कहानी- हां वेरा तुम! (Short Story- Haan Vera Tum!)

"आपको ऐसे आना चाहिए था क्या मेरे सामने? लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं हमारे बारे में." कितना अपनापन था तुम्हारे स्वर में. "एक बात…

“आपको ऐसे आना चाहिए था क्या मेरे सामने? लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं हमारे बारे में.” कितना अपनापन था तुम्हारे स्वर में.
“एक बात कहूं.” मैंने सिर उठाकर तुम्हें देखा. मेरी आंखों को निहार रही थी तुम भी.
“मुझे अपना लो वेरा. तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगा. बिल्कुल नहीं… प्लीज़ अब मुझे अकेला ना छोड़ना.”
मैं भावुक हो उठा था. एकदम निरीह. एक छटपटाहट महसूस करता हुआ, जिससे मुझे केवल तुम ही मुक्त कर सकती थी.
 

प्लेटफॉर्म पर काफ़ी चहल-पहल थी. मैं तुम्हें तलाशता हुआ भागा जा रहा था. हर चेहरे को बग़ौर देखता हुआ. एक काया तुम्हारी जैसी लगी. मैं ठिठककर रुक गया. वह तुम ही थी. यक़ीनन!
“वेरा तुम!” मेरे मुंह से अचानक निकल पड़ा.
“हां…” बड़ी मासूमियत से मुझे देख रही थी तुम.
यह तो मुझे पता था कि तुम कभी-न-कभी ज़रूर मिलोगी, मगर इस हाल में मिलोगी इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी. मैं तुम्हें एकटक देखे जा रहा था.
“क्यों, क्या हुआ हमें?”
बात करने का वही पुराना लहज़ा. तुमने हंसने का प्रयास किया. एक जबरी हंसी. एकदम फ़ीकी-सी. उसमें एक अव्यक्त पीड़ा साफ़ प्रतिबिंबित हो रही थी. हालांकि अपने दर्द को छुपाने का तुम भरसक प्रयास कर थी, परंतु तुम सफल नहीं हो सकी. तुम्हारी बेबसी को मैं पढ़ रहा था. उसी तरह तुम्हें देखे जा रहा था. देखे जा रहा था. अपलक, तुम्हारी आंखों में. नहीं-नहीं, मैं तुम्हें निहार रहा था. जैसे कोई चकोर, बस चांद को निहार रहा हो.
“कैसी हो?” मैंने पूछा.
“ठीक हैं. बस मुंबई आए थे. सोचा, आपसे मिल लें, इसीलिए फोन कर लिया. बहुत बिज़ी थे?”
“तुम बुलाओ और मैं बिज़ी रहूं. यह मुमकिन है क्या?” तुम्हारी आंखों में झांकने लगा मैं.
“थोड़ी देर यहीं रुकिए. हम काउंटर से बर्थ नंबर पूछ कर आते हैं.”
तुम सामने के काउंटर की ओर बढ़ गई. मैं तुम्हें जाते हुए देखने लगा. उसी तरह एकटक.
तुमसे यह मेरी कुल पांचवीं मुलाक़ात थी. इससे पहले की चारों मुलाक़ातें बिहार में हुई थीं. अंतिम बार हम रांची में मिले थे. तुम्हारी शादी में. वैसे हमारा परिचय ही पटना के एक ग्रामीण इलाक़े में हुआ था.
मुझे याद है, तुम्हारे कॉलेज का दौर था वह. तुम बीएससी पास कर चुकी थी और मेरी भी केंद्र सरकार में नई-नई नौकरी लगी थी उसी साल. तुम्हारी मौसेरी बहन जैती की शादी थी. तुम्हारा मौसेरा भाई सुधीर मेरा जिगरी दोस्त था. हम दोनों साथ-साथ काम करते थे. उस बार पटना में पूरे छह दिन हम साथ रहे. चौबीसों घंटे साथ-साथ. देर रात तक अंताक्षरी खेलते या गाना गाते थे. ख़ूब मज़ा आता था.
