कविता- कहां नहीं हो तुम… (Poetry- Kahan Nahi Ho Tum…)

आलमारी खोलता हूं तो करीने से तहाए हुए कपड़ों के बीच तुम्हे पाता हूं आईने में देखता हूं तो बेदाग़…

थम गई घुंघरुओं की खनक, नहीं रहे कथक सम्राट बिरजू महाराज, 83 की उम्र में ली अंतिम सांस(Kathak Maestro Pandit Birju Maharaj Passes Away At The Age Of 83)

भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक के शिखर पुरुष कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज नहीं रहे. पद्म विभूषण से सम्मानित बिरजू महाराज…

कहानी- जादुई डायरी (Short Story- Jadui Diary)

"उफ़! इतने ख़तरनाक सपने! किसी से शेयर भी नहीं कर सकता… हं… अच्छा-ख़ासा मज़ाक बन जाएगा. वैसे मज़ाक तो मैं…

लघुकथा- प्यारा सा उपहार (Short Story- Pyara Sa Upahar)

"कुछ नहीं होता. पहले तो बच्चे ही इतने होते थे कि औरतें चालीस साल की उम्र तक भी मां बनती…

कहानी- क्या स्वाद है ज़िंदगी में… (Short Story- Kya Swad Hai Zindagi Mein…)

ऋचा को देखते ही कहा था, "मैं तुम्हें आप नहीं कह सकता, लेकिन ठहरो मुझे यक़ीन करने दो कि धरती…

सर्दियों में बच्चे की त्वचा की देखभाल के 5 स्मार्ट टिप्स (5 Ways To Care For Your Baby’s Skin In Winter)

बच्चे की त्वचा की देखभाल करते समय अलग-अलग मौसम में नई चिंताएं पैदा होती हैं, ख़ासकर सर्दियां में. इस मौसम…

लघुकथा- निश्छल प्रेम (Short Story- Nischhal Prem)

दादी और ज़्यादा ग़ुस्से में बोली, "ज़माना ख़राब है. अनु की मां, समय रहते संभल जाओ, वरना कुछ भी हो…

इंटरव्यू: ‘रिस्क न लेने के तो बहाने कई हैं, पर सपने पूरे करने के लिए बस एक जज़्बा काफ़ी है…’ वुमन आंट्रप्रनर दीपाली चतुर्वेदी (Interview: ‘You Have To Take Risks To Follow Your Dreams…’ Woman Entrepreneur Deepali Chaturvedi)

