कहानी- दायित्वबोध (Short Story- Dayitvabodh )

एक-दूसरे से मिलने की कल्पनाएं समुद्री लहरों की तरह आकाश को छूने की कोशिश करने लगीं. दोनों के जीवन में फिर से सावन की फुहारें…

एक-दूसरे से मिलने की कल्पनाएं समुद्री लहरों की तरह आकाश को छूने की कोशिश करने लगीं. दोनों के जीवन में फिर से सावन की फुहारें हिलोरे मारने लगीं. प्रेम की बयार के बीच बस एक द्वंद्व कभी-कभी आशु को ज़रूर कचोटता था. जब भी वह कल्पनाओं में अनु के क़रीब जाता था, अनु का पति, बेटी, मोनिका एवं नेहा उसके और अनु के बीच दीवार बनकर खड़े हो जाते थे. तब कई प्रश्नों से घिर जाता था वह.

अख़बार के दफ़्तर से आशु अभी-अभी लौटा था. कॉलोनी के फ़्लैट के सामने कार रोकी, तो पत्नी मोनिका कार की आवाज़ सुनकर भी बाहर नहीं आई. यह कोई नई बात नहीं थी. ऐसा अक्सर होता आया है. वैसे तो आने के समय पर फ्लैट का दरवाज़ा खुला ही रखा जाता था, फिर भी कभी-कभार ज़रूरत पड़ी, तो मोनिका दरवाज़ा खोलने के बाद पीठ पीछे करके सीधे आगे चली जाती थी. आशु इसका आदी हो चुका था, इसलिए अब भावनाएं आहत होने जैसी कोई विशेष बात नहीं थी.
फ्लैट में घुसने के बाद वह टाई को ढीला करके सोफे पर सूट और जूते पहने ही पसर गया. कुछ देर तक यूं ही अधलेटा-सा पड़ा रहा. अक्सर फ्लैट में आने के बाद वह न तो मोनिका को खोजता था, और न ही वह स्वयं ही उसके पास आकर बैठती थी. शुरू में तो लगता था कि घर पहुंचने पर वह उसके पास आकर बैठे, चाय-कॉफी पिए, कुछ बातें करे, लेकिन जब ऐसा होना ही नहीं था, तो उसने भी समझौता कर लिया. ‘क्या सोचा था, क्या हो गया!’ उसने आह भरी और चाय बनाने के लिए किचन में घुस गया. मोनिका बेड पर अधलेटी-सी टीवी देख रही थी. आशु ने चाय का एक कप बिना बोले उसके पास रख दिया और फिर अपना कप लेकर दूसरे कमरे में, जिसे उसने एक ऑफिस में भी तब्दील कर दिया था और जिसमें वह सो भी जाया करता था, चला गया. चाय पीने के बाद उसने मेज़ पर हथेलियां रखकर उन पर सिर टिका दिया.
मोनिका के साथ आशु ने प्रेम विवाह किया था परिवारवालों और समाज की परवाह किए बिना. प्रेम से वशीभूत विवाह बेमेल था. उसकी तुलना में मोनिका की पारिवारिक, आर्थिक एवं शैक्षिक स्थिति बहुत कमज़ोर थी. वह उच्च शिक्षित था, जबकि मोनिका मात्र कामचलाऊ पढ़ी-लिखी. दोनों परिवारों के बीच सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर भी बहुत अंतर था. आशु ने इन सब अंतरों को आदर्श के चोले में छिपाते हुए मोनिका को अपने जीवन में जगह दी थी, लेकिन यथार्थ तो यथार्थ है. उसका कल्पनाओं और भावनाओं से कोई तालमेल हो, यह ज़रूरी नहीं. कभी न कभी वह सामने आता ही है. नेहा के माता-पिता बनने के बाद आशु और मोनिका के बीच अंतरों के कारण तल्ख़ी बढ़ती गई. पहले जिन अंतरों को उपेक्षित किया था, वही अब विवाद की वजह बनकर दोनों के बीच आने लगे. नतीज़ा यह हुआ कि समय बीतने के साथ ही धीरे-धीरे संवादहीनता की स्थिति बनती गई. 24 साल हो गए इस स्थिति में जीते-जीते. नेहा बाहर पढ़ती है. घर में दो ही लोग और दोनों ही मौन.
आशु ने सोचा था, मोनिका उच्च स्तरीय सुविधाएं पाकर बहुत ख़ुश होगी, लेकिन हुआ इसका उल्ट. रिटायरमेंट के बाद पेंशन ही तो मिल रही थी आशु को. उच्च स्तरीय कॉलोनी में रहने का ख़र्च कम नहीं होता. लेकिन मोनिका आर्थिक स्थिति से समझौता करने की बजाय दिनोंदिन बढ़ती जा रही सुख-सुविधाओं की इच्छाओं के मनावाने के लिए बात-बात पर विवाद करते हुए रो-पीटकर, कुतर्कों और अपशब्दों के साथ चीख-चिल्लाकर अपनी ज़िद पूरी कराने लगी. विवाद थमने के बाद भी बहुत देर तक उसका ज़ोर-ज़ोर से बड़बड़ाना जारी रहता. तनाव से बचने के लिए अक्सर वह पार्क में चला जाता, फिर देर रात लौटता. संवादशून्यता की एक और बड़ी वजह यह भी रही.
