Short Stories

कहानी- धूप और परछाई (Short Story- Dhoop Aur Parchayee)

मैं समझ ना सकी कि मैंने तुमसे ही थोड़ी धूप चुराकर जीना सीखा. अब मैं हालात का सामना कर सकती हूं, किसी से भी बात कर सकती हूं, तो वो स़िर्फ तुम्हारी वजह से. ये परछाई हल्की-हल्की धूप बनी तुम्हारी वजह से. तुम आए ही नहीं मुझसे मिलने. मैंने तो तुम्हारे हिस्से की धूप अब तक अपने मन में बचाए रखी है. कब तक मैं इस उधार की धूप पर जीती रहूंगी?

बेंगलुरू, अपनी अलग पहचान बनाने के सफ़र की शुरुआत इसी अनजान शहर से की थी मैंने. आज फिर क़िस्मत मुझे वापस यहां ले आई है. अजीब बात है, छह साल पहले ये शहर जितना अनजान लगता था, उतना ही आज भी अनजान है, क्योंकि इस शहर की पहचान मेरे लिए तुम ही तो थे. अब जब तुम ही साथ नहीं, तो ये शहर भी अपना नही लगता.
बिल्कुल पढ़ाकू थी मैं पहले. एकदम चुपचाप-सी रहने वाली, चश्मे पहनने वाली किताबी कीड़ा. ना मोहल्ले में कोई दोस्त था, ना ही स्कूल में. हर जगह एक कोने में दुबककर बैठ जाती थी. बात करने से बहुत डर लगता था. इसलिए किताबों को ही अपना दोस्त बना लिया. उनसे बात नहीं करनी पड़ती न! ज़ाहिर है पढ़ाई में भी अव्वल थी. इंजीनियर बनना चाहती थी. मां-पापा को भी मेरे इस सपने से कोई ऐतराज़ नहीं था. उन्हें कभी मेरी किसी बात पर ऐतराज़ रहा ही नहीं. एक सुंदर बुलबुले जैसी थी मेरी और मेरे किताबों की ये दुनिया. पर जिस दिन मेरा एडमिशन बेंगलुरू के बड़े आईआईटी कॉलेज में हुआ, उस दिन ख़ुशी तो हुई थी, पर मेरी ये बुलबुले की दुनिया कुछ टूटती सी दिखाई दे रही थी. मां-पापा ने एडमिशन के लिए ट्राई करने को तो हां कर दी थी, पर ये नहीं सोचा था कि एडमिशन के बाद सब कैसे होगा. घर की लड़कियां हॉस्टल जाकर नहीं प़ढ़तीं. अकेली रह लेगी? खाएगी क्या? अनजान से बात कैसे करेगी? मां-पापा के इतने सारे सवालों के बाद एक आख़िरी सवाल आया-“तू सच में ये करना चाहती है?”
“सच कहूं, तो मुझे भी नहीं पता था कि मैं कैसे रहूंगी? क्या करूंगी? पर इतना ज़रूर पता था कि यही वो एक चीज़ है, जो मैं सच में करना चाहती थी.”
ये भी पता था कि अब ज़िंदगी जितनी आसान है, उतनी वहां जाकर नहीं होगी. वहां गोभी की सब्ज़ी बनने पर मेरे नाक सिकुड़ने के डर से मां की तरह कोई दूसरी सब्ज़ी नहीं बनाएगा. एग़्जाम शुरू होने के जस्ट पहले एडमिट कार्ड न होने पर पापा की तरह दौड़ता हुआ कोई मुझे लेने नहीं जाएगा. मैं तो लोगों से बात तक नहीं कर सकती.

