लघुकथा- तारीख़ों में प्यार (Short Story- Tarikhon Mein Pyar)

1 मई (चिलचिलाती गर्मी में)
आकाश! मैं दिनभर ऑफिस में काम करके आती हूं. फिर तुम्हारी मां के कामों में हाथ बंटाना, तुम्हारी रोज़ नई-नई चाचियां, मौसियां आती हैं और कहती हैं हमारी जाति में यह रिवाज़ है, वह रिवाज़ है, पक जाती हूं सुन सुन कर…

फरवरी 14 (वसंत की एक ख़ुशनुमा शाम)
आकाश! मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती. अगर हमारी शादी नहीं होती है, तो मैं जान दे दूंगी. वे लोग कभी नहीं समझेंगे कि हमारा रिश्ता जन्म-जन्मांतर का है. वे मेरी ख़ुशी की बजाय अपना सामाजिक सम्मान बचाने में लगे हैं.

1 मार्च (हल्की-हल्की गुलाबी-सी ठंड)
आख़िर मेरे मां-बाप नहीं माननेवाले. वे कहते हैं कि हम दोनों की जाति अलग है, लेकिन वे यह नहीं जानते प्रेम की कोई जाति नहीं होती.

18 मार्च (फागुन के अलमस्त होलियाना मौसम में)
आकाश, तुम्हारे मां-बाप तो राजी हैं. मैं घर से भागकर तुमसे शादी कर लूंगी. मैं ख़ुद नौकरी करती हूं. मेरे फ़ैसले मेरे माता-पिता नहीं ले सकते.

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29 मार्च (गर्मियों ने दस्तक दे दी थी)
आकाश, लो आज कोर्ट में शादी करके हम दोनों एक हो गए. दुख तो हो रहा है कि मम्मी-पापा की मर्जी के ख़िलाफ़ गई… मगर प्यार के आगे दुनिया में कोई चीज़ नहीं है.

1 मई (चिलचिलाती गर्मी में)
आकाश! मैं दिनभर ऑफिस में काम करके आती हूं. फिर तुम्हारी मां के कामों में हाथ बंटाना, तुम्हारी रोज़ नई-नई चाचियां, मौसियां आती हैं और कहती हैं हमारी जाति में यह रिवाज़ है, वह रिवाज़ है, पक जाती हूं सुन सुन कर…

16 मई (आज का तापमान रिकॉर्ड पर था)
आकाश, हद हो गई अब मैं इस घर में नहीं रह सकती. कितने दकियानूसी विचार हैं. कल तुम्हारी बड़ी भाभी कह रही थी कि घर में जींस-विंस अच्छा नहीं लगता. पति के साथ एक थाली में खाना मत खाओ… ‘उन दिनों’ में तुम्हें चौका में घुसना नहीं चाहिए, नियम का पालन करना चाहिए.
अब बताओ यार क्या मैं इसलिए शादी की थी. तुम भी मुझे वक़्त नहीं देते. अपने बिज़नेस में ही उलझे रहते हो. यार, अभी तक हम लोग हनीमून के लिए कहीं घूमने भी नहीं गए हैं.

30 जून (ओह! धूल भरी आंधियों का मौसम)
एनफ इज़ इनफ… आज तो हद ही हो गई. तुम्हारी बहन मुझे मेरे कास्ट के नाम पर ताना दे रही है. कह रही थी मेरे भाई ने ग़लती कि छोटी जाति की लड़की से शादी की, जो हमारे रिवाज़ों पर सवाल उठाती है.
आकाश बताओ, क्या मैं गूंगी गुड़िया हूं कि तेज़ हंसूं नहीं, तुम्हारे और मेरे कॉमन पुरुष मित्रों से बात करने में उन्हें एतराज है.

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26 जुलाई (घनघोर बारिश वाली शाम में)
डैड, आई एम सॉरी!.. मम्मा, आई एम सॉरी!.. मैंने आप लोगों की बात नहीं सुनी और अपनी मनमानी की. अब मुझे पछतावा हो रहा है, अब मैं उस घर में एक दिन भी नहीं रह सकती. अब आकाश भी मेरा फेवर नहीं करता. काश! मैं प्यार-व्यार के चक्कर में आप लोगों की क़ीमती नसीहत को दरकिनार ना करती.

14 अगस्त (बारिश के बाद सुनहरी धूप खिली थी)
आज मैं आज़ाद हो गई. आकाश और मुझमें आपसी सहमति से तलाक़ हो गया…

– गौतम कुमार ‘सागर’

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Photo Courtesy: Freepik

Usha Gupta

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