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कहानी- बउरहिया (Short Story- Baurhiya)

आपने तो शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आपकी ‘बउरहिया’ भविष्य में लेखिका कहलाएगी. ‘मोहिनी’ नाम तो आप ही ने मुझे दिया था. प्रेमपत्र लिखते हुए कभी आपको नहीं लगा कि यह नाम कुछ जाना-पहचाना है. लेकिन लगता भी कैसे, आपके लिए तो मैं परले दर्जे की बेवकूफ़ थी, बउरहिया थी.

आशुतोषजी व्यग्रता से चहलक़दमी करने लगे. उनकी दृष्टि बार-बार किसी की प्रतीक्षा में मुख्यद्वार की तरफ़ टिक जाती. दोपहर के दो बजने वाले हैं. यह समय डाकिया के आने का है. आशुतोष बाबू लेखक हैं और पाठकों में इतने लोकप्रिय हैं कि पुस्तक जैसे ही प्रकाशित होकर बाज़ार में आती है, प्रशंसा पत्रों का अम्बार लग जाता है. साहित्य जगत में उन्हें कई पुरस्कार व प्रशस्ति पत्र मिल चुके हैं, जो उनके बैठक की शोभा बने हुए हैं.

आशुतोषजी ने जो चाहा पाया- यश, धन, कीर्ति सब कुछ उन्हें मिला. आयु के इस पडाव पर जबकि वे अर्धशती पार कर चुके हैं, पहली बार उन्हें किसी का अभाव खला. हृदय में एक मधुर टीस उठी. सदैव आत्ममुग्ध रहनेवाले आशुतोष किसी और के सम्मोहन में आबद्ध हो गए हैं! कुछ ही दिनों पहले एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका में एक कविता छपी थी. उस कविता की मार्मिकता और सरल, सहज अभिव्यक्ति ने उनके हृदय को बांधकर रख दिया.

कवयित्री का नाम देखा तो कुछ-जाना-पहचाना लगा, किन्तु मस्तिष्क पर बहुत ज़ोर डालने पर भी कुछ याद नहीं आया. कितना मोहक, कितना अच्छा नाम था ‘मोहिनी’. मोहिनी की पीड़ा ने, उसकी शब्द-शक्ति ने, उसकी अभिव्यक्ति की सरल किंतु तीव्र प्रहारक क्षमता ने मोह ही लिया था आशुतोषजी को. उन्होंने प्रेम की पीड़ा में पागल हो सब कुछ भुला मोहिनी को प्रशंसा पत्र लिखा. अपने पाठकों के पत्रों का कभी जवाब न देनेवाले दंभी आशुतोषजी एक नयी-नयी कवयित्री के प्रशंसक बन उसको प्रशंसा पत्र लिखेंगे, यह ख़ुद उनके लिए भी किसी आश्‍चर्य से कम नहीं था. लेकिन मोहिनी ने उनके एक भी पत्र का प्रत्युत्तर नहीं दिया. इधर दिन-प्रतिदिन आशुतोषजी की प्रेम-पीड़ा बढ़ती जा रही थी. उधर मोहिनी की रचनाओं ने तो जैसे साहित्य जगत् में जादू ही कर दिया था. जिस पत्रिका को खोलो, उसी में उसकी रचना.

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कोई ऐसा पत्र, कोई ऐसी पत्रिका नहीं थी, जिसमें मोहिनी की रचनाएं प्रकाशित न हुई हों. वह लिखती ही ऐसा थी कि उसके शब्द सजीव जान पड़ते. कहानियों को पढ़कर लगता, अभी कल ही किसी-न-किसी के साथ घटी सच्ची घटना है. कविताओं की गेयता मुग्ध कर देती. सरल तो इतनी कि बच्चे भी अर्थ बता दें. किन्तु मार्मिक इतनी कि पत्थर दिलवाले भी रो उठें. जीवन के हर स्तर को सच्चाई से, गहराई से छूती रचनाओं ने मोहिनी को पाठकों के साथ-साथ समालोचकों में भी प्रिय बना दिया था.