पहली मुलाक़ात में ही तुम मुझे जंच गई थी. तुम्हारे बोलने का लहजा. विचारों में गंभीरता. झील-सी गहरी आंखें. नागिन जैसी लहराती जुल्फ़ें सब बेमिसाल थीं. मुझे बरबस आकर्षित कर रही थीं. कितनी कशिश थी तुम्हारी मुस्कुराहट में और चेहरे में जादू-सा आकर्षण. उस पहली मुलाक़ात में ही मुझे लगा शायद तुम्हीं वह लड़की हो, जो मेरी जीवनसंगिनी बनेगी या मैं ही वह लड़का हूं, जो तुम्हारा हमसफ़र बनने जा रहा है. मैंने तय कर लिया था कि तुमसे मन की बात ज़रूर कहूंगा.
बात ही बात में मुझे पता चल गया था कि तुम्हारे लिए भी लड़के की तलाश चल रही है और अपनी आकर्षक नौकरी की वजह से योग्यता के पैमाने पर मैं बीस ही था. मुझे पक्का भरोसा था, अगर मैंने शादी का प्रस्ताव रखा, तो तुम्हारें घरवाले सहर्ष स्वीकार कर लेगें. बशर्ते मैं भी तुम्हें पसंद होऊं.
तुम्हारी मौसी के घर में गुपचुप हमारी जोड़ी की चर्चा थी. यह तुम्हें भी पता था. शायद तुम्हारी मम्मी से सुधीर ने बात भी की थी. एक तरह से उसी मक़सद से मुझे जैती की शादी में बुलाया भी गया था. तुम्हारी मां की नज़रों में मुझे मां जैसी ममता और वात्सल्य दिखा था. बड़े अपनेपन से उन्होनें मेरे बारे में पूछा था. मुझे लगा था, मेरी मां मुझसे हालचाल पूछ रही है.
मैंने सुधीर से भी बातचीत कर ली थी. उसी ने मुझे सलाह दी थी कि मैं तुमसे भी पूछ लूं और मैं मौक़ा तलाशने लगा तुमसे बात करने का.
मई की ख़ुशनुमा शाम थी वह. सूर्यास्त हो चुका था. हम लोग छत पर बैठे गपशप कर रहे थे. सुधीर नीचे चला गया. उसके जाने के बाद अचानक वहां ख़ामोशी पसर गई. छत पर केवल हम दोनों थे. मेरे सामनेवाली कुर्सी पर तुम बैठी थी. बगल में चल रहे टेबल फैन से तुम्हारे इक्का-दुक्का बाल जो जूड़े से बाहर थे, रह-रहकर तुम्हारे रुख पर फिसल रहे थे. उस दिन तुमने पहली बार अपनी बालों को लपेटकर जूड़ा बनाया था.
“एक बात कहूं.” थोड़ी देर बाद मैंने ही मौन तोड़ा. तुम मेरी तरफ़ देखने लगी, लेकिन बोली कुछ नहीं. हल्की-सी मुस्कराहट तैर रही थी तुम्हारें लबों पर. तुम कितनी अच्छी लग रही थी. मुझे वह पल जस का तस आज भी याद है.
“तुम बुरा तो नहीं मानोगी?”
“बोलिए न! बुरा क्यों मानूंगी. बुरा माननेवाली बात आप कह ही नहीं सकते.” तुमने आग्रह किया. जैसे जल्द-से-जल्द तुम सुन लेना चाहती थी कि मैं कहना क्या चाहता हूं.
“तुम अपने केश इसी तरह खुले रखा करो.”
“क्यों?” तुम हल्के से मुस्कुराई.
“तुम्हारे खुले बाल बहुत अच्छे लगते हैं. सच्ची! खुली जुल्फ़ों की बीच तुम्हारा ख़ूबसूरत चेहरा, ऐसे लगता है जैसे बादलों की बीच चांद. बस, हर देखनेवाला मंत्रमुग्ध होकर खिंचा चला आता है तुम्हारी ओर.”
