Others

कहानी- प्रेशर कुकर (Short Story- Pressure Cooker)

                   शैली माथुर
“कढ़ी के स्वाद की कल्पना में खोई हो या ज़िंदगी के स्वाद की? वैसे दोनों का फ़लसफ़ा एक ही है. ज़िंदगी को भी यदि सहज व स्वाभाविक ढंग से जीया जाए, तो उसका भरपूर आनंद उठाया जा सकता है. अपनी ज़िंदगी को प्रेशर कुकर बनाओगी, तो जीने का लुत्फ़ ही नहीं आएगा और किसी दिन अत्यधिक प्रेशर से कुकर फट गया, तो याद रखना सबसे ज़्यादा नुक़सान भी कुकर को ही होगा.”

हमेशा की तरह आज भी सुरेखा की पेशानी पर बल चढ़े हुए थे. चेहरे पर तनाव की लकीरें स्पष्ट देखी जा सकती थीं. माया ने महसूस किया कि स्टाफ रूम में सुरेखा के प्रविष्ट होते ही सभी उपस्थित शिक्षिकाएं मुंह दबाकर अपनी व्यंग्यपूर्ण मुस्कुराहट छुपाने का असफल प्रयास करने लगी थीं. अपनी सहेली के प्रति माया का मन सहानुभूति से भर उठा. लेकिन सुरेखा को तो मानो लोगों की व्यंग्यात्मक निगाहों की कोई परवाह ही नहीं थी. वह दनदनाती हुई आकर माया के पास रखी कुर्सी खींचकर बैठ गई.
माया ने चुपचाप अपने सामने रखा पानी का ग्लास उसकी ओर बढ़ा दिया, जिसे उसने एक ही सांस में खाली कर दिया. पानी में मानो कोई शक्तिवर्द्धक औषधि मिली थी, जो गले के नीचे उतरते ही अपना असर दिखाने लगी थी.
“अब तो हद ही हो गई है. तुझे तो पता ही है मेरे सास-ससुर आए हुए हैं. उनकी टोका-टाकी की आदत ने मेरी तो नाक में दम कर रखा है. सवेरे-सवेरे बाई के छुट्टी पर चले जाने के फोन से मूड वैसे ही ख़राब था. चाय का कप लेकर रसोई से बाहर निकली, तो सास ने बिना नहाए रसोई में जाने के लिए टोक दिया. बड़ी कोफ़्त होती है ऐसे दक़ियानूसी सोचवाले लोगों से. और उससे भी ज़्यादा खीज हो रही थी मुकेश से. सब कुछ देखते-समझते हुए भी अख़बार में मुंह डाले ऐसे बैठे रहते हैं, मानो सारा घटनाक्रम कहीं टीवी पर चल रहा हो.”
“अच्छा अब शांत हो जा. तू हर बात पर बहुत ज़्यादा प्रेशर ले लेती है.”
माया के समझाने पर सुरेखा और चिढ़ गई. “जिस पर बीतती है, वही जानता है. प्रेशर झेलते-झेलते मुझे तो लगने लगा है कि मैं प्रेशर कुकर ही बन गई हूं.”
“और कभी अतिशय प्रेशर के दबाव से यह कुकर फट गया तो? सबसे ज़्यादा नुक़सान किसे होगा?” माया ने पूछा.
ग़ुस्से और तनाव ने सुरेखा के सोचने-समझने की शक्ति छीन ली थी. वह किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी माया को ताकने लगी, तो माया का मन एक बार फिर उसके प्रति सहानुभूति से भर उठा. “अभी हम दोनों की क्लास का वक़्त हो रहा है, इसलिए हमें यहां से निकलना चाहिए. क्लास के बाद फुर्सत से बैठकर बात करते हैं.”
माया अपने नोट्स संभालती उठ खड़ी हुई, तो सुरेखा को भी बेमन से उठना पड़ा. क्लास में भी उसका मूड उखड़ा-उखड़ा ही रहा. बेवजह ही एक लड़की पर बरस पड़ी. फिर पीठ पीछे कमेंट भी सुनने को मिल गया, “मैडम घर पर पति और बच्चों से झगड़कर आती हैं और फिर सारा ग़ुस्सा हम मासूमों पर निकालती हैं.” सुरेखा मुड़कर कुछ खरी-खोटी सुनाने का मन बना ही रही थी कि तभी सामने से आते चपरासी ने ज़रूरी मीटिंग के लिए सभी को प्रिंसिपल के केबिन में इकट्ठा होने की सूचना दी.
“आज का तो दिन ही ख़राब है. न जाने सुबह किसका मुंह देखकर उठी थी.” बड़बड़ाती सुरेखा मीटिंग रूम की ओर बढ़ गई. सभी टीचर्स इकट्ठा हो गए, तो प्रिंसिपल सर नेे मीटिंग का उद्देश्य स्पष्ट किया.
