पराए होते बेटे, सहारा बनतीं...

पराए होते बेटे, सहारा बनतीं बेटियां ( Are theirs sons, daughters evolving resort)

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‘बेटियां तो पराया धन हैं, बेटे ही हैं जो हमारी पीढ़ी को आगे बढ़ाते हैं.’ सदियों से चली आ रही ये कहावत वर्तमान स्थिति में ग़लत साबित हो रही है. डोली में बैठकर मायके के आंगन से विदा ज़रूर होती हैं बेटियां, लेकिन परायी नहीं. बदलते समाज में अधिकतर बेटे जहां अपने ही माता-पिता से दूर होते जा रहे हैं, वहीं बेटियां अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बन रही हैं. समाज में आए इसी बदलाव पर पेश है, हमारी ख़ास रिपोर्ट.
जब बेटों ने नकारा, बेटियों ने दिया सहारा
गोरखपुर के रहने वाले रामचरण (परिवर्तित नाम) के दो बेटे और एक बेटी है. 80 साल के रामचरण पिछले दो सालों से डिमेंशिया नामक बीमारी से पीड़ित हैं. रामचरण का एक बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और दूसरा क्लर्क. एक बेटा नोएडा तो दूसरा इलाहाबाद में रहता है. रामचरण अकेले ही अपनी पत्नी के साथ गोरखपुर में रहते हैं. बीमारी के चलते उन्हें हफ़्ते में एक बार लखनऊ जाना पड़ता है. अपने-अपने परिवार में व्यस्त रामचरण के दोनों बेटों के पास पिता को लखनऊ ले जाने का समय नहीं, इसलिए रामचरण की बेटी पूजा (बदला हुआ नाम) हर हफ़्ते अपने पिता को लखनऊ ले जाती है. अपने दोनों बेटों से उम्मीद छोड़ चुके रामचरण आज अपनी बेटी पर गर्व करते हैं.
मुंबई के गोरेगांव में रहने वाले 60 साल के अब्दुल ख़ान (परिवर्तित नाम) और उनकी पत्नी फातिमा (परिवर्तित नाम) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. अब्दुल इस समय कैंसर से पीड़ित हैं और आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है.अब्दुल का बेटा इस समय दुबई में अपने परिवार के साथ रहता है, लेकिन अपने अब्बा की देखभाल के लिए उसके पास समय नहीं है. अब्दुल के इस मुश्किल दौर में उनकी बेटी सोमय्या (बदला हुआ नाम) ससुराल की बजाय मायके में रहकर अपने पिता की सेवा कर रही है.
उत्तर प्रदेश के जौनपुर में रहने वाली रिटायर टीचर विमला देवी को शायद ही पहले पता था कि उम्र के आख़िरी पड़ाव पर उनका बेटा विशाल नहीं, बल्कि बड़ी बेटी बीनू उनका सहारा बनेगी. हमसे बातचीत के दौरान ख़ुद विमला देवी ने इस बात को स्वीकारा कि किस तरह पति की मृत्यु के बाद घर की आर्थिक स्थिति ख़राब होने पर उन्होंने अपनी बेटी बीनू की पढ़ाई रोक दी और बेटे विशाल की पढ़ाई को जारी रखा. आज जब विशाल अपनी पत्नी के साथ हरियाणा में सेटल हो चुका है, तो बीनू ही उनका सहारा बनी है. आज स़िर्फ विमला देवी ही नहीं, बल्कि पूरा मोहल्ला बीनू की तारीफ़ करता है.

मजबूरी या ज़िम्मेदारी से भागना?
जन्म देने वाले माता-पिता को ही एक समय के बाद यूं दरकिनार करना क्या लड़कों की मजबूरी है या वो अपनी ज़िम्मेदारी से पीछा छुड़ाना चाहते हैं? इसी मुद्दे पर हमने कई लोगों से बात की.

