हेमा मालिनी… मां बनना औरत के लिए फख़्र की बात होती है (Hema Malini… Being A Mother Is A Gift)

बहुत-से अनछुए एहसास पलने लगते हैं आंखों में… कुछ रेशमी ख़्वाब पलकों पर उतरने लगते हैं, कुछ शबनमी बूंदें दिल को भिगोने लगती हैं… एक मासूम-सी खिलखिलाहट न जाने कितने अरमान, कितनी ख़्वाहिशें जगा जाती हैं और मन बार-बार यही कहता है कि हां, ये  नन्हीं-सी जान ही मेरी पूरी दुनिया है… मेरा अक्स है… मेरे वजूद का हिस्सा है… एक औरत जब मातृत्व को महसूस करती है, तो उसके लिए बहुत कुछ बदल जाता है… और वो इस बदलाव को लेकर बेहद उत्साहित भी रहती है… लेकिन कहीं न कहीं आज भी हमारे समाज की सोच उन बेड़ियों की जकड़न से ख़ुद को छुड़ा नहीं पाई है, जिसमें एक स्त्री को मात्र उसके जिस्म से ही पहचाना जाता है और उसके मां बनने को उसके सपनों को त्यागने का कारण समझा जाता है.


जब एक स्त्री मां बनती है, तो उसे पल-पल यह एहसास करवाया जाता है कि अब तुम्हें बच्चे और करियर में से किसी एक को ही चुनना होगा, क्योंकि करियर पर ध्यान दोगी, तो तुम अच्छी मां नहीं बन पाओगी और यदि घर को तवज्जो दोगी, तो करियर के साथ नाइंसाफ़ी होगी… ऐसे में आज की अधिकतर कामकाजी महिलाएं मन में एक अपराधबोध के साथ जीती हैं कि वो चाहकर भी एक अच्छी मां नहीं बन पा रहीं… या कहीं वो अपने बच्चे के साथ नाइंसाफ़ी तो नहीं कर रहीं… इसी वजह से कई महिलाएं अपना करियर, अपने ख़्वाबों को मन के किसी कोने में दफ़न कर देती हैं… लेकिन अगर मैं बात करूं अपने अनुभव की, तो हर स्त्री अपने ख़्वाबों को जीते हुए भी मातृत्व के ख़ूबसूरत एहसास को भी जी सकती है… बस, ज़रूरत होती है, तो थोड़े-से बदलाव की और थोड़ी प्लानिंग की… अपनी सोच को समय व ज़रूरत के अनुसार बदलकर देखें, तो आप सब कुछ पा सकते हैं.
क्या ज़रूरी है… क्या ग़ैरज़रूरी? हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? हमारी फ़िलहाल की ज़रूरतें क्या हैं… यह ख़ुद हमें ही तय करना है, लेकिन हमारे समाज में अक्सर हमारे लिए ये तमाम पहलू ‘दूसरे’ तय करते नज़र आते हैं. लेकिन हक़ीक़त तो यही है कि हमारी ज़रूरतें, हमारी वर्तमान की प्राथमिकताएं भला हमसे बेहतर कोई और कैसे जान पाएगा? यह हमें ही तय करना होगा कि हमें ज़िंदगी के किस पड़ाव पर किस बात को कितनी अहमियत देनी है और किसे कुछ समय के लिए अपनी प्राथमिकताओं की फेहरिस्त में थोड़ा-सा पीछे करना है.
कुछ व़क्त पहले मैंने एक तस्वीर देखी थी, जिसमें डचेस ऑफ केम्ब्रिज केट मिडलटन अपने पति विलियम और अपने न्यूबॉर्न बेबी के साथ खिलखिलाती व बेहद ख़ूबसूरत नज़र आ रही थीं. केट के चेहरे पर मातृत्व की ख़ुशी साफ़-साफ़ झलक रही थी. लेकिन बेहद दुख की बात यह रही कि इन तमाम सकारात्मक बातों को छोड़कर अख़बारों व ख़बरों की सुर्ख़ियां बटोरीं केट के मां बनने के बाद हुए शारीरिक बदलावों ने… बहुत कुछ इस बात को लेकर कहा व लिखा गया कि आख़िर केट ने अपने मम्मी टम्मी को छिपाने की कोशिश क्यों नहीं की…
यह विडंबना ही है कि आख़िर एक स्त्री के मातृत्व को ये समाज क्यों नहीं सहजता से ले पाता? और अगर वो स्त्री कोई सेलिब्रिटी है, तो हर कोई उस पर तंज कसना अपना अधिकार समझ लेता है.
दरअसल, ऐसा ही कुछ ऐश्‍वर्या राय के बारे में भी कहा गया था. मां बनने के बाद उनके बढ़े हुए वज़न को लेकर काफ़ी चर्चा की लोगों ने और यही नहीं और भी बहुत कुछ कहा गया कि किस तरह से सेलिब्रिटीज़ को अपने मातृत्व का ख़ामियाज़ा चुकाना पड़ता है.

