हो पर उसका डोज़ ग़लत हो.
– रीएडमिशन यानी मरीज़ को अगर डिसचार्ज के बाद 30 दिनों के भीतर दोबारा अस्पताल लौटना पड़े
– ग़लत सर्जरी साइट यानी शरीर के ग़लत हिस्से पर या ग़लत व्यक्ति पर किया गया ऑपरेशन.
– रोग को लेकर डॉक्टर और मरीज़ या अस्पताल के स्टाफ के साथ हुई बातचीत में कमी.

किन बातों का ख़्याल रखे अस्पताल?

– मरीज़ की पहचान सुनिश्‍चित करें. मरीज़ की कोडिंग और लेबलिंग सही करें, ताकि इलाज किसी ग़लत मरीज़ को न मिल जाए.
– प्रिसक्रिप्शन लिखते हुए संक्षिप्त रूप यानी स्मॉल लेटर्स का प्रयोग न करें. कैपिटल लेटर्स में साफ़-साफ़ लिखें, ताकि मरीज़ पढ़ सके.
– अस्पताल में एक ख़ास ट्रेनिंग प्रोग्राम की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि ऐसी ग़लतियां न हों.
– अस्पताल का इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐसा हो कि मरीज़ को परेशान न होना पड़े. निर्देश या चेतावनी संकेतवाले बोर्ड, जैसे- बिलिंग काउंटर, कैश काउंटर, रिसेप्शन, फार्मसी, रेडियोलॉजी, लैब आदि हर जगह ठीक से लगे हों, ताकि मरीज़ का समय बर्बाद न हो.
– मरीज़ को एडमिट या शिफ्ट करते व़क्त ख़ास ध्यान रखें.
– मरीज़ के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए उच्च दर्ज़े की सुविधाएं प्रदान करें.
– बेवजह की दवाओं को प्रिसक्राइब करने की बजाय दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग करने के लिए डॉक्टर्स को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.

मरीज़ अपनी सुरक्षा के लिए क्या करें?

– अपनी व्यक्तिगत जानकारियां, जैसे- एलर्जी, खाने-पीने की आदतें, भूतकाल में कोई ऑपरेशन, मेडिकल हिस्ट्री आदि देने के बाद आप अस्पताल के कर्मचारियों से एक बार ये सुनिश्‍चित कर लें कि उन्होंने आपकी जानकारियां सही से लिखी हैं या नहीं.
– डॉक्टर द्वारा बताए गए इलाज से जुड़ी कोई जानकारी अगर आपको समझ न आ रही हो, तो खुलकर सवाल पूछें. अगर डॉक्टर से बात करने में आप कंफर्टेबल न हों, तो अपने साथ किसी दोस्त या रिश्तेदार को ले जाएं.
– इलाज को लेकर किसी तरह का अगर कोई संदेह हो या सवालों के जवाब से अगर आप संतुष्ट न हों, तो सेकंड ओपिनियन (दूसरे डॉक्टर से बात) ज़रूर लें.
– डॉक्टर ने आपके लिए जो भी इलाज या चिकित्सा प्रक्रिया निर्धारित की है, उसके नुक़सान और फ़ायदों के बारे में पूरी जानकारी लें. इलाज से जुड़े साइड इफेक्ट को लेकर स्पष्ट रहें.

यूनिवर्सल सावधानियां

– मरीज़ की जांच करते व़क्त दस्ताने पहनें.
– हाथों की हाइजीन का ख़्याल रखें. मरीज़ के चेकअप के बाद हाथों को अच्छी तरह से धोकर सैनिटाइज़ करें.
– ज़ब ज़रूरत हो, तब सर्जिकल मास्क अवश्य पहनें.
– उपयोग के बाद दूषित सुई को नष्ट कर दें.
– रोगी की देखभाल के लिए इस्तेमाल होनेवाले उपकरण, किसी दूसरे रोगी पर इस्तेमाल करने से पहले किटाणुरहित कर लें.
– अस्पताल से निकलनेवाले कचरे को ठीक से डिस्पोज़ करवाना भी ज़रूरी है.
– शिष्टाचार से पेश आएं. खांसते व छींकते समय अपने मुंह और नाक पर रूमाल ज़रूर रखें, ताकि आपकी बीमारी दूसरों में न फैले.