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#कोविड-19 में पिता बने पुरुषों की दिल को छू लेनेवाली आपबीती… (#Fathers Day Special: Fathers Heart Touching Story…)

यूं तो पिता बनना और पितृत्‍व के लिए स्‍वयं को तैयार करना चुनौतीभरा काम होता है. लेकिन जब बात उन लोगों की हो, जिनके बच्‍चे…

यूं तो पिता बनना और पितृत्‍व के लिए स्‍वयं को तैयार करना चुनौतीभरा काम होता है. लेकिन जब बात उन लोगों की हो, जिनके बच्‍चे समय पूर्व ही पैदा हो गए हों, तो यह मुश्किलोंभरा होता है. ख़ासकर कोरोना वायरस के कारण मौजूदा कोविड-19 के चलते महामारी की स्थिति में यह चुनौती और भी अधिक बढ़ जाती है. उन पिताओं पर अतिरिक्‍त दबाव व ज़िम्मेदारियां आ जाती हैं. आइए, आज फादर्स डे पर ऐसे ही पिता बने पुरुषों की आपबीती को जानते हैं.

सभी चुनौतियों के बावजूद, पिता बनने की ख़ुशी का एहसास कभी भी कम नहीं हुआ…

असीम शाह जिन्हें जुड़वा बच्चे हुए थे इस कोरोना वायरस की महामारी के दिनों में ही. तब उन्होंने ना केवल कई चुनौतियों का सामना किया, बल्कि ख़ुद को भी हौसला देते रहे. जॉन्‍सन एंड जॉन्‍सन के ग्रुप एसएफई व एनालिटिक्‍स मैनेजर की अपनी पद व ड्यूटी को निभाते हुए वे इस लॉकडाउन में बहुत कुछ सीखते भी रहे. कोविड-19 के इस लॉकडाउन के दौरान पैदा हुए जुड़वा बेटों का पिता बनने के अपने अनुभवों के बारे में असीम कुछ यूं बताते हैं…
दो महीने पहले, मैं अपने सहकर्मियों के साथ एक महत्‍वपूर्ण वीडियो कॉल पर था, तभी मेरी पत्‍नी ने अचानक बताया कि उन्‍हें डिलीवरी के लिए हॉस्पिटल जाना पड़ेगा.
यह इमर्जेंसी डिलीवरी थी और हमारे बच्‍चे समय से चार हफ़्ते पहले ही पैदा हो गए. यह भी कमाल की बात थी. मैं दोपहर 3.30 बजे ऑफिस कॉल पर था और लगभग 4.00 बजे अपनी बांहों में दो-दो बच्‍चे थामे हुआ था. समय से पहले पैदा होने के चलते, बच्‍चों को एनआईसीयू में रखा गया. उनका लगातार ध्‍यान रखा जाना और उनकी देखभाल बेहद ज़रूरी था. मैं चाहता था कि मैं भी वहीं ठहरकर एनआईसीयू की कांच की दीवार के पीछे से उन्‍हें लगातार टकटकी लगाए देखता रहूं, लेकिन मुझे वापस घर लौटना पड़ा, क्‍योंकि कोविड के चलते हॉस्पिटल ने किसी को भी वहां ठहरने की इजाज़त नहीं दी.
यह स्थिति सामान्‍य से बिल्‍कुल अलग था और मुझे उन्‍हें उनके हाल पर छोड़कर वहां से जाना पड़ा. मुझे दिन में केवल एक बार उन्‍हें देखने की अनुमति थी. यह भावनात्‍मक रूप से तकलीफ़देह अनुभव था.

