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कहानी- जादूगरनी (Short Story- Jadugarni)

“ऐसे नहीं पापा, ” उसने आकर मेरी पीठ पर हाथ लगाकर मुझे उठाया, “बैठकर खांसो… फिर से…”
एकदम गुड़िया जैसी मेरी बिटिया, एकदम मेरे पास बैठी थी.. दीन-दुनिया से बेख़बर, कितनी मासूम… मेरा मन भर आया, मैंने उसका माथा चूम लिया.
“अरे, अभी मैं डौटर हूं… पेशेंट लोग ऐसे नहीं करते.” उसने घूरा… मैं खिलखिला कर हंस दिया, ऐसा लगा जैसे आसपास बिखरा कुहरा खुल रहा हो…

“पापा, ये देखिए छुटकी ने क्या किया…” घर में घुसते ही मेरे दस साल के बेटे ने अपने गाल पर खरोंच का निशान दिखाया.
“लेकिन मुझे पता है, उसको आप कुछ नहीं कहेंगे.”
मैं आज किसी को कुछ भी कहने की हालत में नहीं था. ऑफिस में क्या बवाल चल रहा था, कल सुबह तक अगर रिपोर्ट तैयार ना हुई, तो मुझे कितना बड़ा नुक़सान हो सकता था… दिमाग़ में यही बात घूम रही थी और इसी बात के साथ दिमाग़ भी.
“कहीं जा रही हो क्या?” पानी का ग्लास लेकर आई पत्नी की साड़ी पर मैंने गौर किया.
“बताया तो था सुबह कीर्तन है मंदिर में. रिंकू, जल्दी जैकेट पहन बेटा… छुटकी घर ही पर है, देखिएगा उसको.” ग्लास लगभग मेरे हाथ में जबरन थमाते हुए वो बाहर की ओर दौड़ी.

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मन में एकदम से कुछ टूट गया. क्या मेरी शक्ल ऐसी है कि मैं परेशान हूं, तो भी सामान्य दिखता हूं? जैसे मैं बाहर से आकर इसको देखकर जान जाता हूं कि कुछ हुआ है घर में, वैसा इसको कभी क्यों नहीं लगता?
रोकते हुए भी मेरे मुंह से एक अनुरोध निकल ही गया, “थोड़ा रुककर चली जाना… सिरदर्द हो रहा है.” शायद आख़िरी शब्द बोलते-बोलते मैं तकिए पर सिर टिकाकर आ़खे बंद भी कर चुका था. ना तो मेरे अनुरोध पर गीता की प्रतिक्रिया मैंने देखी, ना देखने का मन था. बस मन ये था कि गीता मेरे सिरहाने आकर बैठे और पूछे, “क्या हुआ? ऑफिस में कोई बात हो गई क्या?”
और मैं बिना जवाब दिए बस ये फ़िक्र महसूस करता रहूं. इसी पल में जीता रहूं.
वो फिर से एक बार पूछे, “सही सही बताइए, आपको मेरी क़सम.”
और मैं उसके इस प्रेम से तृप्त होकर उसकी हथेली हाथ में लेकर कहूं, “बहुत दिनों से तुमने मेहंदी नहीं लगाई?”
अचानक कुछ आवाज़ सुनकर, ऐसे मीठे विचारों की दुनिया से बाहर आकर आंखें खोलीं, गीता बगलवाली कुर्सी पर बैठी पर्स में कुछ ढूंढ़ रही थी.
“और बताओ… दिन कैसा रहा?” मुझे इसका जवाब नहीं, बदले में यही सवाल सुनना था… आज तो सुनना ही था.
“आराम किया दिनभर, काम ही क्या है मेरे पास.” नुकीले तीर जैसा ताना आकर सीधे मेरे दिल में लग गया.
“दिनभर घर के काम में खटो, फिर बच्चों के झगड़े सुलझाओ… ये लड़की चार साल की भी हुई नहीं और ग़ुस्सा देखो… देखा आपने? कैसे नोचा है रिंकू को?”
मैंने फिर से आंखें बंद कर लीं. मैं अगर यहीं इसी समय मर जाऊं, तो किसको फ़र्क़ पड़ेगा? शायद किसी को भी नहीं… दिल में कुछ अजीब सा घुमड़ रहा था, आंखों तक भी पहुंच रहा था… मेरे अंदर और कुछ सुनने की शक्ति नहीं बची थी, निचुड़ रहा था मैं धीरे-धीरे, हर बीतते पल के साथ…

