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चिल्ड्रेंस डे स्पेशल: कम करें बच्चों का इमोशनल बोझा (Children’s Day Special: Reduce The Emotional Burden Of Children)

सभी पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में टॉप करे, स्पोर्ट्स में अव्वल आए और एक्स्ट्रा करिकुलर में भी…

सभी पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में टॉप करे, स्पोर्ट्स में अव्वल आए और एक्स्ट्रा करिकुलर में भी बेस्ट करे यानी कुल मिलाकर ऑलराउंडर बन जाए. लेकिन जब बेचारा बच्चा ऐसा नहीं कर पाता, तो पैरेंट्स उस पर अपना इमोशनल बोझा लादना शुरू कर देते हैं, जिससे बच्चे परेशान हो जाते हैं. क्या है पैरेंट्स का ये इमोशनल बोझा और कैसे बचें, इससे आइए जानते हैं. 

क्या है इमोशनल बोझा?

अपेक्षाएं रखना मानवीय स्वभाव है, पर उन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए अत्यधिक भावनात्मक दबाव डालना ही इमोशनल बोझा है. बच्चे अति संवेदनशील होते हैं. ऐसे में पैरेंट्स अगर उन पर अपने सपने और वो सब कुछ करने की ज़िम्मेदारी लगातार थोपते रहते हैं, जो वो कभी नहीं कर पाए, तो बच्चों पर इमोशनल दबाव बहुत बढ़ जाता है, जो उनके मानसिक विकास के लिए ठीक नहीं है.

तरह-तरह के इमोशनल बोझ

मेरा बच्चा बड़ा होकर इंजीनियर बनेगा: सर्वे में भी यह बात साबित हो चुकी है कि ज़्यादातर भारतीय पैरेंट्स अपने बच्चों को इंजीनियर बनाना पसंद करते हैं. आज भी यह परंपरागत सोच बच्चों को कुछ नया करने से रोकती है. बच्चे के हुनर को पहचाने बगैर अपना सपना उस पर थोपना बोझा लादना ही है.

हमारे परिवार में सब डॉक्टर ही बनते हैं: माता-पिता डॉक्टर हों, तो बच्चे को भी मेडिकल ही पढ़ाते हैं. वो चाहते हैं कि उनका बच्चा उनसे भी बड़ा डॉक्टर बने और अपना ख़ुद का अस्पताल खोले. ज़्यादातर बच्चे पैरेंट्स की इच्छा समझ उसी में जुट जाते हैं, पर हर कोई सफल नहीं हो पाता. अपने मन का न कर पाने की छटपटाहट नकारात्मक रूप से ग़ुस्से और चिड़चिड़ेपन के रूप में बाहर निकलती है.

तुम्हें हमेशा टॉप करना है: ये बहुत ख़तरनाक बोझा है, जो हर पैरेंट अपने बच्चों के सर पर रखते हैं. बच्चा अगर औसत हो, तो कितनी भी कोशिश कर ले, पढ़ाई में बहुत अच्छा नहीं कर पाएगा. हो सकता है, वो खेलकूद में अच्छा हो, आर्ट या म्यूज़िक में अच्छा कर पाए. अकैडमिक स्कोर के चक्कर में बच्चे पर बेवजह बोझा न लादें.

हमें तुमसे बहुत उम्मीदें हैं: बच्चों से अपेक्षाएं और उम्मीदें रखना बिल्कुल ग़लत नहीं, पर हर व़क्त यह जताते रहने से उन पर भावनात्मक दबाव पड़ता है. उनके मन में डर बैठने लगता है, जिससे उनका आत्मविश्‍वास डगमगाने लगता है. डर और आत्मविश्‍वास की कमी से बच्चे एंज़ायटी से जूझने लगते हैं.

टूटे परिवार का बोझ: माता-पिता के टूटे रिश्ते का असर बच्चों पर इस प्रकार पड़ता है कि वो भावनात्मक रूप से काफ़ी संवेदनशील हो जाते हैं. शादी-ब्याह से विश्‍वास उठ जाना, दुनिया में सब मतलबी होते हैं, प्यार जैसा कुछ नहीं होता आदि भावनाएं उनमें घर कर लेती हैं.