“हमारे बेहतरीन कार्यप्रबंध को देखते हुए लगातार तीसरे वर्ष भी अंतरराज्यकीय साहित्यिक और सांस्कृतिक प्रतियोगिता आयोजित करने की ज़िम्मेदारी हमारे कॉलेज को सौंपी गई है.” सभी ने करतल ध्वनि से इस घोषणा का स्वागत किया. प्रिंसिपल सर ने प्रसन्न मुद्रा में बात आगे बढ़ाई. “चूंकि इस उपलब्धि का श्रेय माया मैडम को जाता है, क्योंकि वे ही इसकी मुख्य कन्वीनर रही हैं, इसलिए इस वर्ष भी यह ज़िम्मेदारी मैं उन्हें ही सौंपता हूं.”
माया व सुरेखा के अलावा बस एक-दो चेहरों को छोड़कर शेष चेहरों पर ईर्ष्या की लपटें सुलग उठीं. तभी माया का गंभीर स्वर गूंज उठा, “सर, मैं चाहती हूं कि अब यह ज़िम्मेदारी किसी और को सौंपी जाए, क्योंकि मेरा मानना है कि सभी को ख़ुद को साबित करने का मौक़ा दिया जाना चाहिए. हमारे यहां सभी प्रतिभाशाली हैं और मुझे उम्मीद है कि वे और भी बेहतर परिणाम देंगे.”
ईर्ष्यादग्ध चेहरे यकायक ही शीतल हो गए और सभी की प्रशंसात्मक निगाहें माया मैडम की ओर उठ गईं.
“मैं आपके सुझाव का सम्मान करता हूं, लेकिन इस वर्ष समारोह के मुख्य अतिथि स्वयं मुख्यमंत्रीजी रहेंगे. अतः इस वर्ष तो यह ज़िम्मेदारी आप ही को वहन करनी होगी, भले ही सबके सहयोग से. हां, उनकी कार्यक्षमता को परखते हुए आप अगले वर्ष के लिए कन्वीनर चुन सकती हैं.” उम्मीद से एक बार फिर सभी की आंखें चमक उठीं.
“आज लास्ट पीरियड के बाद आप सभी की मीटिंग होगी, जहां कार्यक्रम की रूपरेखा बनाकर माया मैडम ज़िम्मेदारियों का बंटवारा करेंगी.”
मीटिंग समाप्त हुई, तो सुरेखा को लेकर माया कैंटीन की ओर बढ़ गई. “चल तुझे तेरी मनपसंद इलायचीवाली चाय पिलवाती हूं. अच्छा, तेरा मूड कुछ ठीक हुआ या नहीं?”
“मेरे मूड की छोड़. तुझे एक बार फिर कन्वीनर बनने की बधाई! कितनी तारीफ़ हुई तेरे काम की! दरअसल, तुझ पर दूसरी ज़िम्मेदारियां भी तो नहीं हैं न. घर पर भी पति और बच्चों का पूरा-पूरा सहयोग मिल जाता है.”
“तुम्हें कैसे पता कि मुझ पर कोई दूसरी ज़िम्मेदारी नहीं है या मुझे घर पर पूरा सहयोग मिलता है? मैंने तो तुमसे कॉलेज के इतर कभी कोई बात ही नहीं की.”
माया की प्रतिक्रिया ने सुरेखा को एक पल को सोचने पर मजबूर कर दिया. वाकई परस्पर अच्छी सहेलियां होते हुए भी माया ने कभी अपना कोई भी दुखड़ा उसके सामने नहीं रोया. न व्यक्तिगत और न व्यावसायिक. दरअसल, सारे समय वही शिकायत करती और अपना रोना रोती रहती थी. और माया का सारा समय उसे समझाने-बुझाने में ही निकल जाता था. लेकिन प्रत्यक्ष में वह इतना ही कह सकी, “वो… दरअसल, तुम हमेशा इतनी शांत और संयत बनी रहती हो, तो मुझे क्या हर किसी को यही लगता है कि तुम्हारे जीवन में कोई समस्या ही नहीं है.” बातों ही बातों में चाय आ गई, तो सुरेखा ने लपककर कप उठा लिया, “सवेरे तो सासू मां की टोका-टोकी से चाय का मज़ा ही किरकिरा हो गया था.”
तभी माया का मोबाइल घनघना उठा, “हां कांत, ओह! पर डियर मैं… हेलो… हेलो…!!”
“क्या हुआ? तुम्हारे पति का फोन था.”
“हां… पर पूरी बात नहीं हो पाई. ऑफिस में किसी ज़रूरी काम में फंस जाने की वजह से वे आज नील को लेने नहीं जा पाएंगे. मुझे लाने का कहकर फोन रख दिया.”
“पर तुम्हें तो मीटिंग में उपस्थित रहना है. ख़ुद तुम्हें लौटने में देरी हो जाएगी. बस, घरवालों के ऐसे रवैए से ही तो हम तनाव में घिर जाती हैं. देखो, उन्होंने तुम्हारी बात तक नहीं सुनी.”
