poem

ग़ज़ल- ज़िंदगी की उलझनें… (Gazal- Zindagi Ki Uljhane…)

उलझा हूं ज़िंदगी की उलझनों में ऐसेउनको याद करने की फ़ुर्सत नहीं मिलती जो इश्क़ में करते थे जीने मरने…

गीत- हे माँ कृपा इतनी करना… (Geet- Hey Maa Kripa Itni Karna…)

श्रम-निष्ठा जो हो सच्ची, माँ मेरे द्वारे तुम आना, आत्मा को तृप्त करें, वरदान मुझे वो दे जाना। युक्ति की…

गीत- अबकी नवरात्रि कुछ यूं मनाएं… (Geet- Abki Navratri Kuch Yun Manayen…)

बहुत ज़रूरी काम है ये, भाई मेरे मत झुठलाना इक बेटी की हंसी खो गई, कहीं मिले तो बतलाना ओढ़…

काव्य- एक प्याला चाय… (Poem- Ek Pyala Chai…)

चाय में घुली चीनी सी मीठी बातें बिस्कुट सी कुरकुरी आ जाती हैं होंठों पर तैरती रहती हैं कमरे में…

कविता- जब तुम कहीं नहीं हो… (Poetry- Jab Tum Kahin Nahi Ho…)

ये धड़कनें तुम्हारे आस पास ठहरीं माना कि तुम नहीं हो जब सोचता हूं अकेला तस्वीर तुम्हारी उभरी कैसे कह दूं…

काव्य- स्त्री-पुरुष (Poetry- Stri-Purush)

पुरुष खोदता है कुआं स्त्री खिंचती है पानी पुरुष डालता है बीज स्त्री सिंचती है पौधा पुरुष उगता है सूरज…

कविता- पुल… (Poetry- Pul…)

शहर के कोने पर बहती हुई उस छोटी सी जलधारा पर बना वो पुल जिस पर अनायास आमने-सामने आ गए…

काव्य- मैं और वो… (Kavay- Main Aur Woh…)

मैं लंबा हो रहा था वो ठिगनी ही रह गई मैं ज़हीन बन रहा था वो झल्ली ही रह गई…

कविता- लड़कियां ढूंढ़ती हैं प्यार… (Poetry- Ladkiyan Dhoondhati Hain Pyar…)

वो तुम्हारी आंखों में खोजती हैं पिता तुम्हारी हथेलियों में भाई तुम्हारे कांधे पे सखा जिनके सामने सीने में जमा…

नज़्म- युग धर्म.. पतझड़.. संघर्ष… (Nazm- Yug Dharm.. Patjhad.. Sangharsh…)

युग धर्म जब वंचना मुखर हो, युग धर्म निभाएं कैसे लगता नही है मुमकिन, सुख चैन पाएं कैसे जब हर…

काव्य: सहमी हुई ज़िंदगी को सिमटी हुई चादरों से ओढ़ देना चाहता हूं… (Poetry: Sahami Hui Zindagi Ko Simati Hui Chadaron Mein Odh Dena Chahta Hoon…)

सहमी हुई तेरी ज़िंदगी को मैं सिमटी हुई चादरों से ओढ़ देना चाहता हूं,  लम्हे के इस सहरा को कुछ वक्त के लिए कहीं और मोड़ देना चाहता हूं… तुझे लगता है कि तू उड़ने लायक भी नहीं, पर तेरी ऊंची उड़ान के लिए मैं अपने पंखों की ताकत को जोड़ देना चाहता हूं… महान है वो मां जिसने तुम जैसी लाड़ली को जन्म दिया, कुछ बखान तेरा करने से पहले अपने दोनों हाथ उसकी वंदना में जोड़ देना चाहता हूं… शख्सियत तेरी ऐसी जैसे कान्हा को मीरा ने अंखियन में बसा लिया, तुम वो अमृत का प्याला हो जिसे शिव ने अपने कंठ लगा लिया… प्यार और विश्वास शबरी के उन मीठे बेरों की तरह है तुम्हारा, जिसने राम को अपनी भोली सूरत से अपना बना लिया… सुबह के सूरज से निकलती वो सुनहरी किरणें, पानी में खिलते कमल सी ताजगी सी हो तुम……

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