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इतनी दूर अनजान लोगों के साथ कैसे रहूंगी? पर अगर कॉलेज नहीं गई, तो ज़िंदगीभर यही सोचती रह जाऊंगी कि काश हिम्मत करके चली गई होती. मुझे इस काश में नहीं जीना था. मुझे इतने दिन उलझन में देखकर पापा ने मेरे आगे
अचानक एक लिफ़ाफ़ा रख दिया. उसे खोल के देखा, तो उसमे बेंगलुरू जाने की टिकट थी.
उस लिफ़ा़फे को देखकर मेरे होंठों पर मुस्कान आ गई और आंखों में नमी.
पापा ने कुछ कहा नहीं, पर मां बोलीं, “अचार व मठरी बांध दी है मैंने. तू भी पैकिंग शुरू कर दे.”
मुझे स्टेशन छोड़ने मां-पापा दोनों आए थे.
“बेटा, ट्रेन में कोई कुछ दे, तो खाना मत. किसी से बात मत करना और कोई सीट बदलने को कहे, तो साफ़ मना कर देना.”
मां हिदायतें दिए जा रही थीं और पापा चुपचाप सारा सामान बर्थ के नीचे सेट किए जा रहे थे.
“देख, हॉस्टल जाकर टाइम पर खाना खाना. सोच-समझकर दोस्त बनाना और पूरा ध्यान पढ़ाई पर देना. झूठ बोलने वाले, देर रात तक घूमने वाले, पार्टी करने वाले स्टूडेंट्स से दूर ही रहना.”
मां की हिदायतों की लिस्ट ख़त्म ही नहीं हो रही थी. पापा पानी की बोतल वाली स्टॉल पर अकेले खड़े थे. जब ट्रेन चलने लगी, तब वो आए और अपनी नम हो चुकी आंखोें से मुझे देख सिर पर हाथ रखा और बोले, “मेरी बेटी का ध्यान रखना और मेरी बेटी के सपनों का भी.” फिर मेरे होंठों पर मुस्कान थी और आंखों में ढेर सारी नमी. घर से दूर जाने का ग़म भी था और सपनों के क़रीब होने का एहसास भी.
सुबह को ट्रेन स्टेशन पर लेट पहुंची, जिसकी वजह से मैं भी कॉलेज के लिए लेट हो रही थी. मैं जल्दी में जैसे-तैसे अपना सामान उठाए प्रिंसिपल की केबिन की तरफ़ जा रही थी कि तुम मुझसे टकराए और मेरा सारा सामान ज़मीन पर फैल गया. पर तुम सॉरी कहते हुए आगे चले गए. “अरे न देखा, न मदद की. बस सॉरी कहते रवाना.” ग़ुस्से में तमतमाते हुए मैंने कहा.
“सॉरी नहीं, थैंक यू, थैंक यू कहना चाहिए आपको इस सॉरी वर्ड को. मतलब लाइफ इतनी सिंपल तो टेक्नोलॉजी से भी नहीं हुई है, जितनी इस सॉरी वर्ड से. धक्का मारो, सॉरी बोलो और आगे चलो बस, लाइफ इज़ सो सिंपल.”
मैं गुस्से में थी और तुम सिर झुकाए. मैं तुम्हें डांटें जा रही थी और तुम ज़मीन पर फैला मेरा सामान उठाए जा रहे थे. ये मेरी लाइफ का पहला रोमांटिक सीन था. मैं तुम्हें डांट रही थी और तुम चुपचाप मुझे सुन रहे थे. फिर तुमने एक स्माइल के साथ कुछ ऐसा कहा, जिससे मेरा सारा ग़ुस्सा चला गया. तुमने कहा, “सॉरी.” न जाने इस सॉरी में ऐसा क्या था, जिससे मेरा ग़ुस्सा ही पिघल गया.