सुरेखा बोले जा रही थी, पर माया ने उसे अनसुना करते हुए दूसरा नंबर घुमा दिया था.
“हां मनोहर, कहां हो तुम इस वक़्त…? अच्छा एक ज़रूरी काम आ पड़ा था. नील के पापा किसी ज़रूरी काम में फंस जाने की वजह से उसे लेने स्कूल नहीं जा पाएंगे. वह टैगोर बाल निकेतन में पढ़ता है. हां, हां… बिल्कुल वही. तो तुम ठीक डेढ़ बजे स्कूल पहुंच जाना. वैसे तो वह तुम्हें पहचानता है, पर फिर भी उसकी एक बार मुझसे बात करवाना, वरना वह तुम्हारे साथ नहीं आएगा. हां, उसे घर छोड़ने जाओ, तब ऊपर जाकर मम्मीजी-पापाजी से अवश्य मिल लेना. उन्हें कुछ काम हो, तो वो भी कर देना, क्योंकि हम दोनों ही आज घर देरी से पहुंचेंगे.”
“किसे फोन कर रही थी?”
“हमारा एक परिचित भरोसेमंद ऑटोवाला है. बहुत ज़रूरी होने पर हम उसे बुला लेते हैं.”
सुरेखा ग़ौर कर रही थी कि इस दौरान माया एक बार भी न तो पति पर झल्लाई और न ही ज़िम्मेदारियों का रोना लेकर बैठी. मीटिंग के बाद भी एक घंटा अतिरिक्त बैठकर माया ने सारा कार्यक्रम तैयार किया. इस दौरान कुछ टीचर्स स्वेच्छा से वहां रुकी रहीं, जिनमें सुरेखा भी एक थी. सबके रुके रहने की अपनी-अपनी वजहें थीं. अधिकांश तो अगले साल कन्वीनर बनने का सपना संजोए थीं, तो कुछ सुरेखा जैसी भी थीं, जिन्हें घर से ज़्यादा यहां सुकून महसूस हो रहा था. प्रोग्राम रिपोर्ट तैयार होने पर अन्य टीचर्स को रवाना कर माया प्रिंसिपल सर को रिपोर्ट दिखाने चल पड़ी.
“मैं भी तुम्हारे साथ ही घर लौटूंगी.” कहते हुए सुरेखा भी साथ हो ली. माया उसकी मानसिकता बख़ूबी समझ रही थी. घर पर ज़्यादा से ज़्यादा समय अनुपस्थित रह वो अपना आक्रोश जता रही थी.
पहला पृष्ठ पढ़ते-पढ़ते ही प्रिंसिपल सर चौंक उठे थे, “ये आपने कौन-सी डेट्स रख दीं मैम? इन दिनों तो मैं इंडिया से बाहर होऊंगा.”
“ओह, सॉरी सर! मुझे मालूम नहीं था. आप अपनी सुविधा की डेट्स बता दीजिए. मैं फिर से प्रोग्राम तैयार कर दूंगी.”
माया की नरमाई से सुरेखा हैरान थी. वह होती तो अभी भड़क उठती. आपसे पहले डेट्स नहीं बताई गई. हम लोग इतनी देर से जुटे हुए हैं. घरवाले अलग परेशान हो रहे हैं.
“नहीं-नहीं, सॉरी तो मुझे बोलना चाहिए. मुझे आपको अपना प्रोग्राम पहले ही बता देना चाहिए था. ख़ैर, कोई विशेष फेरबदल नहीं करना पड़ेगा. कल हूं, पर कल तो छुट्टी है. आप ऐसा कीजिए कल दिन में घर पर आ जाइए. हम एक मीटिंग में ही पूरा प्रोग्राम फाइनल कर लेंगे और हां, लंच साथ ही करेंगे.”
“अरे, नहीं सर मैं ऐसे ही…”
“नहीं-नहीं, लंच तो आपको करना ही पड़ेगा. मैं आप जैसी कर्मठ टीचर को अपनी पत्नी से मिलवाना चाहता हूं.”
“वाह भई, तुम्हारे तो ठाट हैं.” बाहर आते हुए सुरेखा ने कोहनी मारकर माया को छेड़ा था, पर माया को तो अब घर की चिंता सताने लगी थी.
“आज वाक़ई बहुत देर हो गई है. घर बात कर लेती हूं. लो, मीटिंग के वक़्त फोन स्विच ऑफ कर दिया था, तब से ऐसे ही पड़ा है.” माया घर पर फोन लगाने लगी.
“हूं, बिज़ी आ रहा है. मेरे सास-ससुर साथ ही रहते हैं. कुछ समय पूर्व पापाजी को लकवे का दौरा पड़ा था. इलाज चल रहा है. अब काफ़ी बेहतर हैं. अपराधबोध है तो यही कि हम दोनों ही उन्हें पर्याप्त समय नहीं दे पाते.” तबीयत पूछने के बहाने सुरेखा भी साथ हो ली.
माया की चिंता उचित थी. घर में घुसते ही सासू मां का सप्तम स्वर में प्रलाप आरंभ हो गया था. “किसी को परवाह ही नहीं है हमारी. तुम्हारे पापाजी की तो आज आवाज़ ही जानेवाली थी. मैंने फोन पर डॉक्टर से दवा तो पूछ ली, पर लाकर कौन दे? तुम पति-पत्नी ने तो अपने मोबाइल स्विच ऑफ कर रखे थे.“
