Short Stories

कहानी- कैनवास कोरा नहीं… (Short Story- Canvas Kora Nahi…)

अचानक बिजली ज़ोर से कड़की ईजल पर लगा सलमा का मासूम सा शर्मीला चित्र अंधेरे की आंखें फाड़कर रफीक के दिलो-दिमाग़ पर छा गया.
“पर मेमसाब कैनवास तो… कैनवास तो कोरा नहीं.” उसके मुंह से अचानक निकला और वह एकदम सरला की बांहों में निकल कर ईजल के पास जा खड़ा हुआ.

सरला नाम है उसका. पर वह एक जटिल प्रश्न जैसी है. वह एक कलाकार है. रंगों के साथ खेलती है, परन्तु वह अभी तक अपनी बेरंग ज़िंदगी में कोई रंग नहीं भर सकी. वह ऐसा ही समझती है, रंग तो क्या एक रेखा चित्र तक तैयार नहीं कर पाई है.
वह अपने अमीर पिता की एकलौती गरीब बेटी है. पिता की दौलत के साथ उसने अपनी सूनी मांग सजाने के लिए अपनी मर्ज़ी का सिन्दूरी रंग तो ख़रीद लिया था, परन्तु यह उसको बदक़िस्मती थी कि उसको अपनी मांग में अधिक समय तक सजा कर नहीं रख सकी.
उसने बहुत रंग देखे है उसकी ज़िंदगी में. हर समय उसने एक एहसास को जीना चाहा कि उसकी ज़िंदगी रंगों से भरी है. रंग भरे रंगीन गुब्बारों जैसी ज़िंदगी के जिस पहलू से टकराएगी उसको रगों से भर देगी, पर उसके एहसास की यह कड़ी एक एहसास मात्र तक ही सीमित रही, इससे अधिक कुछ भी न बन सकी.
रफीक एक पहाड़ी मजदूर है, जो उसकी ज़िंदगी के साथ बिल्कुल वैसे ही टकरा गया था जैसे होली के दिन किसी राहगीर से अचानक किसी मकान की छत से रंग भरा गुब्बारा आ टकराता है. फ़र्क़ शायद इतना ही था कि उस राहगीर को इस तरह अचानक रंगा जाना अच्छा नहीं लगता, लेकिन उसके लिए रफीक का अचानक इस तरह मिल जाना किसी सुखभरी आमद जैसा था. उसके मिलने से पहले उसे अपना अस्तित्व मिट्टी की धूल के घने गुबार में भटकता हुआ महसूस होता था, जिसमें सांस लेना मुश्किल हो जाता है. आंखें भिंची रहती है और लगता है फेफड़ों में मिट्टी की धूल भर गई है जैसे मौत की आमद का एहसास. पर उससे मिलने के पश्चात् लगा हवा स्वच्छ हो गई है, फेफड़ों में से मिट्टी घुल गई है और अब यह खुल कर सांस ले सकेंगी. जैसे जिंदगी को जीने का एहसास हो गया हो.
रफीक जैसे किसी फुहार सा उसके जीवन में चला आया था. पानी की वो बूंदें लेकर जिसमें धूल के गुबार दब गए थे.
पीठ पर जलाने वाली लकड़ि‌यों का गट्ठर उठाए वह उसके घर की दहलीज़ लांघ आया था. वह अपने बरामदे में ईजल के सामने खड़ी देर से कोरे कैनवास को घूर रही थी.
“बीबीजी लकड़ी किधर रखनी है?”