ग़ुस्सा तो पिघल गया था, पर मेरे हाथ-पैर जम गए थे, ये सोचकर कि मैंने किसी को डांटा और मुझे बिल्कुल डर नहीं लगा. इससे मेरा कॉन्फिडेंस काफ़ी बढ़ गया. इस कॉन्फ़िडेंस से जब मैं आगे बड़ी, तो मेरा हॉस्टल का कमरा, मेरी रूममेट, नीता सब देख अच्छा फील हुआ. फिर नए कॉलेज में मेरा पहला लेक्चर. इतनी नर्वस हो रही थी कि मैं पानी पीती जा रही थी और बोतल का पानी ख़त्म होता जा रहा था. रिलैक्स होने के लिए मैंने टहलना शुरू किया. टहलते-टहलते मेरी पानी की बोेतल किसी पर गिर गई. मैंने आंखें बंद कर लीं. जब सॉरी कहा, तो सामने से आवाज़ आई, “सॉरी नहीं थैंक यू. आपने ही कहा था न?”
“ओह! ये क्या हो गया? एक तो पहले ही नर्वस थी, ऊपर से तुम मिल गए.” तुमने मुस्कुराते हुए कहा, “हाय! आई एम आकाश और तुम?”
मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा, “मैं, ऋतु.”
“यहां की नहीं लगती?”
तुम्हारे इस सवाल का जवाब भी मैंने सवाल से ही दिया, “तुम्हें कैसे पता?”
“साफ़ पता चल रहा है. इतना सामान लेकर आई हो. इतनी नर्वस हो.”
तो मैंने कहा, “हां, वो पहली बार घर से दूर, अकेले रह रही हूं तो… तुम तो यहीं के लग रहे हो, इसलिए नर्वस नहीं हो.”
“नर्वस? मैं तो एक्साइटेड हूं फ्रेशर्स पार्टी के लिए.”
“क्या पार्टी?” मैं हैरान हो गई.
जनाब का पहला दिन है कॉलेज में और इन्हें पार्टी की पड़ी है.
कैंटीन में नीता बोली, “हर कॉलेज में होती है फ्रेशर्स पार्टी. ऐसा क्या हो गया यार, आ जा.”
मैं तो पार्टी के नाम से ही घबरा गई. मैंने ठान लिया था, मैं किसी पार्टी में नहीं जा रही. नीता के बहुत प्लीज़ करने पर भी मैंने मना कर दिया. पर फिर तुम आए और कहने लगे, “तुम मेरी इस कॉलेज में पहली दोस्त हो. तुम नहीं आओगी, तो मैं भी नहीं जाऊंगा. और मुझे जाना है, तो प्लीज़ आ जाओ.”
पहले तुम्हारे सॉरी ने मेरा ग़ुस्सा पिघला दिया था. अब तुम्हारे प्लीज़ ने मुझे मना लिया. पार्टी में बहुत मज़ा आया. बहुत डांस किया, बातें कीं, मस्ती की. फिर हम रोज़ मिलने लगे. कभी क्लास में, कभी कैंटीन में, हम हमेशा साथ ही होते. तुम्हें
फुटबॉल बहुत पसंद था, मेसी की इतनी पुरानी और दाग़ लगी हुई टी-शर्ट भी संभाल के रखते. जब हमारे दोस्त बंटी को प्यार हुआ था, तो तुमने उसकी कितनी टांग खींची थी. तुम कहते, “प्यार-व्यार जैसी कोई चीज़ नहीं होती.” और मैं शायद प्यार में यक़ीन करने लगी थी. मैं सोचती थी कि मुझे बात करना नहीं आता और तुम कहते कि मैं बहुत बातें करती हूं. मुझे लगता था कि मुझे स़िर्फ किताबें पसंद हैं, पर तुम कहते मुझे अक्षय कुमार पसंद है. उसकी हर फिल्म का डॉयलाग मुझे याद रहता. तुम रोज़ मुझे मुझसे मिलाते और मैं रोज़ अपने आपसे मिल हैरान होती.
