कहानी- ख़बरी प्रसाद (Short Story- Khabri Prasad)

"… हमें कोई हक़ नहीं बनता की किसी के पहनावे पर टिप्पणियां करें. अब वो घूंघटवाला ज़माना तो रहा नहीं. समय के साथ सबको बदलना…

“… हमें कोई हक़ नहीं बनता की किसी के पहनावे पर टिप्पणियां करें. अब वो घूंघटवाला ज़माना तो रहा नहीं. समय के साथ सबको बदलना पड़ता है. फिर लड़कियों का पहनावा बदलने की जगह हम सभी अभिभावकों को अपने-अपने बेटों की सोच में बदलाव लाने का प्रयत्न करना चाहिए. उन्हें लड़कियों की इज़्ज़त करना, उनका सम्मान करना सिखाना चाहिए. उनकी गंदी-पंगु मानसिकता को बदलना चाहिए. उन्हें ये सिखाना चाहिए कि एक लड़की कोई वस्तु नहीं है, बल्कि ईश्वर की एक ख़ूबसूरत रचना है…”

सुबह जब आंख खुली आदतानुसार सबसे पहले मैंने अपने कमरे की खिड़की खोली. बाहर काले-काले बादलों ने पूरे आकाश को अपने आगोश में ले रखा था. ठंडी-ठंडी हवाएं मुझे छू कर मेरा रोम-रोम पुलकित कर रही थीं. सुबह के अभी सिर्फ़ छह बजे थे. सोते हुए आकाश का चेहरा कितना शांत और सुकून भरा लग रहा था, अन्यथा रोज़मर्रा की ज़िंदगी और उसकी ज़रूरतों की उहापोह ने वो शांति और सुकून छीन लिया था. रिया के कॉलेज में आज कुछ डिबेट थी, इस कारण उसे कॉलेज थोड़ा देर से जाना था. इसलिए रिया की तरफ़ से आज थोड़ी तस्सली थी, वरना मुझे अपनी वॉक जल्दी-जल्दी ख़त्म करनी पड़ती है.
चलो आज इस सुहाने मौसम में टहलने का बहुत आनंद आएगा. ये सोच मैं किचन में चाय बनाने चली गई. मांजी की चाय उनके कमरे में उन्हें देकर मैं अपनी चाय बालकनी में बैठकर पीने लगी. बालकनी से समुद्र को देखना मेरे लिए अत्यंत सुकून भरा होता है. मैं, बालकनी और समुद्र हम तीनों दोस्तों की तिकड़ी बहुत मज़बूत है. जब कभी मैं उदास होती हूं, परेशान होती हूं या फिर अकेली… मेरे ये दोनों दोस्त मेरा मूड ठीक कर देते है और फिर आज तो मौसम भी साथ था. समुद्र की लहरों की सरगम की धुन बहुत की कर्णप्रिय लग रही थी. नीचे पार्क का जॉगिंग लेन धीरे-धीरे भर रहा था. सभी मौसम का लुत्फ़ उठाना चाहते थे. ऐसे मौसम में बालकनी और समुद्र की चंचलता का राग मुझे जॉगिंग पर जाने से रोक रहा था. कुछ देर सोच-विचार करने के बाद मैंने नीचे जाकर जॉगिंग करने का फ़ैसला किया.
सभी जॉगिंग और ठंडी-ठंडी हवाओं का मस्त आनंद ले रहे थे. कुछ ही देर में रिमझिम बारिश शुरू हो गई. सभी लोग अपने-अपने घर की तरफ़ भागने लगे. अचानक बारिश तेज़ होने से जॉगिंग करने आई एक लड़की बुरी तरह भीग गई. पूरी तरह भीगी होने के कारण वो बहुत असहज महसूस कर रही थी. वो चुपचाप एक शेल्टर के नीचे खड़ी हो गई. मैं भी वहीं खड़ी थी और मेरे साथ मेरे आस-पास के फ्लैट्स की कुछ औरतें खड़ी थीं, जो उस पर और उसके कपड़ों पर टिप्पणियां करना अपना परम कर्तव्य समझ रही थीं. मुझे उनकी मंद-मंद हंसी और टिप्पणियों से कोफ़्त हो रही थी. साथ ही उनकी संकीर्ण सोच पर शर्म आ रही थी. ये वे औरतें थीं, जिनके ख़ुद के घर तो शीशों के थे और दूसरों के घरों पर पत्थर मारने से वे बाज़ नहीं आती थी.