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आवाज़ ने उसका ध्यान अपनी ओर खींचा था. नज़र ने जैसे ही उसे छुआ था, ईजल पर लटक रहे कैनवास जैसे दिल पर एक चित्र उभर आया था. पसीने में तरबतर एक चित्र.
कड़कती लू बरसाती धूप में झिलमिलाता एक चित्र.
गढ़े हुए सुडौल जिस्म के बाजुओं और पिंडलियों पर उभरी नाड़ियां, पैरों में पुराने टाया के जूते, घुटनों तक लटकता कच्छा, पुरानी फौजी कमीज़ की मुड़ी हुई बांहें और कमीज़ की पीठ पर टाट की बोरी का मोटा जैकेट जैसा गद्दा. यह सब कुछ कैनवास पर इतने स्पष्ट रूप में उभर गया था, जैसे कैनवास कैनवास न हो कर आरसी हो.
लकड़ियों का गठ्ठर छोड़ कर वह चला गया था. चाहकर भी वह उसे रोक नहीं पाई थी. उसके जाने के बाद वह देर तक कैनवास पर उसके चित्र को उभारने का प्रयास करती रही. रंगों के साथ लड़ती रही. परंतु जो उसकी आंखों में किसी फ्लैश लाइट सा प्रवेश कर गया था, उसको कैनवास पर उतारना जाने क्यों असम्भव-सा हो गया था. कैनवास पर बनी रफीक की अस्पष्ट तस्वीर जैसे उसकी खिल्ली उड़ा रही थी. दिल के कैनवास वाली तस्वीर अधिक स्पष्ट थी. तंग आ कर उसने रंगों वाली प्लेट सामने की दीवार पर दे मारी थी. सफ़ेद दूध सी दीवार पर छोटे-बड़े रंगीन धब्बे पड़ गए थे जैसे आकाश में बहुत सी आतिशबाज़ियां हुई हो.
और इस आकर्षण ने बहानों को जन्म दिया. घर के पास ही आरे पर काम करता था रफीक. उसे कभी सामान उठवाने के बहाने बुला लेती सरला, तो कभी लकड़िया मंगवा लेती. इन बहानों से कुछ समय के लिए ही उसे देख लेती, पर आंखें तृप्त न होती. प्यास न बुझती, पर जल्दी ही उसने एक बढ़िया बहाना ढूंढ़ लिया था. उसने रफीक को अपने चित्रों का मॉडल बना लिया. रफीक को भी क्या ऐतराज़ हो सकता था. उसे तो पैसे चाहिए थे, कमाई चाहिए थी, जिसके लिए वह अपने पहाड़ छोड़ कर इस मैदानी शहर की ओर आया था.
उसके चित्रों का मॉडल बनते-बनते रफीक उसके काफ़ी नज़दीक हो चला था. उसने अपने बारे में बहुत कुछ बताया था कि वह सन्नासर के पास ही एक गांव में रहता है. उसकी एक छोटी बहन है और दो भाई हैं. उसके अब्बा है, अम्मी है, रिश्तेदार है, वह मिडिल पास है.
उसकी ज़मीन में उसने सेंगे, हाड़ियों‌ और नाखों के दरख़्त हैं. खेती-बाड़ी है. थोड़ी-बहुत मकई और चावल हो जाते हैं. उनका एक छोटा सा घर पहाड़ी के ढलान पर है. और बहुत कुछ बताया था उसने, लाल चश्मे के बारे में, लोगों के बारे में, ख़ूबसूरती और प्रेम कहानियों के बारे में. रफीक के कराए हुए लोगों की कल्पना उसे बहुत प्यारी लगती और वह कह उठती, “इस बार मैं सन्नासर ज़रूर आऊंगी और तुम्हारा गांव भी देखूगी.”