आशुतोषजी ने भी कई समीक्षाएं लिखी मोहिनी की रचनाओं पर. उसकी सृजन क्षमता की भूरि-भूरि प्रशंसा भी की. उन्हें लगा अब मोहिनी का श्रद्धा और स्नेह से परिपूरित प्रेम पगा, आभार प्रकट करता हुआ पत्र उन्हें अवश्य मिलेगा. और ऐसा भी सम्भव है कि वह अधीर-सी अपनी कृतज्ञता प्रकट करने उनके पास ही चली आए. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, मोहिनी के मोहपाश में वे निरंतर जकड़ने लगे. जब उन्हें लगा कि यदि वे मोहिनी से नहीं मिले तो उनके प्राण निकल जायेंगे, तो उन्होंने मोहिनी को एक बड़ा ही मार्मिक पत्र लिखा, जिसमें एक याचक की भांति उनके बिलखते हुए शब्दों ने प्राणरक्षा की भीख मांगी थी. उस पत्र में उनका सर्वस्व स्वाहा हो गया था. तीस वर्षों से अर्जित यश-कीर्ति, मान-सम्मान सब तिरोहित हो गया था. बचा था, बस भावुकता से भरा कंगाल हृदय.

जब से उन्होंने पत्र भेजा था तब से प्रत्युत्तर हेतु बेचैन थे. आज उन्होंने दृढ़ निश्‍चय कर लिया था कि यदि मोहिनी का पत्र नहीं मिलेगा तो वो उससे मिलने अवश्य उसके शहर पहुंच जायेंगे. लेकिन ईश्‍वर ने उनकी सुन ली थी. अपने पाठकों के प्रशंसा पत्रों में एक पत्र ने उन्हें चौंका दिया. लिखावट इतनी सुन्दर थी कि बरबस ही ध्यान खींच ले, मन मोह ले. प्रेषिका का नाम देखा तो उनका दिल ख़ुशी से पागल ही हो गया था. भावावेश से उनके शरीर का अंग-प्रत्यंग कांपने लगा. आंखों से ख़ुशी के आंसू छलक पड़े. उन्होंने उस पत्र को बार-बार चूमा. कभी कांपते अधरों से सटाते तो कभी हृदय से लगा लेते. कुछ संयत हुए तो धीरे से उन्होंने उस पत्र को खोला. सम्बोधन पढ़ा तो अचकचा गये. लिखा था-

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बाबा!

यह सम्बोधन पढ़कर तो आप पर वज्रपात ही हो गया होगा, लेकिन क्या करूं… विवश हूं. जन्म देनेवाला पिता कितना ही अधम, निष्ठुर और पापी क्यों न हो, कहलाता तो पिता ही है. वैसे आपको बाबा कहकर सम्बोधित करने की मेरी लेशमात्र भी इच्छा नहीं थी, किन्तु मां ने जो संस्कार दिए थे, वे इतने दृढ़ हैं कि चाहकर भी आप जैसे नराधम को नाम से सम्बोधित नहीं कर पायी. यदि ऐसा करती तो मां की आत्मा को बहुत पीड़ा पहुंचती और उसे पीड़ा पहुंचाने की मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकती. सारी उम्र उसे नियति ने दुख-तकलीफ़ ही तो दी. जाने किस जन्म के पापों का दंड इस जन्म में आपका रूप ले साकार हो उठा था उसे तिल-तिल कर मारने के लिए.