एग्ज़ाम टाइम को कर्फ्यू में तब्दील कर देना: कुछ पैरेंट्स एग्ज़ाम टाइम में बच्चों को बाहरी दुनिया से पूरी तरह डिस्कनेक्ट कर देते हैं. परीक्षा मतलब स़िर्फ पढ़ाई करना हो जाता है. ऐसा माहौल बच्चों के लिए मुश्किलोंभरा हो जाता है, तभी तो वो बाहर जाने और वहां से निकलने के लिए छटपटाने लगते हैं, इसलिए एग्ज़ाम  को हौवा न बनाएं.

यह भी पढ़ेबच्चों की शिकायतें… पैरेंट्स के बहाने… (5 Mistakes Which Parents Make With Their Children)  

बच्चों में होनेवाले नकारात्मक बदलाव

एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ इमोशनल बोझ का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण उनमें कुछ बदलाव नज़र आते हैं. अगर आपके बच्चे में भी ये लक्षण नज़र आते हैं, तो किसी चाइल्ड काउंसलर से मिलें.

* एकाग्रता में कमी होना

* छोटी-छोटी बातों पर ओवर रिएक्ट करना

* होमवर्क करने में दिलचस्पी न दिखाना

* हर व़क्त ग़ुस्सा और चिड़चिड़ापन रहना

* जो भी कहा जाए, उसका उल्टा करना

* हर व़क्त गुमसुम रहना

* वायलेंट गेम्स खेलना

* अचानक कम या ज़्यादा खाना शुरू करना

यह भी पढ़ेएग्ज़ाम गाइड- कैसे करें परीक्षा की तैयारी? (Exam Guide- How To Prepare For The Examination?)

डिप्रेशन-एंज़ायटी के बढ़ते मामले

बच्चों में बढ़ते इमोशनल दबाव का ही प्रभाव है कि बढ़ती उम्र के बच्चे एंज़ायटी और डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं और जो बच्चे इनसे जूझ नहीं पाते, वो आत्महत्या जैसा गंभीर कदम भी उठा लेते हैं.

हर घंटे एक विद्यार्थी कर रहा है आत्महत्या

2015 में आए नेशनल ब्यूरो ऑफ क्राइम रिकॉर्ड्स के मुताबिक़, हमारे देश में हर साल 8,934 विद्यार्थी आत्महत्या करते हैं यानी लगभग हर घंटे एक छात्र. यह आंकड़ा हमारे लिए बेहद चिंता का विषय है, क्योंकि न स़िर्फ परिवार के रूप में बल्कि एक सभ्य समाज के रूप में भी यह हमारी हार है.

कैसे कम करें इमोशनल बोझा?

* स्कूलों में वैसे ही पढ़ाई का बहुत ज़्यादा दबाव बच्चों पर रहता है, आप भी उसे बहुत ज़्यादा अलग-अलग क्लासेस में लगाकर इंगेज न रखें. उसे खेलने-कूदने और परिवार के साथ समय बिताने का पर्याप्त समय मिले, इसका ध्यान रखें.

* हर बात पर बच्चों को यह कहकर इमोशनली ब्लैकमेल न करें कि हमारे समय पर ऐसा होता था, हम तो ये करते थे, वो करते थे. आपको समझना होगा कि आपका ज़माना अलग था और बच्चे का समय अलग है. आपको आज के बदलते माहौल को ध्यान में रखकर उसे उदाहरण देने चाहिए.

* यूनिट टेस्ट हो या सेमिस्टर एग्ज़ाम, उसका हौवा न बनाएं. बच्चा पहले से ही एग्ज़ाम के नाम से डरा होता है. आप ऐसा माहौल बनाकर उसे और डरा देते हैं. ऐसा न करें. एग्ज़ाम टाइम में भी घर का माहौल सामान्य रखें. बच्चों को स्ट्रेस फ्री होने के लिए थोड़ा फ्री टाइम भी दें.