क्या कहना है बेटों का?
जयपुर में रहने वाले राकेश सिंह (परिवर्तित नाम) कहते हैं, “मैं अपने अम्मा-बाबूजी का सबसे लाड़ला था. मुझे भी ऐसा लगता था कि मैं कभी इनसे दूर नहीं जाऊंगा, लेकिन शादी के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई. अम्मा-बाबूजी की ही पसंद की लड़की से मैंने शादी की. शादी के एक महीने बाद से ही मेरे घर में झगड़ा शुरू हो गया. मेरी पत्नी मुझे घर से दूर चलकर रहने की सलाह देने लगी. आख़िरकार परेशान होकर और झगड़े से बचने के लिए मैं आज अपने शहर से दूर यहां जयपुर में रह रहा हूं. ये मेरी मजबूरी है कि चाहकर भी मैं समय पर अपने माता-पिता की देखभाल नहीं कर पाता. मेरी बड़ी बहन अब गांव से शहर आकर बस गई हैं ताकि वो समय पर अम्मा-बाबू जी की मदद कर सकें. मैं आर्थिक रूप से तो मदद कर देता हूं, लेकिन वहां पहुंच नहीं पाता.”
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क्या लाइफस्टाइल है ज़िम्मेदार?
छोटा परिवार, सुखी परिवार की धारणा भी कहीं न कहीं इस तरह की स्थिति को पनपने में मदद कर रही है. आज शहरों में एक-दूसरे की देखा-देखी में लोग ज्वाइंट फैमिली की बजाय न्यूक्लियर फैमिली में रहना ज़्यादा पसंद करते हैं. रिटायरमेंट के बाद वो माता-पिता को गांव में रहने की सलाह देने लगते हैं. दूर रहने पर वो माता-पिता की आर्थिक मदद तो कर देते हैं, लेकिन उन्हें साथ रखने के लिए राज़ी नहीं होते.


क्या कहती हैं बेटियां?

वाराणसी में रहने वाली तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी अंजना (परिवर्तित नाम) को अपने दोनों भाइयों पर उस व़क्त ग़ुस्सा आया जब मां का इलाज करवाने के लिए भाइयों के पास समय नहीं था. भाइयों ने फोन करके अंजना को मां की बीमारी की ख़बर दी. साथ ही ये भी कहा कि वो ख़ुद मां को लेकर अस्पताल जाए. बकौल अंजना, “भाइयों की बात सुनकर मुझे विश्‍वास नहीं हुआ. ससुराल से कुछ दिन की मोहलत लेकर मैं मां के साथ अस्पताल में रही. वो समय मेरे लिए बहुत ही दर्दनाक था. पहले तो भाइयों ने पैसों से मदद की, लेकिन कुछ समय के बाद वो भी बंद हो गया. आख़िर में मेरे ससुराल वालों ने मदद की. भगवान की दया से अब मेरी मां ठीक हैं और मैं उन्हें अब अपने साथ ले आई हूं. भाइयों के पास अपने परिवार के लिए समय है, लेकिन बूढ़ी मां के लिए नहीं, ये सब देखकर बहुत दुख होता है. ज़माने के साथ आज रिश्ते भी बदलने लगे हैं.”
अंजना जैसी बहुत-सी बेटियां हैं, जो बुरे व़क्त में अपने माता-पिता का सहारा बनती हैं. पहले इस तरह की इक्का-दुक्का घटनाएं ही सुनने को मिलती थीं, लेकिन अब हर दूसरे-तीसरे घर की यही कहानी है. उम्र के आख़िरी पड़ाव में जब माता-पिता को औलाद की ज़्यादा ज़रूरत होती है, उसी समय वो उन्हें छोड़कर अपने संकुचित परिवार की देखरेख में लगे रहना ज़्यादा उचित समझते हैं.

