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कहानी- डॉक्टर (Short Story- Doctor)

       बेला मुखर्जी   “यार! सब घर-परिवार में आराम से रह रहे हैं. तेरे लिए सभी चिंता करते हैं. इतना सूना जीवन, अकेला,…

       बेला मुखर्जी

 

“यार! सब घर-परिवार में आराम से रह रहे हैं. तेरे लिए सभी चिंता करते हैं. इतना सूना जीवन, अकेला, इस उम्र में… पर क्या करें? तूने तो अपने लिए कभी सोचा ही नहीं. अरे, डॉक्टर तो हम सभी थे, पर तेरी तरह अधूरा तो कोई भी नहीं रहा.”
राजीव के जाने के बाद डॉक्टर साहब कुर्सी पर ढीले पड़ गए.

‘डॉक्टर साहब!’ घर-बाहर, छोटे-बड़े सभी इसी नाम से जानते हैं उनको. यही उनका परिचय भी है और पहचान भी. इस पहचान के चलते लोग उनके मम्मी-पापा द्वारा दिया गया नाम ‘सत्य प्रकाश’ भूल ही गए हैं. पापा के कुलगुरु ने उनकी जन्मपत्री बनाते समय आशीर्वाद के साथ कहा था, “यह संतान भाग्यवान है. इसका यश चारों दिशाओं में फैलेगा. इसका बहुत बड़ा परिवार होगा और उस परिवार में यह ईश्‍वर की तरह पूजा जाएगा.”
सुनकर मम्मी-पापा उस समय अवश्य ही ख़ुशी में फूले नहीं समाए होंगे. आज उनको हंसी आती है उस भविष्यवाणी पर. बड़ा तो दूर, आज पचास की उम्र हो गई है, लेकिन घर व जीवन दोनों सूने पड़े हैं. अकेले हैं, नौकर मुरारी के भरोसे. मज़े की बात यह है कि अपने मरीज़ों की चिंता में उनकी नींद तो उड़ती रही, पर अपने या अपने भविष्य में आनेवाले बुढ़ापे के लिए सोचने का समय ही नहीं मिला.
मेडिकल कॉलेज में दुखी लोगों की सेवा में अपने सुख व आराम को त्याग देने की जो शपथ ली थी, उन्होंने उसका अक्षरशः पालन किया है. उसके लिए मन में कभी कोई अभावबोध या अकेलापन भी नहीं जागा. और मरीज़ भी एक से बढ़कर एक. यदि किसी के दम तोड़ते समय भी डॉक्टर साहब आकर खड़े हो जाते तो सबकी आंखों में आशा की किरण फूट पड़ती. लोग धर्म गुरु को सिर पर बैठाते हैं, क्योंकि वो परलोक सुधारते हैं और डॉक्टर साहब परलोक के रास्ते में चट्टान बनकर खड़े हो जाते हैं. मौत से हाथापाई कर भगाते हैं तो लोग उनको अपने प्राणों में बसा लेते हैं. वैसे उनका शरीर मज़बूत है. संयमित, व्यसन रहित जीवन और संतुलित भोजन के साथ सदा कर्मठ रहने से बीमारी पास नहीं आती. पर अचानक वायरल ने आक्रमण करके आठ दिन में ही शरीर तोड़-सा दिया है. जूनियर्स को मौक़ा मिल गया उन पर रौब चलाने का. घर में ज़बरदस्ती नज़रबंद कर रखा है. लेटे-लेटे वर्षों के बाद, अपनी स्टूडेंट सुमन की याद आई. उस भोली मासूम-सी लड़की ने भी तो उनको दिल से प्रेम और आदर अर्पण किया?था. इतनी सुंदर थी सुमन कि उसका प्यार पाने के लिए पूरे मेडिकल कॉलेज के युवा तड़प रहे थे, पर वो तो समर्पित हो चुकी थी अपने से 15 वर्ष बड़े अपने सर के प्रति.