“जी वो मीटिंग में…” माया ने सफ़ाई देनी चाही, पर सासू मां के सप्तम स्वर में उसका स्वर दब गया.
“वो तो भला हो उस ऑटो ड्राइवर का, जो ऊपर पूछने चला आया और मैंने उससे दवा मंगवा ली.”
सुरेखा ने यह कहने के लिए मुंह खोलना चाहा कि माया ने ही ऐसा निर्देश दिया था, पर माया ने इशारे से उसे रोक दिया. बड़बड़ाती सासू मां अंदर चली गईं, तो माया ने मुंह खोला, “देखा नहीं अभी वे कितने ग़ुस्से में हैं? ग़ुस्सा इंसान की सुनने, सोचने-समझने की शक्ति छीन लेता है. अभी उन्हें कुछ भी सफ़ाई देना बात को बढ़ाना होगा. ग़ुुुस्सा शांत होने पर मैं ख़ुद उन्हें सब समझा दूंगी. अब तुम घर पर जाओ. घर में सब परेशान हो रहे होंगे.”
घर लौटते वक़्त सुरेखा को पहली बार एहसास हो रहा था कि समान डिग्रियां होते हुए भी माया की तुलना में वह कितनी नासमझ है. एक दिन की छुट्टी के बाद कॉलेज के लिए निकलते हुए उसके क़दम स्वतः ही माया के घर की ओर उठ गए. माया उसे देख सुखद आश्‍चर्य से भर उठी.
“आज तुम्हारे साथ कॉलेज जाने का मन है.”
“बहुत अच्छा. आओ बैठो.”
पूरे घर में पसरती कढ़ी की सुगंध ने सुरेखा की नाक को भी अपनी गिरफ़्त में ले लिया. वह पूछे बिना न रह सकी.
“लगता है कुछ ख़ास बन रहा है.”
“मम्मीजी सिंधी कढ़ी बना रही हैं. हर चीज़ इतनी स्वादिष्ट बनाती हैं कि उंगलियां चाटते रहने का मन करता है. उनके हाथों में जादू है.”
“जादू-वादू कुछ नहीं है. प्यार से दिल लगाकर कुछ भी बनाओ, तो स्वादिष्ट ही बनेगा.” मम्मीजी कलछी घुमाती रसोई से बाहर निकलीं, तो सुरेखा ने उनके चरण स्पर्श किए.
“बाई तो प्रेशर कुकर में चार सीटियां लगाकर बना जाती है कढ़ी. उसमें भला स्वाद कैसे आएगा? स्वाद तो सहज व स्वाभाविक रूप से पकी चीज़ में आता है.” कहते हुए
मम्मीजी फिर से रसोई में घुसकर कढ़ी के भगोने में कलछी घुमाने लगीं, तो सुरेखा भी पीछे-पीछे पहुंच गई.
“वाह, क्या खट्टी-खट्टी सुगंध है, पर यह तो बार-बार उबाल खाकर बाहर निकल रही है. आपको कलछी घुमा-घुमाकर उसे गाढ़ा करना पड़ रहा है.”
“अब स्वाद के मज़े उठाने हैं, तो इतनी मेहनत तो करनी ही पड़ेगी.”
कॉलेज के रास्ते में सुरेखा को गंभीर सोच में डूबा देख माया समझ गई कि इस बार सोच की गाड़ी सही दिशा में आगे बढ़ रही है.
“कढ़ी के स्वाद की कल्पना में खोई हो या ज़िंदगी के स्वाद की? वैसे दोनों का फ़लसफ़ा एक ही है. ज़िंदगी को भी यदि सहज व स्वाभाविक ढंग से जीया जाए, तो उसका भरपूर आनंद उठाया जा सकता है. अपनी ज़िंदगी को प्रेशर कुकर बनाओगी, तो जीने का लुत्फ़ ही नहीं आएगा और किसी दिन अत्यधिक प्रेशर से कुकर फट गया, तो याद रखना सबसे ज़्यादा नुक़सान भी कुकर को ही होगा.”
सुरेखा कांप उठी. तस्वीर के इस पहलू के बारे में तो उसने सोचा ही नहीं था.
“ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, तनाव व परेशानियां उतने ही स्वाभाविक हैं, जितनी ईसीजी मशीन में स्क्रीन पर उभरती ज़िगज़ैग यानी ऊपर-नीचे होती रेखा. ज़िगज़ैग रेखा ज़िंदगी का सबूत है. रेखा सीधी हुई, तो ज़िंदगी ख़त्म.” माया गंभीर थी.
सुरेखा अवाक् थी. कितनी मूढ़ है वह! अपने ही नाम के मर्म को नहीं समझ सकी. ज़िगज़ैग यानी उतार-चढ़ावयुक्त रेखा ही तो ज़िंदगी की सबसे सुंदर रेखा है- सुरेखा.

