कहानी- समझाइश (Short Story- Samajhaish)

“आपसे कुछ कहने आई हूं…” यह सुनते ही रसोईं की ओर बढ़ती रुचि रुक गई उसके रुकने और माथे पर सिकुड़न डालकर देखने के अंदाज़…

“आपसे कुछ कहने आई हूं…” यह सुनते ही रसोईं की ओर बढ़ती रुचि रुक गई उसके रुकने और माथे पर सिकुड़न डालकर देखने के अंदाज़ से उसे रोहन की हिदायत याद आई…
“दूसरों के पचड़ो में पड़कर अपनी फज़ीहत मत करवाना…” सहसा हिम्मत टूटने लगी. मन में विचार उमड़ा, बेटियां मां से हर बात शेयर करती हैं. क्या पता रुचि ने सब बताया हो, फिर किसी के व्यक्तिगत मामलों को सरेआम उठाकर उनकी शर्मिंदगी की वजह वह क्यों बने… फिर वह इन्हें जानती ही कितना है. किस नाते वह मियां-बीवी के झगड़े के बारे में बात करेगी.

“दीवारों के कान होते हैं सुना था, पर देख पहली बार रहा हूं…”
बैठक की दीवार से कान सटाए बैठी अल्पना को देख रोहन ने टोका, तो वह खिसियाकर बोली, “पिछले दो दिनों से बड़ी शांति है. टोह ले रही थी कि बगल में कोई है भी या नहीं…”
“हां, पर टोह क्यों ले रही हो. ऐसे किसी के घर के झगड़ों का मज़ा लेना सही नहीं है.”
“मज़ा नहीं लेती हूं. चिंता होती है जब नए शादीशुदा जोड़े के झगड़ने की आवाज़ आती है. वो भी जंगलियों की तरह… शुक्र है आज शांति है, वरना डर लगता था कि कहीं एक-दूसरे को कुछ कर ही न दे…”
अल्पना की बात सुनकर फ़िक्र भरे भाव लिए रोहन टिफिन और बैग उठाकर ऑफिस के लिए रवाना होने लगा, तो अल्पना उसे सी.ऑफ करने के लिए उसके पीछे-पीछे दरवाज़े तक आई, तभी उसे आभास हुआ कि लिफ्ट की ओर बढ़ते रोहन ने ठिठककर गर्दन हिलाकर किसी को अभिवादन किया.
‘किसको अभिवादन किया है’ इस कौतूहल के साथ वह दरवाज़े से बाहर निकल आई, तो देखा बगल वाले फ्लैट के दरवाज़े पर उसकी हमउम्र एक सभ्रांत-सी महिला खड़ी थी.
अल्पना की नज़र मिली, तो परिचय की आकांक्षा लिए वह मुस्कुराई. अल्पना समझ गई कि बगल वाले फ्लैट में रहनेवाले नवदंपत्ति की रिश्तेदार है.
“नमस्ते मैं रुचि की मम्मी… कल ही आई हूं…”
“ओह! नमस्ते…” अल्पना ने मुस्कुराकर जवाब दिया, तो वह तपाक से बोली, “कभी आइए न घर… ये दोनों तो ऑफिस चले जाते हैं, तो बोर हो जाती हूं मैं…”
“जी ज़रूर, वैसे कब तक हैं आप..?”
“बस दो-तीन दिन के लिए आई हूं, सोचा देख आऊं इनकी नई गृहस्थी. आप आइए न…”
“आऊंगी…” कहकर अल्पना विदा लेना चाहती थी, पर रुचि की मम्मी बात करने के मूड में थी, सो बिना सवाल के ही बोलीं, “कितना कोई टीवी देखे… मुझे तो सीरियल पसंद ही नहीं हैं… वही पारिवारिक लड़ाई-झगड़ा… पता नहीं ऐसे षडयंत्रकारी सीरियल बनाते क्यों है. सब वास्तविकता से दूर…”
अल्पना अवाक खड़ी सोचने लगी, ‘इसे कहते है चिराग़ तले अंधेरा… आने वाले तूफ़ान से बिल्कुल अंजान ये बेचारी अपनी बेटी-दामाद की सुखद गृहस्थी में डूबी हैं और वह इनके बेटी-दामाद के झगड़ों की आवाज़ें पिछले चार दिन से सुन रही है. ये आई हैं तभी बगल से कोई आवाज़ नहीं आई, वरना कभी रात को, तो कभी ऑफिस जाने से ठीक पहले युगल दंपत्ति झगड़ने लगते है… हालांकि उनकी आवाज़ धीमी होती है, पर इतना तो पता चलता ही है कि यह साधारण बातचीत नहीं है.