“अच्छा!” तुम हंसने लगी थी.
“सच!” मुझे उस समय तुम दुनिया की सबसे सुंदर लड़की लग रही थी. तुम्हारी मुस्कुराहट से मैंने यही समझा, मेरी बातें तुम्हें अच्छी लग रही हैं.
“कुछ और बोलू?”
“बोलो.” तुमने इजाज़त दे दी.
“तुम्हारी आंखें बहुत अच्छी हैं. झील-सी गहराई है इनमें. तुम्हारे व्यक्तित्व की दर्पण हैं ये आंखें. इनमें झांककर कोई बता सकता है कि तुम कैसी हो. मैं तो इन आंखों के सहारे तुम्हारे दिल में उतर जाता हूं. सच वेरा! मैं सुध-बुध खो बैठता हूं. याद रहती हैं, तो बस तुम्हारी आंखें. इतनी सुंदर आंखें आज तक मैंने देखी ही नहीं, तुम इतनी ख़ूबसूरत क्यों हो? एक अजीब-सी कशिश क्यों है तुम्हारे चेहरे में? मुझे तो बरबस खींचती है, चुंबक की तरह. मन करता है, पूरी ज़िंदगी तुम्हें निहारता रहूं.”
“अच्छा!” तुम खिलखिला पड़ी थी.
फिर बोली, “तुम्हे तो कवि या शायर होना चाहिए था. रूप-सौंदर्य की व्याख्या करने में तुम हिंदी कवियों को पीछे छोड़ रहे हो.”
“ये तुम्हारे ही अल्फ़ाज़ थे वेरा. मुझे लग रहा था, तुम्हें देख-देख कर मैं सचमुच कवि बनता जा रहा हूं.”
“एक बात पूछूं.” थोड़ी देर चुप रहकर मैंने फिर ख़ामोशी तोड़ी थी.
“पूछो.”

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“तुम किसी को पसंद करती हो?”
तुम अचानक चौंककर मेरी तरफ़ देखने लगी. शायद तुम इस प्रश्‍न के लिए तैयार नहीं थी. थोड़ी देर बाद मैं तुम्हारी आंखों में झांका था. सच वेरा, तुम्हारी आंखों में मुझे अपनी तस्वीर नज़र आई.
लंबे समय तक हमारे बीच एक लंबा मौन पसरा रहा. मौन के उस दायरे को लांघने से हम बड़ी देर तक कतराते रहे.
“नहीं.” बहुत देर बाद तुमने कहा था. बहुत धीरे से.
“कहीं रिश्ते की बात चल रही है?” मैंने तुम्हें फिर कुरेदा था.
तुम कुछ बोली नहीं. बस मेरी तरफ़ देख रही थी अपलक. सहसा आंखों से दो मोती लुढ़क पड़े.
“अरे, तुम रो रही हो?” मैं चौंक पड़ा था.
मेरी बात सुनते ही और फूट पड़ी थी तुम वेरा. मुझे लगा मैंने ग़लत सवाल कर दिया दिया. थोड़ी देर बाद तुमने अश्क पोंछ लिए. हम दोनों चुप थे. ख़ामोशी की एक रेखा-सी खिंच गई थी हमारे बीच. मुझे याद आया कि तुम जैती से दो-तीन साल बड़ी थी, इसलिए पहले तुम्हारी शादी होनी चाहिए थी, लेकिन हो रही थी छोटी बहन की शादी.
“सॉरी, मुझे ऐसा सवाल नहीं करना चाहिए था. माफ़ कर दो न वेरा, प्लीज़!” मैं अपराधबोध से ग्रस्त हो उठा. दरअसल, मैं एक बहुत महत्वपूर्ण बात करने के लिए भूमिका बना रहा था और ग़लती कर बैठा. मैंने सफ़ाई दी.