मोनिका के रोज़मर्रा के तानों से बचने के लिए आशु ने रिटायरमेंट के बाद अख़बार के दफ़्तर में उप संपादक की नौकरी पकड़ ली. उधर मोनिका ने भी अपनी बढ़ती इच्छाओं की पूर्ति के लिए कमाई करने की गरज से ज़बर्दस्ती किराए की दुकान लेकर बुटीक का काम शुरू कर दिया. इससे परस्पर निर्भरता कम हो जाने की स्थिति ने दूरी में और इज़ाफ़ा कर दिया. विवाह के शुरू के दिनों में नेहा के पैदा होने के बाद मोनिका दो बार गर्भवती हुई, लेकिन उसने पारिवारिक कलह, वैवाहिक अस्थिरता और अपने स्वास्थ्य ख़राब रहने की बात कहते हुए दोनों बार आशु की मर्ज़ी के बिना ही गर्भपात करा दिया. इसके बाद तो दूरी ऐसी बढ़ी कि दूसरे बच्चे के जन्मने का रास्ता ही बंद हो गया. आशु को सबसे ज़्यादा नागवार यही लगा. ऐसे में आगे जो परिणति होनी थी होकर रही. पहले बेड अलग हुए और उसके बाद कमरे. दोनों का जीवन पति-पत्नी के दायरे से बाहर निकलकर निजी-सा हो गया.
संवादहीनता के शुरूआती दिनों की परेशानी के बाद आशु और मोनिका दोनों इस स्थिति में एड्जस्ट हो गए. फिर भी जब-तब मोनिका के किसी न किसी बहाने प्रताड़ित करने से उपजे तनाव से बचने के लिए आशु उससे दूरी बनाने लगा. धीरे-धीरे अकेलापन उस पर हावी होता गया. वह नहीं चाहता था कि घरेलू तनाव का बुरा असर नेहा के भविष्य, करियर और वैवाहिक जीवन पर पड़े. इसके लिए मौन और दूरी के अतिरिक्त उसके पास कोई दूसरा विकल्प था भी नहीं. फिर भी जब वह दूसरे परिवारों में पति-पत्नी के बीच प्रेम और अपनापन देखता था, तो दुख की एक टीस-सी ज़रूर दौड़ जाती थी उसके अंदर.

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संयोग किसको किससे कब और कैसे मिला दे, कोई नहीं जान सकता. आशु अपनी कविताएं, गीत-संगीत और साहित्य से जुड़े सोशल मीडिया पर पोस्ट करता रहता था. एक दिन एक महिला फॉलोवर ने प्रशंसा करते हुए लिखा, ‘‘बहुत सुंदर कविता है आपकी, दूसरी कविताएं भी पढ़ना चाहूंगी.’’ यह अनुराधा से उसकी पहली मुलाक़ात थी. आशु ने दूसरी कविता पोस्ट की. इस बार प्रशंसा के साथ ही अनुराधा ने उसे चैटिंग की रिक्वेस्ट भेज दी. आशु ने तीसरी कविता अनुराधा की पर्सनल वाल पर पोस्ट की. इस बार उत्तर आया, ‘‘लगता है बहुत वेदना है आपके अंदर. बुरा न मानें, तो एक बात कहूं, आपकी वेदना कविताओं के माध्यम से बाहर निकल रही है.’’
‘‘ऐसी बात नहीं, बस अपने शौक के लिए लिखता हूं.’’ आशु ने बात टालनी चाही.
‘‘नहीं, आशुजी, आप कुछ छिपा रहे हैं. एक साहित्यकार अमूमन वही लिखता है, जो उसे अंदर से व्यथित करता है. अंदर ही अंदर कोई दुख आपको खाए जा रहा है, वरना कविताओं में इतने आहत से लिपटे शब्द यूं ही नहीं निकलते!’’ उधर से टिप्पणी आई.
कुछ देर तक आशु के मौन रहने पर अनुराधा ने लिखा, ‘‘ठीक है, मत बताइए. मुझे अधिकार भी नहीं है आपके जीवन के टटोलने का. ग़लती हो गई, क्षमा मांगती हूं.’’
‘‘अरे नहीं! लेकिन, अब जो भी है, मुझे ही सहना है, किसी से शेयर नहीं करना चाहता.’’
‘‘कोई बात नहीं, बस, एक मित्र के नाते हमदर्दी-सी उठी थी दिल में. सच तो यही है कि मेरा आपसे कोई संबंध ही नहीं. ग़लती मेरी ही थी, मुझे आपसे पूछना ही नहीं चाहिए था.’’
‘‘कोई बात नहीं’’, आप परेशान मत होइए.’’ आशु ने अनुराधा को सहज बनाने को लिखा.
‘‘जी, ठीक है, कविताएं भेजते रहिए, उसमें तो कोई ऐतराज़ नहीं हैं ना!’’
‘‘जी, भेजता रहूंगा.’’
यह अनुराधा और आशु के बीच पहली बार कुछ लंबी बातचीत थी. रात को सोने से पहले न चाहते हुए भी दो चेहरे रह-रह कर उसके सामने आते रहे, एक मोनिका और दूसरा अनुराधा का. कितना अंतर था दोनों में. एक पत्नी होकर भी उसकी भावनाओं से बहुत दूर थी, एकदम लापरवाह… लापरवाह ही नहीं, बल्कि प्रताड़ित करने, तनाव देनेवाली… और दूसरी अनुराधा, जो बहुत दूर रहते हुए, बिना मिले ही उसकी अंतर्वेदना से कितनी जुड़ती जा रही थी! उस रात बहुत देर तक वह अनुराधा के एक-एक शब्द का अर्थ खोजता रहा. ऐसा करते हुए उसे तनाव से कुछ राहत-सी मिलती लगी.
