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कहानी- शादी आजकल… (Short Story- Shadi Aajkal…)

दीप्ति मित्तल

“एक बात मुझे समझ आ गई है. भले ही रिश्ते दिल से बनते हों, मगर निभते दिमाग़ से ही हैं. रिश्ते को चलाने के लिए हमें दिल का नहीं, अपनी इंटेलेक्ट का इस्तेमाल करना पड़ता है. अगर एक बार यह तय कर लो कि रिश्ता निभाना है, तो फिर वह सूझ-बूझ से निभाया जा सकता है. कुछ समझौते करने होते हैं, मगर ज़िंदगीभर का साथ तो मिलता है.”

आज सुबह-सुबह, 30 साल के गुड लुकिंग, हैंडसम आईटी इंजीनियर प्रशांत शुक्ला के घर में वही इमोशनल ब्लैकमेलिंग का सीन चल रहा था,  जो उसकी उम्र के बैचलर, वेल टू डू लड़कों के घर में अक्सर चलता है. ख़ासकर तब, जब घरवालों को लड़के के लिए कोई सूटेबल मैच नज़र आ जाए और लड़का उसकी तरफ़ देखने को भी तैयार ना हो. फिर साम, दाम, दंड, भेद, हर नीति अपना कर मां-बाप के द्वारा उसे घेरने की तैयारी की जाती है.
प्रशांत की मेज़ पर कल से एक ख़ूबसूरत लड़की की मैट्रिमोनियल फोटो पड़ी हुई थी, उसकी एक नज़र के इंतज़ार में, नाम था शुभांगी जोशी. उसी आईटी पार्क की एक कंपनी में एचआर मैनेजर थी, जहां पर प्रशांत की कंपनी थी. फोटो पर उड़ती सी नज़र पड़ी, तो प्रशांत को वो चेहरा जाना-पहचाना लगा.
शायद कभी किसी कैफे में, चाय की टपरी पर या फिर राह चलते देखा होगा उसे. खिला-खिला सा हंसमुख चेहरा था, जिस पर स्ट्रेट सिल्की शोल्डर कट बाल झूल रहे थे. कुछ देर प्रशांत की नज़रें उस फोटो पर ठहरी रहीं, लेकिन फिर पलट गईं.


कल ही उसके बहुत अच्छे हमउम्र दोस्त का डायवोर्स केस फाइल हुआ था. उस ख़बर की कड़वाहट अब तक महसूस कर रहा था वो. पिछले साल ही तो उसकी शादी में जमकर नाचा था. दोनों मेड फॉर ईच अदर लगते थे. मगर सालभर के अंदर ही प्यार का सारा बुखार उतर गया था और म्यान से तलवारें बाहर आ गई थी. तब से तो प्रशांत को शादी का मतलब सीधा सुसाइड नज़र आने लगा था और उसका अभी सुसाइड का कोई इरादा नहीं था.
प्रशांत की मां रजनी कल सुबह से ही उस पर भड़की हुई थी, क्योंकि वह उसके लाए हर रिश्ते को नज़रअंदाज़ कर रहा था. रजनी ने पूरा दिन अबोला रखा. रात को खाना भी नहीं खाया, मगर प्रशांत अपनी भीष्म प्रतिज्ञा से टस से मस ना हुआ, “अभी मुझे कम से कम तीन साल शादी नहीं करनी. उसके बाद जहां बोलोगी कर लूंगा.” यह प्रतिज्ञा प्रशांत की मां तब से सुन रही थी जब वह 25 साल का था और उसे एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करते हुए तीन साल हो गए थे.