मैंने जब से होश सम्भाला तब से मां को चुपचाप कष्ट सहते ही पाया. कितना ख़याल रखती थी वो आपकी छोटी-से-छोटी आवश्यकताओं का. दिन-रात चरखी की तरह आपकी सेवा में घूमती रहती. लोग कहते हैं, कवि जब पीड़ा से पागल हो उठता है, तो स्वत: उसके शब्द फूट पड़ते हैं और ‘कविता’ का रूप धारण कर लेते हैं. लेकिन आपने तो स्वयं कोई पीड़ा नहीं झेली, कोई दु:ख नहीं भोगा, उलटे मां को इतने कष्ट दिए जिनकी कोई गणना नहीं.

तो क्या आप मां को पीड़ित करके उसके अश्रुओं से अपने शब्दों का जाल बुनते थे? कितना दोहरा व्यक्तित्व था आपका, घर के लिए कुछ और समाज के लिए कुछ और. घर में जितने कठोर निरंकुश और पर-पीड़क बाहर उतने ही सहृदय, उदार व हंसमुख. कितने ढोंगी थे आप, यह मैंने अपनी दस वर्ष की छोटी-सी उम्र से ही जानना शुरू कर दिया था.

अपनी रचनाओं में स्त्री-जाति के उत्थान के लिए बड़ी-बड़ी बातें करनेवाले, नारी मन के सूक्ष्मातिसूक्ष्म मनोभावों का गहराई से वर्णन करनेवाले आप अपनी ही पत्नी को दिन-रात भद्दी-भद्दी गालियों से छलनी करते रहते. उसकी ग़लती हो, न हो उसे सबके सामने दोषी ठहराते. कभी-कभी तो अति ही कर देते.

अपने लंपट मित्र सतीश के साथ उसका नाम जोड़कर उसे कुलटा, पतिता और न जाने क्या-क्या कहते. उस समय मां कितना रोती. उसके आंसुओं से मेरे बाल गीले हो जाते. उसकी हिचकियां सारी रात मुझे सोने नहीं देतीं. मैं रात-रात भर जाग कर मां के साथ ही रोती रहती और सुबह चुपचाप स्कूल चली जाती, इस डर से कि जाने आप कब कोई नया बखेड़ा खड़ा कर देंगे और मां को प्रताड़ित करेंगे.

आप मुझसे हमेशा ही नाराज़ रहते. कहते, मां की तरह ही बेवकूफ़ है ‘बउरहिया’ है. आपके ये शब्द तीर से मेरे कानों में चुभते, लेकिन कभी मैंने कोई प्रतिवाद नहीं किया. उसके कई कारण थे, उनमें से सबसे बड़ा कारण था, यदि मैंने बगावत की तो आप निश्‍चित ही मां को व्यंग्यबाणों से छलनी कर देंगे.

मैं मन-ही-मन ईश्‍वर से प्रार्थना करती कि मां कि दुश्‍वरियां कम हो जाएं, लेकिन उन्होंने तो जैसे अपने आंख और कान मूंद ही लिए थे. जैसे-जैसे समय व्यतीत होता जा रहा था, मां के लिए संकट बढ़ते जा रहे थे. आपने अपने वाग्जाल में फंसा जाने कितनी बेवकूफ़ किशोरियों को अपने मनोरंजन का साधन बनाया और वह भी अपनी पत्नी व किशोर होती बेटी के सामने, अपने ही घर में.

छी: घृणा होती है मुझे अपने आप से, ऐसे इन्सान के साथ मैंने पंद्रह वर्ष बिताए और उसके हर कृत्य की मूक दर्शक बनी रही. आज उन सब बीती और घिनौनी घटनाओं के बारे में सोचती हूं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं और मां की उस दयनीय अवस्था को याद कर पुरुष जाति से घृणा हो आती है.

मैंने कई बार मां को अकेले में सिर पटक-पटक कर रोते देखा. उसके रुदन में कितनी पीड़ा, कितनी अवहेलना और कितनी असहायता थी. बाबा! सच कहिए, एक कवि हृदय होते हुए भी आपने उसके मनोभावों को कभी समझा? या समझकर भी नासमझी का ढोंग करते रहे?