दूसरे दिन डिनर के बाद आशु कॉलोनी के पार्क में टहलने चला गया अकेले. बीते कई वर्षों से अकेले ही तो घूमने जाता था. अब तो आदत-सी हो गई थी. वह पार्क में पड़ी सफ़ेद पत्थर से बनी बैंच में बैठकर वहां आए लोगों को देखने लगा. अधिकांश लोग अपने परिवार के साथ ही थे. कुछेक पति-पत्नी के जोड़े भी. शायद तीन-चार प्रेमी-प्रेमिका भी पार्क के कोने में बैठे थे. कुछेक लिव इन रिलेशन के भी जोड़े थे, जिनकी थोड़ी-बहुत चर्चा थी कॉलोनी. पॉश कॉलोनी में तो वैसे भी किसी को दूसरे के जीवन में झांकने की ज़रूरत भी नहीं होती. अपने साथियों के साथ कोई घास पर बैठा बतिया रहा था, तो कोई पुरुष एवं महिला एक-दूसरे के हाथों में हाथ डाले टहल रहे थे. ‘मेरे ही भाग्य में ये सब कुछ क्यों नहीं।’ उसने सोचा. उसकी आंखों के सामने फिर मोनिका और अनुराधा के चेहरे घूम गए. वह अपने जीवन के बारे में सोचने लगा, तभी मोबाइल पर एक संदेश का अलार्म बजा. देखा तो, उधर अनुराधा ही थी.
‘‘हाय! आपको डिस्टर्ब तो नहीं किया? बात हो सकती है?’’ उधर से संदेश था.
‘‘नहीं, नहीं, कोई काम नहीं है, पार्क में आया हूं घूमने.’’ आशु ने जवाब दिया.
‘‘आशुजी, आपकी नई कविता भी बहुत इमोशनल थी. मैं इतनी डूब गई उसमें कि अपने उद्गार व्यक्त करने के लिए ख़ुद को रोक नहीं पाई.’’
‘‘अच्छा किया. इससे मुझे आगे और लिखने की प्रेरणा मिलती है.’’
‘‘मैने पहले भी पूछा था, आप टाल गए थे, लेकिन पूछे बिना रह नहीं पा रही हूं. बताइए ना, क्या बात है… मुझ पर विश्‍वास कर हर सुख-दुख को शेयर कर सकते हैं.”
‘‘मैं अपना दुख किसी को बताना नहीं चाहता. बस, इतना समझ लो कि कुछ बातें हैं, जिन्होंने ज़िंदगी के मायने बदल दिए हैं, जो सपने देखे थे, बिखर गए कहीं.’’

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‘‘समझती हूं… और समझती इसलिए भी हूं कि ख़ुद मैं भी जीवन में अधूरेपन से टूट चुकी हूं… अगर शेयर कर लें, तो मन का बोझ हल्का हो जाएगा. हो सकता है नई आशा जन्म ले ले. आपके विश्‍वास को कभी भी टूटने नहीं दूंगी, ये वचन देती हूं.’’
‘‘मैं आपके बारे में ज़्यादा जानता नहीं, कुछ बताइए.’’
इस पर अनुराधा ने जो लिखा, उससे पता चला कि वह मुंबई में रहती है पति और एक बेटी के साथ. पहले पति लखनऊ में सरकारी पद पर अधिकारी थे, फिर रिटायरमेंट के बाद बीते एक साल से अपने मूल निवास मुंबई में शिफ्ट हो गए. खाली समय में पति ने पार्ट टाइम जॉब पकड़ लिया और अनुराधा ने घर संभाला. उसने बताया कि उसके पति को अन्य महिलाओं के साथ संबंध बनाने और ड्रिंक की लत लगी हुई है. इसकी वजह से अक्सर घर में झगड़ा होता रहता था. इसके दुष्प्रभाव से बचाने के लिए उसने बेटी को एमबीए की पढ़ाई के लिए पूना भेज दिया था. स्वयं तनाव से मुक्ति पाने के लिए वह काव्य लेखन और गीत-संगीत में डूब गई. इसके अलावा तो खालीपन ही था उसके जीवन में!
अनुराधा के खुलने के बाद आशु को भी उसके मैसेज की तलब सताने लगी. आत्मीयता बढ़ी, तो दोनों ‘आप’ की जगह ‘तुम’ पर उतर आए. तीसरे दिन जब वह पार्क के किनारे घास पर बैठा था, तो अनु का मैसेज फिर आ गया, ‘‘हाय…! देखो मैं अंदर ही अंदर घुट रही थी, सो तुमसे सब कुछ शेयर कर लिया. अजनबी ही तो हो, फिर भी विश्‍वास किया तुम पर. अब काफ़ी रिलैक्स महसूस कर रही हूं. पता नहीं क्यूं, मेरे अंदर तुम्हारे लिए सहानुभूति पैदा होती जा रही है. कुछ तो बताओ..!’’ संदेश में एक आजिज़ी थी. इधर से चुप्पी बनी रही, तो अनुराधा ने दूसरा संदेश भेजा, ‘‘तुम मुझे अनु कह सकते हो, क्या मैं तुम्हें तुम्हारे नाम से बुला सकती हूं?’’