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लेकिन असली दिक़्क़त तो तब शुरू हुई, जब उन्‍हें हॉस्पिटल से डिस्‍चार्ज कर दिया गया और वो हफ़्तेभर में घर आ गए. जैसा कि मैंने बताया कि बच्‍चे समय से पूर्व हुए थे और बहुत छोटे थे. उनके लिए काफ़ी छोटे-छोटे डायपर्स की ज़रूरत होती थी. ज़रूरी डायपर्स, फॉर्म्‍यूला मिल्‍क, दवाएं आदि लेने के लिए मुझे 8-10 फार्मेसीज का चक्‍कर लगाना पड़ता था. लॉकडाउन के चलते, ये चीज़ें आसानी से उपलब्‍ध नहीं थीं और मैं इन अत्‍यावश्‍यक चीज़ों को सीमित स्‍टॉक में ही रख पाता था, जो बमुश्किल 3-4 दिन चल पाता. यह थोड़ी हताशाजनक स्थिति थी, पर मैंने हिम्मत नहीं हारी.
मुझे केवल अपने बच्‍चों के लिए उनके ज़रूरी सामानों को जुटाने की ही चिंता नहीं थी, बल्कि साथ ही मुझे बच्‍चों की देखभाल में अपनी पत्‍नी के साथ हाथ भी बंटाना था. बच्‍चों को संभाल पाना हम दोनों के लिए ही बहुत बड़ा काम था. कई बार तो ऐसा होता कि मैं काम करता और उसे बच्‍चों को संभालना पड़ता. हालांकि, मेरे सहकर्मियों और मेरी कंपनी ने मेरा काफ़ी सहयोग किया और मुझे अपनी इच्‍छानुसार शिफ्ट में काम करने की छूट दे दी, जो सबसे ज़रूरी था.
सभी चुनौतियों के बावजूद, पिता बनने की ख़ुशी का एहसास कभी भी कम नहीं हुआ. मुझे उन्‍हें सुलाने, खिलाने-पिलाने, उनके डायपर बदलने, कपड़े धोने, फीडिंग बॉटल धोने आदि में आनंद आता था. मैं हमारे नन्हें-मुन्‍नों के साथ अपनी पत्‍नी की हरसंभव मदद करना चाहता था. मैंने जाना कि किस तरह से माता-पिता दोनों को हाथ बंटाना ज़रूरी होता है और यह सब कुछ लॉकडाउन के चलते संभव हो सका.

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लॉकडाउन के चलते मेरी ज़िंदगी में आए पितृत्‍व के एहसास को शब्‍दों में बयां नहीं कर सकता…

यांसन इंडिया के सीनियर प्रोडक्‍ट मैनेजर, प्रणित सुराना बताते हैं कि किस तरह से उनके पांच महीने के बेटे ने उनके जीवन में बदलाव ला दिया है.
लॉकडाउन के दौरान, लोगों की ज़िम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है और ख़ासकर उन पैरेंट्स की रिस्‍पांसबिलिटी बहुत बढ़ गई है, जिनके बच्‍चे अभी बहुत छोटे हैं. मुझे बताते हुए गर्व हो रहा है कि मैं अब एक पिता की ज़िम्मेदारियों को बेहतर समझने लगा हूं. मैं इस लॉकडाउन के चलते मेरी ज़िंदगी में आए पितृत्‍व के एहसास को शब्‍दों में बयां नहीं कर सकता. यह मेरे लिए आशा की किरण है. मैं लॉकडाउन से पहले ऑफिस के अपने उन दिनों की याद करता हूं, जब मैं अपने सहकर्मियों के साथ घूमता-फिरता और टी-ब्रेक पर गपशप किया करता था. यूं तो ये बातें सुनने में महत्‍वपूर्ण नहीं लगती, लेकिन उन पलों की मुझे बेहद याद आती है. लेकिन अभी जब मैं घर पर रहकर अपने बच्‍चे को संभालने के साथ फुलटाइम ऑफिस मैनेज कर रहा हूं, तो मुझे जीवनसाथी का अर्थ समझ आया. इसने मुझे आराम लेने और दैनिक कार्यों को प्रभावी तरीक़े से करने के महत्‍व को बता दिया है. घर पर रहकर काम करने से, ऑफिस का काम करने और व्‍यक्तिगत जीवन को संभालने के बीच की पतली रेखा और अधिक महीन हो गई है.

यदि मैं ऑफिस जाकर काम करता, तो अपने बच्‍चे को चलने की कोशिश करने और पेट के बल पलटना देखने जैसी अद्भुत ख़ुशी का किसी भी स्थिति में आनंद नहीं ले पाता. मुझे लगता है कि इस कोविड-19 इमर्जेंसी के बीच इन बहुमूल्‍य पलों को जीने से बड़ी ख़ुशी मुझे नहीं मिल सकती थी.

ऊषा गुप्ता

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Usha Gupta

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