Kavita

कविता- झूठ-मूठ का मनुष्यपन… (Kavita- Jhuth-Muth Ka Manushypan)

गर्मी में भी सबसे ज़्यादा खीझ मनुष्य को हुई उसने हवाओं को क़ैद किया बना डाले एसी और.. रही-सही हवा…

कविता- वक़्त और लम्हे… (Kavita- Waqt Aur Lamhe…)

वक़्त से लम्हों को ख़रीदने की कोशिश की वह मुस्कुराया बोला क्या क़ीमत दे सकोगे मैं बोला अपने जज़्बात दे…

काव्य- नए साल का पहला दिन है… (Kavya- Naye Saal Ka Pahla Din Hai…)

जी हां, सही समझा आपने आज एक जनवरी है नए साल का पहला दिन है चारों तरफ़ उमंग और उत्साह…

कविता- नव वर्ष की पावन बेला… (Kavita- Nav Varsh Ki Pawan Bela…)

नव वर्ष की पावन बेला मन मेरा तो हर्षित है नए सूर्य की आभा से मानो सब आलोकित है उम्मीद…

कविता- तुम दूर ही अच्छे हो… (Kavita- Tum Dur Hi Achche Ho…)

तुम और मैं मिले तो मुझे अच्छा लगा गुज़रे वक़्त की कसक कुछ कम हुई परंतु मन के डर ने…

कविता- अभिव्यक्ति है आंखें… (Kavita- Abhivyakti Hai Aankhen…)

नेत्र कहूं नयन कहूं या कहूं मैं चक्षु आंखों की भाषा सिर्फ़ नहीं है अश्रु जीवन का दर्पण है आंखें…

काव्य- हे प्रभु… (Kavya- Hey Prabhu…)

हे प्रभु यदि तुम्हारे साथ भी मुझे कुछ कहने से पहले सोचना पड़े अर्थात अच्छे-बुरे सही-ग़लत का विचार करना पड़े…

कविता- युग बदलते रहे… (Kavita- Yug Badlate Rahe…)

वस्त्रहरण दौपदी का, हुआ था युगों पहले धृतराष्ट्र के द्यूत क्रीड़ागृह में युगों के प्रवाह में नष्ट नहीं हुआ वो…

कविता- वो पीली सोच वाली कविता… (Woh Peeli Soch Wali Kavita…)

प्रकृति प्रेम… अभी तलाश रही हूं कुछ पीले शब्द कि एक कविता लिखूं पीली सी ठीक उस पीली सोच वाली…

कविता- संघर्ष- मन और बुद्धि के बीच… (Poetry- Sangharsh- Maan Aur Buddhi Ke Bich…)

संघर्ष चल रहा है युद्धीय स्तर पर मन और बुद्धि के बीच निरंतर संघर्ष.. विचार शक्ति का तर्क है कि…

कविता- द्रौपदी का ऊहापोह (Kavita- Draupadi Ka Uhapoh)

द्रौपदी स्वयंवर मैं अग्निसुता, मैं स्वयंप्रभा मैं स्वयं प्रभासित नारी हूं मैं यज्ञ जन्मा, और पितृ धर्मा नहीं किसी से…

काव्य- वसंत… (Poetry- Vasant…)

देखा था पहली बार वसंत को तुम्हारी आंखों से छलकते प्यार में महसूस किया था टेसू की तरह रक्तिम अपने…

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