जानें किस बात पर रो पड़ीं ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी (Why Dream Girl Hema Malini Cried)

ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी (Dream Girl Hema Malini) के इस ख़ास कॉलम 'मेरी ज़िंदगी, मेरे अनुभव' (Meri Zindagi Mere Anubhav) में आप हेमा मालिनी की ज़िंदगी के ऐसे अनुभवों के बारे में जानते हैं, जिन्हें आपने पहले कभी नहीं पढ़ा. 'मेरी सहेली' (Meri Saheli) की एडिटर हेमा मालिनी (Hema Malini) उनके कॉलम 'मेरी ज़िंदगी, मेरे अनुभव' (Meri Zindagi Mere Anubhav) के माध्यम से अपनी ज़िंदगी के ख़ास अनुभव आप लोगों के साथ शेयर करती हैं. जुड़े रहें हमारे साथ... और जानें ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी (Dream Girl Hema Malini) की ज़िंदगी के ख़ास अनुभव, उन्हीं की ज़ुबानी. हां, उस वक़्त मैं रो पड़ी थी आज मुझे सोचकर हंसी आती है कि जब ईशा पहली बार स्कूल गई, तो मैं रोने लगी थी. जी हां, यह सच है. अब तक मैंने उसे ख़ुद से एक पल के लिए भी अलग नहीं किया था. मेरे ख़्याल से ऐसा हर मां के साथ होता है. हम अपने बच्चों को लेकर इतने पज़ेसिव हो जाते हैं कि उन्हें ज़रा भी तकलीफ़ में नहीं देख सकते. वो भी पहली बार स्कूल जाते समय उदास थी, क्योंकि उसका भी यह पहला ही अनुभव था मुझसे दूर अंजान लोगों के बीच जाने का. ऐसे में अपने बच्चे को ख़ुद से थोड़ी देर के लिए भी अलग कर पाना आसान नहीं था. ईशा को देखकर मुझे और भी रोना आ रहा था, ये चंद घंटे कैसे गुज़रे बस मेरा दिल ही जानता है. फिर जब ईशा स्कूल से लौटी, तो मैंने उसे कलेजे से लगा लिया. थोड़ी देर तक मैंने उसे ऐसे ही कसकर…

ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी (Dream Girl Hema Malini) के इस ख़ास कॉलम ‘मेरी ज़िंदगी, मेरे अनुभव’ (Meri Zindagi Mere Anubhav) में आप हेमा मालिनी की ज़िंदगी के ऐसे अनुभवों के बारे में जानते हैं, जिन्हें आपने पहले कभी नहीं पढ़ा. ‘मेरी सहेली’ (Meri Saheli) की एडिटर हेमा मालिनी (Hema Malini) उनके कॉलम ‘मेरी ज़िंदगी, मेरे अनुभव’ (Meri Zindagi Mere Anubhav) के माध्यम से अपनी ज़िंदगी के ख़ास अनुभव आप लोगों के साथ शेयर करती हैं. जुड़े रहें हमारे साथ… और जानें ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी (Dream Girl Hema Malini) की ज़िंदगी के ख़ास अनुभव, उन्हीं की ज़ुबानी.

