व्यंग्य- कुछ मत लिखो प्रिये… (Vyangy- Kuch Mat Likho Priye…)

अपनी यह महान कविता सुनाकर उसने मुझे यूं देखा जैसे वह टैगोर हो और मैं कोई अनपढ़. बोली, ''अच्छी है न!'' मैंने अपने दिल का…

अपनी यह महान कविता सुनाकर उसने मुझे यूं देखा जैसे वह टैगोर हो और मैं कोई अनपढ़. बोली, ”अच्छी है न!”
मैंने अपने दिल का दर्द छुपा लिया. मुंह से तो बोल न फूटा, उसका हाथ अपने हाथ में लेकर किस कर दिया. बोल ही नहीं पाया कि क्या बकवास लिखा है. वह अब बहुत अच्छे मूड में थी. बोली, “चलो, तुम्हारी चाय भी हो गई, जब तक बच्चे खेल कर आते हैं, मैं अपनी कविता फाइनल कर लेती हूं.‘’
वो तो गुनगुनाती चली गई और मुझे छोड़ गई अपनी कविता के बोझ तले मेरे दुख के साथ. आपने कभी सोचा है कि इस समय मेरे जैसे पति क्या करते हैं, अच्छी एक्टिंग करते हैं! अपना दर्द छुपा कर मुस्कुराते हैं.

मैं ऑफिस से आया. फ्रेश होकर एक कप चाय के साथ पत्नी रेनू के साथ कुछ देर बैठने का मन था, पर अजी, अब कहां! अब तो कविता लिखने के कीड़े ने मेरी प्रिया को काट खाया है.
मैंने कहा, ‘’आओ, चाय ले आओ.”
लैपटॉप से नज़रें उठाकर उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कोई भारी ज़ुर्म कर दिया है. निराशा भरे स्वर में बोली, ”अभी-अभी एक ख़्याल आया था. अब चाय बनाने में वह ख़्याल डिस्टर्ब हो जाएगा. आज प्लीज़ तुम ही चाय बना लो न. मैं यह कविता पूरी करना चाहती हूं.‘’
मैंने पता नहीं कैसे हिम्मत कर ली, जिस पर मैं बाद में काफ़ी पछताया.
मैंने पूछ लिया, ”रेनू, दिनभर नहीं आया ये ख़्याल? लिखने के भाव आने की टाइमिंग आजकल कुछ अजीब नहीं हो रही?”
रेनू ने एक झटके से चेयर से उठते हुए कहा, ”मैं चाय ही बना देती हूं, क्यूंकि तुम एक आम आदमी हो, तुम नहीं जानते लिखने की टाइमिंग अपने हाथ में नहीं होती है. हम लोग थोड़ा अलग टाइप के होते हैं. हमारा एक मूड होता है, पर कितने दुख की बात है कि मुझे चाय बनाने उठना पड़ गया. मेरी कविता! इतना प्यारा सोचा था.’’ कहते-कहते वह रुआंसी होकर किचन की तरफ़ बढ़ गई, मैं उसके पीछे जाता हुआ बोला, ”डार्लिंग, मेरे साथ चाय पीकर लिख लेना.”
वह मुझसे चाय लाने तक एक शब्द नहीं बोली. चाय लेकर आई, तो भी चेहरा ऐसा बनाकर बैठी रही कि मुझे अफ़सोस हुआ कि इसे चाय बनाने क्यों उठा दिया. पर मैं भी एक चालाक पति हूं. मुझे पता है कि आजकल उसका मूड ठीक करना कितना आसान हो गया है मेरे लिए.
मैंने पूछा, ”और डार्लिंग, तुमने जो कल अपनी कविता फेसबुक पर पोस्ट की थी, कितने लाइक्स हो गए? कमेंट्स कैसे आए?”