‘‘अनुजी, मुझे कोई ऐतराज़ नहीं… और वैसे भी एक टूटे हुए आदमी को किसी भी नाम से बुलाया जाए, क्या फ़र्क पड़ता है.’’
‘‘आशु, मैं तम्हारे नाम के आगे ‘जी’ नहीं लगा रही. तुम भी सिर्फ़ अनु कहो. तुम मानो या न मानो, लेकिन मैंने तो स्वीकार कर लिया है कि हम दोनों दोस्त बन गए हैं.’’
आत्मीयता के ऐसे शब्द तो आशु ने कई वर्षों से सुने ही नहीं थे. मोनिका तो सहज भाव से भी बात नहीं करती थी. उल्टा कर्कश शब्दबाणों का प्रहार! दोनों ही नारी हैं, तो क्या इतना बड़ा अंतर हो सकता है एक नारी से दूसरी नारी के बीच! उसने अनु के वाॅल पर उसके चित्र को देखा. लगा जैसे बरसों से पहचानता हो उसे. कुछ भी न होते हुए बहुत कुछ होती जा रही अनु उसके लिए. हल्की-सी मुस्कान तैर गई उसके चेहरे पर. वह अनु के चेहरे में कुछ खोजने लगा.
‘‘क्या हुआ आशु? कहां खो गए..?’’ अनु के संदेश से वह कल्पनाओं से बाहर निकल आया.
‘‘वो मैं तुम्हारा फोटो देखकर सोच रहा था कि कुछ दिन पहले तुम कितनी अजनबी थीं और आज कितने क़रीब आ गईं.’’
‘‘अच्छा जी!’’
‘‘लग रहा है, जैसे बरसों बाद मुझे कोई मेरा अपना मिल गया है.’’
‘‘तो, अपना समझकर ही बता दो, कौन-सा दुख तुम्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा है.’’
इसके बाद दोनों वॉइस मैसेज पर आ गए. आशु ने अनु के सामने अपनी वेदना से भरी किताब का एक-एक पन्ना खोलकर रख दिया. जब कोई अपनत्व दे, तो उसके सामने अंदर के सारे उद्गार न चाहते हुए भी उमड़ ही पड़ते हैं.
‘‘ठीक है, मैं समझ गई. तुम्हारी और मेरी कहानी अलग नहीं है, बहुत कुछ एक जैसी ही है. हम दोनों भी कैसा भाग्य लेकर आए! जीवन एक बार मिला, लेकिन उसमें भी अकेलापन, उदासी… कोई ख़ुशी नहीं, कोई आनंद नही… कोई उमंग नहीं..!’’
‘‘कभी-कभी तो प्रेम विवाह के प्रायश्चित की आग इतना त्रस्त कर देती है कि लगता है आत्महत्या कर लूं या फिर मोनिका के कर्कश व्यवहार से बचने के लिए कहीं बहुत दूर ऐसी जगह चला जाऊं, जहां वह मेरा मरा चेहरा भी नहीं देख पाए.’’
‘‘तुम परेशान मत हो. अच्छा किया जो बता दिया, नहीं तो अंदर की घुटन जीने नहीं देती. अब मैं चलती हूं, कल इसी समय फिर बात करते हैं.’’
इसके बाद जो होना था, वही हुआ, यानी पहले दोस्ती, फिर गहरी अंतरंगता और अंत में प्रेम. सोशल मीडिया पर ही उनके प्रेम की सांद्रता इतनी अधिक बढ़ती गई कि दोनों एक-दूसरे को पति-पत्नी की तरह स्वीकारने लगे और उसी रूप में भावनाएं व्यक्त करने लगे. एक-दूसरे से मिलने की कल्पनाएं समुद्री लहरों की तरह आकाश को छूने की कोशिश करने लगीं. दोनों के जीवन में फिर से सावन की फुहारें हिलोरे मारने लगीं.
प्रेम की बयार के बीच बस एक द्वंद्व कभी-कभी आशु को ज़रूर कचोटता था. जब भी वह कल्पनाओं में अनु के क़रीब जाता था, अनु का पति, बेटी, मोनिका एवं नेहा उसके और अनु के बीच दीवार बनकर खड़े हो जाते थे. तब कई प्रश्नों से घिर जाता था वह. क्या विवाहित पुरुष और महिला के साथ प्रेम संबंध बनाया जाना उचित है? क्या उसके और अनु के बीच जो कुछ भी चल रहा है, वह अनु के पति और मोनिका के साथ विश्वासघात नहीं है? साथ ही यह आशंका भी कि अगर धोखे से भी अनु के पति और मोनिका को पता चल गया तो क्या होगा? मोनिका तो प्रलय ले आएगी! उधर अनु का पति भी उसका न जाने क्या हाल करे! बात खुलने पर सामाजिक प्रतिष्ठा गिरने के साथ ही कहीं क़ानूनी शिकंजे में फंस गया तो? और इससे भी ऊपर मोनिका और नेहा के प्रति दायित्वबोध का एहसास. द्वंद्व से लिपटा यह कैसा भंवर था! एक ओर प्रेम और आत्मीयता की भूख शांत करने की सुखद स्थिति और दूसरी ओर अपनी ही नज़रों में गिरते हुए आत्मग्लानि के थपेड़े एवं पारिवारिक दायित्व का बोझ!
जब यह घुटन असहनीय हो गई, तो एक दिन उसने अनु से अपनी वेदना कह ही दी, ‘‘अनु, हम दोनों विवाहित हैं, क्या हमारे बीच इस तरह के संबंध सही हैं?
