कहानी- आपबीती (Short Story- Aapbeeti)

"नही, मेरे पापा मर चुके हैं और मरे हुए आदमी का मुंह देखकर घर से बाहर नहीं जाया जाता." रवि कुछ ग़ुस्से व आश्चर्य से…

“नही, मेरे पापा मर चुके हैं और मरे हुए आदमी का मुंह देखकर घर से बाहर नहीं जाया जाता.”
रवि कुछ ग़ुस्से व आश्चर्य से बोले, “यह तुम क्या कह रही हो रजनी?”
“हां, मैं ठीक कह रही हूं. यही तो कहा था आप लोगों ने. आप शायद भूल चुके हो, पर मुझे सब कुछ याद है.”

रवि आज बहुत ग़मगीन थे. महीने भर पहले ही उनकी मां का देहांत हुआ था. वैसे तो उन्होंने स्वयं को संभाल लिया था, पर आज रह-रहकर उनकी आंखें भर आ रही थी, क्योंकि अभी-अभी उन्होंने अपनी मां का एक बड़ा-सा फोटो फ्रेम करवाकर हॉल में टंगवाया था.
रजनी बार-बार उनको दिलासा दे रही थी. रवि कभी अपनी मां की बातें याद करते, तो कभी जीवन-मरण की बातें करते. अचानक रवि ने पूछा, “रजनी, तुम्हारे भी पापा तो गुज़र गए हैं. तुम उनका भी फोटो क्यों नहीं देती, मैं फ्रेम कराकर यहीं टंगवा दूंगा.” रजनी का लहजा अचानक बदल गया. वह काफ़ी तल्ख़ी से बोली, “नही, मेरे पापा मर चुके हैं और मरे हुए आदमी का मुंह देखकर घर से बाहर नहीं जाया जाता.”
रवि कुछ ग़ुस्से व आश्चर्य से बोले, “यह तुम क्या कह रही हो रजनी?”
“हां, मैं ठीक कह रही हूं. यही तो कहा था आप लोगों ने. आप शायद भूल चुके हो, पर मुझे सब कुछ याद है.” रजनी की आंखों के सामने दो साल पहले का मंजर गुज़रने लगा. जिस शनिवार को रजनी अपने मायके से होकर आई थी, ठीक उसके अगले शनिवार को उसके पापा की मौत हार्ट अटैक से हो गई थी. रजनी को यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि उसके पापा अब नहीं रहे. कितना आघात पहुंचा था उसे.
अंत्येष्टि से वापस आते समय पिता की एक फोटो वह अपने साथ लाई थी, जिसे फ्रेम कराकर वह उसी जगह पर टांग रही थी, जहां आज रवि की मां की फोटो लगी है, पर पापा की फोटो टांगते देखकर सासू मां काफ़ी तल्ख़ी से बोली थीं, “यह क्या कर रही हो बहू, आते-जाते मरे हुए आदमी का मुंह ही देखना पड़ेगा, यहां मत टांगों.” रजनी सहम-सी गई. उसने कहा, “मैं अपने बेडरूम में लगा देती हूं.”
“नहीं, सोकर उठते ही सबसे पहले मरे हुए आदमी का ही दर्शन होगा.” सासू मां ने फिर सख़्ती से कहा.
रजनी के तन-बदन में आग-सी लग गई. उसने भी पलटकर जवाब दिया, “मांजी, यहां कोई अजर-अमर होने नहीं आया है. सभी को एक-न-एक दिन मरना ही है.”
“मां से ज़ुबान क्यों लड़ा रही हो, जब मां मना कर रही है, तो मत करो.” रवि उस पर चिल्लाते हुए बोले थे.
माता-पिता के भक्त बेटे से सही बात पर भी उसका साथ देने की उम्मीद उसने छोड़ दी थी. फिर पापा की बातें भी उसे याद आईं, “घर की शांति के लिए कभी-कभी समझौता करके मौन रह जाना ही उचित है, क्योंकि इससे विवाद नहीं बढ़ता…” और वह मौन रह गई थी.


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उसने अपने पापा की फोटो अपनी आलमारी में लगा दी. जब भी आलमारी खोलती, अपने पापा को देखती और एक उलाहना देती, “पापा, आपका कहना ग़लत है कि लड़कियों का घर उसका ससुराल होता है. लड़कियों का कोई घर नहीं होता पापा. लड़कियों का कोई घर नहीं होता…” बड़बड़ाते हुए वह सिसक पड़ी.
रवि को सभी घटनाक्रम याद आ गया. उसके हृदय में वैसे ही दर्द का समंदर लहरा रहा था. आज रजनी के दर्द को भी उसने बड़ी शिद्दत से महसूस किया. फिर शर्मिंदगी और पश्चाताप के साथ रजनी को अपनी बांहों में लेते हुए बोला, “सॉरी, आई एम वेरी वेरी सॉरी रजनी. मैं आज ही पापा का भी फोटो यहां लगवाऊंग.”
रजनी ने भी यही सोचते हुए रवि को माफ़ कर दिया कि जब तक इंसान पर आपबीती नहीं पड़ती, तब तक वह दूसरों का दर्द शायद भलीभांति समझ नहीं पाता.

रत्ना श्रीवास्तव

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Usha Gupta

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