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“सुन रहे हैं? आप डांटते ही नहीं उसको… आते समय फोन भी नहीं किया आपने… नींबू नहीं है घर में, अदरक भी मंगानी थी ” मेरी तकलीफ़ से बेख़बर गीता, अपनी  समस्याओं की गठरी खोलती जा रही थी. मेरे लिए ये माहौल असहनीय होता जा रहा था, बमुश्किल आंखें खोलकर मैंने धीरे से कहा, “तुम हो आओ मंदिर… जाते समय लाइट बंद कर जाना, सिरदर्द हो रहा है…”
कमरे मे बहुत हल्की रोशनी का बल्ब जलाकर गीता चली गई. मैं अपने आप को उस बल्ब जैसा ही महसूस कर रहा था… धीरे-धीरे टिमटिमाता हुआ, ना भी हो कमरे में तो कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा… आंखें भरी हुई थीं… आंसू बार-बार लुढ़ककर कान तक आ रहे थे.
“डौटर डौटर खेलेंगे?” पता नहीं, कब कहां से बिटिया एकदम से आकर सिरहाने खड़ी हो गई थी. मैंने शर्ट की आस्तीन से आंखे पोंछकर उसको ऊपर बिस्तर पर बिठाया. बिना मेरी स्वीकृति की प्रतीक्षा किए वो बड़ी तल्लीनता से, डौटर डौटर खेल का सामान बैग से निकालती रही. मैं लेटे-लेटे उसको देखता रहा.. चुपचाप.
“अब ना पापा आप.. ऐसे करके खांसो.” उसने स्टेथोस्कोप लगाते हुए खांसकर बताया.
ओह! ये ‘डॉक्टर डॉक्टर’ खेल रही है.
“अच्छा…” मैंने खांसने की कोशिश की.
“ऐसे नहीं पापा.” उसने आकर मेरी पीठ पर हाथ लगाकर मुझे उठाया, “बैठकर खांसो… फिर से…”
एकदम गुड़िया जैसी मेरी बिटिया, एकदम मेरे पास बैठी थी.. दीन-दुनिया से बेख़बर, कितनी मासूम… मेरा मन भर आया, मैंने उसका माथा चूम लिया.
“अरे, अभी मैं डौटर हूं… पेशेंट लोग ऐसे नहीं करते.” उसने घूरा.. मैं खिलखिला कर हंस दिया, ऐसा लगा जैसे आसपास बिखरा कुहरा खुल रहा हो…
“लेकिन डॉक्टर, मेरा सिर बहुत दर्द कर रहा है..” मैंने माथे पर हाथ रखते हुए कहा.
“अच्छा, तो फिर लेट जाओ… आंखे बंद करके.” एकदम गंभीर होकर मुझे आदेश देते हुए और कंबल से मुझे अच्छी तरह ढकते हुए वो बार-बार अपने माथे पर आए बाल हटाती जा रही थी… ये पल कैसा था, ये बताना मुश्किल है… बस कुछ ऐसा कि उस छोटे से बल्ब से भी कमरे में रोशनी बढ़ती जा रही थी.
“ये वाली दवा अभी पीनी है, कड़वी है…” एक छोटी-सी प्लास्टिक की शीशी मेरे मुंह मे लगाकर उसने वापस सामान में रख दी. मैंने देखा उसके सामान में एक ट्यूब जैसी भी थी, मैंने पूरा अभिनय करते हुए कहा, “डॉक्टर! ये भी लगा दीजिए मेरे माथे पर.. प्लीज़.”
“अच्छा.. ठीक है.” फिर पता नहीं क्या-क्या सामान उठाकर, दाएं-बाएं रखकर, मेरे सिरहाने आकर बैठ गई…थोड़ी देर में, छोटे-छोटे नाज़ुक हाथ मेरे माथे को सहला रहे थे, मेरी आंखें बंद थीं.. लेकिन मुझे वो दिख रही थी.  अभी भी अपने चेहरे पर से बाल हटाती हुई मेरी गुड़िया उतनी ही गंभीर डॉक्टर के रोल में होगी. जैसे-जैसे उसके हाथ मेरे माथे को, मेरे बाल को सहला रहे थे, मैं हल्का होता जा रहा था; थोड़ी ही रिपोर्ट बची है, रात तक तो बन ही जाएगी… गीता को लेकर भी मन से रोष कम हो रहा था, थक जाती होगी वो भी तो.
“पापा को एक बात बताओगी..” मैंने अपने माथे पर रखा उसका हाथ  सहलाते हुए पूछा, “भइया को क्यों मारा था?”

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“मारा नहीं था पापा.. नोंचा था…” भोला-भाला एक जवाब आया. मैं आंखें बंद किए हुए मुस्कुरा दिया.
“हां, तो क्यों किया था ऐसा…” उससे बात करते हुए मुझे लग रहा था, मेरे आस-पास सब कुछ तो ठीक है, उतना भी ख़राब नहीं है.
“भइया ने मुझे डॉटरनी कह दिया था… मैं वो थोड़ी हूं…” आवाज़ में गुस्सा आ गया था. मैं एकदम से हंस दिया. ‘डॉक्टरनी’ शब्द इसको ‘डॉक्टर’ जितना शायद अच्छा नहीं लगा होगा.
“अच्छा मैं भइया को मना कर दूंगा, लेकिन अब लड़ाई नहीं करना.” उसके हाथ मेरे माथे को फिर से सहलाने लगे थे. मैं मुस्कुरा रहा था, महसूस कर रहा था, मेरे आसपास सब ठीक ही नहीं, बल्कि अच्छा है, बहुत अच्छा है. मैंने उसको बुलाकर अपने बगल में बैठा लिया, वो अभी भी थोड़ी परेशान थी.
“आप बोलोगे ना भइया से… मैं डॉटरनी नहीं हूं…” संशय से भरकर पूछते हुए उसने फिर माथे पर आए अपने बाल हटाए.
“और क्या!  मेरी बिटिया डॉक्टरनी थोड़ी है,” मैंने उसके बाल अपने हाथ से ठीक करते हुए, उसका  चेहरा अपनी हथेलियों में भर लिया, “मेरी बिटिया तो जादूगरनी है!”

लकी राजीव

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Photo Courtesy: Freepik


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Usha Gupta

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