अपने मुंह मियां मिट्ठू (Self Praise: Are You Hurting Or Helping?)

अपने मुंह मियां मिट्ठू लोग अपने सिवाय किसी और को कुछ समझते ही नहीं हैं. अपने मुंह मियां मिट्ठू लोगों…

अपने मुंह मियां मिट्ठू लोग अपने सिवाय किसी और को कुछ समझते ही नहीं हैं. अपने मुंह मियां मिट्ठू लोगों को आत्मप्रशंसा की इतनी बुरी लत होती है कि हर किसी के सामने अपनी बड़ाई करने लगते हैं. उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे ख़ुद को श्रेष्ठ साबित कर सकते हैं, जबकि आत्मप्रशंसा ओछेपन की निशानी है.

 

बड़े बड़ाई न करें, बड़े बोले न बोल
रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मेरा मोल

रहीमदास का ये कथन बिल्कुल सटीक है. जो लोग वाकई में ज्ञानी और गुणवान होते हैं वो अपने गुणों का बखान नहीं करते, बल्कि चुपचाप अपना काम करते रहते हैं. क्योंकि उनका काम ही उनके बारे में सब कुछ कह देता है. इसकी जीती जागती मिसाल स्वामी विवेकानंद, रविंद्रनाथ टैगौर, महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस जैसे इतिहास पुरुष हैं, जिनका लोहा पूरी दुनिया मानती है, लेकिन उन्होंने ख़ुद कभी अपनी शेखी नहीं बघारी.

अपने मुंह मियां मिट्ठू लोग दरअसल अपनी कमियां छुपाते हैं
जिन लोगों में योग्यता नहीं होती वो ही ख़ुद की प्रशंसा करके अपनी कमियां छुपाने की कोशिश करते हैं. अपनी हार के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार मानने की बजाय उसका दोष परिस्थितियों व दूसरे लोगों पर मढ़ देते हैं, जैसे जॉब या प्रमोशन न
मिलने पर ऐसे शख़्स कहेंगे, “मुझे काम का अनुभव तो था, लेकिन लोगों को इसकी कद्र नहीं… मेरी सिफ़ारिश करने वाला कोई नहीं था या मेरी किसी बड़े आदमी से पहचान नहीं थी, इसलिए मुझे ये नौकरी/प्रमोशन नहीं मिली.’ माना किसी संदर्भ में ये बातें सही हो सकती है, लेकिन आप में यदि प्रतिभा व योग्यता है, तो निश्‍चय ही आपको सफलता मिलेगी. इसके लिए आपको अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की ज़रूरत नहीं.

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अपने मुंह मियां मिट्ठू लोग छोटी सोच के होते हैं
अपनी तारीफ़ करके यदि आपको ऐसा लगता है कि दूसरे आपसे प्रभावित हो जाएंगे और उनकी नज़रों में आपका क़द बढ़ जाएगा तो आप ग़लत हैं. उल्टा आप उनकी नज़रों में छोटे बन जाएंगे, क्योंकि कोई भी इंसान अपनी कथनी से नहीं, बल्कि करनी से बड़ा होता है. शांति व संजीदगी सज्जन व ज्ञानी व्यक्तियों की पहचान है. जिस तरह पूरा भरा घड़ा छलकता नहीं है वैसे ही योग्य व सक्षम व्यक्ति भी ख़ुद अपनी बड़ाई नहीं करते, बल्कि दुनिया उनके गुणों का बखान करती है. दरअसल, प्रशंसा की भूख अयोग्य व्यक्तियों में ही होती है. इस संदर्भ में महात्मा गांधी ने बिल्कुल सही कहा है, “जो लोग अपनी प्रशंसा के भूखे होते हैं, वो साबित कर देते हैं कि उनमें योग्यता नहीं है.”

अपने मुंह मियां मिट्ठू लोग स़िर्फ अपनी शेखी बघारते हैं
आप अपने परिवार व समाज में सबकी मदद करते हैं, मुश्किल हालात में जी जान लगाकर आप उनकी सहायता करते हैं. इस काम के लिए जब दूसरे आपकी प्रशंसा करें तब तो ठीक है, लेकिन आप अगर ख़ुद ही अपनी शेखी बघारने लगेंगे तो आपके सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा. तुलसीदास जी ने भी कहा है “आत्मप्रशंसा वह आग है जिसमें कर्तव्य का जंगल जल जाता है.”

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Kamla Badoni

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