हिंदी कहानी- लविंग मेमोरी (Hindi Short Story- Loving Memory)

मैं सोचने लगी- यह एकदम कैसा बदलाव आ गया विजय पाल में. प्रायश्‍चित के किस क्षण ने उनकी आंखों पर पड़ा परदा हटा दिया था.…

मैं सोचने लगी- यह एकदम कैसा बदलाव आ गया विजय पाल में. प्रायश्‍चित के किस क्षण ने उनकी आंखों पर पड़ा परदा हटा दिया था. मन में उगे ईर्ष्या और अविश्‍वास के झाड़-झंखाड़ को जला डाला था. लेकिन वह तरुणा से अपना मन बदलने की बात क्यों छिपाना चाहते हैं? क्या पुरुष का थोथा अहम् उन्हें अब भी जकड़े हुए है? उन्हें तरुणा की दृष्टि में अपने छोटे होने का भय सता रहा है? क्या यह प्रायश्‍चित वह जूही के जीवित रहते हुए नहीं कर सकते थे?

 

अक्सर स्कूल से लौटते ही रचना पहले अपने जूते उतारकर, हाथ धोकर, बस्ता तथा दूसरी चीज़ें ठीक जगह पर रखकर मेरे पास आती है और उसका पहला सवाल होता है… आज खाने में क्या मिलेगा? लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ. वह सीधी मेरे पास चली आयी. मैंने आश्‍चर्य से उसकी ओर देखा. वह हाथ में एक क़िताब पकड़े हुए थी. नज़रें मिलते ही उसने क़िताब मुझे थमा दी. फिर पन्ने पलटकर एक जगह उंगली टिकाकर मेरी ओर देखने लगी, बोली कुछ नहीं.