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उस लड़की की असहजता और मौक़े की नज़ाकत को समझते हुए मैंने उसे अपनी जैकेट पहना दी.
“अरे-अरे अंजली ये क्या कर रही हो?.. क्यों उसे अपनी जैकेट दे रही हो?..” उनमें से एक बोली.
मैंने उन्हें ग़ुस्से भरी नज़रों से देखा, तभी औरों ने उसका साथ देना शुरू कर दिया.
“और क्या… अरे कपड़े पहनने की समझ होनी चाहिए.“
“और नहीं तो क्या?.. इनके घरवाले भी कुछ नहीं कहते, कैसे कपड़े पहन कर आई है… पता नही था की बारिश का मौसम है और बारिश कभी भी शुरू हो सकती है. ये स्लीवलेस और शॉर्ट्स पहनना ज़रूरी था क्या?“ मालती बोली.
“तुम लोग कुछ भी बोल रही हो. चुप हो जाओ सब… बारिश रुक गई बेटा… तुम घर जाओ…“ उस लड़की को भेज मैं अपने घर आ गई. उनकी बातों और सोच से मन बहुत आहत हुआ था. औरत ही औरत की दुश्मन होती है… ये कहावत यहां बिल्कुल चरित्रार्थ हो रही थी.
अजीब समाज है हमारा! हर बात पर स्त्रियों पर ही उंगली उठती है. कहने को नया ज़माना है. हम इक्कीसवीं सदी तो छोड़, बाइसवीं सदी में प्रवेश कर रहे हैं… पर सोच… सोच अभी भी वही पिछड़े… पुराने ज़माने में अटक गई है. अपने घर में क्या हो रहा है… इससे किसी को कोई मतलब नहीं है. दुनिया जहां का ठेका ले रखा है. आसपास पूरी सोसाइटी की ख़बर रखती हैं. इन जैसी औरतों को ही गॉसिप क्वीन का ख़िताब दिया गया है.
सब बातों को आई-गई करके घर पहुंच कर मैं अपने काम में व्यस्त हो गई.
मैं जानती थी की सामने के फ्लैटवाली मालती अभी मांजी के पास सारी बात का ब्योरा देने आती होगी. ये उसका नित्यक्रम था. दिन के समय मांजी के पास बैठ कर पूरी सोसाइटी की ख़बर देती थी. वैसे मांजी पुराने ज़माने की होते हुए भी बहुत सुलझे विचारों की थी. समय के साथ चलना और बदलना वे बख़ूबी समझती थी. रिया ने तो मालती का नाम ख़बरी प्रसाद रखा था. कितनी बार वो रिया को भी टोक चुकी थी. उसे दूसरों के बच्चों में बहुत दिलचस्पी थी. कौन क्या कर रहा है… क्या पहन रहा है… वगैरह-वगैरह. मैं अपनी विचारधारा के केंद्रबिंदु मालती के विषय में सोच ही रही थी कि उसने घर में प्रवेश किया.
“पता है मांजी आज सुबह क्या हुआ?..” कहकर उसने सुबह का पूरा विवरण पूरे मिर्च-मसाले के साथ मांजी को सुना दिया.
मैं चुपचाप रसोई में चाय बनाने चली गई.
“मांजी, अब आप ही बताइए… क्या लड़कियों को रहन-सहन, पहनावे की मर्यादा नहीं रखनी चाहिए? सुबह खामाखाह अंजली नाराज़ हो गई. अगर लड़कियां इतने छोटे कपड़े पहनेंगी, तो हादसे तो होंगे ही ना… क़सूरवार लड़के हो जाते हैं. अब मेरी आरुषि को देखो… सलवार सूट के सिवा कुछ नहीं पहनती. और कभी बहुत मन हुआ, तो जींस -टॉप, वो भी पूरी बाजू वाला, स्लीवलेस तो बिल्कुल नहीं. ये होते हैं संस्कार!”
“अगर लड़की शॉर्ट्स पहने या फिर स्लीवलेस तो वो संस्कारी नहीं है… मालती किसको क्या पहनना है और क्या नहीं ये उसका निजी मामला है. हमें कोई हक़ नहीं बनता की किसी के पहनावे पर टिप्पणियां करें. अब वो घूंघटवाला ज़माना तो रहा नहीं. समय के साथ सबको बदलना पड़ता है. फिर लड़कियों का पहनावा बदलने की जगह हम सभी अभिभावकों को अपने-अपने बेटों की सोच में बदलाव लाने का प्रयत्न करना चाहिए. उन्हें लड़कियों की इज़्ज़त करना, उनका सम्मान करना सिखाना चाहिए. उनकी गंदी-पंगु मानसिकता को बदलना चाहिए. उन्हें ये सिखाना चाहिए कि एक लड़की कोई वस्तु नहीं है, बल्कि ईश्वर की एक ख़ूबसूरत रचना है. एक तरफ़ तो दुर्गा मां की पूजा करना सिखाते है उन्हें और दूसरी तरफ़ उन्हें सिखाने-समझाने की अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी भूल जाते
हैं. बहन-बेटी तो सभी के घर में हैं.”
“फिर वही बात मांजी… अब वो 207 वाली मिसज़ शर्मा को देखो… पूरी छूट दे रखी थी अपनी बेटी को. कैसे-कैसे कपड़े पहनती थी वो… कितनी बार तो मांजी उसके पहनावे से मेरी नज़रें शर्म से झुक जाती थी. क्या हुआ… भाग गई ना घर से…”
“अरे वो बालिग थी और अपनी पसंद के लड़के से शादी करना चाहती थी. उसके घरवाले किसी और जाति के लड़के से उसकी शादी नहीं करना चाहते थे. इसमें कपड़ों का क्या क़सूर… प्रेम विवाह तो सलवार सूट वाली या फिर कोई भी लड़की कर सकती है. और फिर बाद में उसके घरवाले मान भी तो गए थे.“ मांजी ने उसकी बात को अत्यंत सुलझे हुए तरीक़े से संभाला, जिस पर मालती की बहुत असंतुष्ट प्रक्रिया थी.