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“ज़रूर आइएगा मेमसाब.” रफीक कहता.
“बड़ी प्यारी जगह है. बड़ा-बड़ा टूरिस्ट लोग आता है वहां. होटल वैगरह तो नहीं, पर टूरिस्ट क्वार्टर बहुत है.” “अच्छा.” सरला भोली सी बनती हुई कहती.
“जी मेमसाब पास ही है.” और फिर वह वहां जाने का रास्ता बताने लगा.
गर्मी आ गई थी. रफीक अपने गांव पहाड़ों की ओर चला गया था. गर्मी का मौसम यह अपने पहाड़ी इलाके में ही बिताता है. सर्दी में पहाड़ों पर बर्फ़ भी पड़ती है, इसलिए वह इन दिनों में चार पैसे कमाने के लिए जम्मू शहर की ओर चला जाता है.
है तो बहुत भोला, लेकिन शहर की हवा खाकर थोड़ा चतुर भी हो गया है. उसके साथ ही आरे पर काम करने वाले फज़लू ने जब उसका मज़ाक उड़ाते हुए मेमसाब के बारे में पूछा था, तब उसने कहा था, “हां फजलुआ, कुछ समझ में नहीं आता. मेमसाब मेरी तस्वीर बनाते समय बड़े प्यार से देखती हैं. उनकी आंखें देख कर मुझे सलमा की याद आ जाती है, वो भी उतने ही प्यार से देखती है. पर सच कहूं फजलुआ, यह मेमसाब मेरी सलमा की बराबरी नहीं कर सकतीं. यह बड़े लोग प्यार-मुहब्बत नहीं, सिर्फ़ वक़्त पास करना जानते हैं.
सरला सन्नासर आ गई थी. दो कमरों का एक क्वार्टर किराए पर ले लिया था उसने. गर्मी की छुट्टियां बिताने और बहुत से सैलानी भी आए हुए थे. कुछ ही दिनों में सभी बंगले किराए पर चढ़ गए थे.
दूर-दूर तक फैली ढलान, हरी घास की मखमली चादर में लिपटी हुई, दूर देवदार और चीड़ के घने जंगलों तक फैली हुई पहाड़ी ढलान. उसका जी चाहता वह बिना रुके इन मखमली ढलानों में दूर तक फिसलती चली जाए.
वो दूर तक, जहां देवदार और चीड़ के ये ऊंचे-लंबे दरख़्त जंगल का रूप धारण करने लगते हैं.
सरला को यह जगह की बहुत पसन्द आई थी. वह सोचती, ‘मैं पहले क्यों नहीं आई यहां?’ सुबह-शाम की शबनम, बादलों के टुकड़ों को दरख़्तों में अटकी हुई सफ़ेद धुंध, घास चरते हुए भेड़-बकरियों के झुंड, कंबलों में लिपटे हुए सलवार कमीज़ और जैकेट पहने हुए पहाड़ी लोग. यह सब उसे किसी स्वप्न सा लगता.
“कोई भी ख़ूबसूरत नज़ारा, जो इंसान ने पहले कभी न देखा हो, कुछ देर के लिए सपने जैसा लगता है.” रफीक उसकी हैरानगी को दलील देने को कोशिश करता. वह सारा दिन उसके साथ ही रहता.
कल वह मेमसाब को अपने घर ले गया था. पहाड़ी चढ़ती पतली पगडण्डी का सफ़र बेशक थका देनेवाला था, पर सरला के लिए यह बड़ा प्यारा अनुभव था. पहाड़ी ढलान में कितना प्यारा लगा था रफीक का घर. बेतरतीब सी शिलाओं को बड़ी तरतीब के साथ दीवारों का रूप दे दिया गया था. घर की जिस चारपाई पर वह बैठी थी, उस पर बिछी हुई चादर में से दूध की महक आती हुई महसूस होती थी. रफीक के छोटे भाई-बहन के दरवाज़े-खिड़कियों के पीछे में छुप-छुप कर देखते-हंसते चेहरे याद आते ही उसके चेहरे पर मुस्कुराहट बिखर जाती.
कल रात ही उसने एक चित्र बनाया था रफीक के घर का चित्र, जिसमें कमरे के अन्दर से दरवाज़े-खिड़कियों के बाहर का दृश्य नज़र आता था और उनके पीछे से झांकते आधे-छुपे मुस्कुराते चेहरे. रफीक ने जब चित्र देखा, तो झट से बोल पड़ा, “यह तो हमारे घर की तस्वीर है और यह मेरे भाई-बहन झांक रहे हैं. सचमुच कमाल कर दिया आपने.” फिर कुछ सोच कर बोला, “आपको एक तस्वीर मेरे लिए बनानी पड़ेगी मेमसाब.”
“एक क्यों? तुम जितनी चाहो.” सरला का उत्तर था.
“नहीं, सिर्फ़ एक ही, सलमा की. मैं अभी उसे लाता हूं.” कह कर वह क्वार्टर से निकल गया था. सलमा का नाम सुनते ही सरला के पांव के नीचे से जैसे ज़मीन ही खिसक गई थी. वह देर तक सोचती रही. यह सलमा कौन है? कहीं उसकी मंगेतर तो नहीं. एकदम नया नाम था उसके लिए. रफीक ने तो पहले उसका ज़िक्र तक नहीं किया था और कुछ देर बाद ही वह सलमा का चित्र बना रही थी. शरमाई हुई कजरारी आंखों वाली. दूध सी सफ़ेद सलमा का चित्र. एक पहाड़िन परी कर चित्र.
हाय कितना प्यारा सा चित्र!.. सरला हैरान थी कि इस ख़ूबसूरती को उसने रंगों में कैसे ढाल लिया. दरअसल, वह कोई बहुत बड़ी कलाकार नहीं थी. वैसे ही शौकिया पेंटिंग वगैरह कर देती थी. शौक, जिसके कारण वह एक कलाकार की ओर खिंच गई थी. जिससे उसने अपनी सूनी मांग में सिंदूर भरवाया था. पर उस कोमल हृदय और कोमल उगलियों वाले कलाकार के हाथ को उसके कसे हुए भरपूर जिस्म को रास नहीं आए. उसको तो चाहिए था एक भरा-भरा गठीला नर शरीर, जो उसे बुरी तरह झिझोंड डालता.
रफीक बड़ा ख़ुश था. बार-बार कह उठता, “मेमसाब, आपने मेरी सलमा की बहुत अच्छी तस्वीर बनाई है.”
“सचमुच अच्छी बनी है?” उसने जान-बूझकर पूछ लिया. “हां जी, बहुत अच्छी बनी है. मैं सलमा को घर छोड़ कर आता हूं ,फिर ले आऊंगा.”
वह मुस्कुरा पड़ी थी. रफीक सलमा को छोड़ने चला गया. उसके जाने के बाद अचानक सरला ने महसूस किया कि वह कुछ खोने जा रही है. उसे एक अजीब सी असुरक्षा का एहसास होने लगा.