मेरी नज़रें उसकी उंगली पर टिक गईं- उस पृष्ठ पर एक लड़की का चित्र छपा हुआ था. बड़ी-बड़ी आंखें, दुबला चेहरा, होंठ सख़्ती के साथ आपस में सटे हुए. उम्र में रचना जितनी ही लग रही थी. फ़ोटो के नीचे एक पंक्ति छपी हुई थी. ‘इन लविंग मेमोरी ऑफ़ जूही… मिसेज़ तरुणा पाल.’
मैंने कहा- “अभी देखती हूं, आओ पहले कुछ खा लो.”
“नहीं, अभी खाने का मन नहीं है.” रचना ने कहा. उसकी उंगली अभी तक चित्र पर टिकी हुई धीरे-धीरे हिल रही थी. मैंने रचना को बांहों में भर लिया. उसके कपोल मेरे होंठों से छू गए. कुछ गीला-गीला लगा…
“अरे, क्या हुआ?” मेरे इतना कहते ही उसके शरीर का कंपन मेरे अंदर पहुंचने लगा. वह सुबक रही थी. मैंने रचना की पीठ थपथपा दी. उसे बांहों में लेकर प्यार करने लगी.
रचना धीरे-धीरे बता रही थी कि यह जूही का चित्र है, जो उसके स्कूल की छात्रा है और दूसरे सेक्शन में पढ़ती है. रचना कह रही थी- “मम्मी, मेरी कभी जूही से बात नहीं हुई. बस प्रेयर या आधी छुट्टी के समय कभी-कभी दिखार्ई दे जाती थी. एक दिन वह प्रेयर के समय बेहोश होकर गिर गई थी. तब प्रिंसिपल ने उसकी मां को बुलाया था. बीच में काफ़ी समय से मैंने उसे नहीं देखा.”
“शायद बीमार रहने के कारण स्कूल नहीं आ रही होगी.” मैंने कहा.
“और फिर सुना.. कि…. ” रचना आंसू पोंछने लगी.
“यह क़िताब तुम्हें कहां मिल गई?”
“लायब्रेरीवाली मैडम ने दी है.” कहकर रचना चुप हो गई. मैंने देखा उसकी आंखें छत पर टिकी थीं- गहराई से सोच रही थी कुछ. कुछ देर बाद रचना को नींद आ गई. मैं क़िताब उठाकर फिर से जूही का चित्र देखने लगी. मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था- जूही की मां तरुणा पाल को कितना दुख हुआ होगा. क्या हुआ होगा नन्हीं जूही को? मुझे याद था, एक बार जब रचना बीमार हो गई थी और काफ़ी समय तक स्कूल नहीं जा सकी थी तो मेरा मन कितना डरा-डरा रहता था. रचना सो रही थी और मैं सोच रही थी- कैसी होंगी मिसेज़ पाल.
दो दिन बाद मैं रचना के स्कूल गई. मैंने रचना से इस बारे में कुछ नहीं कहा था. दूसरी क्लासेस चल रही थीं, इसलिए लायब्रेरी में बस लायब्रेरियन ही बैठी थी. मैंने अपना परिचय दिया. उसका नाम सुलभा पांडे था. मैंने क़िताब दिखाकर जूही के बारे में पूछा तो उसकी आंखें भी गीली हो गईं. बोली- “बहुत अच्छी बच्ची थी. लायब्रेरी के पीरियड में क़िताब लेने अवश्य आती थी. देखने में ही बीमार लगती थी, चुप-चुप रहती थी. एक-दो बार मैंने बात करनी चाही, पर वह ज़्यादा कुछ नहीं बोली. फिर मैंने सुना कि जूही नहीं रही. सुनकर मन बहुत देर तक ख़राब रहा. मैंने कई बार उसे मां के साथ स्कूल में देखा था.”
सुलभा ने आगे बताया कि कैसे एक दिन जूही की मां तरुणा पाल लायब्रेरी में आई थीं. उन्होंने कहा था कि वह जूही की स्मृति में कुछ क़िताबें लायब्रेरी को देना चाहती हैं. “मैंने तरुणा पाल को प्रिंसिपल से मिलवा दिया था. फिर उन्होंने दो हज़ार रुपये दिये थे क़िताबों के लिए. इस बीच उनका कई बार आना हुआ. आज रचना जो क़िताब ले गई थी, यह उन्हीं पुस्तकों में से है.”
कुछ देर मौन छाया रहा. मैंने कहा- “क्या मैं जूही की मां से मिल सकती हूं?”
सुलभा ने कहा- “मिलेंगी तो उनके साथ-साथ आपको भी दुख होगा. रहने दीजिए.” पर मेरा मन नहीं मान रहा था, मैंने कहा- “अच्छा! आप मुझे उनके घर का पता तो दे दीजिए. हो सकता है मैं न जाऊं, पर कभी…”
सुलभा ने मुझे जूही के घर का पता दे दिया. कई दिन बीत गए. जब भी जाने की सोचती तो सुलभा पांडे की सलाह याद आ जाती और मेरे बढ़ते क़दम रुक जाते. फिर जाने का मन हुआ तो पाया कि पता लिखी हुई चिट न जाने मैंने कहां रख दी थी.

