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कहानी- विश्‍वास (Short Story- Vishwas)


“अंधविश्‍वासों का मैंने हमेशा विरोध किया है और विश्‍वासों का मैं हमेशा आदर करता हूं. प्रार्थना, ध्यान मैं भी करता हूं. एक सर्वव्यापक, सर्वशक्तिशाली सत्ता में मेरा भी विश्‍वास है. यदि मूर्ति पर ध्यान केंद्रित करने से आरती को एकाग्रचित्त होने में मदद मिलती है, उसका आत्मबल बढ़ता है तो यह उसका विश्‍वास है और मैं इस विश्‍वास का सम्मान करता हूं. मैं आरती पर अपने विश्‍वास नहीं लादता और न ही वह मुझ पर अपने.”


क्लास से लौटकर तान्या ने चुस्त जींस उतारकर ढीली-सी ट्राउज़र डाल ली और पलंग पर पसर गई. अपनी रूममेट स्वाति को उसने सख़्त हिदायत दे दी कि दो घंटे तक उसे कोई डिस्टर्ब न करे, वह बहुत थक गई है. तभी हॉस्टल की ही दो अन्य लड़कियां उसे पुकारती हुई आ पहुंचीं.
“तान्या, कोई अंकल तुम्हें ढूंढ़ रहे हैं… लो, वे यहीं आ गए.”
“हैलो! तो तुम तान्या हो?”
सिर से पांव तक अपने को एक सूटेड-बूटेड अनजान सज्जन द्वारा घूरता पाकर तान्या अचकचा गई.
“मैं कुणाल का पिता हूं.”
“ओह… बैठिए.” परिचय पाकर तान्या सकुचा उठी.
“मेरी पोस्टिंग इसी शहर में हो गई है… कुणाल ने बताया होगा.”
“नहीं, तीन दिन से नेटवर्क गड़बड़ चल रहा है.”
“आई सी! मतलब रोज़ बात होती है.” तान्या इस कमेंट से एक बार फिर सकुचा उठी.
“सामने हॉस्टल की नई बिल्डिंग मेरे सुपरविज़न में बन रही है. अभी मैं इस पुरानी बिल्डिंग के निरीक्षण के लिए आया था. कमरे देखते-देखते अचानक तुम्हारा ख़्याल आया. तुमसे मिलने का मोह नहीं छोड़ सका, इसलिए चला आया. तुम्हें बुरा तो नहीं लगा?”
“अं… न… नहीं.”
उन सज्जन की निगाहें कमरे का निरीक्षण करते-करते शेल्फ पर रखी भगवान की तस्वीर पर अटक गईं.
“ये मेरी नहीं है. स्वाति पूजा करती है.” तान्या अचानक बोल उठी.
“क्यों, क्या तुम भगवान को नहीं मानतीं?”
“मानती हूं, पर इन सब ढकोसलों में मेरा विश्‍वास नहीं है.” उन सज्जन की निगाहें पास खड़ी स्वाति की ओर उठ गई.
“शी नोज़. वह जानती है मेरे विचार.” तान्या अब तक संभल चुकी थी. उसका डांवाडोल होता आत्मविश्‍वास लौट आया था. लेकिन उन सज्जन ने बात पलट दी.
“मैं सारा सामान यहां ले आया हूं. कपिल के एग्ज़ाम चल रहे हैं. तो वह और आरती बाद में आ जाएंगे. कुछ कपड़े और किताबें ही तो हैं. एक-दो दिन में घर सेट होने के बाद तुम्हें बुलाता हूं. तुम्हारा मोबाइल नंबर क्या है?”
तान्या से मोबाइल नंबर लेकर उन्होंने उसे अपना विज़िटिंग कार्ड पकड़ा दिया. तान्या उन्हें जाते देखती रही.