एक ख़्वाब देखा था मासूम निगाहों से, कुछ अरमानों के रंग भरे थे उसमें… फिर बंद लिफ़ाफ़े में रख छोड़ा-था उसको वक़्तके दराज में… समय गुज़रा, यादें धुंधली पड़ती गईं… वो सपना वहीं पड़ा रह गया… फिर एक रोज़ यादें ताज़ा हुईं और खुददिल ने ही दिल से कहा, अपने जज़्बे को जगा ले, सूरज को अपनी मुट्ठी में क़ैद मत कर भला, पर आसमान में एक छोटा-सा सुराख़ तो बना ले… खोल उस बंद लिफ़ाफ़े को और उस ख़्वाब को अपनी आंखों में बसा ले… सजाकर पलकों परउसको तलाश ले फिर से वजूद अपना और अपने उस सपने को अपनी हक़ीक़त बना ले…  दीपाली चतुर्वेदी… ये वो नाम है जिन्होंने वक़्त के दराज़ में बंद लिफ़ाफ़े को खोल अपने ख़्वाब को जीने का मन बनाया औरफिर उसे आकार दे खुले आसमान में उड़ना सिखाया… आज उनका सपना साकार रूप ले रहा है और पंख फैलाकर उड़ान भी भर रहा है. दीपाली हैं बेस्टसोर्स नूट्रिशन की मार्केटिंग डायरेक्टर. क्या था उनका सपना और कैसे उन्होंने अपने जज़्बे सेउसे साकार किया, इसी विषय पर हमने उनसे बात की…  आपके मन में कब और कहां से ख़्याल आया कि देश में देसी हर्बल प्रोडक्ट्स को लोगों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए लॉन्चकरना है?  साफ़तौर पर कहूं तो हमारे देश में एक परिवार और एक लड़की के क्या सपने होते हैं? पढ़ाई-लिखाई, घर के काम मेंनिपुण, मन किया तो नौकरी और शादी के बाद बच्चा… बस लाइफ़ सेट… है न! लेकिन मैंने जब शुरुआत की तो वो समाजकी सोच में बदलाव आने का दौर था. मैंने फूड टेक्नोलॉजी में बी टेक किया था और मेरी मॉम भी चाहती थीं कि मैं पढ़ाईकरके अच्छा सा जॉब कर लूं, करियर बना लूं. बी टेक के बाद मैं फार्मास्युटिकल मार्केटिंग में एमबीए किया. मुझे अच्छाजॉब भी मिल गया था. करियर आगे बढ़ रहा था, पर कहते हैं कि एक लड़की की ज़िंदगी में तब बदलाव आता है जब शादीतो नहीं कहूंगी मैं, पर जब वो मां बनती है. ये बदलाव मेरी ज़िंदगी में भी आया और उसके बाद मेरी सारी दुनिया मेरे बच्चे मेंही सिमट गई. जॉब छोड़ दिया और मैं दोबारा जॉब जॉइन नहीं कर पाई, क्योंकि मैं अपने बच्चे को अपना 100% देनाचाहती थी. लेकिन कुछ समय बाद कहीं न कहीं एक मां और एक करियर ओरीएंटेड स्त्री के बीच की ऊहापोह में मैं फ़ंसनेलगी.  मुझे पहले नींद नहीं आती थी क्योंकि बच्चा सोने नहीं देता था, लेकिन अब नींद आनी बंद हो गई थी कि मैं कर क्या रही हूं… मेरी काबिलीयत, करियर, सपने सब धरे के धरे रह जाएंगे.  उस वक़्त मैं अपने भाई के पास अमेरिका गई थी तो मैंने देखा वहां दवाइयां काफ़ी महंगी होती थीं और लोग अब नेचुरल फूड और डायट्री सप्लीमेंट्स के ज़रिए ये कोशिश करते थे कि वो हेल्दी और फिट रहें. शरीर को संपूर्ण पोषण मिलेगा तो बीमारी नहीं होगी. उस वक़्त न सिर्फ़ मुझे, बल्कि मेरे पूरे परिवार को लगा कि ये ट्रेंड हमारे देश में भी आज नहीं तो कलआएगा ही, क्योंकि यहां भी लाइफ़ स्टाइल संबंधी बीमारियां, जैसे- हार्ट की बीमारी, मोटापा, डायबिटीज़ आदि बढ़ रहीथीं. उस वक़्त ये ख़याल आया कि क्यों न ऐसे प्रोडक्ट्स बनाएं जाएं जो नेचर के क्लोज़ हों और जिनके बारे में लोगअनजान हैं और जिस पोषण की पूर्ति खाने के ज़रिए नहीं हो पा रही हो, तो वो पोषण इन प्रोडक्ट्स से उनको मिल सकेगा. दवा के तौर पर नहीं लेकिन सप्लीमेंट के तौर पर इनके इस्तेमाल से लोग अपनी डायट को कम्प्लीट बना सकते हैं.  