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फिर वह चार साल के लिए यूएस चला गया. उसके आते ही रजनी और प्रशांत के पिता पवन शुक्ला चाहते थे कि 30 लगने से पहले प्रशांत की शादी हो जाए, क्योंकि 30 के बाद लड़कीवालों को, लड़के की उम्र बताते हुए कुछ अच्छा नहीं लगता और उधर से भी पहला
डाउटफुल सवाल यही आता है, “इतनी उम्र हो गई. अभी तक क्यों नहीं हुई लड़के की शादी. क्या, कोई कमी है उसमें?”
तीन साल तक शादी न करने की भीष्म प्रतिज्ञा लिए हुए प्रशांत को पूरे पांच साल हो चुके थे, लेकिन वे तीन साल थे, जिनमें अभी तक एक दिन भी नहीं घटा था. यह कौन सा गणित था, रजनी को कभी समझ नहीं आया. मगर अब अपने होनहार बेटे से बहस करने की शक्ति उसमें नहीं बची थी. इसलिए आज सुबह उसने वही हथियार चलाया, जिसे चलाने में वह निपुण थी और जिसकी धार से उसने पूरे घर को अपने कंट्रोल में रखा हुआ था. उसके आंसुओं की धार…
आंखें सूज कर लाल हो चली थीं. ज़ुबान बिना रुके ऐसे बुदबुदाए जा रही थी जैसे कोई अखंड पाठ चल रहा हो.
“पहले दर्द सह-सह कर इन्हें पैदा करो. फिर पूरी जवानी इन्हें पालने में लगा दो. फिर अपनी सारी जमा-पूंजी इन्हें सेटल करने में स्वाहा कर दो और जब बुढ़ापे में अपने सुख के लिए कुछ मांगो, तो फिर ये ‘माय लाइफ माय चॉइस’ का अलापने लगते हैं. अरे, आज घर में शादी होगी, बहू आएगी तो हमें भी कुछ सुख मिलेगा. हमारे भी अरमान पूरे होंगे, नाते रिश्तेदारों से नेग-शगुन के लेन-देन निपटेंगे. हमारे जाने के बाद ब्याह करेगा, तो हमें क्या सुख मिलेगा.
फिर यह भी तो सोच, अगर आज हमें कुछ हो गया, तो कौन बचेगा तेरे लिए. परिवार में हमारे  बाद कोई तो होना चाहिए, जिसे अपना कह सके. जो तेरा ध्यान रख सके. मगर नहीं, मां-बाप जो कहेंगे, उससे उल्टा ही करना है. पता नहीं शादी को लेकर किस बात से डरता है…”
रजनीजी की बड़बड़ जारी थी. इसी बीच उनकी बेटी शालिनी का इंदौर से फोन आ गया. शालिनी प्रशांत से दो साल बड़ी थी यानी 32 की. उसकी एक चार साल की बेटी थी. ससुरालवाले ज़ोर दे रहे थे एक और बच्चा करने के लिए, जिस कारण उसके घर में काफ़ी तनाव चल रहा था और वह अपने मन की भड़ास कैब से ऑफिस जाते हुए रोज़ मां को फोन कर निकाला करती थी.
“मां बस बहुत हुआ. अब मैं उस घर में ज़्यादा नहीं टिक पाऊंगी. दिनभर ऑफिस में बॉस की खिटपिट सुनो और घर पर सास की! एक बच्चे को ही पालना मुश्किल हो रहा है. दूसरे के बारे में कहां से टाइम निकालें? और जब भी अपनी मजबूरी बताओ, तो यही सुनने को मिलता है हमने तो तीन-तीन को पैदा किया है और उन्हें अच्छे से संभाला भी है. अरे, आप ही बताओ उनके टाइम में क्या औरतें बाहर के काम संभालती थीं? जॉब करती थीं? ऐसी स्ट्रेसफुल लाइफ जीती थीं? यहां ख़ुुद को नहीं संभाल पा रहे, एक और बच्चे को कैसे संभालेंगे? बहुत हुआ मां! अब मैं ज़्यादा दिन यह नाटक नहीं झेलने वाली, इंडिपेंडेंट हूं, अलग होकर रह लूंगी.”
बेटी का अल्टीमेटम सुनकर रजनी घबरा गई, “ऐसा नहीं कहते बेटी. दामादजी की तो सोच. वे तो तुझे कुछ नहीं कहते.”
“यही तो प्रॉब्लम है मां! उनकी मां मुझे कुछ भी कहती रहें, वे कभी किसी को कुछ नहीं कहते. एक बार कोशिश की थी उन्होंने अपनी मां से बात करने की, जोरू के ग़ुलाम का तमगा लेकर लौटे थे उनके कमरे से. तब से उन्हें कुछ नहीं कहते, जो सुनना पड़ता है, मुझे ही सुनना पड़ता है.”