और वह रात तो मां के लिए कालरात्रि के समान भयावह साबित हुई, जिस दिन आप अपने अड्डेबाज मित्रों को रात्रि भोज के लिए आमंत्रित कर आये थे. उस दिन मां ने कितने मनोयोग से आपके पसंद के सारे व्यंजन बनाये थे, लेकिन अपने मित्रों की मांग पर दस बजे रात में आपने मां को मीट बनाने का आदेश दिया और उसने बिना किसी ना-नुकुर के उस आदेश का पालन भी किया. किंतु जाने कैसे मीट कूकर में थोड़ा लग गया और जलने की गंध आने लगी. फिर मां ने कितनी कोशिश की- सारे मीट को निकालकर दूसरे बर्तन में घी डालकर अच्छी तरह पकाया, लेकिन जलने के स्वाद और गंध को दूर नहीं कर पायी.

मैंने उस दिन मां को पहली बार भय से कांपते हुए पाया. वह बार-बार मेरे पास आती और एकाध टुकड़े और थोड़ी-सी तरी चखाते हुए भर्रायी आवाज़ में पूछती, “बता तो बेटा, जलने का स्वाद आ रहा है क्या?” मुझसे उसका भय से काला पड़ा चेहरा, उसकी सहमकर आंसुओं से लबालब आंखें और स्याह सूखे अधर देखे नहीं जा रहे थे. और पहली बार उसके भय को कम करने के लिए मैंने झूठ बोला, “नहीं मां, बहुत अच्छा बना है.” और मैंने अपने चेहरे पर तृप्ति का झूठा भाव लाने का अभिनय किया था. लेकिन उसकी प्रखर दृष्टि ने मेरा झूठ पकड़ ही लिया.

मां की उस दुखद अवस्था को मैं आजीवन भुला नहीं सकती. आपके भय से भयभीत रसोई के एक कोने में सिमटी बैठी थी. आप अपने मित्रों के साथ भोजन करने बैठ गये थे. अभी पहला ग्रास मुंह में रखा ही था कि वह सम्भावित दुर्घटना घट गयी, जिसे सोच-सोचकर हम मां-बेटी अधमरी हुई जा रही थीं. आपने अपने उपस्थित मित्रों की भी परवाह नहीं की और थाली उठाकर मां की तरफ़ दे मारी और उसके तीखे कोने से उनकी कुहनी बुरी तरह ज़ख़्मी हो गयी.

मित्रों ने काफ़ी बीच-बचाव किया, लेकिन आपका क्रोध शांत होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा था. हारकर सारे लोग घर चले गये. उसके बाद तो आपने मां पर लात व मुक्कों की बरसात ही कर दी. मैं बिलखती हुई अपनी निरीह मां को पिटती देखती रही. बात यहीं तक रहती तो गनीमत थी, लेकिन आप पर तो भूत सवार था. उस काली भयानक अर्धरात्रि में आपने मां को घर से बाहर निकाल दिया. वह कितनी गिड़गिड़ायी, आपके हाथ-पैर पड़ी, लेकिन आप तो क्रोध में अंधे हो गये थे. मैंने जब मां को अन्दर बुलाने के लिए रो-रोकर आपसे विनती की तो आपने मुझे भी मां के पास बाहर धकेल दिया. आपने यह भी नहीं सोचा कि आपकी पत्नी और किशोरवय बेटी इस अर्धरात्रि में कहां जाएंगी? अगले ही क्षण उनका अहित हो सकता है. लेकिन हित-अहित की चिन्ता तो वे करते हैं, जिन्हें रिश्तों से लगाव हो.  आप तो हमें बेमन से ढो रहे थे और इतनी जल्दी थक गये कि घास के निर्जीव गट्ठर की तरह उतार फेंका. लेकिन हम इन्सान थे और वो भी जीवित, नारी देह में.

