व्यंग्य- दे दे प्यार दे… (Satire Story- De De Pyar De…)

इश्क़ का साइड इफेक्ट देखिए. लोग कहते हैं इश्क़ अंधा होता है. मै नहीं मानता. लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, शिरीन-फरहाद और हीर-रांझा में कोई अंधा नहीं था.…

इश्क़ का साइड इफेक्ट देखिए. लोग कहते हैं इश्क़ अंधा होता है. मै नहीं मानता. लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, शिरीन-फरहाद और हीर-रांझा में कोई अंधा नहीं था. सभी आंखवालों ने जान-बूझकर चूल्हे में सिर दिया. हर आदमी इश्क़ नहीं कर सकता. कुछ लोग इश्क़ करते हैं, कुछ लोग इश्क़ के तंदूर पर बैठ जाते हैं. इश्किया साहित्य में और बुरा हाल है. जिसे इश्क़ का सलीक़ा नहीं आता, वही इश्क़ की परिभाषा तय करता है.

अब इस वक़्त जब कि दिन के ग्यारह बज रहे हैं, मैं पूरी निर्भीकता से रजाई ओढ़कर लेटा हूं. बगलवाले घर की बालकनी से अंदर चल रही टीवी की आवाज़ सुनाई पड़ रही है- दे दे प्यार दे.. प्यार दे.. प्यार दे दे.. मुझे प्यार दे… ऐसा लगता है गोया आशिक अपना गिरवी माल छुड़ाने आया हो. पहले इज़हारे इश्क़ का भी एक सलीका हुआ करता था- तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं… कोरोना ने कैरेक्टर पर कितना घातक असर डाला है. प्रेमी रिक्वेस्ट करने की जगह राहजनी पर उतारू है- दे दे प्यार दे.. प्यार दे, प्यार दे दे.. मुझे प्यार दे… (जितना है सब निकाल दे) इसे कहते हैं दिनदहाड़े इश्क़ की तहबाजारी. प्यार और व्यापार के बीच की दूरी सिमट रही है.
टीवी बंद हो चुकी है, मगर आवाज़ अभी भी सुनाई पड़ रही है- दे दे प्यार दे… अब उस घर का युवा भविष्य इज़हारे इश्क़ के लिए बालकनी में खड़ा है. मैं हैरान था. दुनिया कोरोना की वैक्सीन मांग रही है और वो प्यार की डिलीवरी का इंतज़ार कर रहा था. लौंडे पर लैला-मजनू का बसंत देख, मैं सोचने लगा, ‘शादी से पहले भला शादी के बाद का संकट क्यों नहीं नज़र आता’ वैसे ये सवाल मैंने वर्माजी से भी पूछा था.
उनका जवाब था, “नज़र भी आ जाए, तो लोग उसे नज़र का धोखा मान लेते हैं. उदाहरण मेरे सामने है. जब तुझे इश्क़ का इन्फेक्शन हुआ था, तो मैंने कितना समझाया था कि इस दरिया-ए-आतिश में मत कूद, पर तू कहां माना था. और फिर… शादी के पांच साल बाद किस तरह के. एल. सहगल की आवाज़ में मेरे सामने रोना रो रहा था, “जल गया जल गया.. मेरे दिल का जहां…”
इश्क़ का साइड इफेक्ट देखिए. लोग कहते हैं इश्क़ अंधा होता है. मै नहीं मानता. लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, शिरीन-फरहाद और हीर-रांझा में कोई अंधा नहीं था. सभी आंखवालों ने जान-बूझकर चूल्हे में सिर दिया. हर आदमी इश्क़ नहीं कर सकता. कुछ लोग इश्क़ करते हैं, कुछ लोग इश्क़ के तंदूर पर बैठ जाते हैं. इश्किया साहित्य में और बुरा हाल है. जिसे इश्क़ का सलीक़ा नहीं आता, वही इश्क़ की परिभाषा तय करता है. वही तय करता है कि लौकिक और पारलौकिक इश्क़ में- किसके अंदर फिटकरी कम है. जो इश्क़ के मामले में बंजर होता है, वही इश्क़ में ‘अद्वैतवाद’ खोजता है. ऐसे लोगों ने साहित्य को बंजर बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभाई है. उन्होंने छायावाद, अद्वैतवाद और अलौकिक दिव्यता के लेप में लपेटकर सीधे-सादे इश्क़ को ममी बनाकर आम आदमी से दूर कर दिया.