इस आइडिया को इम्प्लीमेंट करने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? एक महिला होने के नाते सबसे पहली चुनौती थी कि मैं अपने काम और परिवार के बीच कैसे संतुलन बनाए रखूं. हममहिलाएं खुद से ही इतनी उम्मीदें लगाए रहती हैं कि अपने स्टैंडर्ड्स बहुत हाई करके रखती हैं, तो मुझे लगा कि अपने बच्चेपर भी उतना ही ध्यान दूं, जितना फुल टाइम मदर को देना चाहिए और अपने काम से भी मुझे समझौता नहीं करना था. परमेरे परिवार ने मुझे काफ़ी सपोर्ट किया और काम आसान हो गया. दूसरी चुनौती बिज़नेस फ़्रंट पर थी और वो ये कि हमने 2015 में ये प्रोजेक्ट लॉन्च किया था और इसका आइडिया हमको 2013-14 में आया था, पर एक-डेढ़ साल तो ग्राउंडवर्क में ही लग गया था पर क्योंकि हमने शुरुआत ही की थी ई कॉमर्ससे और उस समय ये कॉन्सेप्ट नया था, तो लोग डिजिटल पेमेंट को लेकर बिल्कुल भी सहज नहीं थे. इसके अलावा जो एकऔर बहुत बड़ी चुनौती थी वो ये कि भले ही आयुर्वेद भारत की कोख में जन्मा है, गांव-गांव में लोग इससे अनजान नहीं, परबावजूद इसके लोगों को उस समय हर्बल प्रोडक्ट्स पर इतना भरोसा नहीं था. उस पर हम भारतीय खाने के लिए जीते हैं, हमारे लिए सेहत बाद में और स्वाद पहले. वहीं अगर हम बात हम महिलाओं की करें तो हमारे लिए घर, परिवार, जिम्मेदारियां हमारी प्राथमिकताएं हैं पर हमारी सेहत कहीं से हमारी प्राथमिकताओं में नहीं होती.  एक अन्य समस्या ये भी थी कि ये फ़ैमिली बिज़नेस था, तो हमारे पास रिसोर्सेस बहुत सीमित थी और भारत जैसे विशालदेश में हर जगह पहुंच पाना संभव नहीं और ऊपर से लोग भी इतने फिटनेस फ़्रीक नहीं थे.  फ़्यूचर प्लांस क्या हैं और कैसे तमाम चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ने का सोचा है? हमारे कई प्रोडक्ट्स हैं जो पहली बार हमने ही देश में इंट्रड्यूस किए, जैसे किडनी हेल्थ, मेंटल हेल्थ प्रमोट करने के लिएभी एक्स्क्लूसिव प्रोडक्ट्स हैं, लेकिन लोगों को जानकारी ही नहीं है. साथ ही ऐसे प्रोडक्ट्स में लोगों का भरोसा जीतनाबेहद ज़रूरी है, इसलिए हम क्वालिटी टेस्ट रिपोर्ट्स के साथ कस्टमर के पास जाते हैं. सोशल मीडिया के ज़रिए, फ्रीशिपिंग के साथ हम लोगों से जुड़ते हैं. COVID से पहले तो हम सेमिनार्स भी करते थे. हम डायटीशियन, न्यूट्रिशनिस्ट औरडॉक्टर्स को भी बताते हैं कि ऐसे प्रोडक्ट्स मौजूद हैं देश, तो वो अपनी प्रैक्टिस में इनका किस-किस तरह से उपयोग करसकते हैं और लोगों को भी रिकमेंड कर सकते हैं. FSSAI के भी नियम अब बदल रहे हैं तो अगर हम सर्टिफ़ायड प्रोडक्ट्सलोगों को देते हैं तो उनको ये भरोसा होता है कि ये उत्पाद वाक़ई सही और सेफ हैं. हमें आयुष कमल भूषण अवॉर्ड भीमिला है, तो इससे भी लोगों का ट्रस्ट एक कदम और बढ़ जाता है हम पर. वैसे भी अब लोग हेल्थ को लेकर ज़्यादा सतर्कहो गए हैं और डिजिटल पेमेंट ज़्यादा करने लगे हैं, तो राह थोड़ी आसान हो रही है.  फ़िलहाल हम भारत पर ही फ़ोकस कर रहे हैं पर भविष्य में ज़रूर एक्स्पोर्ट की तरफ़ जाएंगे. …

