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कहीं आप कंप्लेन बॉक्स तो नहीं? (Don’t Be A Complain Box)

दुखी आत्मा या फिर रोने की मशीन... अक्सर हमारा सामना ऐसे लोगों से होता है, जो हर व़क्त स़िर्फ शिकायत…

दुखी आत्मा या फिर रोने की मशीन… अक्सर हमारा सामना ऐसे लोगों से होता है, जो हर व़क्त स़िर्फ शिकायत (Complain) करते रहते हैं. घर-परिवार, दोस्त, रिश्तेदार, ऑफिस कलीग्स से लेकर क़िस्मत और भगवान से भी उन्हें बहुत-सी शिकायतें होती हैं. क्यों करते हैं लोग इतनी शिकायत और क्या होता है इसका परिणाम, आइए जानते हैं..

किसी ने कहा है कि कंप्लेन करना एक संक्रामक बीमारी की तरह है, जो हमारी ख़ुशियों के साथ-साथ  हमारे रिश्ते, सेहत और सफलता को बर्बाद कर देती है. और सबसे बड़ी बात यह कि अक्सर कंप्लेन करनेवाले को यह एहसास ही नहीं होता कि वह एक कंप्लेन बॉक्स बन चुका है.

क्यों करते हैं लोग शिकायत?

शिकायत तो हर कोई करता है, पर जब आपकी हर बात शिकायत और शिकायती लहज़े से शुरू हो, तो आप दूसरों से अलग हो जाते हैं. एक्सपर्ट्स की मानें, तो यह बहुतों की आदत में शुमार होता है. ज़रूरी नहीं कि वो हर व़क्त दुखी हो, पर ख़ुशी के पलों में भी वो किसी अनहोनी की आशंका में ही शिकायत करते रहते हैं.

अटेंशन पाने के लिए

कुछ लोगों को हमेशा सेंटर ऑफ अट्रैक्शन बने रहना अच्छा लगता है. उन्हें लगता है कि हर कोई स़िर्फ उन पर ध्यान दे, उनके बारे में ही सोचे और बात करे और जब ऐसा नहीं होता, तब वो अपना रोना शुरू कर देते हैं. मेरे पास इसके लिए समय नहीं है, मेरे पास उसके लिए समय नहीं है, मैं क्या करूं? जैसे कि दुनिया के बाकी लोगों के पास रोज़ाना 48 घंटे हैं और इन्हें स़िर्फ 24 घंटे मिले हैं.

ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए

कुछ लोगों को किसी भी चीज़ की ज़िम्मेदारी लेनी ही नहीं होती है. हर काम के लिए इस तरह कंप्लेन करते हैं कि जैसे दुनिया का सबसे कठिन काम उन्हें दे दिया गया हो. काम कर तो देंगे, पर उसकी ज़िम्मेदारी ख़ुद नहीं लेंगे.

अपनी कमियों को छुपाने के लिए

ज़्यादातर लोग अपनी कमियों को छुपाने के लिए कंप्लेन करते हैं. काम समय पर न पूरा होने के लिए पूरे ब्रह्मांड को ज़िम्मेदार ठहरा देंगे कि इसकी वजह से ही ऐसा हुआ, उसकी वजह से वैसा हुआ.

नकारात्मक सोच

ज़्यादा शिकायतें वही लोग करते हैं, जिन्हें सब में कमियां ही दिखाई देती हैं. दरअसल, उनकी सोच ही नकारात्मक होती है, इसलिए उन्हें हर जगह कमी ही नज़र आती है.

आत्मतुष्टि के लिए

शिकायत करनेवाले इसे आत्मतुष्टि का एक ज़रिया बना लेते हैं. ख़ुद को समझाने के लिए कि मेरी कोई ग़लती नहीं, बल्कि सारी ग़लती सामनेवाले की ही है, क्योंकि सारी कमियां उसी में हैं.

वो उससे कहीं ज़्यादा के हक़दार हैं

इन्हें हमेशा इस बात की शिकायत रहती है कि इन्हें बाकी लोगों से बहुत कम मिला है, जबकि वे इससे कहीं ज़्यादा अच्छी सैलरी, ज़्यादा अच्छी जॉब, ज़्यादा ख़ुशियों और सब कुछ ज़्यादा पाने के हक़दार हैं. आप इनके लिए कुछ भी कर दें, फिर भी इन्हें अपना सब कुछ दूसरों से कम ही लगेगा.

मैं ही सबसे अच्छा काम कर सकता हूं

अपने आइडियाज़ को ही सबसे आगे रखना और अपनी बात को सही साबित करने के लिए दूसरों को नीचा दिखाना, दूसरों के आइडियाज़ में कमी निकालना, अपने आगे दूसरों को न गिनना इनकी आदत में शुमार होता है.