तुम्हारी वही ख़ामोशी और अंगूठे से फ़र्श को कुरेदने का वही प्रयास.
“तुम मुझसे शादी करोगी वेरा?” मैं अचानक कह गया.
“हां, तुम मुझे भा गई हो वेरा. मैं, मैं तुम्हारा हमसफ़र, तुम्हारा जीवनसाथी बनना चाहता हूं. अगर मैं तुम्हें पसंद होऊं तो…” मेरी आवाज़ लरज़ रही थी.
कुछ देर बाद मैंने फिर सफ़ाई दी, “अगर तुम्हें कोई और पसंद हो तो कोई बात नहीं.” मुझे पसीना छूटने लगा.
तुम अचानक हंस दी थी. ठीक रोते हुए उस बालक की तरह, जो रोते-रोते किसी बात पर अचानक खिलखिलाकर हंसने लगे.
“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं.” यह तुम्हारी आवाज़ थी.
बहुत देर बाद तुम फिर बोली, “पप्पा से बात करिए न.” सहसा तुम्हारी आवाज़ बदल गई.
” नहीं-नहीं, आपको हमारे दादाजी से इजाज़त लेनी होगी.” तुम्हारा चेहरा सहसा बुझ-सा गया. लाचारी एवं पीड़ा साफ़ झलक रही थी तुम्हारी आंखों में.
“उन लोगों को तो मैं मना लूंगा.” मेरा आत्मविश्‍वास बढ़ गया था.
तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान थिरक उठी. बड़ी दिलकश मुस्कान थी, हसरत भरी. तुम्हारा चेहरा खिल उठा था, किसी शबनमी फूल की तरह. जैसे किसी बोझ से कोई दबा जा रहा हो और अचानक कोई साथी उसका सारा बोझ अपने कंधे पर लेकर उसे सुस्ताने का मौक़ा दे दे. या फिर, कोई मांझी अपनी नाव समेत बीच भंवर में फंस गया हो और सहसा कोई दूसरा कुशल मांझी उसकी नाव को उबार कर उसे साहिल तक पहुंचा दे.
अब उस दिन की बात सोचकर हंसी आती है मुझे. तुमने उस दिन मेरी ग़ुस्ताखी या फिर कहो दुस्साहस का बुरा क्यों नहीं माना वेरा? आख़िर क्यों वेरा? काश! तुम उसी समय मेरा प्रस्ताव ठुकरा देती. तो आज ये वक़्त ही न आता, लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया. तुमने ही मुझे रास्ता दिखा दिया था आगे बढ़ने का. सपने में देखने का.
तुम अभी भी क्यू में ही थी. अपनी बारी का इंतज़ार करती हुई.
मैं उन मीठी स्मृतियों में फिर से गोता लगाने लगा, जो तुमसे और केवल तुमसे जुड़ी थीं. उन दिनों दुनिया अचानक बेहद हसीन लगने लगी थी. एकदम सपने जैसी. ख़ुशी पोर-पोर से टपक रही थी. दुनिया इतनी सुंदर तो कभी नहीं लगी थी मुझे. मैं समझ नहीं पा रहा था, अचानक क्या हो गया. ज़िंदगी इतनी हसीन हो सकती है, मैंने कभी सोचा भी नहीं था. ताड़ के लंबे सूखे वृक्ष, जो पटना के उस देहात में पहुंचते समय नीरस और खूसट लगे थे, अब सौंदर्य बरसा रहे थे. तसव्वुर इतना मीठा, इतना मधुर कभी नहीं लगा था. हे भगवान! तुमसे जुड़ी हुई हर चीज़ से अपनापन महसूस कर रहा था मैं.