कई बार क्लास लेते-लेते उस पर नज़र गई तो देखा वो तन्मय हो उनके चेहरे को देख रही है, पर उनकी समझ में नहीं आया कि उसकी आंखों में जानने-समझने का आग्रह था या प्रेम की मुग्धता. असल में अपना काम छोड़ और किसी ओर ध्यान देने का समय या मानसिकता थी ही नहीं उनमें. आज फुर्सत के पलों में अचानक उसकी याद आई. पता नहीं कहां होगी वो. अवश्य ही एक सुखी जीवन जी रही होगी. बहुत अच्छी लड़की थी सुमन. अच्छी पत्नी होने के सारे गुण थे उसमें. उसके साथ उन्होंने जो किया वो ग़लत तो था, पर अपराध नहीं. कम से कम उनके मन में कभी कोई अपराधबोध नहीं जागा उस घटना को लेकर.
सच तो यह है कि पुरानी बातों को याद करने का समय उन्हें कभी नहीं मिला. कोई नाज़ुक हालत में हो तो उस मरीज़ को जूनियर डॉक्टर के भरोसे नहीं छोड़ सकते. वे रात में भी एक-दो राउंड लेने चले आते हैं. वर्षों बाद घर में आराम करने का अवसर दिया इस वायरल ने. ऊपर से जूनियर डॉक्टरों को मौक़ा मिल गया उनको बिस्तर पर बांधने का. आज जाकर उनको थोड़ा समय मिला अपने बीते जीवन को याद करने का. अब बुख़ार नहीं, बस, वायरल वाली कमज़ोरी भर है. वे अस्पताल जाना भी चाहते थे, पर सारे जूनियर डॉक्टरों ने एकजुट हो अल्टीमेटम दे दिया कि ह़फ़्ते से पहले उन्होंने अस्पताल में पैर रखा तो सारे के सारे अनिश्‍चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे. वे जानते हैं कि ये लोग उनका आदर-सम्मान ही नहीं करते, बल्कि दिल से बेहद प्यार भी करते हैं. जब बुख़ार था, तब एक-दो डॉक्टर दिन-रात घर में ही रहकर पहरेदारी करते रहे. अब बुख़ार उतरा तो उनसे पीछा छूटा.
बाहर के बरामदे में एक जरनल लेकर बैठे थे. तभी एक चमचमाती गाड़ी आकर रुकी. चौकीदार ने गेट खोल लंबा सलाम मारा. कोई परिचित होगा. ड्राइविंग सीट से उतर वे सज्जन पास आकर बोले, “क्यों बे, तू कैसे बीमार पड़ गया?‘’ और सामने पड़ी दूसरी कुर्सी खींच बैठ गए. उन्होंने ध्यान से देखा तो पहचान गए. क्लासमेट राजीव, एमआरसीपी करने लंदन गया था. रईस खानदान का बेटा. पढ़ाई के बाद नौकरी कर वहीं बस गया.
“अरे राजीव! कब आया तू?”
“कल! बाबूजी की पहली बरसी थी तो आना पड़ा. तुझसे मिलने अस्पताल गया था तो पता चला तू बीमार है. तेरा अस्पताल अनाथ पड़ा है तेरे बिना.” हंस पड़े दोनों.
“मामूली वायरल था. बुख़ार भी कब का उतर गया, पर सब लोगों ने मिलकर पाबंदी लगा घर में बिठा रखा है.”
“भाग्यवान है मेरे भाई. तुझे सब चाहनेवाले ही मिले. वैसे यह नई उम्र के लड़के हमसे ज़्यादा समझदार हैं. पर सत्य! काम करने की भी सीमा होती है. ढलती उम्र में थकान को अनदेखा कैसे कर सकता है तू?”
“ढलती उम्र, थकान… ये सारे शब्द मेरे लिए नए और अजीब-से लग रहे हैं. मुझे तो ऐसा कुछ भी नहीं लगता.”
“लगे या न लगे, पचास को पार कर आए हैं हम.”
“पर मुझे लगता है, मैं अभी-अभी पच्चीस का हुआ हूं. तूने अपना यह क्या हाल बना लिया है? मन भर फ़ालतू चर्बी जमा करेगा शरीर में तो पचास क्या सत्तर वर्ष की थकान आएगी.”
“क्या करूं यार? घरेलू पत्नी किसी को न मिले. उसे कुकिंग छोड़ दुनिया में कुछ भी पसंद नहीं. रोज़ नई-नई चीज़ बनाती और खिलाती है.”
“मज़े में है यार.”
“अब घर है तो उसका सुख भी होगा. तेरा तो न घर, न घर का आराम.” खुलकर हंसे दोनों.