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

 

Meri Saheli Team

Share
Published by
Meri Saheli Team
Tags: Story

Recent Posts

कहानी- मुखौटा (Short Story- Mukhota)

"तुम सोच रहे होगे कि‌ मैं बार में कैसे हूं? मेरी शादी तो बहुत पैसेवाले…

May 25, 2024

श्वेता तिवारी माझी पहिली आणि शेवटची चूक, ‘या’ अभिनेत्याची स्पष्ट कबुली (When Cezanne Khan Called His Kasautii… Co-Star Shweta Tiwari “First & Last Mistake”)

श्वेता तिवारी तिचा अभिनय आणि फोटोंमुळे नेहमी चर्चेत असते. सोशल मीडियावर हॉट फोटो पोस्ट करुन…

May 25, 2024

सुट्टीचा सदुपयोग (Utilization Of Vacation)

एप्रिलच्या मध्यावर शाळा-कॉलेजला सुट्ट्या लागतील. सुट्टी लागली की खूप हायसे वाटते. थोड्या दिवसांनंतर मात्र सुट्टीचा…

May 25, 2024

अवनीत कौरच्या कान्स पदार्पणाने जिंकली सर्वांची मन, भारतीय संस्कारांचे पदार्पण (Avneet Kaur Touches The Ground During Cannes Red Carpet Appearance, Her Indian Sanskar Is Winning Hearts) 

77 वा कान्स फिल्म फेस्टिव्हल सुरू आहे. बॉलिवूडपासून हॉलिवूडपर्यंतचे सितारे कान्सच्या रेड कार्पेटवर आपली जादू…

May 25, 2024
© Merisaheli