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एक बार मन में आया कि उन्हें सब बता दे, पर उनके चेहरे की रौनक़ देखकर कुछ कहने का मन नहीं हुआ… दो-चार इधर-उधर की बातें करके वह भीतर आ गई. बिखरा घर समेटते हुए ध्यान बार-बार बगल वाले फ्लैट पर ही लगा रहा.
अभी दो-तीन हफ़्ते पहले ही रुचि अपने पति गौरव के साथ बगल वाले फ्लैट में शिफ्ट हुई है. ज़्यादा बातचीत नहीं हुई, पर मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान हुआ है…
“बेटी किसी चीज़ की ज़रूरत हो, तो बताना. कभी घर आना…” उसने एक-दो बार कहा भी है, तो प्यारी-सी मुस्कान के साथ रुचि ने हां में सिर हिला दिया.
शुरू-शुरू में नवदंपति का साथ-साथ बाज़ार जाना और वहां से सामान से लदे-फंदे घर आना अल्पना को अच्छा लगता था. उन्हें देखकर उसे अपने बच्चे याद आते. उन्होंने भी इन्हीं की तरह तिनका-तिनका जुटाकर नीड़ बसाया होगा. पर डेढ़-दो हफ़्ते के भीतर ही उनके प्रेमी युगल होने का तिलस्म टूटता नज़र आया.
दरअसल, अगल-बगल फ्लैट होने से दोनों के ड्रॉइंगरूम के बीच पतली-सी दीवार है. ज़रा-सी भी आहट के आर-पार होने की पूरी संभावना रहती है. ड्रॉइंगरूम से रुचि और गौरव के बीच की खटपट सुनाई देने से उसके कान खड़े हुए… दीवार से कान लगाकर बात सुनने की कोशिश की तो, अंदाज़ा हुआ शायद गौरव रुचि के नौकरी करने के ख़िलाफ़ है. उन्हें झगड़ते सुन कई बार मन हुआ कि वह उन्हें रोके, पर रोहन ने सख्त ताक़ीद कर दी थी कि ‘कोई ज़रूरत नहीं है कुछ बोलने की… हम पड़ोसी हैं उनके माता-पिता नहीं…’ इस बात पर उसने रोहन से जिरह भी की थी कि क्योंकर हम नई पीढ़ी से डरने लगें हैं… अगर हम उन्हें समझाने का बीड़ा नहीं उठाएंगे, तो इनका जीवन जाने किस दिशा में जाएगा…
पर रोहन के अनुसार बेवजह की दख़लंदाज़ी से स्थिति अटपटी न हो जाए, कहीं उन्होंने अपने मामले में टांग न अड़ाने की हिदायत देकर बेइज्ज़त कर दिया तो..? रोहन जो कहें पर इनके बीच जो भी डिफ़रेंसस है, वो जड़ बनाए उससे पहले इनकी काउंसिलिंग ज़रूरी है. सोच-विचार के बाद उसने निर्णय लिया कि दोनों की बेहतरी के लिए ये बात रुचि की मम्मी के कानों में डालनी ही होगी.
दूसरे दिन रोहन के ऑफिस जाने के बाद उसने रुचि के घर की घंटी बजा दी. दरवाज़ा रुचि की मम्मी की जगह रुचि ने खोला, तो वह चौंककर बोली, “अरे आज ऑफिस नहीं गई…”
“हां आंटी, मैंने सोचा मम्मी बोर हो जाएंगी, तो छुट्टी ले ली.”
“ओह!” कहकर वह क्या करे सोच ही रही थी कि तभी रुचि की मम्मी का उमंग भरा स्वर सुनाई दिया, “अरे आप, आइए न… अच्छा किया आप आईं… रुचि चाय तो बना ला…”
“जी मम्मी…” रुचि ने उनके आदेश पर गर्दन हिलाई. आर या पार वाली मनोदशा में खडी अल्पना के मुंह से सहसा निकला… “आपसे कुछ कहने आई हूं…” यह सुनते ही रसोईं की ओर बढ़ती रुचि रुक गई उसके रुकने और माथे पर सिकुड़न डालकर देखने के अंदाज़ से उसे रोहन की हिदायत याद आई…
“दूसरों के पचड़ो में पड़कर अपनी फज़ीहत मत करवाना…” सहसा हिम्मत टूटने लगी. मन में विचार उमड़ा, बेटियां मां से हर बात शेयर करती हैं. क्या पता रुचि ने सब बताया हो, फिर किसी के व्यक्तिगत मामलों को सरेआम उठाकर उनकी शर्मिंदगी की वजह वह क्यों बने… फिर वह इन्हें जानती ही कितना है. किस नाते वह मियां-बीवी के झगड़े के बारे में बात करेगी.