एक दिन सफ़ाई करते समय अलमारी के पीछे गिरी वही चिट मिल गई, तो मैं ख़ुद को जाने से नहीं रोक सकी. तरुणा पाल के घर पहुंची, तो चार बज रहे थे. अब लग रहा था कि शायद मुझे नहीं आना चाहिए था. मृत जूही के बारे में उसकी मां से बातचीत उनका दुख ही बढ़ाएगी.
कॉलबेल बजाई, तो एक पुरुष ने दरवाज़ा खोला. उनकी आंखों में अपरिचय का भाव देख मैंने अपना नाम बताया और कहा- “मैं मिसेज़ तरुणा पाल से मिलने आई हूं.”
उन्होंने कहा- “आइए, अंदर आइए. तरुणा तो इस समय घर पर नहीं है. मैं हूं विजय पाल.”
विजय पाल यानी तरुणा पाल के पति और मृत जूही के पिता यह जानना चाह रहे थे कि मैंने आने की तकलीफ़ क्यों की थी. मैंने उन्हें रचना के बारे में बताया, फिर क़िताब खोलकर दिखाई- “हालांकि मैं जूही से कभी नहीं मिली, पर मुझे लगा…” मैं अपना वाक्य पूरा नहीं कर सकी. मैंने देखा मि. पाल ने क़िताब उठा ली थी और ध्यान से उस पृष्ठ को देख रहे थे.
कमरे में जैसे एक अशोभनीय मौन छा गया. मि. पाल की नज़रें अपलक जूही के चित्र पर टिकी थीं जैसे उन्हें यह याद ही नहीं रह गया था कि मैं भी उसी कमरे में बैठी थी. मैंने उनके शब्द सुने- “पर…. मैंने तो नहीं दीं ये क़िताबें…….”
उनकी प्रतिक्रिया सुनकर मैं चौंक गई, पर शायद वह ठीक ही कह रहे थे, क्योंकि जूही के चित्र के नीचे छपी पंक्ति में केवल तरुणा पाल का ही नाम था. विजय पाल का नाम नहीं था. उनकी ओर देखती हुई मैं सोच रही थी, आखिर क्यों नहीं था उसका नाम? इसके बाद विजय पाल ने क़िताब वापस मेरे हाथों में थमा दी. उनकी ख़ामोशी मुझे असहज बना रही थी. मैं क्षमा मांगकर उठ खड़ी हुई. विजय पाल ने कुछ नहीं कहा. बस, बाहरी दरवाज़ा खोलकर एक तरफ़ खड़े रहे. क्या यह साफ़ नहीं था कि मुझे वहां नहीं आना चाहिए था? अपने पीछे ज़ोर से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ ने मुझे कुछ चौंका दिया. तभी सामने से एक महिला आती दिखाई दी. उन्होंने मेरी ओर प्रश्‍न सूचक दृष्टि से देखा तो मैंने बता दिया कि मैं कौन हूं और क्यों आई थी.
इतना सुनते ही उनकी आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा- “मैं तरुणा हूं, आइए…..” मेरे हाथ पर कसी उनकी उंगलियों में थरथराहट थी. वह मुझे फिर से अंदर ले जाना चाहती थीं. मैंने धीरे से हाथ छुड़ा लिया. “मैं फिर कभी आऊंगी.”
“आइएगा, ज़रूर आइएगा…” तरुणा पाल ने कहा. उनके कपोलों में आंसुओं का गीलापन था और आंखें लाल हो गई थीं. मुझे लायब्रेरियन सुलभा पांडे की बात याद आ रही थी- ‘मिलेंगी तो उनके साथ आपको भी दुख होगा. रहने दीजिए.’ उन्होंने एकदम ठीक सलाह दी थी. अगर विजय पाल के व्यवहार से मुझे अपना आना ग़लत लगा था, तो तरुणा के दुख ने कहीं अंदर तक छू लिया था मुझे. मैं उनके साथ बैठकर कुछ देर तक बातें करना चाहती थी, लेकिन… दोबारा आने की बात कहकर मैं तरुणा पाल के पास से चली आई थी.
एक बात बार-बार परेशान कर रही थी- आख़िर समर्पण की पंक्ति तरुणा पाल के नाम पर ही क्यों ख़त्म हो गई थी. क्या जूही के चित्र के नीचे विजय पाल का नाम नहीं होना चाहिए था? तरुणा पाल बेटी के दुख में इतनी शोकाकुल थीं और विजय पाल… मुझे उनके शब्द याद आए- “पर… मैंने तो नहीं दीं ये क़िताबें.” उनका वाक्य बार-बार कानों में गूंज रहा था. और फिर तरुणा पाल की आंसू भरी लाल आंखें सामने कौंधने लगीं.
फिर पता ही नहीं चला कि मेरे क़दम कब मुझे रचना की स्कूल लायब्रेरी में ले गए. शायद मैं सुलभा पांडे से उनकी सलाह न मानने के लिए क्षमा मांगना चाहती थी.