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रफीक को मेरा होना पड़ेगा हर हाल में मेरा होना पड़ेगा. उसने सोच लिया था. हवा का एक तेज़ झोंका आया और खिड़की धड़ाक से बन्द हो गई. बाहर बूंदाबादी होने लगी थी. रफीक बारिश में भीगा हुआ जब कमरे में दाख़िल हुआ, तब वह नाइटी पहने खिड़की के पास खड़ी थी. बिजली के न होने के कारण कमरे में हल्का अंधेरा था. आममान में बिजली की कड़कड़ाहट के साथ ही हवा आंधी की तरह हुंकारती हुई आई और एक खिड़की खड़ाक से खुल गई. रफीक की आंखें खुली की खुली रह गई थी. उसने अपनी मेमसाब को कभी इस हालत में नहीं देखा था. खिड़की से आई तेज हवा ने उसकी जाली जैसों पतली नाइटी को उसके नंगे जिस्म पर ये उड़ा दिया था और आसमानी बिजली के लश्कारे में उसका जिस्म संगमरमर की एक खूबसूरत मूर्ति सा लग रहा था. रफीक की फटी हुई पुतलियां देख कर वह मुस्कुराई थी और फिर धीरे-धीरे उसके नज़दीक और नज़दीक होती चली गई. “यह औरत जात बहुत शक्की होती है.” रफीक ने थूक निगलते हुए कहा.
“क्यों?” सरला उसकी ओर बढ़ते हुए बोली.
“आपके साथ घूमता हूं न तस्वीर बनाने के लिए, इसीलिए पता नहीं क्या समझती है?”
“कौन सलमा?”
“हां, और कौन? रूठ जाती है. सीधे मुंह बात तक नहीं करती.”
“अच्छा। मेरे साथ घूमने में उसे क्या ऐतराज़ है?” सरला ने उसके हाथ से अपना हाथ छुआते हुए पूछा.
“वो मेरी मंगेतर है न जी, इसीलिए शक करती है.” सरला उसके बिल्कुल नज़दीक आ चुकी थी. इतनी नज़दीक कि उनकी हल्की गर्म सांसें आपस में टकरा रही थी. उसके हाथ राफीक की चौड़ी छाती पर फिसलते हुए उसकी कमीज़ के बटनों की ओर बढ़े.
“मैं तुम्हे कैसी लगती हूं?” बटन खोलते हुए उसने पूछा. रफीक ने अपने सूख गए होंठों पर जीभ फेरी.
“अच्छी लगती हैं, पर यह आप क्या कर रही हैं?”
“मैं आज तुम्हारा एक न्यूड बनाना चाहती हूं.”
“न्यूड?” रफीक बुदबुदाया, “माने?”
“नंगा चित्र.” सरला ने स्पाट किया
अचानक बिजली ज़ोर से कड़की ईजल पर लगा सलमा का मासूम सा शर्मीला चित्र अंधेरे की आंखें फाड़कर रफीक के दिलो-दिमाग़ पर छा गया.
“पर मेमसाब कैनवास तो… कैनवास तो कोरा नहीं.” उसके मुंह से अचानक निकला और वह एकदम सरला की बांहों में निकल कर ईजल के पास जा खड़ा हुआ.
सरला हैरान सी कुछ समझ नहीं पा रही थी कि एकाएक बिजली फिर चमकी और सलमा का मासूम चित्र एक बार फिर शरमा गया. सरला को सलमा की शर्मीली आंखें देखकर एकदम अपने नंगेपन का एहसास हुआ और उसने झट पलंग से चादर उठा कर अपने जिस्म पर लपेट ली.

– बलजीत सिंह रैना

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