‘‘इसमें ग़लत क्या है? जो हमारे साथ हैं, उनका व्यवहार देखो. क्या हमें ख़ुशियों के साथ जीने का कोई अधिकार नहीं है ?’’ उधर से अनु ने दो टूक अपना फ़ैसला सुना दिया कि अगर वे प्रेम बंधन में हैं, तो अपने जीवनसाथियों की उपेक्षा और प्रताड़ना के कारण ही हैं. वे ही दोषी हैं इस स्थिति के लिए.
‘‘वो कुछ भी करें, फिर भी हमारे दायित्व हैं उनके लिए. वो हमारे साथ एक बंधन में बंधे हैं.’’
अनु तो जैसे हर सवाल का तार्किक जवाब लेकर ही बैठी थी. उसने लिखा, ‘‘तो उनके प्रति दायित्व निभा तो रहे हैं. क्या सारे दायित्व हमारे ही हिस्से में हैं, उनका कोई दायित्व हमारे लिए नहीं है? जहां तक वैवाहिक बंधन की बात है, तो वो तभी तक मर्यादित रह सकता है, जब पति-पत्नी दोनों ही एक-दूसरे की भावानाओं को समझें, एकतरफ़ा रस्मे मोहब्बत कब तक निभाई जाएगी, समझे मिस्टर!’’

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जब इधर से कोई उत्तर नहीं गया, तो अनु ने फिर कहा, ‘‘मेरे पति और तुम्हारी पत्नी प्रताड़ना की कोई सीमा नहीं छोड़ रहे, और हम पूरी तरह उनके प्रति समर्पित रहें, ये क्या बात हुई!.. वैसे देखा जाए, तो वो ही संबंधों की मर्यादा तोड़ रहे हैं, जबकि हम एक-दूसरे से सिर्फ़ निश्कलंक प्रेम ही तो पा रहे हैं, और वो भी बिना किसी वासना के.’’
‘‘फिर भी समाज की मर्यादाएं तो हम तोड़ ही रहे हैं ना!’’
‘‘हम कोई मर्यादा नहीं तोड़ रहे हैं. मैं और तुम बहुत दूर हैं. मिलना, स्पर्श करना तो दूर, आमने-सामने बात भी नहीं हो रही है.’’ फिर आगे भावुकता से भरे शब्द, “देखो, हम एक-दूसरे से शायद ही कभी मिल पाएं. मैं जानती हूं तुम्हारी और अपनी सीमाएं. ऐसे में अगर भावनाएं शेयर करके एक-दूसरे की प्रेम की भूख शांत कर ले रहे हैं, तो इसमें बुराई क्या है? किसी को भी दुख दिए बिना कुछ ख़ुशियां चुरा ले रहे हैं, तो ग़लत क्या है?’’
अनु के तर्कों के सामने आशु की आत्मग्लानि टिक न सकी. वह एक अलौकिक आनंद से भर उठा. उसे लगा जैसे वह नीले आसमान में फैले बादलों के बीच अठखेलियां कर रहा हो. फौरन लिखकर अनु का आभार जताया, ‘‘तुम्हारे विचारों के आगे नतमस्तक हूं. तुम सही कह रही हो, मन का बोझ हल्का हो गया. अनु, सच तो यह है कि तुमसे भावनाओं की शेयरिंग करके अपने आपको बहुत तनावमुक्त और ख़ुश पाता हूं. मुझे लगता है, ऐसा ही तुम्हारे साथ भी होगा.’’
‘‘घर में ख़ुशियां नहीं मिलेंगी, तो बाहर तो खोजी ही जाएंगी ना! मनुष्य कोई पत्थर नहीं है, उसमें भावनाएं होती हैं. शरीर के साथ ही भावनात्मक संतुष्टि भी ज़रूरी है. मैं तो यहां तक कहूंगी कि अगर यह संतुष्टि मिल जाए, तो शारीरिक तृप्ति की भी उतनी तीव्रता नहीं रह जाती.’’
‘‘अरे तुम तो एकदम दार्शनिक हो गईं, लेकिन संबंधों को छुपाना तो ग़लत है, पारदर्शिता तो होना चाहिए.’’
‘‘फिर वहीं पर आ गए. अरे, ये कोई चोरी नहीं है और न ही कोई धोखा है. कुछ चीज़ें सही होती हैं, फिर भी छुपाकर रखनी ही पड़ती हैं बुद्धूराम, समझे या नहीं. सामने होती, तो इस बात पर तुम्हें आंख ज़रूर मारती!’’
आशु की समझ में ही नहीं आया कि अब क्या कहे, बस, ‘‘अनु, तुम भी!’’ लिखकर रह गया.
‘‘किसी को कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है, ज़्यादा सत्यवादी मत बनो.’’
अनु के तर्क संकोची प्रवृति के आशु के लिए आत्मग्लानि और तनाव से मुक्ति दिलाने में बहुत सार्थक सिद्ध हुए. आगे चलकर मोबाइल फोन पर बहुत-सी बातें बेबाक़ी से होने लगीं, जिससे घरों में फैली संवादहीनता से उपजे तनाव से राहत मिलने लगी थी. दोनों अपनी कल्पनाओं के चित्र खींचते और घंटों उनमें डूबे रहते. कभी हाथों में हाथ डाले हिल स्टेशन पर घूमने, कभी बारिश में भीगने, कभी किचन में मनपसंद डिश बनाने, तो कभी शाम को समुद्र की रेत पर घंटों बैठे रहने के सपने देखते. अनु तो वैसे ही बहुत मुंहफट थी. जबnकभी आशु थोड़ा गंभीर-सा लगता तो ठंड में एक ही रज़ाई में घुसकर चिपट जाने और उससे आगे की भी बातें करने लगती. वह ठिठोली कर उसे छेड़ती कि कितने बच्चे चाहिए उसे. कभी-कभार आशु भी कह देता, ‘कब तक बचोगी, जिस दिन मिलोगी, भगा ले जाऊंगा, समझीं!’ तब दोनों देर तक हंसते रहते.