घर के बाहर मां ने अपनी सारी शारीरिक और मानसिक पीड़ा भुला मेरी चिन्ता शुरू कर दी, किशोरवय बेटी को सीने से लगा अपने प्राण हथेली पर ले वह एक अनदेखी, अनजानी राह चल पड़ी.

गली में पसरे भयावह सन्नाटे को चीरती किसी कुत्ते की आवाज़ सुन हम मां-बेटी के रोंगटे खड़े हो जाते. किसी तरह संकट की काली रात आख़िर बीत ही गयी. अगली सुबह हम मां के मायके पहुंचे. जैसी उम्मीद थी, वहां किसी ने हमारे आगमन पर न कोई उत्साह दिखाया और न ही हमारी दुर्दशा पर कोई प्रश्‍न पूछा, लेकिन इतनी जगह तो मिल ही गयी जिसमें हम अपने हाथ-पैर पसार निर्भय हो लेट सकते थे.

आख़िर मां ने अपनी परिस्थितियों से समझौता कर ही लिया. गांव में ही प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने लगी. अपने शरीर को गला-गला कर उसने मुझे पढ़ाया-लिखाया और कभी यह नहीं जताया कि मेरी परवरिश में उसने कितनी पीड़ा सही है. आज उसी मां के ममत्व और त्याग ने मुझे इस योग्य बनाया कि सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध आवाज़ उठा सकूं.

मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम बनाने के अथक प्रयास में मां ने अपने शरीर की घोर उपेक्षा की, परिणामस्वरूप जर्जर काया अनेक रोगों का गढ़ बन गयी और एक दिन मां मुझे छोड़कर हमेशा के लिए चली गयी. मां के दुख-दर्द की अनुभूति ही मेरी कविताओं में अभिव्यक्त हो मारक रूप ले लेती है.

आपने तो शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आपकी ‘बउरहिया’ भविष्य में लेखिका कहलाएगी. ‘मोहिनी’ नाम तो आप ही ने मुझे दिया था. प्रेमपत्र लिखते हुए कभी आपको नहीं लगा कि यह नाम कुछ जाना-पहचाना है. लेकिन लगता भी कैसे, आपके लिए तो मैं परले दर्जे की बेवकूफ़ थी, बउरहिया थी. आपकी यह प्रिय गाली थी मां के लिए भी और मेरे लिए भी. कभी-कभी सोचती हूं काश! मेरे वश में आपको अभिशाप देना होता, तो ज़रूर देती, लेकिन अगले ही पल स्मृति में मां का लहुलूहान चेहरा अस्वीकृति में सिर हिलाता नज़र आता है.

आपको मैं क्या कोई अभिशाप दूंगी. मेरी मां की आह, तड़प आपको कभी-न-कभी तो प्रायश्‍चित की आग में अवश्य ही झुलसाएगी और वह दिन निकट भविष्य में ज़रूर आयेगा, इसी विश्‍वास की दृढ़ता के साथ! सदैव से आपकी उपेक्षित तिरस्कृत-

बउरहिया

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पत्र की अंतिम पंक्ति पढ़ने तक आशुतोषजी के हाथ बुरी तरह कांपने लगे. बदन पसीने से तर-बतर था. इस अप्रत्याशित पत्र ने उनके अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया. आज अपनी ही बेटी के सामने वे अपने आपको बौना महसूस कर रहे थे. उनकी लेखनी, तमाम उपलब्धियां जिन्हें प्राप्त कर वे अपने आपको किसी सफलतम साहित्यकार से कम न समझते और जिनका दंभ भरा करते थे, वही आज उन्हें मुंह चिढ़ा रहे थे, उलाहना दे रहे थे. अनजाने में ही अपनी बेटी के प्रति आए अपने घिनौने और कुविचारों का ख़याल उन्हें कचोटने लगा. मन स्वयं के प्रति नफ़रत से भर गया. बउरहिया की नफ़रत भरी निगाहें अब भी उनका पीछा कर रही थीं.
– सुमन सिंह

 


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Usha Gupta

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