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बेटी के फोन आने का और कुछ फ़ायदा हुआ हो, या ना हुआ हो, लेकिन रजनीजी का माइंड डायवर्ट होने से उनका सुबकना और बड़बड़ाना रुक गया था.
मौ़के का फ़ायदा उठाकर प्रशांत कमरे से बाहर निकला और मां पर पलटवार किया, “देखा! एक की शादी करके अरमान नहीं निकले, जो मेरी कराने चली हो. अगर मैं आज शादी कर लूंगा, तो इस घर में भी वही कहानी दोहराई जाएगी, जो दीदी के घर में चल रही है, बस किरदार बदल जाएंगे.”
“क्या फ़ालतू की बकवास करता है?”
“इसमें फ़ालतू की क्या बकवास है मां, आपकी जेनरेशन का माइंडसेट एक ही है. बहू पढ़ी-लिखी आए, प्रोफेशनली क्वॉलिफाइड! जॉब भी करे, लेकिन ऑफिस से घर आकर किचन भी वही संभाले. बच्चे भी पैदा करे, उनकी पढ़ाई-लिखाई भी देखे और अपना करियर भी. यही दीदी की सास का माइंडसेट है और यही आपका भी है.”
“मेरा कहां ऐसा माइंडसेट है? तू एक बार बहू तो ले आ, देखना, मैं उसे कुछ नहीं कहूंगी.”
“कैसे कुछ नहीं कहोगी? जिस रिश्ते के लिए इतनी लड़ाई चल रही है घर में, वो लड़की भी दस घंटे की नौकरी कर रही है. थक-हार कर घर पर आएगी, फिर क्या उसका मन करेगा किचन में काम करने का? और मैं तो कर नहीं सकता, क्योंकि मुझे तो आपने कभी किचन में आने नहीं दिया. कभी कुछ नहीं सिखाया, ये कहकर कि रसोई के काम लड़कों के नहीं हैं. आजकल की लड़कियां, लड़कों वाले सारे काम कर रही हैं मगर लड़के, लड़कियों वाले काम नहीं सीख रहे. फिर क्या होगा घर में सिवाय क्लेश के! और फिर वो भी अपनी मां को ठीक ऐसे ही रोते रोते फोन करेगी जैसे दीदी आपको पिछले छह सालों से करती हैं.”
“देख बेटा! लड़कियों को घर तो संभालना ही पड़ता है.” रजनी तमक कर बोली.
“यह आपका सोचना है मां! आजकल लड़के और लड़कियों की सोच में फ़र्क़ नहीं रहा. जब दोनों कमाते हैं, तो फिर घर भी दोनों को ही संभालना होगा. आप पूछ रही थीं ना, किस बात से डरता है? बस इसी बात से डरता हूं कि क्या-क्या संभालूंगा शादी के बाद! ऑफिस, घर, बीवी, माता-पिता… फिर लगता है, जैसा चल रहा है वही बढ़िया है.
रोज़ अपने कलीग के घर में चल रहे इन्हीं ड्रामों के क़िस्से सुनता हूं. बात ये है कि आप जैसे सो कॉल्ड मॉडर्न पैरेंट्स ने अपनी लड़कियों को कमाना तो सिखा दिया, लेकिन अपने लड़कों को घर संभालना नहीं सिखाया. इसीलिए आज शादी में बैलेंस बिगड़ रहा है. जिस वजह से आज मुझे शादी एक डरावना सपना नज़र आ रहा है और ये स़िर्फ मेरे साथ नहीं है, आजकल सभी लड़के लड़कियों के साथ ऐसा ही हो रहा है.”
“मगर बेटा कब तक अकेले रहोगे. कंपेनियनशिप तो हर किसी को चाहिए. एक प्यार भरा साथ हो, हाथों में हाथ हो…” रजनीजी ने अपना सुर बदला.
“तो उसके लिए शादी की क्या ज़रूरत है मां! आजकल कंपेनियनशिप बिना शादी के भी मिल जाती है, डोंट वरी अबाउट दैट.” प्रशांत जुमला उछालकर वापस कमरे में चला गया. यह सुनते ही रजनीजी फिर तिलमिला उठी, “आजकल के लड़के-लड़कियां तो यही चाहते हैं कि सब कुछ ख़ुद ही देख लें और मां-पिता को दूध में से मक्खी की तरह बाहर निकाल कर रख दें. रिश्तों का तो कोई मोल ही नहीं रह गया.”