आशु और अनु दोनों दिनोंदिन प्रेम के असीम आनंद में और गहरे डूबे जा रहे थे. यह वो प्रेम था, जो बढ़ती उम्र में भी उन्हें किशोरावस्था के आवेग से भरपूर रोमांस का एहसास करा रहा था. समय बीता, तो प्रेम की सांद्रता और बढ़ती गई और इसी के साथ रू-ब-रू मिलने की इच्छा भी तेज़ होती गई. दोनों जानते थे कि उनके वास्तविक मिलन की तो कोई संभावना है ही नहीं, फिर भी लगता था कि जीवन में एक बार उस अजनबी साथी को देख तो लें, चंद लम्हे उसके साथ बिता तो सकें, जिसने रेगिस्तान-से जीवन में हरीतिमा ला दी थी.

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अतीत की घटनाएं आशु के मानस पटल पर चलचित्र की तरह चल ही रही थीं कि अनु के मैसेज की सांकेतिक घ्वनि उसे वर्तमान में ले आई. इस बार मैसेज में अनु ने उससे कम से एक बार रु-ब-रु मिलने की इच्छा जताई थी. अनु ही नहीं वह स्वयं भी अनु से एक बार मिलना चाहता था. तय यह हुआ कि दोनों मुंबई के समुद्री तट पर किसी पार्क में मिलें, किसी गेस्ट हाउस में रुकें, ढेर-सारी बातें करें, 2 दिन घूमें-फिरें, फिर वापस अपने परिवारों में लौट जाएं. इस पर दोनों बहुत देर तक सोचते रहे और प्रेम की भावनाओं को शेयर करते रहे.
आशु और अनु दोनों के अपने-अपने परिवारों में दूरियां इस हद तक बढ़ चुकी थीं कि कौन कहां जा रहा है, इसको बताने की भी ज़रूरत नहीं रह गई थी. उस रात बहुत देर तक आशु सो नहीं सका. रह-रहकर कभी उसे अनु का प्रेम बुलाता, तो कभी अपराधबोध घेर लेता. लेकिन अंततः प्रेम की ही जीत हुई. उसने पक्का इरादा कर लिया कि ऑफिस से एक सप्ताह का अवकाश लेकर ट्रेन से मुंबई के लिए निकल जाएगा. मोनिका से पूछने का तो कोई अर्थ ही नहीं था, क्योंकि वह तो उसके घर में होने या न होने से एकदम निरपेक्ष थी. अक्सर तो वह घर में रहने पर ही उसे कोसती-पीटती रहती थी.
मुंबई के लिए सीधी ट्रेन सुबह दस बजे जाती थी. आशु सुबह जल्दी ही उठ गया. उसने सप्ताह भर के लिए रोज़मर्रा का ज़रूरी सामान एक छोटे से सूटकेस में ठूंसा और डाइनिंग टेबल पर एक काग़ज़ पर ‘एक ज़रूरी काम से एक सप्ताह के लिए बाहर जा रहा हूं ’ लिखकर मोनिका के कमरे में झांका. वह अपने कमरे में ब्रेकफास्ट लेते हुए टीवी देखने में मशगूल थी. आशु ने कुछ कहना चाहा, लेकिन संबंधों के बीच टूटन के चलते होंठों पर शब्द ही नहीं आ सके.
लंबा सफ़र था. ट्रेन को दूसरे दिन सुबह मुंबई पहुंचना था. मुंबई में स्टेशन से उसे उस पार्क में जाना था, जहां अनु को आना था. स्टेशन पर भीड़ थी. कई अनजाने चेहरों के बीच कुछ चेहरे जाने-पहचाने भी मिले. उनसे अपने को बचाता हुआ वह कंपार्टमेंट में घुस गया. फिर भी उसे लगा कि जैसे लोग उससे पूछ रहे हों, ‘आशु बाबू, किधर?, क्या लंबे सफ़र पर जा रहे हो ?’ वह जल्दी से अपनी बर्थ पर चला गया. बैठने के कुछ देर बाद हाथों पर अपना सर टिकाकर आंखें बंद कर लीं. थोड़ी देर में जैसे ही ट्रेन चली, मोनिका और नेहा के चेहरे सामने आने लगे. ध्यान हटाने के लिए उसने खिड़की के शीशे से बाहर झांका. बाहर तेज़ी से पीछे भागते पेड़ों को देखकर लगा कि जैसे उसका भी सब कुछ छूटा जा रहा है. उसने फिर आंखें बंद कर लीं और लेट गया. गाड़ी के हिचकोलों ने उसे नींद की आग़ोश में जा धकेला.