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“शिरीष सिन्हा. तो ये तुम्हारे होनेवाले ससुर हैं और तुमने उनके पांव तक नहीं छुए.”
“मैं जैसी हूं, वैसी ही उनके सामने नज़र आना चाहती हूं. ढोंग से मुझे सख़्त नफ़रत है.”
“पर…”
“कुणाल मुझसे प्यार करता है. उसके मम्मी-पापा मुझे पसंद करें या न करें, मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता. वह मुझ से ही शादी करेगा.”
पिछले सप्ताह ही कुणाल ने उसे बताया था कि वह छुट्टियों में घर जा रहा है और मम्मी-पापा को बताकर जल्दी ही शादी की डेट फिक्स करेगा. फिर दुबारा बात होने पर उसने बताया था कि पापा तो तटस्थ हैं और मम्मी बहुत ग़ुस्सा हैं. विजातीय, पाश्‍चात्य संस्कारों में पली-बढ़ी लड़की उन्हें बहू के रूप में बिल्कुल पसंद नहीं है. हां, कपिल ज़रूर भाभी को लेकर बहुत उत्साहित है. कुणाल कहता है कि चिंता की कोई बात नहीं है. सब ठीक हो जाएगा. बस, थोड़ा इंतज़ार करो. वह कहता है कि मम्मी दिल की बहुत अच्छी हैं. जल्दी ही उनका ग़ुस्सा शांत हो जाएगा.
कुणाल की मम्मी का ग़ुस्सा तो शांत नहीं हुआ, लेकिन तान्या का पारा चढ़ गया था. ‘हुंह माइ फुट, इंतज़ार करो. मेडिसन की डिग्री मिलते ही वह कुणाल पर शादी के लिए दबाव डालेगी. न मानें उसके मम्मी-पापा, कोर्ट मैरिज कर लेंगे. मेरे पापा तो तैयार हैं ही.’ आर्मी ऑफ़िसर की इकलौती बेटी तान्या बचपन से ही स्वच्छंद वातावरण में पली-बढ़ी थी. किशोरावस्था में मां की असामयिक मृत्यु के बाद तो उसे रोकने-टोकने वाला वैसे भी कोई नहीं था. जिस चीज़ पर वह हाथ रख देती, वही उसकी हो जाती थी. बेहद प्रतिभाशाली और ख़ूबसूरत बेटी पर कर्नल साहब जान छिड़कते थे. तान्या ने उन्हें फोन पर अपनी पसंद बताई, तो वे तुरंत शादी के लिए तैयार हो गए. तान्या ने ही उन्हें थोड़ा इंतज़ार करने के लिए कहा. कुणाल उससे दो साल सीनियर था. पी.जी. के बाद वह दूसरे शहर में प्रैक्टिस करने लगा था. पढ़ाई के दौरान परवान चढ़ा प्यार अब शादी में अपना मुक़ाम तलाश रहा था.
वादे के मुताबिक़ दो दिन बाद ही कुणाल के पिता ने तान्या को घर पर डिनर के लिए बुलाया. आलीशान, ख़ूबसूरती से सजा घर तान्या को पहली ही नज़र में अपना लगने लगा. साथ डिनर और वार्तालाप करते तान्या कुणाल के पूरे परिवार के बारे में जान गई. किसे क्या पसंद है, किसका कैसा स्वभाव है आदि. सिन्हा साहब ने तान्या से भी उसके परिवार, रुचियों, मित्रों, पढ़ाई आदि की जानकारी ली.
“तुम जब चाहो यहां आ सकती हो, जितने दिन चाहो रह सकती हो. सर्वेंट मदन यहीं पीछे क्वार्टर में रहता है. वह तुम्हारी ज़रूरतों का ख़्याल रखेगा.”
“थैंक्यू अंकल.” तान्या को कुणाल के पापा से मिलकर बहुत अच्छा लगा. लेकिन वह चाहकर भी कुणाल की तरह उन्हें डैडी नहीं पुकार पा रही थी, न ही उन्होंने ऐसी कोई इच्छा ज़ाहिर की. तान्या की परीक्षाएं समीप थीं. उसकी तैयारी भी अच्छी हो रही थी. उसे उम्मीद थी कि सारे पर्चे अच्छे हो जाएंगे, लेकिन परीक्षा से कुछ दिन पूर्व उसे मलेरिया हो गया. सिन्हा साहब को पता चला, तो वे उसे ज़बरदस्ती घर ले आए. समय पर दवा, इंजेक्शन, दूध, खाना, ऑफिस के साथ-साथ सिन्हा साहब तान्या की ज़िम्मेदारी भी बख़ूबी निभा रहे थे. तान्या हैरान थी. रिश्ता जुड़ने से पूर्व ही वह अंकल से दिल से जुड़ाव महसूस करने लगी थी. पापा को उसने ख़बर नहीं की, व्यर्थ ही परेशान होंगे. वैसे भी अब वह काफ़ी स्वस्थ महसूस कर रही थी. उसने सोच लिया था कि आज अंकल से कह देगी कि वह हॉस्टल लौटना चाहती है.