आख़िर क्यों हो रहा है ऐसा?
आज से 2-3 दशक पहले तक स्थिति ऐसी नहीं थी. शादी के बाद लड़कियां ससुराल की दहलीज़ तक ही ख़ुद को सीमित रखना उचित समझती थीं. शादी के बाद लड़कों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी. नौकरी के लिए अगर कोई लड़का अपने घर से दूर जाता तो उसकी पत्नी घर पर ही रहकर सास-ससुर की सेवा करती थी. अचानक कुछ सालों से स्थिति बदली है. आख़िर क्यों हो रहा है ऐसा? जानने के लिए हमने बात की साइकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ से. उनके अनुसारः
* माता-पिता को छोड़कर लड़कों का कहीं और सेट होना कहीं न कहीं उनकी मजबूरी है. शादी के बाद वो अपने परिवार यानी पत्नी और बच्चों को सारी सहूलियतें देने के लिए और ख़ुद को एक सफल पति और पिता साबित करने के उद्देश्य से अपने पैरेंट्स को पीछे छोड़ देते हैं.
* बचपन में अपने समान ही बहन को मिले अधिकार और प्यार के चलते भी लड़कों की मानसिकता में बदलाव आया है. उन्हें अब ये लगने लगा है कि  माता-पिता की ज़िम्मेदारी अकेले उनकी नहीं है.
* माता-पिता की संपत्ति में बेटी का भी हक़ है, इससे भी लड़कों की मानसिकता थोड़ी बदली है और वो पैरेंट्स के प्रति थोड़े उदासीन हुए हैं.
* भावनात्मक रूप से भी लड़कों की अपेक्षा लड़कियां अपने माता-पिता से ज़्यादा जुड़ी होती हैं.
* ख़ुद पैरेंट्स भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. पास रहने वाले बेटे और बहू की अपेक्षा उन्हें अपनी बेटी ज़्यादा अच्छी लगती है और वो बार-बार उसकी  तारीफ़ करते रहते हैं. ज़रा-सी भी तकलीफ़ होने पर वो तुरंत बेटी को फोन करते हैं और उसे अपने पास बुलाते हैं. माता-पिता की इस हरक़त की वजह  से भी लड़कों का मन दुखी होता है और वो उन्हें छोड़कर जाने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते.
* ससुराल गई बेटी से माता-पिता उम्र के आख़िरी पड़ाव तक जुड़े रहते हैं, लेकिन घर आई बहू से वो कभी नहीं जुड़ पाते. हर बात पर बेटी और बहू का तालमेल करके बहू को बेटी से कम आंकने की आदत उनके लिए आगे चलकर मुसीबत बन जाती है.

श्रवण कुमार से कम नहीं है मेरी बेटी
जब भी माता-पिता की सेवा की बात आती है तो श्रवण कुमार का नाम ज़ेहन में आता है, लेकिन आज की पीढ़ी में लड़कों की बजाय लड़कियां इस रूप को साकार करती नज़र आ रही हैं. उत्तर प्रदेश के फुलपुर तहसील में रहने वाली पेशे से हाउसवाइफ चंद्रकला गुप्ता के अनुसार, “अपनी बेटी के जन्म के समय ही हमने बेटे की बजाय बेटी की कामना की थी. 35 साल की मेरी बेटी शशिकला बैंक में कैशियर है. हमसे दूर न जाने की वजह से उसने बैंक में प्रमोशन भी नहीं लिया, क्योंकि प्रमोशन होने पर उसकी पोस्टिंग दिल्ली हो रही थी और वो हमें यहां अकेला छोड़कर जाना नहीं चाहती थी. उसके पैदा होने पर मेरी सास ने कहा था कि लड़की की बजाय लड़का होता तो वंश आगे बढ़ता. ये तो पराया धन है, लेकिन आज सच्चाई कुछ और है. उम्र के इस पड़ाव पर मुझे ऐसा लगता है कि मेरी बेटी श्रवण कुमार से कम नहीं है.”