हां, उस वक़्त मैं रो पड़ी थी
आज मुझे सोचकर हंसी आती है कि जब ईशा पहली बार स्कूल गई, तो मैं रोने लगी थी. जी हां, यह सच है. अब तक मैंने उसे ख़ुद से एक पल के लिए भी अलग नहीं किया था. मेरे ख़्याल से ऐसा हर मां के साथ होता है. हम अपने बच्चों को लेकर इतने पज़ेसिव हो जाते हैं कि उन्हें ज़रा भी तकलीफ़ में नहीं देख सकते. वो भी पहली बार स्कूल जाते समय उदास थी, क्योंकि उसका भी यह पहला ही अनुभव था मुझसे दूर अंजान लोगों के बीच जाने का. ऐसे में अपने बच्चे को ख़ुद से थोड़ी देर के लिए भी अलग कर पाना आसान नहीं था. ईशा को देखकर मुझे और भी रोना आ रहा था, ये चंद घंटे कैसे गुज़रे बस मेरा दिल ही जानता है. फिर जब ईशा स्कूल से लौटी, तो मैंने उसे कलेजे से लगा लिया. थोड़ी देर तक मैंने उसे ऐसे ही कसकर पकड़े रखा. उन कुछ घंटों के लिए मैं बहुत बेचैन हो गई थी, ऐसा लग रहा था जैसे मेरी सांसें अटक गई हैं. फिर दूसरे-तीसरे दिन से सब नॉर्मल हो गया था. उसके बाद तो मैं और ईशा दोनों इस बात के लिए तैयार हो गए थे कि ईशा को स्कूल जाना है और उतना टाइम मुझसे दूर रहना है. यही नहीं, ठीक ऐसी ही फीलिंग आहना के स्कूल जाने पर भी हुई थी.

एक मां के लिए उसके बच्चे की मुस्कान से बड़ी कोई चीज़ नहीं 
दुनिया की हर क़ीमती चीज़ बच्चे की मासूम-सी हंसी के सामने फीकी पड़ जाती है. जब ईशा का जन्म हुआ, तो मैंने ईश्‍वर को थैंक्यू कहा, क्योंकि मुझे उन्होंने मां बनने का सौभाग्य दिया. ममता का एहसास जगाया. ईशा के ईर्द-गिर्द ही मेरी दुनिया अब सिमट गई थी. मैं भी एक औरत ही थी, दुनिया के लिए मैं स्टार रही हूं, पर मेरी बच्ची के लिए तो मैं स़िर्फ उसकी मां थी. उसकी हर मासूम-सी शरारत पर बेहद प्यार उमड़ आता था. उसकी वो तोतली बोली पर दिल न्योछावर हो जाता था. सच कहूं, तो शब्दों में बयां करना नामुमकिन है इस एहसास को. एक मां ही पहचान सकती है, मां की भावनाओं को.

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बच्चे हमें सच्ची ख़ुशी देते हैं
दरअसल, हम ये सोचते हैं कि हम बच्चों को ख़ुशी देते हैं, सुख-सुविधाएं देते हैं, लेकिन सही मायने में वो हमें ख़ुशी देते हैं, उनके बिना हम अपनी ज़िंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकते.
बच्चे हमें जीना भी सिखाते हैं और जीने की वजह भी देते हैं. हमारी दुनिया उनकी ख़ुशियों की परिधि में सिमट जाती है और यह सिमटना सकारात्मक होता है. हमें यह कभी नहीं लगता कि क्यों हमें अपने करियर या पर्सनल लाइफ से समझौता करना पड़ रहा है, क्योंकि हमारी प्राथमिकता हमारे बच्चे ही होते हैं.

पैरेंट्स और बच्चों का रिश्ता सबसे अनोखा और प्यारा होता है
मेरी मां भी मुझे लेकर कितना कुछ सोचती थीं, उनका साथ ही था, जिसने मुझे आगे बढ़ाया. आज मैं समझ सकती हूं कि वो भी मुझे लेकर, मेरे करियर, मेरी पर्सनल लाइफ को लेकर इतना क्यों सोचती थीं, क्योंकि उनको मेरी फ़िक्र थी. उनका प्यार ही था, जो कभी डिसिप्लिन, तो कभी हल्की-सी डांट-फटकार के रूप में भी सामने आता था.
पैरेंट्स और बच्चों का रिश्ता सच में सबसे अनोखा और सबसे प्यारा होता है, क्योंकि इसमें स्वार्थ नहीं होता.

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आज मेरी दोनों बेटियां (ईशा और आहना) मां बन गई हैं और वो भी मातृत्व के उसी एहसास को जी रही हैं, जिसे मैंने, मेरी मां ने, उनकी मां ने…. और दुनिया की हर मां ने जीया है. ईश्वर दुनिया की हर औरत को ये सुख दे.

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Kamla Badoni

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