एक दिन अक्षय कुमार की नई फिल्म लगी थी. टिकट्स भी थीं, पर उसी वक़्त एक्स्ट्रा क्लास लग गई. उस दिन पहली बार क्लास बंक करके दोस्तों के साथ पिक्चर देखने गई. कॉलेज के दिनों में बहुत मस्ती की. जितनी फिल्में देखीं, उतने ही नोट्स भी बनाए. जब भी मैं अपने मां-पापा की बात करती, तो तुम्हें सुनना बहुत अच्छा लगता. पर तुम कभी अपने पैरेंट्स के बारे में नहीं बताते.
एक दिन मेरे बहुत ज़िद करने पर तुमने बस इतना ही बताया, “उनसे ज़्यादा मिलना नहीं हुआ इस बार. तो ज़्यादा बातें भी नहीं हैं. अच्छा है नहीं मिलते एक-दूसरे से, क्योंकि जब भी मिलते हैं वर्ल्ड वार शुरू हो जाता है.” ये कहते हुए तुम हंस तो रहे थे, पर पहली बार उदासी देखी तुम्हारी आंखों में. उसके बाद न मैंने कभी इस बारे में बात की, न तुमने.
पढ़ाई और मस्ती के बीच पता ही नहीं चला कब ग्रेजुएशन ख़त्म हुई और कब मैं इतनी बदल गई. अब मैं इंडिपेंडेंट थी, बातें करती थी और खुल के हंसने लगी थी. कॉलेज के आख़िरी दिन फेयरवेल पार्टी में सब एंजॉय कर रहे थे, पर तुम उदास थे. तुमने कहा, “मुझे तुमसे कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है.”
तो मैंने कहा, “अब कौन से नोट्स चाहिए तुम्हें मुझसे? अब तो कॉलेज ख़त्म हो गया.”
तुम मुस्कुराए और मेर दोनों हथेलियों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, “वही तो, कॉलेज ख़त्म हो गया. अब हम कभी मिलें या न मिलें पता नहीं. मैं तुमसे… कुछ नहीं.”
कहते हुए तुम वहां से बस चले गए, मुझे उन अधूरे लफ़्ज़ों के साथ छोड़कर. उन अधूरे लफ़्ज़ों को पूरा करते-करते मेरी सारी रात बीत गई. पर न वो लफ़्ज़ पूरे हो सके न नींद. अगली सुबह बड़ी हड़बड़ी में उठी.
नींद भी पूरी नहीं हुई थी और स्टेशन के लिए लेट भी हो रही थी. अब छुट्टियों के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए घर जा रही थी. स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार करते-करते मोबाइल में तुम्हारा मैसेज देखा- ‘स्टेशन पर मिलते हैं. बात करनी है. वेट करना.’
मेरी दिल की धड़कनें सुपरफास्ट ट्रेन की तरह दौड़ने लगीं. एक मिनट में हज़ारों ख़्याल दिमाग़ में आने लगे. हर ख़्याल के साथ मेरे होंठों पे मुस्कुराहट और बढ़ती जाती.
मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया. बहुत इंतज़ार किया. पर तुम नहीं आए. ट्रेन चलने लगी, पर मेरी आंखें अब भी प्लेटफॉर्म पर रुकी हुई थीं. मैं अपनी सीट पर बैठे स्टेशन को पीछे छूटते हुए देखने लगी. जैसे अपने बीते हुए कल को पीछे छूटते हुए देख रही थी. तुम वहां आए ही नहीं, पर ऐसा लग रहा था कि मैंने बेंगलुरू नहीं, बेंगलुरू ने मुझे छोड़ दिया. शायद तुम हमारा साथ यहीं तक चाहते थे. तो अब बेंगलुरू वापस मुझे क्यों बुलाकर लाया है यहां? मुझे छेड़ने के लिए? उफ़्फ़! मैं भी कितना सोचती हूं. अब तो बुरा भी नहीं लगता, ख़ुद पर हंसी आती है.