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प्रशांत वापस अपने कमरे में आया. मेज़ पर पड़ा शुभांगी का फोटो हाथ में उठाया. उस पर एक गहरी नज़र डाली और फिर मेज़ की दराज़ में डाल दिया.
वो सुबह उस दिन अतीत बन गई थी, लेकिन उस सुबह ने न जाने कितनी बार ख़ुद को दोहराया था. फिर एक दिन रजनीजी और पवन थक-हारकर चुप होकर बैठ गए और प्रशांत को उसकी क़िस्मत पर छोड़ दिया. अब प्रशांत का पूरा फोकस करियर पर था. आते-जाते कभी-कभी उसे शुभांगी जोशी दिख जाती थी. कभी आईटी हब की पार्किंग में, कभी किसी फूड कोर्ट पर… दिल में एक टीस सी उठती, मगर आजकल की शादियों का हाल देख वह ख़ामोश रह जाता.
देखते ही देखते छह साल गुज़र गए थे. इसी बीच प्रशांत के पिता का देहांत हो गया था और मां रजनी ज़्यादातर बड़ी बहन शालिनी के पास रहा करती थीं, उसके दूसरे बेबी को संभालने के लिए. प्रशांत अब अकेला रहता था. ख़ुद को और घर को संभालना सीख गया था. करियर में जहां पहुंचना चाहता था पहुंच चुका था, इसलिए वहां भी कुछ पाने को बाकी नहीं बचा था. वैसे तो बाकी सब ठीक था, लेकिन दिल के किसी कोने में एक खालीपन बसा रहता था, जो उसे सालने लगा था.
उसकी वह सोच ‘आजकल बिना शादी के भी कंपेनियनशिप मिल जाती है’ बिखर चुकी थी. पिछले छह सालों में तीन लड़कियों को डेट कर चुका था, लेकिन सब टेंपरेरी कनेक्शन निकले. परफेक्शन को ढूंढ़ते, गिव एंड टेक की समीकरण में उलझे, कच्चे रिश्ते…
प्रशांत ने ज़िंदगी में इतना तन्हा ख़ुुद को कभी महसूस नहीं किया था, जितना आजकल कर रहा था. इसलिए अपनी कार छोड़ कर ऑफिस शेयर्ड कैब से जाने लगा था, ताकि कुछ मिनट के लिए ही सही कलीग्स के अलावा कोई और ऐसा बंदा मिले, जिससे दो-चार बातें हो जाएं.
आज प्रशांत जिस कैब से ऑफिस जा रहा था, वह बीच में एक रेजिडेंशियल सोसायटी में रुकी एक पिकअप के लिए. प्रशांत की को-राइडर एक लड़की थी. प्रशांत ने उसे कुछ देर कनखियों से देखा और फिर चौंक पड़ा. यह वही थी जिसका मैट्रिमोनियल फोटो और बायोडाटा छह साल पहले प्रशांत की टेबल पर था, जो कभी-कभी उसे अपने कैंपस में दिखती थी, मगर पिछले दो-तीन सालों से पता नहीं कहां गायब हो गई थी… शुभांगी जोशी.
बदन थोड़ा भर गया था, बाल थोड़े छोटे हो गए थे, लेकिन चेहरा बिल्कुल वही था. उम्र जैसे उसे बिना छुए निकल रही थी. प्रशांत उसको देखकर यह सेंस करने की कोशिश कर रहा था कि इसकी शादी हुई या नहीं या ये भी मेरी तरह ही…
साथ बैठा लड़का अगर किसी लड़की को कनखियों से घूर रहा हो, तो लड़की बिना देखे भी सेंस कर लेती है कि उसे घूरा जा रहा है. शुभांगी ने कुछ देर बर्दाश्त किया, लेकिन फिर तीखी नज़रों से प्रशांत की ओर देखा और पूछा, “व्हाट?”
प्रशांत सकपका गया. मुंह से इतना ही निकला, “नथिंग…” फिर थोड़ा हिचकते हुए पूछा, “तुम शुभांगी जोशी हो ना?”
“डू वी नो ईच अदर?” शुभांगी ने हैरानी से पूछा.
“नॉट एक्जेक्टली! बट इन सम वे… दरअसल, कुछ साल पहले तुम जिस कंपनी में एचआर मैनेजर थी, मेरी कंपनी उसी के पास थी. कई बार देखा था तुम्हें.”
“मगर तुम्हें मेरा नाम कैसे पता चला?”
“यह भी एक इंटरेस्टिंग स्टोरी है. दरअसल, छह साल पहले तुम्हारा मेट्रोमोनियल फोटो और बायोडाटा आया था मेरे लिए.”
“अच्छा! रियली? और तुम्हें मेरा नाम याद रहा?”
“हां, पता नहीं क्यों याद रहा.”
“छह साल पहले का वो टाइम ही ऐसा था. मेरे पैरेंट्स ने शायद ही किसी बैचलर का घर छोड़ा हो, जहां मेरा फोटो और बायोडाटा ना भिजवाया हो. इतने ज़ोर-शोर से भगवान को खोजते, तो वो भी मिल जाते, मगर वे दामाद नहीं खोज पाए.” शुभांगी हंसते हुए बोली.
“दरअसल, उनकी ग़लती नहीं थी. मैंने ही उनकी सारी प्लानिंग फेल कर दी.”
“मगर क्यों?”
“मुझे शादी जो नहीं करनी थी. एक पढ़ी-लिखी इंडिपेंडेंट लड़की आजकल कहां पैरेंट्स के प्रेशर में आकर शादी करती है. दो साल लग गए उन्हें यह बात समझने में तब जाकर शांत बैठे.”
“यानी तुमने अभी तक शादी नहीं की?”
“नहीं. तुमने तो कर ली होगी?..”
सुनकर प्रशांत हंस पड़ा, “नहीं मैंने भी नहीं की. आजकल के पढ़े-लिखे इंडिपेंडेंट लड़के भी कहां माता-पिता के प्रेशर में आकर शादियां करते हैं.” ये सुनकर शुभांगी भी उसकी हंसी में शामिल हो गई.
“वैसे काफ़ी टाइम से तुम्हें कैंपस में नहीं देखा था, कंपनी स्विच की क्या?”
“नहीं स्विच नहीं की थी. दो साल के लिए लंदन गई थी एक मैनेजमेंट कोर्स करने. पिछले महीने ही लौटी हूं. वापस आकर उसी कंपनी को फिर से ज्वॉइन कर लिया. एक्चुअली ये कोर्स मेरी कंपनी ने ही स्पॉन्सर्ड किया था.”
“वाव, गुड!” प्रशांत ने रिएक्शन दिया.
“व्हाट अबाउट यू?” शुभांगी ने पूछा.
“मुझे जो भी कोर्स करने थे, सब कर डाले. अब बस ऑफिस आता हूं और काम कर लौट जाता हूं. फिर अपना खाना बनाता हूं और टीवी देखते हुए उसे एंजॉय करता हूं. दैट्स ऑल! सैलरी बहुत है, मगर न ख़र्च करने का समय है और ना ही कोई लक्ष्य, बस चल रही है ज़िंदगी सुकून से.”