“ऐसा नहीं है. बोल न क्या खाएगा? हां, तू क्या देश में नहीं लौटेगा?” हंसता राजीव अचानक उदास हो गया,
“बहुत मन करता है मेरे भाई. पर यह विदेश ऐसा चक्रव्यूह है कि इसमें घुसना आसान है, पर निकलने का रास्ता नहीं मालूम. रास्ता भी खोज लिया तो अनिश्‍चित भविष्य का डर, असुरक्षा का आतंक, बच्चों के करियर की चिंता…”
“बहुत दिन हो गए देश को छोड़े, इसलिए ऐसी सोच है तेरी. आया है तो महीने-दो महीने रहकर जा. देख, देश कहां पहुंचा है. कितनी ऊंचाई को छू रहा है.”
“नहीं होगा यार, बच्चे नहीं आना चाहते. मन तो हर पल रोता है अपनी माटी के लिए, पर… फिर भी बच्चे अपना दाना आप चुगने लगें तो दोनों बूढ़े-बूढ़ी लौट आने का सपना देख रहे हैं.”
“मैंने तुझको तभी मना किया था.”
“इतनी गहरी सोच कहां थी तब? लालच में चला गया था. अरे हां, सुमन भी वहीं है, हमारे पड़ोस में ही रोज़ का आना-जाना, उठना-बैठना है.’
“सुमन! लंदन में है?”
“हां, हमारे पड़ोस में. तूने उसकी क़दर नहीं की, पर ईश्‍वर ने उस भली लड़की को भरा-पूरा सुख दिया है. बहुत ही सुखी परिवार है उसका, तीन प्यारे से बच्चे और हंसमुख, मिलनसार पति. बहुत ख़ुश है सुमन. पास ही एक छोटे से अस्पताल में पार्ट टाइम नौकरी भी करती है.”
“उसका पति डॉक्टर है?”
“न… न… सीए है किसी कंपनी में. अच्छी नौकरी पर है. अपना घर भी ले लिया है.” फिर दोनों मित्रों ने बहुत सारी पुरानी यादें ताज़ा कीं. राजीव का बहुत सारे दोस्तों से अभी भी संपर्क बना हुआ है. कुछ विदेश में हैं, पर अधिकतर देश में ही सुखी-संपन्न जीवन जी रहे हैं. थोड़ी देर बाद चलते हुए बोले, “यार! सब घर-परिवार में आराम से रह रहे हैं. तेरे लिए सभी चिंता करते हैं. इतना सूना जीवन, अकेला, इस उम्र में… पर क्या करें? तूने तो अपने लिए कभी सोचा ही नहीं. अरे, डॉक्टर तो हम सभी थे, पर तेरी तरह अधूरा तो कोई भी नहीं रहा.”
राजीव के जाने के बाद डॉक्टर साहब कुर्सी पर ढीले पड़ गए. आंखें बंद हो गईं. लगभग दो दशक बाद आंखों के सामने आ गई फूल-सी खिली-खिली, ख़ूबसूरत सुमन. शांत स्वभाव की थी वो. अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों को उनके मुख पर गड़ाकर तन्मय हो उनका लेक्चर सुनती. सिर झुका नोट्स लेती, जब भी उस पर नज़र पड़ती, उसकी एकाग्रता में कभी कोई कमी नहीं पाते. उन्होंने कभी उस पर ध्यान नहीं दिया. हां, उसको शिष्य के रूप में पसंद अवश्य करते थे. नए-नए मेडिकल कॉलेज में लेक्चरार हुए थे. अपने ज्ञान को शिष्यों पर प्रदर्शित करने की प्रबल इच्छा थी, पर शायद सुमन इन सब से अलग और ज़्यादा पाने की आशा रखती थी. पर वो इन सबको समझ ही नहीं पाते. फिर भी मौन पुजारिन की तरह सुमन उनके साथ साये की तरह रहती. वो पढ़ाई पूरी कर उनके ही अंडर में काम कर रही थी. तब उसके मम्मी-पापा ही प्रस्ताव लेकर आए. ना ही कर देते, पर मित्रों ने ऐसे घेरा, ऐसी लताड़ लगाई कि उनको हां करना ही पड़ा.