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शाम को अंकल लौटे तो काफ़ी ख़ुश दिखाई दे रहे थे.
“तान्या, कल कपिल और आरती आ रहे हैं.”
“ओह, मैं तो वैसे भी आज हॉस्टल लौट रही हूं.”
“अरे नहीं, अभी दो दिन और आराम करो. कमज़ोरी बहुत है. मैंने आरती को भी बता दिया है कि मेरे एक परिचित की लड़की इस तरह यहां रह रही है.”
“पर अंकल…”
“नो पर-वर. अरे मदन सुनो! पूजाघर आज पूरा जम जाना चाहिए. सारी तस्वीरें दीवार पर टांग देना और वो आंगन में तुलसी का पौधा लाकर लगाया या नहीं? तुम्हारी मेमसाब बिना तुलसी में पानी डाले सवेरे पानी तक नहीं पीतीं.”
“जी, अभी करता हूं साहब.”
“और सुनो, मेरे कमरे की सारी खिड़कियां खोल देना. यू नो तान्या, आरती को प्रकृति से बहुत लगाव है. सवेरे की अरुणिमा उसे उतना ही लुभाती है, जितना गोधूलि का सुरमई अंधेरा. इसीलिए तो मैंने अपने बेडरूम में ए.सी. नहीं लगवाया है. आरती को ताज़ी हवा पसंद है. इस उम्र में भी उसे बारिश की फुहारों में भीगना अच्छा लगता है. भले ही बाद में ज़ुकाम हो जाए… हा… हा… अरे तू अभी तक यहीं खड़ा है? काम कब निबटाएगा? और सुन, कल लंच में थोड़े दही वड़े बना लेना. आरती को पसंद है… सोंठ ज़रूर बनाना कपिल के लिए.” दूर जाते मदन को पीछे से आवाज़ लगाते हुए सिन्हा साहब बोले.
तान्या एकटक अंकल के चेहरे पर आते भावों को निहारे जा रही थी. कितना उत्साह है उनके चेहरे पर, ख़ुशियां मानो छलकी पड़ रही हैं. आंटी कितनी लकी हैं, उन्हें इतना प्यार करनेवाला पति मिला है. तान्या अब तक सिन्हा साहब से काफ़ी खुल चुकी थी. उन्हें कुछ भी कहने, पूछने में उसे अब कोई संकोच नहीं होता था. अंकल को छेड़ते हुए उसने कहा, “आपका और आंटी का टेस्ट तो बिल्कुल अलग लगता है. पर लगता है आप आंटी से काफ़ी डरते हैं. तभी उनके आगे झुक गए हैं.” पर प्रत्युत्तर में सिन्हा साहब गंभीर हो गए थे.
“हूं… वैसे तो यह दिल से महसूस की जानेवाली चीज़ है, पर फिर भी मैं इन एहसासात को शब्दों में ढालकर समझाने का प्रयास करता हूं. तुम्हारा सोचना सही है. पहले मुझे भी आरती के टेस्ट से झुंझलाहट होती थी. तुम्हें आश्‍चर्य होगा, जब मैं तुम्हारी आंटी को लेकर मंदिर जाता था तो मैं बाहर धूप में ही खड़ा रहता था. फिर मुझे लगा, मैं किसे दिखाने के लिए यह कर रहा हूं? मंदिर में बैठे उस भगवान को, जिसे मैं मान ही नहीं रहा हूं या उधर से गुज़र रहे राहगीरों को, जिन्हें मेरे यहां खड़े रहने, न रहने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है. फ़र्क़ पड़ रहा है तो आरती को, जिसे यह एहसास था कि उसका पति बाहर धूप में खड़ा है, इसलिए वह जल्दी से जल्दी दर्शन कर लौट आती थी. मैंने उसके संग अंदर जाना आरंभ कर दिया, ताकि वह आराम से प्रार्थना कर सके. आरती ने कुछ कहा नहीं, पर मैंने उसकी ख़ुशी को महसूस किया. मैंने हाथ भी जोड़ना आरंभ कर दिया.”
“लेकिन ऐसा करके तो आप उनके अंधविश्‍वास को बढ़ावा दे रहे हैं.”
“नहीं. अंधविश्‍वासों का मैंने हमेशा विरोध किया है और विश्‍वासों का मैं हमेशा आदर करता हूं. प्रार्थना, ध्यान मैं भी करता हूं. एक सर्वव्यापक, सर्वशक्तिशाली सत्ता में मेरा भी विश्‍वास है. यदि मूर्ति पर ध्यान केंद्रित करने से आरती को एकाग्रचित्त होने में मदद मिलती है, उसका आत्मबल बढ़ता है तो यह उसका विश्‍वास है और मैं इस विश्‍वास का सम्मान करता हूं. मैं आरती पर अपने विश्‍वास नहीं लादता और न ही वह मुझ पर अपने. उसकी ख़ुशी के लिए कुछ करना मुझे गहरा सुकून देता है. हो सकता है तुम्हें यह मेरा झुकना लगे. पर मेरा मानना है कि इंसान झुककर ही सामनेवाले को झुका सकता है.”
अंकल की बातों ने तान्या को हिलाकर रख दिया था. कितनी महान सोच है उनकी! हम आज की जेनरेशन ‘फ्रीडम चाहिए, स्पेस मिलनी चाहिए’ का शोर मचाते हैं. ‘ओन आइडियाज़, ओन आइडेंटिटी’ का दंभ भरते हैं. यहां तो दो बिल्कुल विपरीत विचारधारा और स्वभाव वाले व्यक्ति एक ही घर में, बल्कि एक ही कमरे में अपने-अपने विश्‍वासों के साथ बड़े प्यार से जी रहे हैं, बिना किसी ईगो के, टकराव के. भला इससे ज़्यादा स्पेस और फ्रीडम और क्या होगी?
अगले दो दिन तान्या की ज़िंदगी के बेहद महत्वपूर्ण हमेशा याद रखने लायक़ दिन थे. कैसे किसी को अपना बनाया जाता है यह तान्या ने आंटी से सीखा. मां बनकर आंटी ने उसका इतना ख़्याल रखा कि तान्या को कपिल और कुणाल से ईर्ष्या होने लगी. साथ ही यह दहशत भी उसे घेरे रहती कि जब उन्हें उसका असली परिचय मिलेगा, तब क्या होगा? हालांकि कपिल से उसका असली परिचय अंकल ने करवा दिया था. ताश खेलते वक़्त जब वह तान्या को बार-बार ‘दीदी’ कहकर संबोधित कर रहा था, तो अंकल ने उसे धौल जमाते हुए कहा था, “दीदी-दीदी क्या कर रहा है? भाभी है तेरी.”
“भा…भी?” कपिल की चीख निकल गई थी.
“श्श्श…” अंकल ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया था और तान्या लाज से सुर्ख हो गई थी.
अंकल जब उसे हॉस्टल छोड़कर लौटने लगे, तो तान्या की आंखें भर आईं. उसके हाथ स्वतः ही उनके चरणों की ओर बढ़ गए. लेकिन उन्होंने बीच में ही उसे थाम लिया और वह ‘डैडी’ कहकर उनके सीने से लग गई. ‘अंकल’ संबोधन हमेशा के लिए दफ़न हो गया.