दूसरे दिन तड़के सुबह जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर रुकी, आशु का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. यही तो वह शहर है, जहां अनु रहती है. हज़ारों मील दूर से अब वह उसके कितने क़रीब आ गया था. बीते एक साल से वह सिर्फ़ कल्पनाओं में ही तो अनु के शहर को छूता रहा था और उसकी कॉलोनी, उसके फ्लैट को जानेवाली सड़क ओर फ्लैट के चित्र मन ही मन बनाता रहा था. अजीब रोमांच से भर गया वह. फ्रेश होने के बाद वह स्टेशन के बाहर आकर घास के मैदान में अधलेटा-सा बैठ गया. अनु ने बताया था कि स्टेशन से उसकी कॉलोनी का टैक्सी से कोई 10 मिनट का रास्ता था यानी अनु बिल्कुल पास ही है! क्या कर रही होगी इस वक़्त! उसने तुरंत फोन पर पूछा, ‘‘अनु, मैं स्टेशन पर आ गया हूं. तुम कहां हो?’’
‘‘तुम्हारे दिल में, तुम्हारे पास!’’ पहले अनु ने छेड़ा उसे, फिर बोली, ‘‘तुम सनराइज़ पार्क पर पहुंचो, मैं वहीं हूं. टैक्सीवाले को बोलना, ले आएगा. सीधा रास्ता है, यही कोई आधा घंटा लगेगा.’’
‘‘पहचानूंगा कैसे?”
‘‘तुम्हारी पसंद की पीली साड़ी में, जिस पर लाल फूल हैं और नीले रंग का बाॅर्डर है. चेहरा तो कई बार देख ही चुके हो फोटो में… और सपनों में भी तो!.. और तुम… तुम्हें कैसे पहचानूंगी?’’
‘‘वही रूप जिसे तुम पसंद करती हो- काला कोट, काली पेंट, काला हैट और काला चश्मा.’’
जिस समय आशु पार्क में पहुंचा, वहां काफ़ी भीड़ और गहमगहमी हो गई थी. रविवार के अवकाश का दिन था, शायद इसलिए भी. वह पार्क के एक कोने में अशोक के पेड़ के पीछे खड़ा हो गया. दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था. भावुकता से वशीभूत अपने को सहज नहीं रख पा रहा था. संकोची और भावुक प्रकृतिवालों का ऐसे समय में यही हाल होता है. कुछ सहज होने पर उसने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई. अधिकांश रूप में तो सभी जोड़ों में नज़र आ रहे थे. ‘अनु कहां है?’’ उसने सोचा. फिर तुरंत अंदर ठहाका-सा गूंजा, ‘‘क्यों, खा गए धोखा, नहीं पहचान पाए उसे, जिसके सपने रातोंदिन देखा करते थे. अरे, सामने एक बेंत की कुर्सी पर अनु ही तो बैठी थी, पीली साड़ी में. वह रह-रहकर इधर-उधर देख रही थी. आशु थोड़ा आगे बढ़कर दूसरे पेड़ के पीछे खड़ा हो गया. अनु की ब्लाउज़ से कुछ खुली गोरी पीठ का हिस्सा उसकी आंखों के सामने था. फिर वह जैसे ही खड़ी हुई, आशु ने एक नज़र में उसके पूरे शरीर को देखा. बढ़ती उम्र में भी सौंदर्य की प्रतिमा थी अनु. बीते एक साल से उसकी कल्पना में रहनेवाली अनु आज यथार्थ में उसके सामने थी.
कुछ देर में आशु सहज होने पर अनु की तरफ़ बढ़ा. तभी ‘‘पापा..!’’ शब्द की आवाज़ ने उसे बुरी तरह चौंका दिया. नेहा और यहां ? क्या मोनिका और नेहा यहां तक आ गए? उसने उस ओर देखा जिधर से आवाज़ आई थी. एक बच्ची अपने पापा को पुकार रही थी. ‘ओह! हू-ब-हू नेहा जैसी आवाज़!’’ उसने राहत की सांस ली, लेकिन वह आवाज़ उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी. द्वंद्व से भरे विचारों का मंथन एक बार को फिर शुरू हो गया, ‘यह ठीक है कि घर में वेदना देनेवाली मोनिका के बदले प्रेम देनेवाली अनु मिल गई है, लेकिन क्या अनु सदा के लिए उसकी हो सकती है? उसकी और अनु की प्रेम कहानी आख़िर कब तक चलेगी? कितनी उम्र बची है अनु के साथ संबंधों के लिए? अनु ने एक बार स्वयं उससे कहा था कि इस जन्म में तो उनका मिलना संभव नहीं है, अगला जन्म लेना पड़ेगा. यथार्थ तो यही था कि इस जीवन में उसे और अनु को अपने-अपने जीवनसाथी के साथ ही रहना होगा. और फिर 60-61 वर्ष की आयु के बाद समय ही कितना बचता है?

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विचारों का प्रवाह आगे बहा, तो आशु के सामने नेहा का चेहरा आ गया, जो अनु और उसके चेहरों के बीच में आकर ठहर गया. नेहा अभी पढ़ रही थी, उसका करियर बनना और विवाह होना था. अगर अनु और उसके संबंध और प्रगाढ़ होते गए, तो शायद अंतरंग क्षणों में दोनों अपने आपको रोक नहीं पाएंगे, फिर दैहिक मिलन का ऐसा जुनून सवार होगा कि घर लौटना मुश्किल हो जाएगा. दायित्वबोध की तीव्रता ने उसे स्थिति पर मंथन के लिए मजबूर कर दिया.