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“कोई गर्लफ्रेंड? आई मीन, इफ यू डोंट माइंड…”
“थी, मगर अब नहीं है. पता नहीं शायद कुछ प्रॉब्लम है मेरे साथ. शायद कुछ अलग एक्सपेक्टेशन है मेरी. मैं एक नॉर्मल रिलेशनशिप ढूंढ़ता हूं, जिसमें कोई बनावटीपन ना हो, कोई शोऑफ ना हो, जहां डेट पर जाने से पहले मुझे सोचना ना पड़े कि कैसा लग रहा हूं, अपने स़फेद होते बालों को छुपाने ना पड़े… जहां मुझे ये प्रेजेंटेशन ना देना पड़े कि मैं तुम्हारा किस तरह से ख़्याल रखूंगा, तुम्हारे लिए यह करूंगा, वह करूंगा… मेरे साथ अपनी लाइफ इंवेस्ट करना तुम्हारे लिए फ़ायदे का सौदा होगा… ब्ला ब्ला…  यू नो, आजकल सब कुछ बहुत आर्टिफिशियल हो गया है, बहुत ऊपरी…”
प्रशांत की बातें सुनकर शुभांगी भी जैसे कहीं खो गई.
“सेम विद मी! डेट पर जाकर बात करना ऐसा लगता है जैसे किसी कंपनी में इंटरव्यू देना कि कैसे ख़ुुद को बेहतर दिखा कर दूसरे को इंप्रेस किया जाए. जिसके सामने मैं, मैं बनकर नहीं रह सकती, तो उसके सामने मैं जाऊं ही क्यूं?.. वैसे, क्या कभी अकेलापन नहीं लगता तुम्हें, लोनलीनेस की फीलिंग नहीं आती?” इस बार शुभांगी ने जैसे प्रशांत की दुखती रग पर हाथ रख दिया था.
कुछ देर वो गुमसुम बैठा रहा, विंडो से बाहर झांकते हुए जैसे आसमान में शुभांगी के सवाल का जवाब खोज रहा हो.
“झूठ नहीं बोलूंगा, लगता है… बहुत लगता है. मैं तो अब इसी इंतज़ार में हूं कि मां झूठे से एक बार टोक दे, ‘बेटा यह एक लड़की देखी है तेरे लिए, सही लगे तो रिश्ता पक्का कर दूं?’ एंड आई टेल यू, मैं बिना लड़की को देखे, हां कर दूंगा.”