“मैंने इसीलिए तो आपको जाने से मना किया था.” फिर धीमे स्वर में बोलीं- “जूही को लेकर मिस्टर और मिसेज़ पाल के बीच सदा तनाव रहता था. यूं तरुणा पाल यहां कई बार आईं और उन्होंने अपने और विजय पाल के बारे में सीधे-सीधे कुछ बताया भी नहीं. पर जो कुछ टुकड़ा-टुकड़ा बातें मैंने सुनी थीं, वही काफ़ी थीं.” फिर मेरी ओर झुककर सुलभा ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा- “जानती हैं, विजय पाल जूही को अपनी बेटी नहीं मानते थे. न जाने क्यों उनके मन में वहम बैठ गया है कि तरुणा पाल उनके प्रति सच्ची नहीं हैं. तरुणा पाल ने पति को बहुत बार समझाया, लेकिन…”
मैं सोच रही थी- तो इसीलिए दिवंगत जूही के चित्र के नीचे तरुणा के साथ विजय पाल का नाम नहीं है.
“पति-पत्नी के तनाव का सबसे ज़्यादा असर बेचारी जूही पर पड़ा था. शायद उसके अस्वस्थ रहने के पीछे इस बात का सबसे ज़्यादा प्रभाव रहा हो.” सुलभा पांडे कह रही थी.
कैसे सहा होगा मां-बाप के बीच के इस तनाव को जूही ने? शायद पिता की उपेक्षा का दंश उसे सदा ही प्रताड़ित करता रहा हो और यही उसकी बीमारी का सबसे बड़ा कारण भी हो. औरतों के बारे में पुरुषों के पास एक यही तो सबसे बड़ा और धारदार हथियार होता है. औरत बार-बार आहत-मर्माहत होने पर भी उस चक्रव्यूह में रहने पर विवश होती है. मेरा मन हो रहा था कि अभी तरुणा पाल के पास जाऊं और उनसे ढेर सारी बातें करूं. वह बात न करना चाहें तब भी जान लूं कि उन्होंने विजय पाल का विरोध क्यों नहीं किया? नन्हीं जूही को तिल-तिल करके क्यों मर जाने दिया- क्यों?
सोचा अनेक बार, मैं गई नहीं… जा नहीं सकी. इस बार सुलभा पांडे की सलाह नहीं थी, पर मैं जान रही थी कि मेरे प्रश्‍नों के तीर तरुणा पाल को कहीं गहरे घायल न कर दें. पति का अविश्‍वास सहते-सहते ही उन्होंने जूही को खो दिया था. इस दुख का कोई मरहम नहीं था, हो भी नहीं सकता था.
मैं तरुणा पाल से नहीं मिल पा रही थी, पर अंदर से कुछ बार-बार कचोटता था. समझ में नहीं आता था कि मुझे क्या करना चाहिए. जब मन ज़्यादा बेचैन हुआ तो मैं सुलभा पांडे के पास फिर जा पहुंची. मैं ख़ुद नहीं जानती थी कि आख़िर मैं उनके पास क्यों आई थी.
मुझे देखते ही सुलभा पांडे की आंखें चमक उठीं. बोलीं- “मैं आपके बारे में ही सोच रही थी?”
“वह क्यों?”
“असल में मेरे अलावा केवल आप ही हैं, जो तरुणा पाल के बारे में जानती हैं.”
मुझे अब महसूस हो रहा है कि आपकी सलाह न मानकर मैंने तरुणा के घाव कुरेदने के साथ ही अपने मन पर भी भारी बोझ बैठा लिया है.” मैंने कहा.
“नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है. बल्कि आपका जाना शायद अच्छा ही रहा. मेरे मना करने पर भी आप गईं, शायद इसीलिए….” सुलभा ने कहा.
सुलभा पांडे की बात मुझे आश्‍चर्य में डाल रही थी. “साफ़-साफ़ कहिए- क्या बात है?”
सुलभा पांडे ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया, बस एक साथ कई पुस्तकें खोलकर मेरे सामने रखती चली गईं- एक ही वाक्य कहते हुए- “देखिए… देखिए.”
मैंने देखा और देखती रह गई- एक-दो नहीं आठ-नौ तस्वीरें जूही की मेरे सामने थीं और समर्पण की पंक्ति कुछ ज़्यादा ही चमक रही थी.
“इन लविंग मेमोरी ऑफ़ जूहीः तरुणा पाल, विजय पाल.”
“यह क्या!” मैंने सुलभा पांडे की ओर देखा.
“हां, आपने ठीक देखा. तरुणा पाल के नाम के आगे विजय पाल का नाम- और यह किसी और ने नहीं, स्वयं विजय पाल ने अपने हाथों से लिखा है.”