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मुझे माफ़ करना बेटी!
कानपुर की 55 साल की मिसेज़ संगीता हमसे बात करते हुए अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाईं. बकौल संगीता, “मेरे दो बच्चे हैं. एक लड़का और एक लड़की. मैं ख़ुद एक पढ़ी-लिखी महिला हूं, लेकिन मैंने अपनी ही बेटी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया. लड़कियों के बारे में पहले से ही अलग धारणा थी. बचपन में मैंने जैसा महसूस किया अपनी बेटी के साथ भी उसी तरह का व्यवहार किया. बेटे और बेटी में फर्क़ किया. याद है मुझे, जब हम कानपुर में रहने आए थे. मेरे दोनों बच्चे छोटे थे. सीमा को दूध पीना बहुत पसंद था, लेकिन शहर में दूध ख़रीदना पड़ता था, इसलिए मैं स़िर्फ आधा लीटर दूध मंगवाती थी, जिसमें से एक ग्लास अर्जुन पीता और बाकी का मैं चाय के लिए रख देती. सीमा की ओर कभी मेरा ध्यान गया ही नहीं कि उसे भी दूध पसंद है और उसके शारीरिक विकास के लिए ये ज़रूरी भी है. कपड़े ख़रीदते व़क्त भी अर्जुन के लिए अच्छा, तो सीमा को कहीं बाहर थोड़े न जाना है, ये सोचकर कुछ भी ख़रीद लेती थी. रोटी बनाते व़क्त मैं पहली रोटी कभी भी अर्जुन को नहीं देती, लेकिन सीमा को दे देती. हमारे यहां ऐसी मान्यता है कि जो पहली रोटी खाता है उसे लड़ाई-झगड़े में पहली लाठी यानी मार पड़ती है. सीमा डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन अर्जुन की इंजीनियरिंग की फीस इतनी ज़्यादा थी कि हमें सीमा को आगे पढ़ने के लिए मना करना पड़ा. किसी तरह उसे एमएससी कराया ताकि उसकी शादी में कोई अड़चन न आए. आज जब अर्जुन अपनी पत्नी और बच्चे के साथ मुंबई में सेटल हो गया है और मेरी बेटी सीमा हर सुख-दुख में हमारे लिए तुरंत हाज़िर रहती है, तो अपने किए पर बहुत पछतावा होता है. अंदर ही अंदर मैं बहुत पछताती हूं. काश! वो दिन लौट आते, तो मैं अपनी बच्ची को वो सारा सुख और हक़ दे देती जिसकी वो हक़दार थी.

आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना ही लड़कियों को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करता है. आर्थिक रूप से मज़बूत होने के कारण लड़कियों के ससुराल वाले भी उन पर उंगली नहीं उठा पाते. पति भी अब ये समझने लगे हैं कि पत्नी के माता-पिता भी उसके लिए उतने ही ज़रूरी हैं जितने कि सास-ससुर, इसलिए अब वो भी पत्नी का इसमें पूरा सहयोग करने लगे हैं. ये सारा बदलाव लड़कियों के शिक्षित होने और उनके आत्मनिर्भर बनने से आया है.

 डॉ. माधवी सेठ, साइकोलॉजिस्ट

“मेरी बेटी अविका ने छोटे परदे पर ख़ूब नाम कमाया. जब मुझसे कोई पूछता है कि आप अविका के पिता हैं, तो लगता है कि मैं दुनिया का सबसे ख़ुशनसीब पिता हूं. मैं नहीं मानता कि स़िर्फ बेटा ही बुढ़ापे का सहारा बन सकता है, बेटियां भी अब माता-पिता का सहारा बन रही हैं. मैं तो लोगों से यही अपील करूंगा कि बेटियों को पूरा मौक़ा दें.”

 समीर गौर (टीवी एक्ट्रेस अविका गौर के पिता)


– श्‍वेता सिंह