* ज़्यादातर मांएं इमोशनल कार्ड खेलती हैं. दूसरों के बच्चों के उदाहरण दे-देकर बच्चों पर और दबाव डालती हैं. आपको समझना होगा कि हर बच्चा अलग और ख़ास होता है. आपके बच्चे में जो ख़ूबियां हैं, शायद ये ख़ूबियां उस बच्चे में न हों, तो तुलना किस बात की.

* वर्किंग कपल्स के बच्चों की परवरिश एक बड़ा टास्क है. उन्हें समय न दे पाना और उनके लिए हर व़क्त मौजूद न रहनेवाली भावना उन्हें इस कदर इमोशनल बना देती है कि वो बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा छूट दे देते हैं. यह भी सही नहीं है. बच्चों की सही परवरिश के लिए नियमों से लेकर पैंपरिंग तक को संतुलित रखना ज़रूरी है.

 

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैरेंट्स की उम्मीदों का दिलचस्प डाटा

एचएसबीसी द्वारा की गई स्टडी ‘होप्स एंड एक्सपेक्टेशन ऑफ पैरेंट्स ऑन देयर चिल्ड्रेन्स एजुकेशन’ में दुनिया के अलग-अलग देशों में बच्चों की पढ़ाई और करियर से जुड़ी बातों पर दिलचस्प डाटा तैयार किया गया है. आप भी देखें फैक्ट्स.

* भारत के 51% पैरेंट्स चाहते हैं कि उनके बच्चों का सक्सेसफुल करियर हो, जबकि बाकी देशों में बच्चों की ख़ुशी और अच्छी लाइफस्टाइल को ज़्यादा तवज्जो दिया जाता है.

* जब भारतीय पैरेंट्स को अपने बच्चे के लिए तीन सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित करने के लिए कहा गया, तो 51% ने सफल करियर, 49% ने जीवन में ख़ुशहाली, 33% ने स्वस्थ जीवनशैली और 22% ने कहा कि इतना कमा ले, जिससे ज़िंदगी

आसानी से जी सके और स़िर्फ 17% ने कहा कि वो अपनी काबीलियत के अनुसार जो भी करना चाहे, उसमें वो मदद करेंगे.

* वहीं अमेरिका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पैरेंट्स ने सफल करियर को उतनी तवज्जो नहीं दी. यहां स़िर्फ 17% पैरेंट्स ने सफल करियर की बात कही.

* बच्चे की ख़ुशी के मामले में दुनिया के ज़्यादातर देश हम भारतीयों से आगे हैं. जहां फ्रांस में 86%, कनाडा में 78%, इंग्लैंड में 77%, यूएई में 60% हॉन्गकॉन्ग में 58% और इंडोनेशिया में 56% है, वही आंकड़ा भारत में 49% है यानी हमें अपने बच्चों की ख़ुशी का और ध्यान रखना होगा.

* जब बात शिक्षा की हो, तो ज़्यादातर भारतीय पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर इंजीनियर बने, जबकि ‘मैन्यूफैक्चरिंग का हब’ कहे जानेवाले चीन में भी पैरेंट्स इंजीनियरिंग को उतनी तवज्जो नहीं देते, जितना हमारे देश में. हमारे देश के पैरेंट्स की रुचि को देखें, तो 23% इंजीनियरिंग, 22% फाइनांस, 16% कंप्यूटर और इंफॉर्मेशन साइंस, 14% मेडिकल और 2% अपने बच्चों को लॉ पढ़ाना चाहते हैं.

* भारत में 88% पैरेंट्स बच्चों को मास्टर्स या पीएचडी करवाना चाहते हैं, जबकि बाकी देशों में बारहवीं के बाद कोई कोर्स या डिग्री को लोग ज़्यादा प्राथमिकता देते हैं. हायर एजुकेशन की लालसा सभी पैरेंट्स को नहीं होती.

– संतारा सिंह

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide

Usha Gupta

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