कहानी- प्रेम की पराकाष्ठा (Short Story- Prem Ki Parakashtha)

“शशांक बेटा, मृणाल तुमसे अथाह प्रेम करती थी. ये प्रेम होता ही ऐसा है. जब कोई किसी से आत्मा की…

मैरिटल रेप, डर लगता है इस प्यार से(Marital Rape: When married women are raped by their husband)

हमारे देश में संबंध बनाने के लिए शादी का लाइसेंस ज़रूरी है. इस लाइसेंस के बिना बने संबंधों को परिवार/समाज/क़ानून…

वार्षिक राशिफल २०२२: जानें क्या कहते हैं २०२२ में आपके सितारे (Yearly Horoscope 2022)

मेष साल 2022 आपके लिए नई शुरुआत करने का अवसर लानेवाला है, इसका तहेदिल से स्वागत करें. पूरे साल आर्थिक…

पहला अफेयर: तेरा साथ है तो… (Pahla Affair… Love Story: Tera Sath Hai To)

मैं अपनी चचेरी बहन के पास अस्पताल में बैठी थी. उसका छोटा-सा एक्सीडेंट हुआ था और पांव में फ़्रैक्चर हो जाने कीवजह से वह तीन-चार दिनों के लिए एडमिट थी. मैं उसके पास कुर्सी पर बैठी कोर्स की किताब पढ़ रही थी कि तभी उसकेस्कूल के दोस्त उससे मिलने आए. दो लड़कियां और तीन लड़के. कुछ ही देर में बाकी सब तो चले गए लेकिन रश्मि काएक दोस्त, जिसका नाम जतिन था रुक गया. हम तीनों बातें करने लगे. बातों के सिलसिले में पूरी दोपहर कब निकल गईपता ही नहीं चला. दूसरे दिन फिर आने का वादा करके वह घर चला गया.  उसके जाने के बाद मैं यूं ही उसके बारे में सोचने लगी… बिखरे बालों वाला वह बहुत सीधा-सादा, भोला-सा लगा मुझे. रात में चाची रश्मि के पास रुकी और मैं घर चली गई. सुबह नहाकर जब वापस आई तो देखा जतिन महाराज पहले से ही वहां बैठे थे. चाची के चले जाने के बाद हम तीनों फिर गप्पे मारने लगे. एक आम और साधारण-सा चेहरा होने के बाद भीएक अजब-सी, प्यारी-सी रूमानियत थी जतिन के चेहरे पर और उसकी बातों में कि दिल और आंखें बरबस उसकी ओर खींची चली जाती थी. चार दोपहरें कब निकल गई पता नहीं चला. रश्मि को अभी डेढ़ महीना घर पर ही रहना था. इस बीच उसके बाकी दोस्तों के साथ ही जतिन भी घर आता रहा. वह स्कूल में होने वाली पढ़ाई की जानकारी रश्मि को देकर उसकी मदद करता और खाली समय में हम तीनों खूब बातें करते और मस्ती करते. अब तो जतिन से मेरी भी बहुत अच्छी दोस्ती हो गई थी. जिस दिन वह नहीं आता वो दिन खाली-खाली-सा लगता और मैं बेसब्री से उसका इंतजार करती. रश्मि भी हंसी-हंसी में उसे ताना मारती, "तुम मुझसे मिलने थोड़े ही आते हो, तुम तो चेतना से मिलने आते हो…" तब जतिन एक शर्मीली-सी हंसी भरी नज़र मुझ पर डाल कर सिर झुका लेता. बारहवीं पास होते ही मैं डेंटल कॉलेज में पढ़ने दूसरे शहर चली गई और जतिन भी आगे की पढ़ाई करने दूसरे शहर चला गया, लेकिन फोन पर हम बराबर संपर्क में बने रहते. कभी-कभी रात की ट्रेन से सफर करके जतिन मुझसे मिलने आता. दिन भर हम साथ में घूमते, लंच करते और रात की ट्रेन से वह वापस चल आ जाता. पढ़ाई खत्म होने तक हम दोनों को ही इस बात का एहसास हो चुका था कि हम दोस्ती से आगे बढ़ चुके हैं. हम एक-दूसरे से प्यार करने लगे हैं और अब अलग नहीं रह सकते. हम दोनों ही अपनी एक अलग रूमानी दुनिया बसा चुके हैं, जहां से लौटना अब संभव नहीं था. कितनी खूबसूरत थी वह दुनिया, बिल्कुल जतिन की दिलकश मुस्कुराहट की तरह और उसकी आंखों में झलकते प्यार सेसराबोर जिसमें मैं पूरी तरह भीग चुकी थी. नौकरी मिलते ही जतिन ने अपने घर में इस बारे में बात की. उसके माता-पिता अपने इकलौते बेटे की खुशी के लिए सहर्षतैयार हो गए, लेकिन मेरे पिताजी ने दूसरी जाति में शादी से साफ इनकार कर दिया. यहां तक कि जतिन के घर आने पर अपनी बंदूक तान दी. महीनों घर में तनाव बना रहा, लेकिन मैं जतिन के अतिरिक्त किसी और से शादी करने के लिए किसी भी हालत में तैयार न थी. महीनों बाद सब के समझाने पर पिताजी थोड़े नरम हुए. उन्होंने पंडित जी से कुंडली मिलवाई तोपंडित जी ने मुझे मंगली बता कर कहा कि यदि यह शादी हुई, तो लड़की महीने भर में ही विधवा हो जाएगी. साथ ही लड़के की कुंडली में संतान योग भी नहीं है. घर में सब पर वज्रपात हो गया. अब तो शादी की बिल्कुल ही मनाही हो गई. चार-पांच पंडितों ने यही बात की. अलबत्ता जतिन के घर वाले अब भी अपने बेटे की खुशी की खातिर इस शादी के लिए तैयार थे. बहुत संघर्षों और विवादों के बाद…

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