शादी फॉरएवर का कॉन्सेप्ट क्यों भूल रहे हैं हम? (Failing to understand the concept of marriage forever)

कुछ रस्में, सात फेरे, सात वचन और एक बंधन, वो भी जन्म-जन्मांतर (Marriage forever concept) का! शादी को लेकर हर किसी की अपनी अपेक्षाएं और…

कुछ रस्में, सात फेरे, सात वचन और एक बंधन, वो भी जन्म-जन्मांतर (Marriage forever concept) का! शादी को लेकर हर किसी की अपनी अपेक्षाएं और उम्मीदें होती हैं, कुछ पूरी होती हैं, तो कुछ नहीं भी. शत-प्रतिशत संतुष्टि तो हमें किसी भी रिश्ते से नहीं मिलती, लेकिन क्या हम उन रिश्तों को तोड़ने का निर्णय इतनी आसानी से लेते हैं, जितनी आसानी से आज हम शादी को तोड़ने का निर्णय लेने लगे हैं? चूंकि इस रिश्ते से बाहर आने का एक विकल्प हमें नज़र आता है तलाक़ के रूप में, तो फिर समस्या चाहे कितनी ही मामूली क्यों न हो, हम समझौता नहीं करते. तलाक़ के मामले दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रहे हैं. यहां हम उन मामलों का ज़िक्र नहीं कर रहे, जहां तलाक़ लेना ही एकमात्र रास्ता रह जाता है, लेकिन जहां शादी को बचाए रखने के कई रास्ते खुले होते हैं, वहां भी अब हमारी कोशिशें कम ही होती हैं उसे बचाने की. पहले माना जाता था कि शादी जन्म-जन्मांतर (Marriage forever concept) का साथ है, लेकिन अब एक जन्म भी निभाना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि शादी फॉरएवर का कॉन्सेप्ट ही हम भूल चुके हैं. क्या वजहें हैं कि ऐसा हो रहा है?

– रिश्ता निभाना या उससे जुड़ी ज़िम्मेदारियां पूरी करना आजकल के कपल्स को बोझ लगता है. उन्हें लगता है कि हम क्यों सामनेवाले के अनुसार अपनी ज़िंदगी जीएं, हम क्यों एडजेस्ट करें… आदि. जब रिश्ते में इस तरह के विचार आने लगते हैं, तो उसे तोड़ने के रास्ते हमें ज़्यादा आसानी से नज़र आने लगते हैं.

– शादी एक बंधन और ज़िम्मेदारी है. कोई चाहे या न चाहे, इसमें त्याग-समर्पण करना ही पड़ता है. लेकिन इस तरह की भावनाएं व बातें आजकल हमें आउटडेटेड लगती हैं. हम अब रिश्तों में भी प्रैक्टिकल होते जा रहे हैं, जिससे भावनाएं गौण और स्वार्थ की भावना महत्वपूर्ण होती जा रही है.

– कपल्स आजकल अपने ईगो को अपने रिश्ते से भी बड़ा मानते हैं. पति-पत्नी दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं होता. आपसी टकराव बढ़ने के साथ-साथ मनमुटाव भी बढ़ता जाता है और नतीजा होता है- रिश्ते का अंत.

– आजकल लोग शादी तो करते हैं, लेकिन कई शर्तों के साथ और जहां कहीं भी उन्हें लगता है कि उनकी आज़ादी या लाइफस्टाइल में उनकी शादी एक बेड़ी या बंधन बन रही है, वहीं उसे तोड़ने का निर्णय आसानी से ले लेते हैं.

और भी हैं वजहें…

– लड़कियां भी आत्मनिर्भर हो रही हैं, जिस वजह से वो कोई भी निर्णय लेने से हिचकिचाती नहीं.

– घरवालों का सपोर्ट भी अब उन्हें मिलता है, पहले जहां उन्हें रिश्ते बनाए रखने की कोशिश करने से संबंधित कई तरह की सीख व नसीहतें दी जाती थीं, वहीं अब समझौता न करने की बात समझाई जाती है. हालांकि जहां बात लड़की या लड़के के स्वाभिमान व अस्तित्व की रक्षा से जुड़ी हो और जहां शोषण हो रहा हो, तो वहां शादी फॉरएवर का कॉन्सेप्ट (Marriage forever concept) भूलना ही पड़ता है, लेकिन यहां हम उन छोटी-छोटी बातों का ज़िक्र कर रहे हैं, जिन्हें बड़ा मुद्दा बनाकर शादी जैसे महत्वपूर्ण बंधन को तोड़ने का सिलसिला बढ़ रहा है.

