Geet / Gazal

काव्य- मैं और वो… (Kavay- Main Aur Woh…)

मैं लंबा हो रहा था वो ठिगनी ही रह गई मैं ज़हीन बन रहा था वो झल्ली ही रह गई…

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष पद्य- बिगड़ता पर्यावरण (Poetry- Bigadta Paryavaran)

सर्व प्रदूषण दूर हो, खुल कर लेवें सांस। स्वच्छ जगत फिर से बने, रहे न मन में फांस।। जहां कहीं…

कविता- लड़कियां ढूंढ़ती हैं प्यार… (Poetry- Ladkiyan Dhoondhati Hain Pyar…)

वो तुम्हारी आंखों में खोजती हैं पिता तुम्हारी हथेलियों में भाई तुम्हारे कांधे पे सखा जिनके सामने सीने में जमा…

नज़्म- युग धर्म.. पतझड़.. संघर्ष… (Nazm- Yug Dharm.. Patjhad.. Sangharsh…)

युग धर्म जब वंचना मुखर हो, युग धर्म निभाएं कैसे लगता नही है मुमकिन, सुख चैन पाएं कैसे जब हर…

काव्य: सहमी हुई ज़िंदगी को सिमटी हुई चादरों से ओढ़ देना चाहता हूं… (Poetry: Sahami Hui Zindagi Ko Simati Hui Chadaron Mein Odh Dena Chahta Hoon…)

सहमी हुई तेरी ज़िंदगी को मैं सिमटी हुई चादरों से ओढ़ देना चाहता हूं,  लम्हे के इस सहरा को कुछ वक्त के लिए कहीं और मोड़ देना चाहता हूं… तुझे लगता है कि तू उड़ने लायक भी नहीं, पर तेरी ऊंची उड़ान के लिए मैं अपने पंखों की ताकत को जोड़ देना चाहता हूं… महान है वो मां जिसने तुम जैसी लाड़ली को जन्म दिया, कुछ बखान तेरा करने से पहले अपने दोनों हाथ उसकी वंदना में जोड़ देना चाहता हूं… शख्सियत तेरी ऐसी जैसे कान्हा को मीरा ने अंखियन में बसा लिया, तुम वो अमृत का प्याला हो जिसे शिव ने अपने कंठ लगा लिया… प्यार और विश्वास शबरी के उन मीठे बेरों की तरह है तुम्हारा, जिसने राम को अपनी भोली सूरत से अपना बना लिया… सुबह के सूरज से निकलती वो सुनहरी किरणें, पानी में खिलते कमल सी ताजगी सी हो तुम……

काव्य: तुम्हारे शहर की अजब कहानी… (Poetry: Tumhare Shahar Ki Ajab Kahani…)

तुम्हारे शहर की अजब कहानी है… काग़ज़ों की कश्ती है, बारिशों का पानी है… मिलते तो हैं लोग मुस्कुराकर यहां,…

ग़ज़ल- हमारे हिस्से का छोटा सा आकाश… (Gazal- Hamare Hisse Ka Chota Sa Aakash…)

असल वजह यही है थोड़े कुछ में ही बहुत कुछ ढूंढ़ने की कोशिश करना और बहुत कुछ में थोड़े कुछ…

कविता- तुम याद आते हो (Poetry- Tum Yaad Aate Ho)

मेरी आंखों में आंसू हैं क्या कहूं तुम याद आते हो तुम मेरे साथ हो कि नहीं हो बात यह…

काव्य- अपने-अपने क्षितिज… (Kavay- Apne-Apne Kshitij…)

तुमने मुझे लिखा मैंने तुमको आपस में कविताएं बदलकर भी हम स्वयं को पढ़ सकते हैं अधूरे तुम भी रहे…

ग़ज़ल- तेरी बेवफ़ाई… (Gazal- Teri Bewafai…)

ख़ुशी मुझसे लेकर, ग़म मुझको दे जाइनायत के बदले सितम मुझको दे जा तेरी बेवफ़ाई से गिला कुछ नहीं मगर…

काव्य: वो बूढ़ी मां… (Poetry: Wo Boodhi Maa)

वो बूढ़ी मां अब काम की नहीं लगती जो तुमको गरम-गरम रोटियन घी भर-भर के खिलाती थी… अब वो बोझ लगती हैक्योंकि उसके इलाज में पैसे खर्च होते हैं तुम्हारे...  तुम्हारे बच्चों को वो अब दादी या नानी नहीं लगती, वो उसे बुढ़िया या बुड्ढी कहने लगे हैं क्योंकि उसकी याददाश्त अबउ सका साथ नहीं देती.. वो अब इरिटेटिंग लगती है… जो कभी उनको बड़े प्यार से कहानियां सुनाया करती थी…  वो बूढ़ी मां अब ग़ुस्सा दिलाती है तुम्हें, जो घंटों दरवाज़े पर बैठ तुम्हारे लौटंने का इंतज़ार करती थी, जिसको यही चिंता सताती थी कि मेरे बेटे ने, मेरी बेटी ने कुछ खाया है या नहीं… जो तुम्हें खाना खिलाने के बाद ही हलक से निवाला निगल पाती थी… अब वो तुम्हारे बच्चों की पढ़ाई में एक डिस्टर्बिंग एलीमेंट हो गई है…  उस बूढ़ी मां के लिए अब तुम्हारे लिए वक़्त नहीं, जो तुम्हारी हल्की सी छींक और खांसी पर तुम्हें गोद में लेकर डॉक्टर केपास दौड़ पड़ती थी, जो तुम्हारा बुख़ार न उतरने पर न जाने कौन-कौन से मंदिरों कौन-कौन सी मज़ारों के चक्कर लगाकर मन्नतें मांगा करती थी  उसके लिए तुम्हारे बड़े से महलनुमा घर में एक छोटा-सा कमरा तक नहीं है ख़ाली, जो कभी तुम्हें एक छोटे-से कमरे में हीमहलों का एहसास कराती थी…  वो बूढ़ी मां अब तुमको मां ही नहीं लगती है, जिसका आंचल पकड़कर तुम ख़ुद को हमेशा महफ़ूज़ समझते थे, जिसकीगोद तुमको जन्नत का एहसास कराती थी, अब उसका शरीर कमज़ोर पड़ चुका है, अब तुमको उसके बुढ़ापे की लाठी बननेकी ज़रूरत है लेकिन तुम अब बस हर पल उसके मरने का ही इंतज़ार करते हो… क्योंकि अब उसके पास तुम्हारे नाम करनेको कोई प्रॉपर्टी नहीं…  और जब तुम देखते हो कि उसे मौत भी नहीं आ रही, वो अब बीमारी से है घिरती जा रही, तब तुम उसको ओल्ड एज होम मेंले जाकर छोड़ देते हो और उसकी आंखें बस तुम्हारा इंतज़ार करते-करते वहीं बंद हो जाती है…  गीता शर्मा  डाउनलोड करें हमारा मोबाइल एप्लीकेशन https://merisaheli1.page.link/pb5Z और रु. 999 में हमारेसब्सक्रिप्शन प्लान का लाभ उठाएं व पाएं रु. 2600 का फ्री गिफ्ट.

विश्व कविता दिवस पर विशेष: कविता- मैं अपने हर अनकहे चुप के, नये आकार लिखती हूं… (World Poetry Day: Kavita- Main Apne Har Ankahe Chup Ke, Naye Aakar Likhti Hun…)

कभी तेरा-कभी मेरा, मैं दिल का हाल लिखती हूं कहूं कैसे कि बहाने से, मैं मन बेहाल लिखती हूं गढ़ती…

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