“क्या हुआ, आप कुछ कहने जा रही थी…” रुचि की मम्मी ने टोका, तो वह चौंककर बोली, “आज आप लोग हमारे घर डिनर पर आइए…” यह सुनकर रुचि मुस्कुराते हुए बोली, “अरे नहीं आंटी, इस बार रहने दीजिए… वो दरअसल आज हमने मूवी का प्रोग्राम बनाया है और उसके बाद बाहर ही डिनर…”
“तो फिर…”
“कल भी नहीं आंटी… तीन दिन के लिए तो ये आई हैं. गौरव शाम को फ्री होता है, तो शामें कहीं न कहीं इंगेज की है…”
“अरे छोड़िए डिनर-विनर, आप आईं यही मुझे अच्छा लगा…” रुचि की मम्मी ने उसे दुविधा से उबारते भावनाओं में बह गईं, “मुझे तसल्ली है कि आप लोग बगल में हो… मैं रुचि से आज कह ही रही थी कि पड़ोसी ही वक़्त-बेवक़्त काम आते है. इसलिए उनसे संबंध बनाकर ही रखने चाहिए. आप लोग इन बच्चों का ध्यान रखिएगा…”
रुचि और उसकी मम्मी के साथ ख़ूब बातें हुईं, पर वो बात न हो पाई जिसे कहने वह यहां आई थी… रुचि ने अपनी मम्मी से गौरव के व्यवहार के बारे में कुछ बताया या नहीं इस दुविधा में घिरी वह घर आ गई…


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दो दिन बाद रुचि की मम्मी चली गई. उनके जाते ही उनके घर से फिर से झगड़ों की आवाज़ें आने लगी.
दो दिन तो किसी तरह उसने बर्दाश्त किया, पर इतवार को आवाज़ इतनी ऊंची हो गई कि नीचेवाली मिसेज़ वर्मा ने अल्पना को फोन लगाकर कहा, “तुम्हारे घर के बगलवाले फ्लैट में क्या हो रहा है…”
“मैं क्या बताऊं तुम ख़ुद आकर देख लो…” चिढ़कर वह बोली और बाहर आ गई, तो देखा फ्लोर के बाकी दो घरों से भी ताका-झांकी हो रही थी, पर कुछ कहने या करने की हिम्मत किसी में नहीं थी. सहसा उसने रुचि के फ्लैट की डोरबेल बजा दी.
दरवाज़ा खुला तो वह दनदनाती हुई भीतर गई और उन दोनों पर बरस पड़ी, “शर्म आनी चाहिए तुम लोगों को… दो दिन पहले ही तुम्हारी मम्मी तुम्हारी सुखी गृहस्थी का ढेर सा संतोष लेकर गईं है और आज तुम लोग कुत्ते-बिल्ली जैसे झगड़ रहे हो… ये अपार्टमेंट है और लोग भी यहां रहते हैं. इस तरह से रोज़-रोज़ झगड़ना अच्छा है क्या…”
अल्पना के यूं डपटने पर रुचि अवाक थी और गौरव सन्न था.
“आंटी वी आर सॉरी… हमारी वजह से… आई मीन हमें नहीं पता था कि…”
बुरी तरह हडबडाया गौरव कुछ कहता उससे पहले रुचि ने अल्पना का हाथ पकड़कर उसे सोफे पर बैठा दिया और ख़ुद उसके घुटने पर सिर रखकर सुबक पड़ी…
“आंटी मेरा शुरू से सपना था कि मैं पढ़-लिखकर अपने पांव पर खड़ी होऊं. आज जब मेरी मेहनत का फल मुझे मिल रहा है, तब ये मेरे पंख काटकर मुझे उड़ने से रोकना चाहते हैं.”