सुमन खिल उठी ताज़े गुलाब की तरह. सगाई का दिन निकाला गया. ख़ूब धूमधाम व रौनक थी. सारे दोस्तों को निमंत्रण दिया गया था. सगाई की रस्म पूरा करके हाथोंहाथ शादी का मुहूर्त भी निकाला जाना था. दोस्त उनके घर जमा होने लगे तो उन्होंने उन सबको सीधे सुमन के घर भेज दिया.
“बस, एक राउंड लेकर फिर तैयार होकर अभी आया. तुम लोग चलो तब तक. ठंडा-वंडा पीयो.” ठीक समय पर वार्ड का राउंड लेकर घर लौटे. आज किसी मरीज़ से ज़्यादा उलझे नहीं. नहाकर तैयार होते-होते कई दोस्तों के कई फ़ोन आए, “अबे जल्दी आ.”
एक बार सुमन ने भी लजाते हुए पूछा, “कितनी देर में आएंगे.”
“बस, निकल रहा हूं.”
हल्के आसमानी शर्ट के ऊपर ग्रे सूट पहना. टाई उनको पसंद नहीं, पर राजीव चेतावनी दे गया था, “टाई ज़रूर बांधना.” टाई बांधी. सुमन के लिए एक हीरे की अंगूठी ख़रीद लाए थे, उसे जेब में रखा. घर से निकले ही थे कि एक बूढ़ा आकर पैरों पर पछाड़ खाकर गिर पड़ा. बुरी तरह रो रहा था वो, “डाक्टर साब! मेरे पोते को बचा लो. हम बूढ़े-बूढ़ी की बुढ़ापे की लाठी है वो. बहू-बेटे को पहले ही खो चुके, पोते के सहारे ज़िंदा थे. अब डॉक्टरों ने उसे भी जवाब दे दिया. आप हमारे भगवान हैं. आप हमारे सहारे को बचा लीजिए.”
एक बार सोचा भगा दें. डॉक्टरों के जीवन में ये सब तो लगा ही रहता है, तभी अपनी शपथ याद आ गई. झुककर बूढ़े को दोनों हाथों से उठाया. जेब से अंगूठी की डिब्बी फिसल बाहर लुढ़क गई, उसे देखा भी नहीं.
“कहां है तुम्हारा पोता?”
“दस नंबर के बेड पर.”
याद आया यह फ्री बेड है. अति ग़रीब बूढ़ा-बूढ़ी अपने पंद्रह-सोलह वर्ष के पोते को लेकर आए थे. बुरा हाल था लड़के का. वास्तव में ही संकट था. लगा, लड़का अंतिम सांसें गिन रहा है. दो हाउस जॉब वाले असहाय खड़े हैं. सब कुछ भूल तैयार हो गए मौत से कुश्ती लड़ने. रातभर खींचतान रही उनमें और मौत में. भोर में मौत तंग आकर, थककर लौट गई. घर लौटे तो भोर की पहली किरण धरती को चूमने नीचे उतर रही थी. किसी प्रकार कपड़े बदल बिस्तर पर लेटकर गहरी नींद सो गए थे.
दूसरे दिन से सुमन काम पर नहीं आई. कभी भी नहीं आई, किसी ने बताया कि कोई स्कॉलरशिप ले वो विदेश चली गई है. भूल ही गए थे उसको. असल में वो उनके मन की गहराई को इतना बड़ा समर्पण करके भी छू नहीं पाई थी. आज इतने वर्षों बाद राजीव के मुंह से उसके सुखी, भरे-पूरे परिवार की बात सुन अच्छा ही लगा. थोड़ा स्नेह तो था ही उसके लिए मन में, स्टूडेंट थी अपनी. उनके मन में सभी स्टूडेंट के लिए स्नेह था. मन ही मन आशीर्वाद दिया, “मैं बहुत ख़ुश हुआ सुमन तुम्हारे सुखी और भरे-पूरे जीवन की बात सुन. ईश्‍वर! तुमको अखंड सौभाग्य दे.”
हां, राजीव के मन में उनके लिए दुख है. अपना कोई नहीं, परिवार के नाम पर कोई भी नहीं. घर-जीवन सब सूना पड़ा है, लेकिन क्या यह सच है? झपकी-सी आने लगी, शायद सो ही गए थे कि पैरों पर किसी के स्पर्श से चौंककर जाग उठे. एक युवती उनके दोनों पैरों पर माथा रख प्रणाम कर रही है. दो प्यारे से बच्चे हाथ में गेंदे के फूल लिए और एक आकर्षक युवक हाथ में थैला लिए खड़ा था.