तो… इश्क़ क्या है? वो ज़माना गया जब इश्क़ इबादत हुआ करता था. अब इश्क कमीना हो चुका है और उससे आजिज आ गए लोगों का आरोप है कि मुश्किल कर दे जीना… (ये उन्हीं महापुरुषों का काम है, जो इश्क़ को इबादत से कमीना तक लाए हैं) इश्क़ में आदमी निकम्मा हो जाता है, ऐसा मै नहीं चचा गालिब कहते हैं- इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के…
बदलता है रंग आसमां कैसे-कैसे. कोरोना ने इश्क़ को भी संक्रमित कर दिया. इस दौर मे आकर इश्क़ नमाज़ी से इश्क़ जेहादी हो गया. ये अब तक का सबसे बड़ा हृदय परिवर्तन था. लव सीधे जेहाद हो चुका है. अब पुलिस बाकायदा इश्क़ का धर्म, राशन कार्ड और आधार कार्ड चेक करेगी. ऐसे मामले में पुलिस ईश्वर का भी दख़ल बर्दाश्त नहीं करेगी. उधर… इश्क़ गहरे सदमे में है. वो जेहादी हो गया और ख़ुद उसे भनक तक ना लगी. ये सब इतनी जल्दी में हुआ कि इश्क़ को संभलने का भी मौक़ा नहीं मिला. अब उसके सामने चेतावनी है कि चलाओ न नज़रों से बान रे, वरना रोज़ थाने का चक्कर काटना पड़ेगा.
लगता है मां का लाडला बिगड़ गया है. बालकनी से फिर लौंडे के गाने की आवाज़ आ रही है, “दे दे प्यार दे… इस बार उसकी आवाज़ में रोब नहीं याचना है. जैसे वो इश्क़ नहीं गेहूं मांग रहा हो. (वैसे इस हालात-ए-हाजरा में इश्क़ के मुक़ाबले गेहूं ज़्यादा महफूज़ है. इश्क़ को तो पुलिस और पब्लिक दोनों पीट रही है).
मैं एक व्यंग्य लिखने की सोच रहा हूं और देश का भविष्य प्यार का कटोरा उठाए याचना कर रहा है. हम यूपी वाले ऐसे छिछोरे इश्क़ का धुआं देख लें, तो खांसने लगते हैं. मैं फ़ौरन उठकर बालकनी में आ गया. छिछोरा आशिक टॉप फ्लोर की ओर देख कर गाने लगा- हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे.. मरने वाला कोई ज़िंदगी चाहता हो जैसे… उस फ्लैट की खिड़की अभी भी बंद है, पर लौंडा डटा है. आशिक और भिखारी दोनों के धंधे में धैर्य ज़रूरी है.
सतयुग को देखते हुए मुझे पूरा यकीन है कि अभी इश्क़ के इम्तेहान और भी हैं… इश्क़ का दिल से बडा गहरा रिश्ता होता है. और दिल हैं कि मानता नहीं… तो नतीज़ा ये निकला कि सारा किया धरा दिल का है, इश्क़ खामख्वाह बदनाम है. दिल तेरा दीवाना है सनम. दिल खुराफाती है और इश्क़ मासूम.. सदियों से कौआ बेचारा कोयल के बच्चे पालता आया है और दुनिया की नज़र में वो कोयल आज भी मासूम है, जो बडे़ शातिराना तरीक़े से अपने अंडे कौए के घोसले में रख देती है. इश्क़ के इस अवसरवादिता पर एक ताज़ा शेर पेश करता हूं-
दिल ने बड़ी लगन से दरीचे बिछाए थे
कमबख्त मौक़ा पाते ही कुत्ते पसर गए…

सुलतान भारती

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Usha Gupta

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