मुझे याद है वेरा. उस दिन सुबह तुम जैती को शादी की मेहंदी लगा रही थी. तुम्हारी मम्मी, मौसी और परिवार की कई लड़कियां एवं रिश्तेदार वहां मौजूद थे. मैं भी वहीं चारपाई पर बैठा था. नज़र चुराकर तुम्हें निहार रहा था. बीच-बीच में तुम मेरी जानिब देख लेती थी. जैती को मेहंदी लगाने के बाद तुम कोन और नींबू का पानी समेटने लगी. अचानक मैं तुम्हारे पास पहुंच गया.
“मुझे भी मेंहदी लगा दो वेरा!” मैंने तुमसे आग्रह किया.
मुझे नहीं पता, मैं कब बिजली की सी गति से चारपाई से उठा और तुम्हारे सामने आकर बैठ गया. सच वेरा! पता नहीं यह सब कैसे हो गया?
“अरे! देख नहीं रहे हैं आप. मम्मी, मौसी देख रही हैं. लोग क्या कहेंगे?” तुमने फुसफुसाया था.
मुझे तुम्हारा यह संबोधन बड़ा अच्छा लगा था. वहां बैठे सभी लोग मेरी नादानी पर हंसने लगे.
मुझे अपनी अज्ञानता का एहसास हुआ.
“सॉरी! जाने दो.” मेरे मुंह से निकला.
मैं बुझ-सा गया. मैं उठने ही वाला था कि तुमने मेरा हाथ पकड़ लिया. हां वेरा, सचमुच तुमने मेरा हाथ पकड़कर रोक लिया था. मुझे तो यक़ीन ही नहीं हुआ. “अच्छा लाइए, आपको लड़की बना दूं.” और तुम सबसे बेख़बर होकर मेरी हथेली में कोन से एक फूल रचने लगी. सहसा वहां लोगों को विश्‍वास नहीं हुआ, यह तुम क्या कर रही हो. एक पराये युवक को इस तरह? लेकिन वहां लोग जो कुछ देख रहे थे, वह सच था. हां वेरा! वह सच था. तुम मेहंदी लगा रही थी मेरी हथेली पर. तुम्हारी नज़र मेरी हथेली पर थी. सच, उस समय तुम कितनी सुंदर लग रही थी. तुम्हारे केश भी खुले थे. मैं कभी हथेली, कभी तुम्हें देख रहा था. और कामना कर रहा था कि काश! यह समय ठहर जाता सदा के लिए. अंत में तुमने हथेली में एक गोला बनाया और उसमें ‘वी’ लिख दिया. तुमने ‘वी’ क्यों लिखा था वेरा?

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“लाइए आपका नाख़ून रंग दूं, मेहंदी के रंग में।. यह लंबे समय तक आपको हमारी याद दिलाएगा.” तुमने फुसफुसाकर कहा और बाएं हाथ के अंगूठे के नाख़ून पर मेंहदी लगा दी.
सचमुच मेहंदी के वे रंग लंबे समय तक तुम्हारी याद दिलाते रहे. मैं न तो बायां हाथ धोता, न अंगूठे का नाख़ून काटता. मैं दिन-रात हथेली और अंगूठे को निहारता था. उसमें तुम दिखाई देती थी वेरा. मैं तुम्हारे प्यार के रंग में सराबोर हो गया था. मैं उठकर अपने कमरे में चला आया. मेरी आंखें उस ख़ुशी को संभाल नहीं पाईं और छलक पड़ी थी. मैं मुंह के बल बिस्तर पर पड़ गया.
“अरे आप रो रहे हैं?” तुम मेरे पीछे-पीछे कमरे में आ गई थी.
“पता नहीं क्यों?”
“अरे हुआ क्या?”
“रो कहां रहा हूं मैं. ये तो ख़ुशी के आंसू हैं.” मैंने अपने को संभाला और बोल पड़ा था. मुंह छुपाते हुए.
“सचमुच आप एकदम बच्चे हैं.” तुम हंस रही थी.
अचानक तुम लरज पड़ी. एक याचक की तरह, “प्लीज! आप बच्चा मत बनिए. बड़े हो जाइए. आपके अंदर के बालक से डर लग रहा है मुझे. कहीं वह बालक…” सहसा चुप हो गई थी तुम.