रेनू ने झट अपना फोन उठाया. अपनी पोस्ट मुझे दिखाई, ”देखो विजय, ५० लाइक्स हो गए. ८० कमेंट्स. ये तो उन लोगों ने जान-बूझकर कोई कमेंट नहीं किए, जो मेरी इस प्रतिभा से जलते हैं. वे बड़ा दिल दिखाते, तो सोचो कितने लाइक्स और मिल जाते, पर ख़ैर, मैंने अब सोच लिया है कि मैं तो बहुत लिखूंगी. सब मेरी कविता पढ़-पढ़ झूम उठते हैं. कहते हैं कि मैं अब तक क्यों नहीं लिख रही थी.‘’
फिर रेनू ने एक ठंडी सांस लेते हुए कहा, ”उन्हें क्या पता, कैसे चूल्हे-चौके में कविताएं दबी पड़ी थीं. और हां, तुम्हें टाइम नहीं मिला था न, ये पढ़ने का! रुको, तुम्हे ख़ुद सुनाती हूं.” यहां मैं डरपोक बन गया. हिम्मत नहीं हुई कि कहूं, प्लीज़ मुझे मत सुनाना अपनी लिखी कविता!
रेनू मुझे अपनी कविता सुना रही थी, ”बन बन डोलूं, कहां कहां डोलूं, कहां हो प्रिय, तुम्हे खोजती डोलूं.. मॉल में डोलूं, मार्किट में डोलूं, कहां खोये प्रिय, दीवानी सी डोलूं…”
अपनी यह महान कविता सुनाकर उसने मुझे यूं देखा जैसे वह टैगोर हो और मैं कोई अनपढ़. बोली, ”अच्छी है न!”
मैंने अपने दिल का दर्द छुपा लिया. मुंह से तो बोल न फूटा, उसका हाथ अपने हाथ में लेकर किस कर दिया. बोल ही नहीं पाया कि क्या बकवास लिखा है. वह अब बहुत अच्छे मूड में थी. बोली, “चलो, तुम्हारी चाय भी हो गई, जब तक बच्चे खेल कर आते हैं, मैं अपनी कविता फाइनल कर लेती हूं.‘’
वो तो गुनगुनाती चली गई और मुझे छोड़ गई अपनी कविता के बोझ तले मेरे दुख के साथ. आपने कभी सोचा है कि इस समय मेरे जैसे पति क्या करते हैं, अच्छी एक्टिंग करते हैं! अपना दर्द छुपा कर मुस्कुराते हैं. पत्नी की प्रतिभा को दबाने का जोख़िम भी नहीं ले सकते. नहीं तो रो-रोकर इस पर ही कुछ बकवास लिख दिया जाएगा.


