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मदर्स डे पर विशेष- ईश्वर का रूप है मां… (Happy Mother’s Day- Quotes About Mothers)

हम एक शब्द हैं वह पूरी भाषा है         बस यही मां की परिभाषा है... मैं रोया परदेस में भीगा मां का…

हम एक शब्द हैं वह पूरी भाषा है

        बस यही मां की परिभाषा है…

मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार

दुख ने दुख से बातें की बिन चिट्ठी बिन तार

तू फिरश्तों की दुआ है मां

तू धरती पर खुदा है मां

कल अपने आपको देखा था मां की आंखों में

ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है…

घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे

चुपके-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा

ज़िंदगी की पहली टीचर, पहली फ्रेंड मां

ज़िंदगी भी मां क्योंकि ज़िंदगी देनेवाली भी मां

जब-जब मैंने काग़ज़ पर लिखा मां-पिता का नाम

कलम अदब से कह उठी हो गए चारों धाम

संवेदना, भावना, एहसास है मां

जीवन के फूलों में ख़ुशबू का आभास है मां

मुर्गे की आवाज़ से खुलती घर की कुंडी जैसी मां

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां

चलती फिरती हुई आंखों से अज़ां देखी है

मैंने जन्नत तो नहीं देखी है मां देखी है

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकान आई

मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से मां आई

मैंने मां की हथेली पर एक छोटा तिल देखा

और मां से कहा- ये दौलत का तिल है

मां ने अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा थामा और कहा-

देखो मेरे दोनों हाथों में कितनी दौलत है…

जब भी कोई रिश्ता उधड़े करती है तुरपाई मां

दुनिया के सब रिश्ते ठंडे गरम-गरम रजाई मां

इस दुनिया में मुझे उससे बहुत प्यार मिला है

मां के रूप में मुझे भगवान का अवतार मिला है

मैं तन पर लादे फिरता दुसाले रेशमी

लेकिन तेरी गोदी की गर्माहट कहीं मिलती नहीं मां

ये जो सख़्त रास्तों पे भी आसान सफ़र लगता है

ये मुझको मां की दुआओं का असर लगता है

एक मुद्दत हुई मेरी मां नहीं सोयी मैंने एक बार कहा था कि मुझे अंधेरे से डर लगता है…

मुझे अपनी दुनिया, अपनी कायनात को एक लफ़्ज़ में बयां करनी हो, तो वो लफ़्ज़ है मां

सहनशीलता पत्थर-सी और दिल मोम-सा

ना जाने किस मिट्टी की बनी है मां

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊं

मां से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं

हालात बुरे थे मगर अमीर बनाकर रखती थी

हम गरीब थे, ये बस हमारी मां जानती थी

मांगने पर जहां पूरी हर मन्नत होती है

मां के पैरों में ही तो वो जन्नत होती है

गिन लेती है दिन बगैर मेरे गुज़ारे है कितने

भला कैसे कह दूं मां अनपढ़ है मेरी…

घर में ही होता है मेरा तीरथ

जब नज़र मुझे मां आती है

स्याही ख़त्म हो गई मां लिखते-लिखते

उसके प्यार की दास्तान इतनी लंबी थी…

– ऊषा मूरत गुप्ता

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Usha Gupta

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