उसने एक नज़र फिर अनु पर डाली. वह परेशानी और निराशा के मिलेजुले भावों से लिपटी चारों तरफ़ देख रही थी. वह खोज रही थी अपने उस प्रेमी को जिसे इतना चाहा था कि आगे के दो दिनों में अगर शरीर भी सौंपना पड़ता, तो ख़ुशी ही होती उसे. वह थोड़ा आगे बढ़ा और गुलमोहर के पेड़ की दो शाखाओं के बीच में से उसे एकटक देखने लगा. कितना सौंदर्य, कितना भोलापन और साथ में कितनी व्यग्रता! वो क्षण आशु के लिए असीमित द्वंद्ववाले थे. एक तरफ़ घर और नेहा का भविष्य और दूसरी तरफ़ अनु का प्यार! ऐसे में क्या करे…! वह झुंझला गया. तभी अनु उसे खोजती हुई उसी की तरफ़ आने लगी. अब समय नहीं था कुछ भी सोचने का, दो टूक फ़ैसले की घड़ी आ गई थी. आख़िरकार दायित्वबोध की जीत हुई. उसने एक निर्णय लेकर अनु के साथ जुड़ी भावनाओं को शून्य कर उसकी तरफ़ पीठ कर ली और तेज़ी से आगे बढ़ा, लेकिन तब तक अनु उसके चेहरे की एक झलक देख चुकी थी.
‘‘आशु !.. आशु..!’’ पहली बार आशु के कानों में अनु की वास्तविक आवाज़ ने घर बनाया, लेकिन वह रुका नहीं, तेज़ी से पार्क के बाहर निकल गया. अनु भी तेज़ी से उसके पीछे चलते हुए पुकारती जा रही थी, ‘‘आशु… आशु… रुको ना!.. रूको तो..! कहां जा रहे हो… देखो मैं यहां हूं, तुम्हारे पीछे..!’’ साड़ी के कारण वह चाहकर भी आशु के बराबर तेज़ नहीं चल पा रही थी. उसकी आवाज़ सुनकर कुछ लोग दोनों को देखने लगे, लेकिन इससे बेख़बर दोनों ही आगे बढ़ते जा रहे थे. आशु ने अनु की पुकार अनसुनी कर अपनी चाल और तेज़ कर दी और सामने जाती टैक्सी को देखकर चिल्लाया, ‘‘टैक्सी..!’’ अनु जब तक उसके पास पहुंचती, वह टैक्सी में बैठ गया और दरवाज़ा बंद कर लिया. पल भर में टैक्सी ओझल हो गई और अनु उसका पिछला हिस्सा देखती रह गई. आंसुओं की बूंदें उसके गालों पर होते हुए नीचे टपकने लगीं.
प्लेटफार्म पर पहुंचकर आशु दिल्ली जानेवाली ट्रेन के कंपार्टमेंट में जा घुसा. उसे मन की यह दुर्बलता अब भी सता रही थी कि कहीं अनु उसे खोजती हुई यहां तक न आ जाए. कंपार्टमेंट का वह हिस्सा बिल्कुल ख़ाली था. वह खिड़की के पास बैठकर उत्सुकता से बाहर देखने लगा. कमबख़्त ट्रेन चल क्यों नहीं रही है, उसने सोचा और आंखें बंद कर लीं. लेकिन कब तक! बंद आंखें भी अनु का चेहरा छुपा नहीं सकीं. उसने माथा पकड़ लिया और फिर से प्लेटफार्म में आते-जाते लोगों को देखने लगा.
आशु के मन में विचारों का तूफ़ान थमने का नाम नहीं ले रहा था, ‘जीवन आख़िर है क्या? क्या मिलने-बिछुड़ने की अनिश्चित घटनाओं की श्रृंखला है जीवन? क्या यह अकाट्य सत्य है कि कोई भी रिश्ता स्थाई नहीं होता और कभी न कभी उसका अंत होता ही है? तो लोग आख़िर मिलते ही क्यों हैं, जो उन्हें अलग होना पड़े. काश! वह सोशल मीडिया की उस साइट पर नहीं होता, काश! उसे अनु नहीं मिली होती! लेकिन यथार्थ तो अब यही है कि वह मिली भी और उसके जीवन का अटूट हिस्सा भी बन गई. रह-रहकर अनु के साथ का सारा अतीत उसके सामने आने लगा. इसी बीच ट्रेन ने सीटी दी. उसने कुछ राहत की सांस ली, लेकिन यह क्या! जैसे ट्रेन के पहिए घूमे, प्लेटफार्म की भीड़ में एक बार फिर से वहीं जाना-पहचाना चेहरा पलभर को दिखाई दे गया. तो अनु उसे पाने के लिए यहां तक आ गई! उससे अनु का इधर-उधर उसे खोजता बदहवास चेहरा देखा नहीं गया. लगा कि फ़ौरन ट्रेन से उतरकर उसे अपने आलिंगन में बांध ले सदा के लिए. घबराकर उसने नज़रें हटा लीं. अब अगर एक पल के लिए भी अनु का चेहरा देखा, तो शायद वह यहां से कभी वापस नहीं जा सकेगा, उसने सोचा. ट्रेन ने थोड़ी गति पकड़ी, तो उसने एक बार फिर मुड़कर पीछे देखा. उसे अनु की झलक भीड़ में गुम होती दिखाई दी. मुंह पर हाथ रखकर रो पड़ा वह. आंसुओं की धार उसके चेहरे पर बिखरने लगी.

असलम कोहरा

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Usha Gupta

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