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कहीं आप में तो नहीं ये लक्षण?

–     कंप्लेन बॉक्स को ग्लास हमेशा आधा खाली नज़र आता है. क्या आपको भी दूसरों में स़िर्फ कमियां नज़र आती हैं?

–     मज़ाक-मज़ाक में लोग आपको जताने की कोशिश करने लगे हैं कि आप हमेशा शिकायत ही करते रहते हैं.

–     अगर आपके दोस्त आपके साथ समय बिताने से कतराने लगे हैं, तो समझ जाइए कि आपकी कंप्लेन करने की आदत से वो ऊब चुके हैं.

–     आपको अपने चारों तरफ़ स्ट्रगल ही दिखाई देता है.

–     हर तरफ़ रुकावटें आपको आगे बढ़ने से रोकती हैं. अगर आपको लगता है कि आप में भी ये लक्षण हैं, तो अभी इस ओर ध्यान देना शुरू करें.

टॉक्सिक है हर व़क्त का रोना 

–    कंप्लेन करने से चीज़ें बद से बदतर लगने लगती हैं.

–     यह आपकी सेहत के लिए नुक़सानदायक है, क्योंकि आपको मानसिक शांति और सुकून नहीं मिलता.

–     हर व़क्त शिकायत करते रहने से आपकी एनर्जी ख़त्म होती रहती है, जिससे आप थका हुआ महसूस करते हैं.

–     यह आपकी आदत में शुमार हो जाता है.

–     आपका सब कॉन्शियस माइंड आपको हर नई चीज़ में निगेटिविटी दिखाने लगता है.

–     हमेशा शिकायत करते रहने से आप नाउम्मीद हो जाते हैं. हर तरफ़ निराशा नज़र आती है.

–     यह क्रिएटिविटी को बुरी तरह प्रभावित करती है, जिससे आप क्रिएटिव काम करने की बजाय कामचलाऊ काम शुरू कर देते हैं.

–     आप कोई भी नया काम करने से कतराने लगते हैं, इसलिए नए और क्रिएटिव आइडियाज़ को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं.

–     यह आपके चेहरे की ख़ुशी और उत्साह-उमंग छीन लेता है.

कैसे कम करें शिकायत करना?

–     अपनी सोच बदलें. हालांकि यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल. भले ही हम एक पल के लिए निश्‍चय करें, पर कुछ देर बाद ही शिकायत करने लगेंगे. इसमें थोड़ा व़क्त लगेगा, इसलिए धैर्य रखें और रोज़ाना प्रैक्टिस करें.

–     शुरू-शुरू में नकारात्मक सोच को कंट्रोल करने में व़क्त लगेगा. लगातार निगेटिव फीलिंग्स को न दबाएं, बल्कि किसी से शेयर कर लें.

–     अपने माइंड और बॉडी को कंट्रोल करने के लिए योग व मेडिटेशन का सहारा लें.

–     कोशिश करें कि लोगों के बारे में बहुत जल्दी राय कायम न करें. दूसरों को जानने-समझने के बाद ही उनके बारे में राय बनाएं.

–     एक लिस्ट बनाएं, जिसमें उन सभी का ज़िक्र करें, जिसके लिए आप ईश्‍वर के शुक्रगुज़ार हैं. इससे आप अच्छा महसूस करेंगे.

–     जिस बदलाव की उम्मीद आप दूसरों से कर रहे हैं, उसकी शुरुआत ख़ुद से करें.

–     अगर कोई बात आपको परेशान कर रही है, तो या तो उसे सुलझा लें या फिर मान लें कि इस समय इसका हल नहीं निकल पा रहा है. अपने काम की ज़िम्मेदारी लेना सीखें.

–    ख़ुश रहने की कोशिश करें. अगर आपको सबसे अधिक शिकायत अपनी जॉब से है, तो आपको जॉब बदलकर देखना चाहिए, शायद इससे आपको

ख़ुशी मिले.

–     वो सब करें, जिससे आप रिलैक्स होते हैं और आपको अच्छा फील होता है.

–     ख़ुद से यह वादा करें कि आप जब भी बोलेंगे, सकारात्मक ही बोलेंगे. कोशिश करेंगे कि नकारात्मक बातों को ख़ुद पर हावी न होने दें.

–    अगर आप ख़ुद को इससे लड़ने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं, तो किसी एक्सपर्ट की मदद लेने में संकोच न करें.

  – सुनीता सिंह

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Aneeta Singh

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