मैं भी कुछ नहीं बोला. कमरे में बहुत देर तक नीरवता ही पसरी रही.
“आपको ऐसे आना चाहिए था क्या मेरे सामने? लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं हमारे बारे में.” कितना अपनापन था तुम्हारे स्वर में.
“एक बात कहूं.” मैंने सिर उठाकर तुम्हें देखा. मेरी आंखों को निहार रही थी तुम भी.
“मुझे अपना लो वेरा. तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगा. बिल्कुल नहीं… प्लीज़ अब मुझे अकेला ना छोड़ना.”
मैं भावुक हो उठा था. एकदम निरीह. एक छटपटाहट महसूस करता हुआ, जिससे मुझे केवल तुम ही मुक्त कर सकती थी.
तुम सहसा चुप हो गई थी और गंभीरता की चादर ओढ़ ली थी. तुम्हारी चुप्पी ने मुझे हताश कर दिया. पटना छोड़ने से एक दिन पहले तुम्हारे दादा ने मेरी हसरतों को दफ़न कर दिया.
सुधीर ने बताया कि उन्हें मेरा प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं. दूसरी जाति का दामाद उन्हें स्वीकार नहीं था. लोगों ने उन्हें मनाने की लाख कोशिश की, पर वे टस-से-मस ही न हुए. वह परिवार के बुज़ुर्ग थे और मुखिया भी. लिहाज़ा उनके फ़ैसले को मानने के लिए तुम लोग बाध्य थे. फिर तुम घर की बेहद ज़िम्मेदार लड़की थी. कैसे इनकार करती.
सच, उस समय तुमने साथ दिया होता, तो मैं बग़ावत कर देता. हम कहीं भाग जाते या उसी समय शादी कर लेते. लेकिन तुम तो जैसे अज्ञातवास में चली गई. लाख खोजने पर भी सामने नहीं आई. मैं तड़पता रहा, तुम्हें देखने के लिए. पता नहीं मैं ख़ुद को बड़ा ग़ुनाहगार महसूस कर रहा था. असह्य वेदना से छटपटा रहा था.
पटना छोड़ते समय तुम फिर प्रकट हो गई थी. मैं तुमसे नज़र नहीं मिला पाया था. हालांकि अब सोचता हूं, अगर तुमने साथ दिया होता, तो आज यह जीवन जीने के लिए हम आभिशप्त न होते.
संभवतः इस कहानी का प्लॉट ही न बनता तब. तुम्हें अपना न बना पाने की पीड़ा, जो मेरी धरोहर बन गई, शायद मेरे पास न होती. तब इस दुनिया को, रिश्तों को इतने क़रीब से देखने की समझ भी न आती मुझे. मैं एक बहुत अच्छा वैज्ञानिक ज़रूर हो जाता, लेकिन मेरी भाषा, मेरे शब्द में इतना दर्द, इतनी टीस कभी न उभर पाती. संवेदनाएं इस तरह मेरे व्यक्तित्व पर हावी नहीं होतीं.
कभी-कभी सोचता हूं, तुम्हें न अपना पाने की क़ीमत क्या इन उपलब्धियों से चुकाई जा सकती है?
ऐसे में मुझे एक ही जवाब मिलता है- नहीं!
हां वेरा, तुमसे अलग होने के बाद पैदा हुई पीड़ा ने मुझे लेखन में बड़ी ऊंचाई तक पहुंचाया. बहुत कामयाबी दी. अगर इस कामयाबी और उपलब्धि को तराजू के एक पलड़े पर रखूं और तुमसे मिल पाने की ख़ुशी को दूसरे पलड़े पर, यक़ीन मानो तुमसे मिलने की ख़ुशी वाला पलड़ा हमेशा भारी रहता. हां, मैंने तुम्हारी आरजू की थी, सफलता या उपलब्धि की नहीं.  
