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कहानी- कुछ… (Short Story- Kuch…)

मेरे बहुत कहने पर उसने कहा, “पता नहीं.” और चाय बनाने चल दी. मैं शायद ख़ामोशी की भाषा समझने में असमर्थ था. या फिर उस समय किसी अंजाने संकोच से ग्रस्त था कि स्वयं उस मौन का अर्थ नहीं लगा सका. यह तो बहुत दिनों बाद मैं जान सका कि हम दोनों के दरमियान ऐसा कुछ ख़ास था ज़रूर, जो उस दिन कहे जाने से बच गया था.

“सुन, तेरे और साधना के बीच कुछ है क्या?” चंदा ने पूछा तो मैं चौंका, उसके कहने का अंदाज़ ही कुछ ऐसा था कि मुझे हंसी आ गई. बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोकते हुए मैंने पूछा, “कुछ से मतलब?”
“कुछ यानी… कुछ.” चंदा झेंप सी गई. वह यह नहीं कह सकी कि कुछ से उसका आशय क्या है, लेकिन मैं समझ गया था. इसीलिए संजीदा होकर बोला, “तुम्हें कैसे लगा कि ऐसी कोई संभावना है?” चंदा शायद इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी. अचकचाते हुए बोली, “अरे मैं ही क्या? सभी को लगता है कि… वह हमेशा तुम्हारे ही बारे में बतियाती रहती है. तुम सामने होते हो, तो उसके बोलने का अंदाज़ ही बदल जाता है. एक दिन तो मम्मी भी कह रही थीं कि दोनों घंटों बैठे हुए पता नहीं क्या-क्या गुटरगूं करते रहते हैं.”
चंदा की बात सुनकर मैं फिर से हंस पड़ा. वैसे उसके सवाल का साफ़-साफ़ जवाब देना आसान न था. मैंने केवल यही कहा कि किसी के कुछ समझने से ही सब कुछ साबित नहीं हो जाता.

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पता नहीं क्यों, उस दिन मैं इस सवाल का जवाब टाल गया कि साधना और मेरे बीच ‘कुछ’ है या नहीं. बातों ही बातों में चंदा भी शायद अपने मूल सवाल को भूल गई थी या फिर शायद उसने मेरे मन को कुरेदना उचित न समझा. जो भी हो, बात आई-गई हो गई.
साधना और मैं बचपन के दोस्त हैं. हम दोनों साथ ही साथ खेलते-कूदते कब इतने बड़े हो गए कि लोग हमारे घुल-मिलकर बातें करने पर भी ग़लत नज़र रखने लगे, कुछ पता ही नहीं चला. चंदा उम्र में हम दोनों से दो-तीन साल बड़ी है, लेकिन वह भी हमारी दोस्त है. शुरुआत में हम तीनों के परिवार एक ही मोहल्ले में रहा करते थे. बाद में मोहल्ले बदल गए, पर दोस्ती कायम रही. अपनापन बना रहा.
साधना और मेरी कई आदतें बहुत मिलती-जुलती हैं. ये आदतें पहले भी थीं, अभी भी हैं. पीठ पीछे किसी की आलोचना करना न उसे पसंद था, न मुझे. जीवन को कैफ़ियत और शालीनता के साथ जीने की पक्षधर वो भी रही, मैं भी. आलू की सब्ज़ी हम दोनों ही चाव से खाते थे और बैगन से दोनों को ही बहुत चिढ़ है. और मैंने अक्सर यह पाया है कि किसी व्यक्ति विशेष की किसी ख़ास आदत से यदि मुझे चिढ़ होती थी, तो उस चिढ़ का अस्तित्व साधना के ज़ेहन में भी मौजूद रहता ही था. हालांकि सामने होने पर हम दोनों एक-दूसरे को यह जताते थे कि हमें आपस में कोई मतलब नहीं है, लेकिन जब कभी मिले बहुत दिन हो जाते तो लगता था मानो दिनचर्या का कोई ज़रूरी क्षण लगातार उपेक्षित हो रहा हो.
साधना के यूं ही किसी मज़ाक से चिढ़कर एक बार पूरे महीनेभर मैं उससे नहीं मिला. आख़िरकार उसी ने एक दिन फोन करके पूछा था कि क्या उसे मुझसे मज़ाक करने का भी हक़ नहीं? उसने उलाहना भी दिया कि यदि मुझे उसका मज़ाक बुरा लगा, तो मैंने उसी वक़्त उसे आड़े हाथों क्यों नहीं लिया? इस फोन के बाद मेरे अभिमान को पिघलने में कितनी देर लगती भला?
अपनत्व की इस सघनता के बावजूद मैं यह नहीं समझ सका था कि क्या सचमुच हम दोनों के बीच ‘कुछ’ है. यही कारण था कि चंदा के सवाल का जवाब मैं जान-बूझकर टाल गया था.
लेकिन जिज्ञासा तो जाग चुकी थी. एक दिन मौक़ा पाकर मैंने यही सवाल साधना से किया, तो वो ख़ामोश रह गई. उसकी पानीदार आंखें एक क्षण के लिए मेरे चेहरे पर टिकीं मानो बहुत कुछ कहना चाहती हों. लेकिन कहा उसने कुछ नहीं.
मेरे बहुत कहने पर उसने कहा, “पता नहीं.” और चाय बनाने चल दी. मैं शायद ख़ामोशी की भाषा समझने में असमर्थ था. या फिर उस समय किसी अंजाने संकोच से ग्रस्त था कि स्वयं उस मौन का अर्थ नहीं लगा सका. यह तो बहुत दिनों बाद मैं जान सका कि हम दोनों के दरमियान ऐसा कुछ ख़ास था ज़रूर, जो उस दिन कहे जाने से बच गया था.