हंसी आती है अपने आप पर. ऐसा भी क्या कह देते तुम आकर? कुछ भी तो नहीं. पागल तो थे तुम. अच्छा हुआ पीछा छूटा.
मां सही कहती थीं. क्लास बंक करने वाले, पार्टी करने वाले से बिल्कुल दोस्ती नहीं करनी चाहिए. मुझे पहले मां की ये बात याद क्यों नहीं आई? न तुमसे दोस्ती होती न ये उलझन, पर तुम उलझनों में बंधने वालों में से नहीं थे. तुम्हें तो कोई बांध ही नहीं सकता. न पढ़ाई, न कॉलेज, न मैं.

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तुम धूप की तरह थे. सामने जो आ जाए, चाहे वो रेत हो या समंदर. धूप की तरह बांहें फैलाए हर जगह छा जाते थे और मैं परछाई की तरह किसी कोने में छुपती रहती. कैसा रिश्ता था हमारा धूप और परछाई सा. आज मैं कोनों में नहीं छुपती, आगे आकर हालात का सामना करती हूं. मैं तुम्हारे बिना भी रह सकती हूं.   
मैं तुम्हें भूलना चाहती हूूं. तुम भी तो भूल गए मुझे. इतने सालों में तुमने एक कॉल तक नहीं किया. कोई ख़बर नहीं ली. तो मैं भी तुम्हें क्यों याद करूं? इतना ग़ुस्सा आया मुझे कि मैंने अपना नंबर ही बदल दिया, ताकि मेरा कोई बेवकूफ़ दोस्त मुझे कॉल ही न कर सके. पर मैं समझ ना सकी कि मैंने तुमसे ही थोड़ी धूप चुराकर जीना सीखा. अब मैं हालात का सामना कर सकती हूं, किसी से भी बात कर सकती हूं, तो वो स़िर्फ तुम्हारी वजह से. ये परछाई हल्की-हल्की धूप बनी तुम्हारी वजह से. तुम आए ही नहीं मुझसे मिलने. मैंने तो तुम्हारे हिस्से की धूप अब तक अपने मन में बचाए रखी है. कब तक मैं इस उधार की धूप पर जीती रहूंगी? कब तक तुम्हें याद कर करके डायरी लिखती रहूंगी. मैं ये सब लिखना बंद क्यों नहीं कर देती. अब डायरी में कुछ और नहीं. अब तुम्हारा इंतज़ार और नहीं…
ये लिखते हुए ऋतु ने ज़ोर से अपनी डायरी बंद की और अपनी डेस्क से उठकर सोने चली गई. पर आंखों में रातभर चमक रही यादों की धूप ने उसे सोने नहीं दिया.
अगली सुबह वो ऑफिस के लिए जल्दी रवाना हो गई. नए ऑफिस में भी सब वैसा ही था जैसा ऑफिस में होता है. उसे उसकी डेस्क दिखाई गई, काम समझाया गया, सब कलीग्स उससे मिले. सब कलीग्स अपने हेड के बारे में बातें सुना कर उसे डराने लगे. शर्मा जी बोले, “वेरी स्ट्रिक्ट! अरे छोटी सी ग़लती पर भी इतना डांटते हैं कि क्या बताएं.”
मिस नीना बोलीं, “पहले दिन ही रिपोर्ट करना पड़ता है उसको. अभी तुमको भी बुलाएंगे और पक्का कल जो सॉफ्टवेयर में एरर आ रहा था, उसे ठीक करने का काम तुम्हें दे देंगे.”
तभी पीउन वहां आया और बोला, “मिस ऋतु कुलकर्णी, आपको सर रामकृष्णन केबिन में बुला रहे हैं.”
शर्मा जी बोले, “लो बुलावा आ गया!”