दरअसल, तुम्हें खोने के बाद मुझे लगा, मेरे पास कुछ है ही नहीं. एक निर्वात, एक खालीपन पसर गया मेरे जीवन में. उसका दायरा दिनोंदिन बढ़ता गया. तुमने हालांकि ऐसा कोई आश्वासन या भरोसा या दिलासा नहीं दिया था, जिससे लगे कि मेरे लिए तुम भी उतनी ही बेक़रार हो जितना तुम्हारे लिए मैं.
इसके बावजूद लगता था, तुम्हारे दिल में, मेरे लिए जगह बन गई थी, अन्यथा तुम मेरी हथेली पर मेंहदी से ‘वी’ क्यों लिखती?
तुम्हारे विरह में मैं सलीके से कभी जी ही नहीं पाया. सदा दर्द टपकता रहा और मैं कराहता रहा. अंदर से अकेलेपन का एहसास सताता रहा. सचमुच मैं ख़ुद से ही भागता रहा ज़िंदगीभर, लेकिन तुम्हारे तसव्वुर से उबर ही नहीं पाया.
दो साल बाद एक दिन सुधीर ने बताया था. तुम्हारी शादी तय हो गई. निमंत्रण-पत्र मेरे सामने रखा था. तुमने ख़ुद मेरा नाम लिखकर कार्ड भेजा था. आने के लिए लिखा था तुमने. वेरा! तुम बुलाओ और मैं न आऊं, यह तो हो ही नहीं सकता था.
मैं सुधीर के साथ रांची आ गया था. वहां तुमने स्वागत किया था, लेकिन वह मुझे बहुत औपचारिक लगा था. बाद में तुम दिखी ही नहीं. न मालूम कहां छुप गई. वैसे तो रांची का मौसम बहुत अच्छा है, लेकिन वह मुझे जमा नहीं. मेरा दम-सा घुटने लगा था. दूसरे ही दिन मैंने वापसी का मन बना लिया.
सब लोगों ने रुकने के लिए कहा, लेकिन मैंने किसी की बात नहीं मानी. रवाना होने से कुछ समय पहले तुम आ गई वेरा. हां, तुम। मुझे तो उस समय यक़ीन ही नहीं हुआ. भौंचक रह गया था.
“आप जा रहे हैं?” तुमने पूछा था.
“हां.” मैं तुमसे नज़र नहीं मिला पा रहा था.
“आप नहीं समझेंगें. हम कितने मजबूर हैं. आप क्या, कोई नहीं समझ सकता हमारी लाचारी को. हम भी आपसे अपेक्षाएं पाल लिए थे. ख़ैर छोड़िए. आप नहीं समझेंगे, लड़की होना किस मजबूरी का नाम है.” यह तुम्हारी आवाज़ थी वेरा.

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तुमने आगे कहा था, “आपको रोकने का कोई हक़ नहीं है हमें. फिर भी अगर आप शादी तक रुक जाएं, तो अच्छा लगेगा हमें. हम जा रहे हैं.” और तुम चली गई वेरा.
पता नहीं क्यों, मैंने सामान खोल दिया और उसी कपड़े में बिस्तर पर सो गया और क़रीब पैंतालीस डिग्री सेल्सियस टेंपरेचर के बावजूद मैं सात-आठ घंटे सोता रहा. शाम को तुम्हीं ने आकर जगाया था.
“चाय लीजिए. हम आपके लिए चाय बनाकर लाए हैं.” मैंने देखा तुमने अपने बाल खोल रखे थे. तुम्हारा गंभीरता का जामा उतार फेंकना मेरे गले नहीं उतर रहा था. मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा था वेरा. हम दोनों चुपचाप चाय पीते रहे.