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“फिर भी मांजी… आप मानो या ना मानो, ये छोटे कपड़े मुसीबत को आमंत्रण होते हैं.”
“मालती, लड़कियों के पहनावे पर ध्यान देने की जगह उनके आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी बनाने की सोचो.” मांजी ने फिर उसकी इच्छा के विरुद्ध जवाब दिया. वो उनकी बातों से पूर्णत: असहमत व असंतुष्ट थी.
दोनों की चर्चा इसी विषय पर चल रही थी. इसी बीच अपनी बात को सिद्ध करने के लिए मालती ने सोसाइटी की न जाने कितनी लड़कियों का कच्चा-चिट्ठा खोल दिया था. उसकी बातें सुनकर मुझे उसकी छोटी और संकीर्ण मानसिकता पर अफ़सोस हो रहा था.
“मालती, नेवर जज अ बुक बाई इट्स कवर… तुम आजकल की पढ़ी-लिखी स्त्री हो. ज़माने के साथ नहीं चलोगी, तो ठोकर खाओगी. तुम्हारी पढ़ी-लिखी सोच के आगे मांजी की पुराने ज़माने की सोच बहुत ऊंची है. और फिर… कपड़े छोटे नहीं होते हमारी सोच होती है. हमारा देखने-समझने, परखने का नज़रिया छोटा होता है. हम जैसा सोचते-समझते हैं, हमारे मन-मस्तिष्क में वैसी ही तरंगे दौड़ने लगती हैं. हमारी मानसिकता उन्हीं तरंगों पर सरगम गाती है. ये सब हम पर निर्भर करता है कि उस सरगम की धुन में मिठास होनी चाहिए या फिर कड़वाहट.”
“अगर हम ही लोग समय के साथ नहीं बदलेंगे, अपनी बेटियों के पैरों में बेड़ियां डाल देंगे, तो उनकी उन्नति कैसे होगी. उनका भविष्य उज्ज्वल कैसे होगा.“ मैंने उसकी बात बीच में काटते हुए कहा.
“अंजली, उन्नति करने के लिए ऐसे कपड़े पहनने ज़रूरी है क्या? मान-मर्यादा नाम की भी कोई चीज़ होती है. आज़ादी दो पर उतनी जितनी ज़रूरी हो.”
“ये तो वही बात हो गई मालती की लड़कियों को उड़ने के लिए आसमान तो दो, पर साथ में उनके पंख भी काट दो. हमें अपनी परवरिश, अपने बच्चों पर भरोसा होना चाहिए. हमारा भरोसा उनके लिए संजीवनी बूटी का काम करता है. आजकल लड़कियां हर दिशा में अपना नाम उज्ज्वल कर रही हैं. कल्पना चावला, सानिया मिर्ज़ा साइना नेहवाल, मैरीकॉम और ना जाने कितनी लड़कियों ने देश और अपने माता-पिता का नाम देश-दुनिया में रोशन किया है. अगर सानिया मिर्ज़ा के घरवाले ऐसी सोच रखते, तो सानिया कभी टेनिस स्टार नहीं बन पाती, क्योंकि टेनिस साड़ी और सलवार सूट में तो खेला नही जाएगा ना… और रहा सवाल मुसीबत और आमंत्रण का, लड़कियों को आत्मरक्षा भी सिखानी चाहिए. पेपर स्प्रे, नाख़ूनों का इस्तेमाल, जूडो-कराटे सब आना चाहिए, ताकि वो किसी पर निर्भर न रहे. उनकी सुरक्षा का दायित्व ख़ुद उन पर ही हो. इतना उनमें आत्मविश्वास होना चाहिए. सरकार ने भी लड़कियों की सुरक्षा के लिए इतने ऐप लॉन्च किए हैं, जो उनके मोबाइल में डाउनलोड होने चाहिए, ताकि वक़्त रहते उन्हें ट्रेस किया जा सके. आख़िर नई तकनीक का यही तो फ़ायदा है. मालती पहनावा किसी लड़की के चरित्र का प्रमाण नहीं होता.“ मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ अपना पक्ष रख दिया.