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दिन यूं ही गुज़रते रहे. साधना के लिए शादी के प्रस्ताव भी आने लगे. इधर मैं अपने व्यवसाय में व्यस्त हो गया. इस व्यस्तता ने साधना के घर जाने की निरंतरता को बाधित किया. फोन पर जब कभी साधना न मिल पाने की शिकायत करती, तो मैं अपनी व्यस्तता का रोना रोने लगता. यह बताने लगता कि सुबह सात बजे से लेकर रात साढ़े दस कहां-कहां अपना सिर खपाता हूं और वह बिना कुछ प्रतिवाद किए रिसीवर क्रेडिल पर रख देती.
पहले उसके फोन दस-पंद्रह दिन में आते थे, लेकिन धीरे-धीरे वो भी कम होने लगा. व्यवसाय बढ़ने के कारण अब मेरा अधिक समय शहर के बाहर गुज़रता. कभी बात होती, तो पता चलता कि उस पर दबाव पड़ रहा है कि वह किसी रिश्ते को तो मंज़ूर कर ले.
एक दिन बातों ही बातों में मैंने उससे कह दिया कि किसी अच्छे से रिश्ते को वह हरी झंडी क्यों नहीं दिखा देती? मैंने यह बात मज़ाक में कही थी, लेकिन साधना ने इसे बहुत गंभीरता से लिया. दो दिन बाद ही मुझे पता चला कि साधना ने एक रिश्ते को अपनी स्वीकृति दे दी है. मैंने फोन करके उसे बधाई दी, तो साधना ने बहुत निरपेक्ष भाव से केवल ‘शुक्रिया’ कहा.
कुछ दिनों बाद ही साधना के पिता शादी का निमंत्रण पत्र लेकर घर आए. उन्होंने बताया कि लड़का डॉक्टर है. काफ़ी संपन्न परिवार है, साधना वहां जाकर राज करेगी. वो मुग्ध भाव से सारी संभावनाओं को रेखांकित कर रहे थे और मैं अनमने भाव से उनकी बातों को सुनता रहा. फिर एक दिन बारात आई. फेरे हुए और साधना विदा भी हो गई.
शादी के कुछ दिनों बाद ही एक दिन चंदा रास्ते में मिल गई. मिलते ही उसने शिकायत की.
“साधना की शादी में तुम दिखाई नहीं दिए अनूप. वहां तुमको सबने बहुत मिस किया. कहां चले गए थे उस दिन?”
“यहीं था.” मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.
“फिर आए क्यों नहीं साधना के यहां?” चंदा चौंकते हुए बोली.
“पता है, विदाई के समय भी न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता रहा मानो साधना की भीगी आंखें तुम्हें ही तलाश रही हों.”

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मैं एक क्षण ख़ामोश रहा. फिर बोला, “मुझे ख़ुद को यह पता नहीं है चंदा कि मैं उस दिन साधना के घर पहुंचा क्यों नहीं… बस हर क्षण मन को यह लगता रहा जैसे अंदर ही अंदर कुछ दरक रहा है. कुछ ऐसा जिसे बरसों से अपने भीतर सहेजकर रखा हुआ था.”
“कुछ यानी..?” चंदा की सवालिया निगाहे मुझ पर टिक गई.
“कुछ यानी… कुछ.” मैंने कहा और हम दोनों हंस दिए पर वह एक उदास हंसी‌ थी.

– अतुल कनक

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Usha Gupta

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