“विजय पाल ने लिखा है अपना नाम! कब?” मेरी उत्सुकता बांध तोड़ रही थी.
सुलभा पांडे चमकती आंखों से मुझे देख रही थीं. “एक दिन एक व्यक्ति यहां आया और उसने कहा कि वह विजय पाल है- तरुणा पाल का पति, जूही का पिता.”
मुझे अपने कानों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था.
सुलभा का स्वर गंभीर था. बोली- “आने के बाद कुछ देर विजय पाल चुपचाप बैठे रहे जैसे अपनी बात कहने के लिए शब्द तलाश रहे हों, फिर झिझकते हुए कहा कि वह जूही के चित्र के नीचे अपना नाम लिखना चाहते हैं. सुनकर मैं तो हैरान रह गई. अगर यह वही विजय पाल थे, तरुणा पाल के पति, तो फिर… फिर… लेकिन मुझे @ज़्यादा कुछ पूछना नहीं पड़ा. उन्होंने धीरे-धीरे मन की सारी परतें खोल दीं मेरे सामने. उनके शब्द अभी तक मेरे कानों में गूंज रहे हैं. ‘जूही को मैंने मारा है. तरुणा मेरे कारण ही परेशान है. काश, मैंने पहले समझ लिया होता.’ और उनकी आंखों से आंसू गिरने लगे.
मैं क्या कहती, चुप रही. फिर मैंने जूही को समर्पित सारी पुस्तकें अलमारियों से निकालकर उनके सामने रख दीं और वे तरुणा पाल के नाम के आगे अपना नाम लिखते चले गए. मैं चुपचाप देखती रही. भला कहती भी क्या. सब पुस्तकों पर अपना नाम लिखने के बाद विजय पाल ने कहा- ‘एक बात है, मेहरबानी करके मेरे यहां आने और इस तरह अपना नाम लिखने की बात तरुणा को मत बताइएगा.’
“क्यों?”
‘कुछ मत पूछिए. बोलिए, क्या मेरी बात रख सकेंगी? मैं आपके किसी प्रश्‍न का उत्तर नहीं दे पाऊंगा.’ मैं कुछ कहती, इससे पहले ही विजय पाल यहां से चले गए.” कहकर सुलभा चुप हो गई.
मैं सोचने लगी- यह एकदम कैसा बदलाव आ गया विजय पाल में. प्रायश्‍चित के किस क्षण ने उनकी आंखों पर पड़ा परदा हटा दिया था. मन में उगे ईर्ष्या और अविश्‍वास के झाड़-झंखाड़ को जला डाला था. लेकिन वह तरुणा से अपना मन बदलने की बात क्यों छिपाना चाहते हैं? क्या पुरुष का थोथा अहम् उन्हें अब भी जकड़े हुए है? उन्हें तरुणा की दृष्टि में अपने छोटे होने का भय सता रहा है? क्या यह प्रायश्‍चित वह जूही के जीवित रहते हुए नहीं कर सकते थे?
न जाने कितनी बातें चक्रवात की तरह दिमाग में घूम गईं और मैंने सुलभा के सामने रखी पुस्तकों में से एक पुस्तक उठा ली, जिस पर लिखा था- ‘इन लविंग मेमोरी ऑफ़ जूही- तरूणा पाल, विजय पाल.’
सुलभा ने मुझे पुस्तक उठाने से रोका नहीं, पर प्रश्‍नभरी आंखों से मेरी ओर अपलक देखती रही. मैं उसका प्रश्‍न समझ रही थी- क्या मैं फिर से तरुणा के पास जाने की सोच रही थी?
मैंने सुलभा की आंखों का प्रश्‍न वहीं रहने दिया और चली आई. लेकिन नहीं, घर पहुंचने से पहले ही मेरे पैर तरुणा पाल के घर की ओर बढ़ गए थे. क़िताब मेरे हाथ में थी. विजय पाल ने सुलभा से कहा था कि लायब्रेरी में आकर पुस्तकों पर तरुणा के आगे अपना नाम लिखने की बात रहस्य ही रहने दें, लेकिन मैं कुछ और सोच रही थी.
तरुणा का दरवाज़ा बंद है. मेरी उंगलियां कॉलबेल दबाने के लिए कसमसा रही हैं. मैं विजय पाल का रहस्य तरुणा को अवश्य बताऊंगी. शायद तब तरुणा की आंखों में उनका क़द छोटा होने के बदले कुछ बड़ा ही हो जाए. शायद जूही को लेकर उनका अपना संताप भी कुछ कम हो जाए. चाहे मरने के बाद ही सही, जूही को उसके पिता मिल गए थे. मेरी उंगली कॉलबेल दबा चुकी थी.

– छवि गुप्ता

 

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