बातों में बहुत तर्क-वितर्क हुआ, पर वही ढाक के तीन पात. आख़िर गॉसिप क्वीन ख़बरी प्रसाद का टाइटल जो मिला था. इतनी जल्दी हार कहां मानती. अपने आपको सही सिद्ध करने के लिए न जाने कितने क़िस्से कह डाले.
ऐसे ही सोच-बदलाव, पहनावे की बहस में कई दिन बीत गए. ऐसे ही एक दोपहर को मालती पड़ोस की सोसाइटी की चटपटी ख़बर लेकर आई, जिसे वो बहुत चटकारे लेकर सुना रही थी.
“पता है मालती, आज रिया के कॉलेज में एक हादसा होते-होते बचा.“ मांजी ने उसकी गॉसिप पर विराम लगाकर कहा.
वो आश्चर्य भरी निगाहों से हम दोनों की तरफ़ देखने लगी.
“रिया के कॉलेज की एक लड़की का किसी ग़लत लड़के से अफ़ेयर चल रहा था. ये उम्र ही ऐसी होती है. अल्हड़ और नासमझ. उसे उस लड़के पर अटूट भरोसा हो गया था. वो लड़का उसकी मासूमियत व भोलेपन का फ़ायदा उठाना चाहता था. उसने अपने प्लान को अंजाम देने की पूरी तैयारी कर ली थी. पर उस लड़की की क़िस्मत अच्छी थी. इस बात की भनक रिया को लग गई और उसने कॉलेज के प्रोफ़ेसर और दोस्तों के साथ मिलकर न सिर्फ़ उस लड़के का प्लान विफल किया, बल्कि उस लड़की की इज़्ज़त को दाग़दार होने से भी बचा लिया. अगर उस लड़की के अभिभावकों ने उसे ऐसी ऊंच-नीच की समझ दी होती, उसे आत्मविश्वासी बनाया होता, तो संभवतः ये नौबत ना आती.“
“अब तो मांजी मानेंगी ना मेरी बात को.” बिना सोचे-समझे वो एकदम तपाक से बोली.
“एक बार मिलना चाहोगी उस लड़की से.“
“क्या वो लड़की यहां पर है?..“ आश्चर्यचकित होकर उसने पूछा.
“ज़रूरी था उसे यहां लाना. अंजली, जाओ ले आओ उसे.“
सामने आरुषि को देख मालती के होश उड़ गए.
“मालती, यही है वो लड़की.“ मैंने आरुषि को उसके पास बैठा दिया. अपनी बेटी तो देख वो शब्दविहीन और जड़वत हो गई. उसकी आंखों के समक्ष अंधेरा छा गया.
कुछ क्षण के लिए कमरे में मौन पसर गया. कई बार कुछ कहने-समझने के लिए शब्दों की भाषा से ज़्यादा प्रबल मौन की भाषा होती है. मौन की भाषा वो अनकही कह और समझा देती है, जिसे शब्द कह नहीं पाते. मालती की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी. उसका मौन, उसकी झुकी नज़रें बहुत कुछ कह रही थीं. उसे एहसास हो रहा था कि बेटियों को आत्मरक्षा और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाना कितना ज़रूरी है. उसकी कृतज्ञ भरी सजल नज़रें जैसे कह रही हों, ‘अंजली, आई विल नेवर जज अ बुक बाई इट्स कवर. पहनावे से चरित्र का आकलन नहीं करेगी… थैंक्यू सो मच…’

कीर्ति जैन

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Photo Courtesy: Freepik

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Usha Gupta

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