यह सुनकर शुभांगी खिलखिलाकर हंस पड़ी, “इतने डेसपरेट हो शादी के लिए!”
“एक बात मुझे समझ आ गई है. भले ही रिश्ते दिल से बनते हों, मगर निभते दिमाग़ से ही हैं. रिश्ते को चलाने के लिए हमें दिल का नहीं, अपनी इंटेलेक्ट का इस्तेमाल करना पड़ता है. अगर एक बार यह तय कर लो कि रिश्ता निभाना है, तो फिर वह सूझ-बूझ से निभाया जा सकता है. कुछ समझौते करने होते हैं, मगर ज़िंदगीभर का साथ तो मिलता है.”
“शायद तुम सही कह रहे हो.”
“तुम्हें नहीं लगता अकेलापन?” प्रशांत ने शुभांगी की आंखों में झांकते हुए पूछा.
“लगता है कभी-कभी, बल्कि अक्सर लगता है. मगर फिर वे सब प्रॉब्लम्स दिखने लगती हैं जो मेरी बड़ी दीदी फेस कर रही हैं. करियर का प्रेशर, फैमिली का प्रेशर… जीजाजी को तो घरेलू ज़िम्मेदारियां दिखती तक नहीं हैं, दीदी को ही सब संभालना पड़ता है. यू नो, आज भी सोसाइटी की वो पुरानी मेंटालिटी नहीं बदली है कि भले ही लड़कियां नौकरी कर लें, मगर घर तो उन्हें ही संभालना है. लेकिन मुझमें ना इतना पेशेंस है, ना ही इतनी एनर्जी.”
“बस इसीलिए मैंने पिछले छह सालों में घर के सारे काम सीख लिए. खाना भी बना लेता हूं, ताकि कम से कम मेरी फ्यूचर वाइफ को यह शिकायत ना हो कि उसे घर अकेले संभालना पड़ रहा है.”
“वाह, परफेक्ट मैरिज मैटीरियल बन गए हो तुम तो? किसी मैट्रिमोनियल साइट पर अपना बायोडाटा अपलोड कर दो, बहुत रिस्पॉन्स आएंगे.”
“तुम करोगी रिस्पॉन्स? करोगी तो अभी अपलोड कर देता हूं.” प्रशांत का सीधा-सीधा प्रपोजल सुनकर शुभांगी सकपका गई. उसे यूं आकवर्ड देख, प्रशांत माहौल हल्का करने के लिए बोला, “वैसे तुम तो रहने ही देना, वरना मेरी मां मुझे उम्रभर ताना मारेगी कि देखा, घूम-फिर कर वही मिली, जिसका रिश्ता मैं तेरे लिए लाई थी…”
ये सुनकर शुभांगी की आंखों में शर्म के साथ हंसी भी तैर गई. इससे पहले वो कुछ कहती, उनका डेस्टिनेशन आ गया था. प्रशांत उसेे, “नाइस टू मीट यू, बाय!” कह कर आगे बढ़ने लगा था, तभी शुभांगी ने उसे पीछे से कहा, “लेट ना हो रहा हो, तो चाय पियोगे मेरे साथ? तुम्हारा बायोडाटा तुमसे ही ले लूंगी, मैट्रिमोनियल साइट पर रजिस्टर करने के पैसे लगेंगे. मॉम कहा करती हैं, बहुत पैसे उड़ाती है, शादी के बाद मुश्किल होगी. इसलिए आजकल मनी मैनेजमेंट सीख रही हूं, फ्यूचर के लिए.”
एक हंसी इधर खिली, एक हंसी उधर बिखरी, एक सफ़र का अंत, दूसरे की शुरुआत बन रही थी.

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Usha Gupta

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Usha Gupta

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