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मैं अब बैठकर उस मनहूस घड़ी को कोस रहा था जब रेनू ने पता नहीं क्यों पहली बार एक बेकार-सी चार लाइन्स लिखकर फेसबुक पर पोस्ट कर दी थी. फेसबुक, नहीं मैं अब इसे फ़ेकबुक कहता हूं, एक से एक मीठे झूठ दिनभर बोले जाते हैं. रेनू की कई सहेलियां आजकल कविता के नशे में डूबी हैं, ये सब एक-दूसरे की तारीफ़ करती हैं. बड़े-बड़े कमेंट्स लिखती हैं और फिर फोन पर उसी कविता को बकवास कहकर मज़ाक उड़ाती हैं.
भाई, तुम लोग एक-दूसरे की झूठी वाहवाही क्यों करती हो. क्यों एक-दूसरे को चने के झाड़ पर इतना चढ़ा देती हो कि वहां से उन्हें फिर सब दिखना बंद हो जाता है. क्यों साफ़़-साफ़ नहीं बताती कि बहन, ‘तू रहने दे, तू मत लिख. तू बोर करती है. हम तो तेरी कविता कभी पूरी पढ़ते ही नहीं…’ पर नहीं, ऐसा बहनापा दिखाती हैं कि जो लाइक कर दे, वह अच्छा, जो न करे, वह हिटलिस्ट में आ जाता है.
मैं जब कभी आजकल फेसबुक पर जाता हूं, तो घबरा जाता हूं. मुझे टैग करके रेनू जो कविताएं लिखती है, उस पर कमेंट्स पढ़ कर सोच में पढ़ जाता हूं कि कहीं मैं ही तो इतना बद्ज़ौक नहीं कि रेनू की कविताएं समझ न पा रहा होऊं. मेरे घर में एक महादेवी हो और मुझे पता ही न हो. पर नहीं, मैं जब ऑफिस में जाता हूं, मेरे जिगरी दोस्त एक अलग-सी मुस्कान के साथ जब कहते हैं, ‘’और यार, तुमने कभी बताया नहीं कि भाभी इतनी महान कवियित्री हैं.” और कहकर जब वे हंस देते हैं, तो मुझे समझ आ जाता है कि नहीं, मैं ग़लत नहीं. ये मेरे दोस्त हैं, मैं इनकी एक-एक नस जानता हूं, जो मैं सोचता हूं, वही ये भी सोचते हैं.
आज पूछ रहे थे, ”यार, तुम कहीं चले गए थे?”
मैंने पूछा था, ”क्यों?”
”भाभी तुम्हे ढूंढ़ती डोल रही हैं.‘’
मैं समझ गया था कि फिर कोई कविता फूटी है, अब समझ आया यही कविता थी, जो मुझे अभी सुना कर गई थी.
इतने में बच्चे खेल कर आ गए, पूछा, मम्मी कहां हैं?”
”कोई कविता लिख रही हैं.‘’
बच्चों का मुंह उतर गया, ”फिर से?”
मैं चौंका, ”हां, पर क्या हुआ?”
”आज स्कूल में अजय कह रहा था कि तेरी मॉम आजकल खाली हैं क्या? कुछ भी लिखती हैं, मेरी मॉम हंस रही थी.”
बेटी हंसी, ”आपने उनकी कल की कविता देखी, बन बन डोलूं…”
मैं भी हंस दिया. बेटे ने कहा, ”पापा, हम उन्हें बता नहीं सकते कि वे न लिखें, तो अच्छा रहेगा, क्यों अपनी एनर्जी वेस्ट कर रही हैं.”
”नहीं.. नहीं.. बेटा, जिसे फेसबुक पर इतनी झूठी वाहवाही मिल जाए, वह नहीं रुकेगा. वह हमसे सच नहीं सुन सकेगा. अब तुम्हारी मां को रोकना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.”


बच्चे हंसकर फ्रेश होने चले गए. हम तीनों एक साथ ही बेड पर लेट गए. किसी ने रेनू को डिस्टर्ब नहीं किया था. वह ख़ुद ही थोड़ी देर में एक पेपर लिए विजयी भाव से आई और वह पसीना पोछा, जो हमें दिखा ही नहीं था. बोली, ‘’आख़िर कर ली पूरी. तुम लोग सुन लो, तो फेसबुक पर डाल दूं.‘’
बच्चे सयाने हैं, बोले, ‘’मम्मी, पापा को सुना दो, हम होम वर्क करने जा ही रहे थे.‘’
रेनू ने घुड़की दी, ”सुन कर जाओ.‘’
रेनू ने सुनाना शुरू किया, ”कल मेड नहीं आएगी, काम बहुत होगा.. बर्तन तो धो लूंगी, पर पोंछा न होगा.. कमर भी दुखेगी, सिर भी दुखेगा.. सारा दिन थक जाऊंगी, डिनर में सिर्फ पुलाव होग…‘’
हम तीनों को एक धक्का लगा. इतनी बेकार कविता. ये फेसबुक पर डालेगी. इशारे से रेनू ने पूछा, ”कैसी लगी?”
हमसे भी बोला न गया, इशारे से ही जवाब दिया, ”बहुत बढ़िया.‘’
”तो फिर अभी आई, पोस्ट कर देती हूं.‘’
बच्चे भी मुझे देखकर हंसकर चले गए, वह भी चली गई. मेरा रोम-रोम कह रहा था, ‘प्रिये, मत लिखो कुछ, प्लीज़ लिखना छोड़ दो. तुमसे न होगा प्रिये… तरस खाओ सब पर…’ दिल चीख रहा था, पर कौन सुनता. रेनू तो अपनी कविता पोस्ट करने जा चुकी थी.

पूनम अहमद


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Photo Courtesy: Freepik

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Usha Gupta

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