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कपिल भी उससे फोन पर लंबी गु़फ़्तगू करता रहता था. ‘भाभी भाभी’ करते उसकी ज़ुबान नहीं थकती थी.
“आपके एग्ज़ाम हैं भाभी, इसलिए ज़्यादा डिस्टर्ब नहीं कर रहा. पापा डांटेंगे. वरना तो…” उसका अपनापन तान्या के पढ़ाई से क्लांत चेहरे पर मुसकान बिखेर जाता. दिल में उस घर का एक हिस्सा बनने की ललक ज़ोर मारने लगती. वह स्वयं में काफ़ी परिवर्तन महसूस करने लगी थी. उसे अब कुणाल ही नहीं उससे जुड़ी हर चीज़ अपनी लगने लगी थी. उसके पापा, मम्मी, भाई, घर- सब कुछ. यह उसके प्यार की गहराई थी, जिसे वह नादान समझ नहीं पा रही थी. कभी वह यादों में खोई मुस्कुराने लगती, तो कभी हंस पड़ती, तो कभी एकदम बेचैन हो जाती.
“तुझे तो लगता है फिर से प्यार हो गया है.” स्वाति उसे छेड़ती.
“हां. मुझे उस घर से प्यार हो गया है.” तान्या मुस्कुराते हुए कहती.
नहाकर बाहर आई स्वाति ने भगवान के आगे अगरबत्ती जलाई तो ख़ुशबू से कमरा गमक उठा. पढ़ती हुई तान्या की नज़रें स्वतः ही ऊपर उठ गईं. उसकी आंखें बंद हो गईं और हाथ अनायास ही जुड़ गए. स्वाति हैरानी और हर्ष से उसे देखती रह गई. मोबाइल बजने पर तान्या ने आंखें खोलीं और बात करने लगी.
“ओह नो… नो.”
“क्या हुआ?” स्वाति घबरा उठी.
“आंटी आ रही हैं. उन्होंने कपिल को मुझसे बात करते हुए सुन लिया था. ओह गॉड… अब?” बदहवासी में वह कमरे के चक्कर काटने लगी. तभी भड़ाक से दरवाज़ा खुला. आंटी सामने थीं.
“स… सॉरी आंटी” तान्या ने कांपते हुए सिर झुका लिया.
लेकिन यह क्या! आंटी ने आगे बढ़कर उसके सिर पर हाथ रख दिया.
“मुझे अपने बेटे की पसंद पर गर्व है. जब तुम सब मेरी ख़ुशी के लिए इंतज़ार कर सकते हो, तो मैं कैसे तुम सबका विश्‍वास तोड़ सकती हूं? मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है.”
तान्या के कानों में डैडी के शब्द गूंज उठे, “इंसान झुककर ही सामनेवाले को झुका सकता है.” उनके विश्‍वास की जीत हुई थी.

शैली माथुर

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