गौरव रुचि को कुछ कहने से रोकना चाहता था, पर अल्पना ने ”कहने दो जो कह रही है… जब लड़ने में शर्म नहीं आई, तो अब क्यों…” कहकर उसे फटकारा और रुचि के सिर पर हाथ फेरा. वह सुबकती हुई कहने लगी, “इन्हें मेरा बाहर जाकर नौकरी करना पसंद नहीं है… मां-बाप के देखे सपनों को पूरा करने का समय आया, तो ये मुझे जंजीरों से जकड़कर रखना चाहते हैं….” रुचि की हिचकियां बंध गईं… तो अल्पना ने आग्नेय दृष्टि से गौरव को देखा, जो असहज और बेबस-सा खड़ा कभी रुचि को, तो कभी उसे देखता जा रहा था.
“शर्म आनी चाहिए. अभी-अभी तुम लोगों ने जीवन शुरू किया है. आगे कितना लंबा जीवन है. कैसे बढोगे. मां-बाप तुम्हारे सुखी जीवन को देख संतुष्ट है. क्यों अपनी जवानी के साथ उनका बुढ़ापा ख़राब करने पर तुले हो. और गौरव तुम ख़ुद को नई पीढ़ी के कहते हो ऐसी नीची और पिछड़ी सोच है तुम्हारी… छि.. तुम औरतों के काम करने के ख़िलाफ़ हो…”
“मैंने इनके सामने हाथ जोड़कर कहा कि मैं अपने पारिवारिक जीवन में आंच नहीं आने दूंगी…”
“आंच आने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ तुम्हारी क्यों है… इसकी भी ज़िम्मेदारी है… तुम दोनों आपस में बात करो. और संभालो अपनी मैरिड लाइफ को…”
“आंटी आप शांत हो जाइए. प्लीज़… आई प्रॉमिस… अब ऐसा नहीं होगा…”
गौरव जो अब तक संयत हो चुका था उसने अल्पना को भरोसा दिलाया. वह जीत का झंडा लिए बाहर आई और अगल-बगल से झांकते पड़ोसियों को सुनाकर कहा, “कुछ लोगों को तमाशा देखना पसंद है… आग बुझाने के लिए आग के पास जाना पड़ता है…”
इस क़िस्से ने रंग दिखाया. उनका झगड़ा वाकई बंद हो गया था… दो दिन शांति रही, तीसरे दिन रुचि घर आई, वो बहुत ख़ुश दिखाई दे रही थी. अल्पना को देखकर वह उसके गले लगकर बोली, “आंटी, उस दिन आपके आने से कमाल हो गया. गौरव अब मुझे हेल्प करता है. मेरी जॉब से उसे कोई दिक़्क़त नहीं है. ये सब आपकी वजह से संभव हुआ है…”
“मुझे ख़ुशी है कि उसने मेरी बात का मान रखा…”
“आंटी एक ख़ुशख़बरी और है. मुझे कल बेस्ट एम्प्लाई का अवॉर्ड मिल रहा है…” कानों तक फैली हुई मुस्कान के साथ वह एक कार्ड बढ़ाते हुए बोली, “गौरव ख़ुद देना चाहते थे, पर थोड़ा शर्मिंदा है. सो आपके सामने आने से संकोच कर रहे हैं. इस कार्यक्रम में फैमिली मेम्बर्स को बुलाया है. आप हमारी फैमिली हो… ज़रूर आइएगा.”


अल्पना का मन उसकी बातों से भीग गया. परदेस में इन बच्चों का और कौन है इस भावना के तहत वह रोहन के साथ रुचि की कंपनी की सिल्वर जुबली पार्टी में गई… एक बड़े होटल में शानदार आयोजन रखा गया था. गौरव रुचि और रोहन को देखकर बड़ी तत्परता से उनके पास आया. आगेवाली पंक्ति में उन्हें आदर के साथ बैठाकर वह ख़ुद भी उनके साथ बैठा… रुचि के बेस्ट एम्लाई एनाउंसमेंट को लेकर उसे उत्सुक देख अल्पना को अच्छा भी लगा और आश्चर्य भी हुआ, क्योंकि उसे देखकर लग ही नहीं रहा था कि दो दिन पहले वह रुचि के काम करने को लेकर अपना पुरुषोचित दंभ दिखा रहा था.
सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई. नारी सशक्तिकरण को लेकर एक नृत्य नाटिका की प्रस्तुति के बाद कंपनी के सीईओ द्वारा महिला वुमन एम्पावरमेंट को लेकर एक प्रभावशाली भाषण दिया गया. भाषण के तुरंत बाद वुमन एम्पावरमेंट पर आम आदमी की धारणाओं को बदलनेवाली एक नई सोच को लेकर प्ले शुरू हुआ.