वो बहुत नर्वस हो रही थी. उसे अपने कॉलेज का पहला दिन याद आ गया. उस दिन भी वो उतनी ही नर्वस थी. वो सोचने लगी काश आज फिर उस दिन की तरह उसे आकाश मिल जाए और वो उसे बहुत डांटे. उसका कॉन्फिडेंस बहुत बढ़ता था उसे डांटने से. नहीं! वो क्या कर रही थी? फिर से आकाश को याद करने लगी वो. पर ऋतु को तो उसे भूलना था.
ऋतु ने केबिन का दरवाज़ा खटखटाया तो, “प्लीज कम इन!” की आवाज़ पर वो अंदर गई. वो बहुत डरी हुई थी. चुपचाप नज़रें नीचे करके खड़ी हो गई. तभी सर रामकृष्णन बोले, “सिट!”
ऋतु की आंखें नीचे ही थीं, सो जल्दी-जल्दी में साइड टेबल से टकरा गई और वहां पड़ी सारी फाइल्स गिर गईं.
ऋतु ने “सॉरी…” कहते हुए फाइल्स उठाना शुरू किया, तो सामने से आवाज़ आई, “सॉरी नहीं, थैंक यू, थैंक यू… कहना चाहिए आपको इस सॉरी वर्ड को. मतलब लाइफ इतनी सिंपल तो टेक्नोलॉजी से भी नहीं हुई है, जितनी इस सॉरी वर्ड से. धक्का मारो, सॉरी बोलो और आगे बढ़ जाओ. बस, लाइफ इज़ सो सिंपल.”
ऋतु हक्की-बक्की होकर उसे देखने लगी और बोली, “तुम आकाश हो या रामकृष्णन?”
आकाश ने मुस्कुराते हुए कहा, “दोनों, मेरा नाम आकाश रामकृष्णन है. अगर तुम्हें याद हो तो.”
“तुम यहां हो. इतना वक़्त तुम्हारा इंतज़ार करने के बाद तुम मुझे मेरे ही ऑफिस में मिले.”
ऋतु के इस बयान पर चौंकते हुए आकाश ने कहा, “तुम सच में मेरा इंतज़ार कर रही थी!”
ऋतु का मन कर रहा था कि अब तक जो भी उसने अपनी डायरी में लिखा था, वो सब उसे बता दे, पर वो तो कुछ बोल ही नहीं पा रही थी. आकाश ने ही बात शुरू की. उसने बताया कि जिस दिन वे स्टेशन पर मिलने वाले थे, उसी दिन उसे पता चला कि उसके पैरेंट्स डिवोर्स ले रहे हैं. उसे पता था ये ख़बर मिलनी थी उसे एक दिन, पर ये नहीं पता था कि ये इतना उदास कर जाएगी उसे. उस दिन वो कहीं जा ही नहीं सका. वो तो प्यार में यक़ीन ही नहीं करता. फिर क्यों इतना वक़्त बीतने के बाद भी वो ऋतु के बारे में सोचता रहता? उसने बहुत कोशिश की वो ऋतु को भूल जाए, पर वो ये नहीं कर पाया.
उसे एक बार ऋतु से वो बात पूरी करनी थी, जो कॉलेज के आख़िरी दिन अधूरी रह गई थी. जब बात करनी चाही, तो पता चला ऋतु ने अपना फोन नंबर ही बदल दिया. अब इतने साल बाद आज मौक़ा मिला उसे अपनी बात कहने का. आकाश लगभग रोते हुए बोला, “तुम्हारे बिना मैं बिल्कुल तुम्हारे जैसा हो गया हूं. सीरियसली, हमेशा काम में डूबा हुआ. तुम मेरी ज़िंदगी में वापस आ जाओ, ताकि मैं वापस अपने जैसा हो सकूं. मुझे नहीं पता हम कब तक साथ रह पाएंगे, पर मुझे तुम्हारे साथ रहना है, हमेशा…”
एक बार फिर ऋतु  के होंठों पर मुस्कान थी और आंखों में नमी.

चैताली थानवी

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Usha Gupta

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