शादी के बाद तुम ससुराल चली गई. मुझे लगा मेरे शरीर में प्राण ही नहीं. दम घुट रहा था. मन कहीं समा ही नहीं रहा था. एक अव्यवक्त पीड़ा, एक लाचारी उभर रही थी जेहन में. तुम्हारी शादी के दो साल बाद ही सुधीर ने बताया कि विराग को कैंसर हो गया. टर्मिनल स्टेज में हैं और उसके चार महीने बाद वह हुआ, जिस ख़बर को सुनकर मैं तो स्तब्ध रह गया.
“क्या सोच रहे हैं?” अचानक तुमने आकर मेरी स्मृतियों की श्रृंखला तोड़ दी.
“कुछ नहीं.” मैं चौक सा पड़ा.
“तुम आ गई? चाय पिओगी? चलो न, सामने के रेस्तरां में चलते हैं.”
तुम ख़ामोशी ओढ़े रही. हम लोग रेस्तरां में आ गए. रास्ते में भी हमारे बीच ख़ामोशी रही.
मैंने चाय का ऑर्डर दिया.
“क्या कर रही हो आजकल?” मैंने बहुत देर बाद तुम्हें फिर कुरेदा.
“कुछ ख़ास नहीं. रांची में ही एक कॉलेज में पढ़ाते हैं.” तुम नीचे देखने लगी.
“मन लगता है?” मेरे मुंह से फिर सवाल निकला. तुमने मुझे देखा फिर नज़रें झुका लीं.
बड़ी देर बाद बोली, “नहीं. सहसा तुम रुक गई. तुम्हारे चेहरे पर पश्चाताप और मजबूरी मैं साफ़ पढ़ रहा था. अपराधबोध की एक परत भी जमी थी.
मुझे लग रहा था, तुम अंदर ही कहीं डूबी हुई हो. तुम्हारे होंठ थरथरा रहे थे वेरा. शायद कुछ कहने के लिए, लेकिन तुम कह नहीं पा रहीं हो.
‘आप ठीक हैं?’ तुमने पूछा.
‘चेहरे से नहीं लग रहे हैं.’
‘नहीं-नहीं, मैं ठीक हूं. ख़ुश हूं. तुम नाहक पाल रही हो अपराधबोध.’ मैंने मन-ही-मन तुम्हारे न पूछे गए सवालों का जवाब दे दिया.
कुछ देर ख़ामोश रहकर पूछा, “कहां जा रही हो?”
“वापस रांची.” तुम मुझे देख रही थी. फिर चाय पीने लगी.
“एक दिन रुक नहीं सकती?” मैं बड़ी मुश्किल से कह पाया था.
मुझे भरपूर नज़र देखकर तुमने पलक झपका ली. बहुत देर तक कुछ बोली नहीं. फिर बोली, “कॉलेज में ज़रूरी काम है. रुकना संभव नहीं हो पाएगा.” तुम प्लेटफार्म की ओर देखने लगी.
मैंने कहना चाहा, ‘क्या तुम्हारा काम मुझसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है’.. लेकिन होंठ ही नहीं खुले.
ट्रेन का समय हो गया. तुमने फिर मुझे देखा.
हम रेस्तरां से बाहर आ गए. प्लेटफॉर्म पर खड़ी गाड़ी सचमुच छूटनेवाली थी.
“हम चलते हैं. अपना ख़्याल रखना. कॉल ज़रूर करना. हम भी कॉल करेंगे.” यह तुम्हारी आवाज़ थी टेपरिकॉर्डर जैसी.
तुम लपककर कोच बी-टू में घुस गई.
“अच्छा.” तुमने मेरी ओर देखकर हाथ हिलाया.
मैंने देखा, तुम बोल नहीं पा रही थी. आंख भी भर आई थीं तुम्हारी. आवाज़ बेतरह गले में फंस गई थी.
ट्रेन भी धीरे-धीरे रेंगने लगी. मैं वापस हो लिया चुपचाप. मन बोझिल था. मैं आंसुओं को रोकने का असफल प्रयास कर रहा था.

हरिगोविंद विश्वकर्मा

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Published by
Usha Gupta

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