प्ले में रुचि को देखकर अल्पना चौंकी. डायलॉग डिलीवरी अल्पना को पहचानी सी लगी. एक दबी कुचली प्रताड़ित नारी के रोल को निभाती रुचि ने बोलना शुरू किया, तो वह हैरानी में डूबती चली गई… और फिर उसने गौरव को घूरकर देखा, जो धीमे-धीमे हंस रहा था. अल्पना का बस चलता तो वहीं उसके कान उमेठ देती. पर वो शरारत भरे भाव आंखों में लिए अपने कानों को माफ़ी मांगनेवाले अंदाज़ में पकड़े बैठा था.
असलियत जानकर अल्पना अपने दोनों हाथों से मुंह ढांपकर हंसती रही. रोहन अपने अगल-बगल देखकर कुछ-कुछ माजरा समझ गए थे. ज़ोरदार एक्टिंग करती रुचि के डायलॉग हूबहू वही थे, जो घर की बैठक की दीवार से इस पार कान लगाकर सुनाई देते थे… झगड़ेवाला सीन वही था, बस पति के क़िरदार में गौरव नहीं था. जो संवाद रुचि ने उस दिन अल्पना से कहे थे वह उसी पोज़ में आज किसी औरत के सामने घुटनों के बल बैठकर मार्मिक अंदाज़ में बोल रही थी…
कार्यक्रम के अंत में रुचि बेस्ट एम्लाई अवॉर्ड लेकर चहकती हुई आई, तो अल्पना ने हंसकर उसे गले लगा लिया.
“आप हंस रही है, मैं तो पिटने के मूड में थी…”
“मूड तो मेरा भी कुछ ऐसा ही था, पर तुम लोगों की प्यारी-सी शरारत और भोली सूरत देखकर किसी तरह ख़ुद को रोका है…” अल्पना ने आंखें तरेर कर रुचि से कहा, तो गौरव और रुचि ठहाका मारकर हंसने लगे. अल्पना मायूसी भरा स्वांग रचते हुए बोली, “टीचर हूं. बच्चों का झूठ पकड़ने में माहिर पर इस बार मात खा गई…”
“मेरा सिर भी खा गई यह कह-कहकर कि इन बच्चों की शादी का क्या होगा…” रोहन बोले, तो अल्पना रुचि और गौरव से धमकी देने वाले अंदाज़ में बोली, “अब तुम लोगों की यही सज़ा है कि मेरी साख गिरने नहीं दोगे. और किसी को नहीं बताओगे की तुम्हारा झगड़ा असली नहीं था, बल्कि प्ले की प्रैक्टिस थी…”
“बिल्कुल नहीं आंटी… हम आपकी साख कतई नहीं गिरने देंगे… और अपने झगड़े को ऐसे ही जारी रखेंगे…” गौरव बोला, तो अल्पना ने झट से उसके कानों को धीरे से पकड़ते हुए, “खबरदार…” कहकर उंगली से चेताया, तो सब हंस पड़े…
“आंटी हम तो उस दिन ही बता देते… पर अचानक ही रिलाइज़ हुआ कि मेरी एक्टिंग इतनी नेचुरल है कि आप हमें डांटने चली आईं… बस एन मौक़े पर ये शरारत सूझ गई…” रुचि के खुलासे पर इस न भूलने वाले वाकये पर अल्पना और रोहन देर तक हंसते रहे.
दो दिन बाद मिसेज़ वर्मा लिफ्ट में मिली और गंभीरता से अल्पना से बोली, “भाभीजी आपने अच्छी फटकार लगाई दोनों को… अब इनके घर से झगड़े की आवाज़ नहीं आती…”
“हां जी, बस एक कोशिश की थी. कामयाब हो गई और क्या कहा जाए…”
अल्पना ने भी उतनी ही गंभीरता से जवाब दिया, तो पास खड़े रोहन फुसफुसाए, “लगता है एक्टिंग का असर तुम्हारे सिर चढ़कर बोल रहा है.”
“हम्म.. जीवन मे कुछ न कुछ ट्राई करते रहना चाहिए… एक्टिंग भी करके देख लेती हूं…”
मिसेज़ वर्मा उनकी फुसफुसाहट और दबी-दबी हंसी देख असमंजस भरे अजीब से भाव के साथ रुकी लिफ्ट के खुले दरवाज़े से जल्दी से बाहर निकल गई… उनके जाते ही अल्पना और रोहन की जबरन रोकी हंसी जो छूटी, तो देर तक बंद ही नही हुई.

मीनू त्रिपाठी

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