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यह सोच ही दरअसल ज़िम्मेदार है, किसी भी स्त्री के मन में बेवजह अपराधबोध की भावनाओं के बीज बोने के लिए. उसे न जाने क्यों कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है… क्या मां बनना अपराध है? क्या सेलिब्रिटी होना गुनाह है? मां बनने के बाद क्यों ये मान लिया जाता है कि अब करियर ख़त्म हो गया? क्यों हर व़क्त उस स्त्री के शरीर व उसमें हुए बदलावों पर ताने कसे जाते हैं? मां बनना किसी भी स्त्री के लिए प्रकृति की सबसे ख़ूबसूरत कृति है… उसके बाद शरीर और मन दोनों बदलता है, तो इसमें ग़लत क्या है… क्यों नहीं किसी भी स्त्री को इस अनोखे एहसास के साथ जीने दिया जाता? क्यों बेवजह सवालों की बौछार उस पर कर दी जाती है… उसे कम से कम अपने मातृत्व के अनोखे पलों को शिद्दत से महसूस तो करने दो… व़क्त के साथ सारे सवाल हल हो जाएंगे… वो ख़ुद तय करेगी कि उसे आगे कब, कैसे और क्या करना है…
सालों पहले जब मेरी बड़ी बेटी ईशा का जन्म हुआ था, तब सबसे पहले मुझसे भी यही पूछा गया था कि क्या मैं अब अपने करियर को प्राथमिकता नहीं दूंगी? क्योंकि हमारे समाज में यही मान्यता है कि मां बनने का अर्थ है आपको अपने सपनों से, अपनी रचनात्मकता और अपनी ख़्वाहिशों से समझौता करना पड़ेगा!
मैंने ख़ुशी-ख़ुशी मातृत्व को चुना, क्योंकि उस व़क्त मेरी प्राथमिकता वही थी. मैं यह जानती थी कि कुछ समय के लिए मुझे अपने काम से ब्रेक लेना ही होगा, और वैसे भी यह मेरी चॉइस थी और मैंने अपनी ख़ुशी से अपने मातृत्व को स्वीकारा था. वैसे भी मैं जो भी करती हूं, उसमें अपना शत-प्रतिशत देती हूं, चाहे वो करियर हो या फिर परिवार. मैं उस समय मां बनने के उस एहसास को पूरी तरह से जीना चाहती थी. मेरे लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती थी कि मैं लंबे समय के लिए स्पॉटलाइट में नहीं रहूंगी, क्योंकि मेरे ज़ेहन में कभी यह बात नहीं आई कि मेरा करियर और मेरा मातृत्व एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हैं. मैं पूरी तरह से आश्‍वस्त थी कि जब समय व हालात सही होंगे, तो मैं अपने काम पर दोबारा ज़रूर लौटूंगी, मुझे कुछ सामंजस्य बैठाने होंगे, कुछ एडजेस्टमेंट्स करने होंगे और वो मैं ज़रूर करूंगी.

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मैं ही क्या, किसी भी औरत के लिए अपने बच्चे से ज़रूरी कुछ नहीं होता. मेरे लिए मां बनना एक सपने के पूरे होने जैसा था, इसलिए मैंने अपना पूरा ध्यान अपनी बेटियों की परवरिश पर लगा दिया. बच्चों को मां की ज़रूरत ज़्यादा होती है, मां की कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता, इसलिए मां को अपना अधिक से अधिक समय अपने बच्चे को देना चाहिए. जब मेरी बेटियां छोटी थीं और मुझे शूटिंग पर जाना पड़ता था, वो मुझे जाने नहीं देती थीं. मुझे भी उन्हें छोड़कर जाना अच्छा नहीं लगता था. फिर मैं कार में बेटी को राउंड पर ले जाती थी और जब वो सो जाती थी, तब मैं चुपके से शूटिंग के लिए निकल जाती थी.
अपनी बेटियों का बचपन अब मैं अपने नवासे में देखती हूं. हम सब चाहे उसे कितना ही प्यार दे दें, लेकिन उसे अपनी मां अपने पास ही चाहिए. मां बच्चे की सबसे बड़ी ज़रूरत होती है और औरत के लिए भी मां बनना सम्मान की बात होती है. मैं ख़ुशक़िस्मत थी कि मैं किसी भुलावे में या भ्रम में नहीं जी रही थी कि मैं चाहूं, तो सब कुछ एक साथ ही हासिल कर सकती हूं. मैं इस तथ्य से पूरी तरह वाक़िफ़ थी समय के साथ-साथ आपकी ज़रूरतें व ङ्गसब कुछफ की परिभाषा बदल जाती है. आपकी सोच अधिक परिपक्व व केंद्रित हो जाती है. आप यह तय कर पाते हो कि अभी आपको क्या चाहिए और भविष्य में आप किस तरह से अपनी प्राथमिकताएं बदल पाओगे. वर्तमान में जो चीज़ें आपके लिए गौण हो चुकी हैं, उन्हें आप आसानी से पहचान पाते हो, ऐसे में तमाम ग़ैरज़रूरी बातों और चीज़ों को आप पीछे छोड़कर आगे बढ़ सकते हो. ऐसे में आप अपनी नई भूमिकाओं और ज़रूरतों के अनुसार आसानी से अपनी राह चुन सकते हो.
मैंने अपने अनुभवों से यही सीखा है कि उन तमाम नकारात्मक लोगों को नज़रअंदाज़ करें, जो आपके मातृत्व के चुनाव को निराशाजनक कहते हैं या फिर यह मानते हैं कि आपने मातृत्व को अपनी ज़िंदगी में सबसे अधिक अहमियत देकर अपने करियर को नज़रअंदाज़ किया है, जिससे आप करियर के प्रति उतने समर्पित नहीं रह पाते, जितने पहले थे. मैंने यही पाया है कि मेरी ज़िंदगी में सबकी अपनी-अपनी जगह व अहमियत है. न किसी की अहमियत कम होती है, न ही ज़्यादा. मेरा यही कहना है कि आप सब कुछ ज़रूर पा सकते हो, लेकिन ज़ाहिर है कि एक ही समय पर सब कुछ नहीं.

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Kamla Badoni :
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