– छोटी-छोटी तक़रार भी हमें इतनी हर्ट करती है कि हम उसे अपने स्वाभिमान से जोड़ने लगते हैं. सहनशीलता अब लोगों में बहुत कम हो गई है, यह भी एक बड़ी वजह है कि रिश्ते ताउम्र नहीं टिकते और जल्दी टूट जाते हैं.

– वहीं दूसरी ओर रिश्ता बनाए रखने व उसमें बने रहने के लिए सारे समझौते करने की अपेक्षा अब भी स्त्रियों से ही की जाती है. व़क्त व दौर जब बदल रहा है, तो अपेक्षाओं के इस दायरे में पुरुषों को भी लाना ही होगा. रिश्ता बनाए रखने की जितनी ज़िम्मेदारी स्त्रियों की होती है, उतनी ही पुरुषों की भी होती है. इस परिपाटी को अब तक बदलने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास भी नहीं किए गए. इस ओर भी ध्यान देना ज़रूरी है.

– शादी जैसे रिश्तों को आजकल की जनरेशन बहुत कैज़ुअली लेती है. यदि इसके प्रति थोड़ा सम्मान व गंभीरता दिखाएं, तो रिश्ते की मज़बूती बढ़ेगी. समय व समाज में बदलाव के साथ-साथ रिश्तों के समीकरण व मायने भी अब बदल रहे हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं होना चाहिए कि हम रिश्तों को इतने हल्के में लें कि उन्हें आसानी से तोड़(Marriage forever concept) सकें.

क्या किया जा सकता है?

– शादी जैसे रिश्ते के प्रति थोड़ी गंभीरता व सम्मान रखना बेहद ज़रूरी है.

– अपने रिश्ते को और अपने पार्टनर को कैज़ुअली न लें.

– छोटी-छोटी बातों को बड़े झगड़े में न बदलें. सहन करना, एडजस्ट करना हर रिश्ते की मांग होती है. इसे अपने ईगो से जोड़कर न देखें.

– अपने मन-मस्तिष्क में रिश्ता तोड़ने जैसे विचार न लाएं. आपस में बहस के दौरान भी इस तरह की बातें मुंह से न निकालें.

– किन्हीं मुद्दों या बातों पर मनमुटाव हो, तो बातचीत ही पहला रास्ता है विवादों को सुलझाने का.

– पहल करने से कोई भी छोटा नहीं होता. रिश्ते को बचाने में अगर आपकी पहल काम आ सकती है, तो अपने झूठे दंभ की ख़ातिर पहल करने से पीछे न हटें. अलग होने के बाद भी ज़िंदगी आसान नहीं होती, गंभीरता से हर पहलू पर विचार करें.

– माफ़ करना सीखें और सॉरी बोलना भी.

– अपने पार्टनर की कद्र करें. भावनात्मक रूप से यदि आपसे कोई जुड़ा है, तो उसे जितना हो सके, आहत या दुखी करने से बचें. आपस में एक-दूसरे के प्रति सम्मान तो हर रिश्ते की ज़रूरत होती है.

– आजकल छोटी-छोटी बातों पर रिश्ता तोड़ देने का जो ट्रेंड बन गया है, उसके परिणाम बेहद घातक होते हैं. कम उम्र में ही तनाव, अकेलापन, डिप्रेशन व अनहेल्दी लाइफ स्टाइल का शिकार होकर अपनी ही ज़िंदगी को लोग बहुत कठिन बना लेते हैं.

– इस बात का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि रिश्ते व भौतिक चीज़ों में बहुत फ़र्क़ होता है. रिश्तों को कपड़ों या गाड़ियों की तरह बार-बार बदलकर सुकून नहीं मिल सकता. रिश्तों में भावनाएं होती हैं और कोई कितना भी प्रैक्टिकल क्यों न हो जाए, रिश्ता टूटने पर आहत होता ही है. जब भावनाएं आहत होती हैं, तो ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो जाती है.

– विजयलक्ष्मी

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Meri Saheli Team

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