“अरे… उठो, यह क्या? कौन हो तुम?”
युवती ने सिर उठाया, आंचल से आंसू पोंछे, मन के आवेग से आंसू आ गए थे.
“मैं मालती हूं डॉक्टर बाबा.”
“मालती…?” कुछ याद नहीं आया. इतने मरीज़ आते-जाते हैं. सबको याद रखना संभव नहीं है. शायद कभी इसके बच्चे, पति या इसका ही इलाज किया होगा.
“बाबा! सुना आपकी तबीयत ठीक नहीं तो मुझसे रहा नहीं गया. आप तो हमारे ईश्‍वर हैं.” अब युवक भी आगे आया. मालती का पति होगा. थैला उसे पकड़ा घुटनों के बल बैठ उसी प्रकार पैर पर माथा रख प्रणाम किया. बच्चों को आगे किया. उन्होंने डरते-डरते दोनों फूल बढ़ा दिए. मन में वसंत ऋतु की सुगंधित हवा बह चली, मानो उनका जीवन परिपूर्ण हो उठा. सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया उनको, “सच्चे इंसान बनो. सबके लिए जीयो.”
युवती ने काग़ज़ की प्लेट में दो सेब रख आगे कर दिया, “बाबा! हम ग़रीब आपके लिए भला क्या लाते? आपको याद नहीं होगा. इतने मरीज़ आते-जाते हैं. दो वर्ष पहले मेरे पति को जब सबने जवाब दे दिया था, तब आपने दिन-रात एक करके उनका जीवन लौटाया था.”
तभी याद आ गया, हां जीवित रहने की आशा एकदम नहीं थी. निमोनिया पूरी तरह बिगड़ चुका था. झोला छाप डॉक्टरों ने मौत के द्वार तक पहुंचा दिया था. उसको तो अस्पताल में ले भी नहीं रहे थे. जूनियर्स ने बार-बार कहा, “इसका आख़िरी समय आ गया है सर. क्यों बेकार में बदनामी अपने सिर लें?” पर वो नहीं माने. स्वयं उसकी देखभाल करते रहे, दूसरों पर भरोसा नहीं किया. कुछ दवाएं बहुत महंगी थीं, जो अस्पताल से नहीं मिलतीं, उनको अपनी जेब से मंगाकर देते. बचा लिया था उसे. आज स्वस्थ युवक सामने खड़ा है. एक अनजान ख़ुशी से मन भर उठा.
“डॉक्टर बाबा! भगवान को हमने देखा नहीं, पर इतना जानते हैं कि कभी-कभी वो भी कान बंद कर लेते हैं. आप हमारे लिए भगवान हैं. मेरा सुहाग लौटा दिया. आज मैं भगवान की पूजा से पहले आपको प्रणाम करती हूं रोज़.”
“पर ये सब क्यों…?”
“ईश्‍वर के दर्शन तो खाली हाथ नहीं करते. हम ग़रीब और क्या भेंट दें…”
वो हंसे. दोनों सेब उठा दोनों बच्चों को दे दिया.
“ख़ुश रहो.”
आंसू पोंछ वे लोग चले गए. वो फिर कुर्सी पर ढीले पड़ गए. मन ने कहा,
‘राजीव! तेरा हिसाब ग़लत है. तुम सबको हरा दिया है मैंने! मेरा जीवन सूना नहीं है. क्या है तुम लोगों के पास? अपना छोटा-सा परिवार. एक दिन चुपचाप संसार को छोड़ चले जाओगे तो पता भी नहीं चलेगा किसी को, पर मेरा परिवार इतना बड़ा है कि मैं ही अपने सदस्यों को पहचान नहीं पाता. बीमार पड़ा, तो ऐसे घेर लेते हैं मुझे कि मौत मेरे पास आने के लिए चार बार सोचकर हिम्मत जुटाएगी. नहीं राजीव, मैंने खोया कुछ भी नहीं, बल्कि इतना पाया है कि तुम सबको हरा दिया है.’

 

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Published by
Meri Saheli Team
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