कहानी- बेड़ियां (Short Story- Bediyan)

"घर नहीं मां, मकान! और आप प्लीज़ इतना भावुक मत हुआ करिए पुरानी चीज़ों को लेकर… यादें कभी-कभी बेड़ियां हो जाती हैं." बेटे ने मेरी…

“घर नहीं मां, मकान! और आप प्लीज़ इतना भावुक मत हुआ करिए पुरानी चीज़ों को लेकर… यादें कभी-कभी बेड़ियां हो जाती हैं.” बेटे ने मेरी चूड़ियां देखते हुए ये बोला या मुझे ऐसा लगा, वो पता नहीं, लेकिन मैंने झट से हाथ ढक लिया.

लोगों की भीड़ देखकर और उपवास की वजह से भूखी होने के कारण, मैं बहुत बेचैन हो रही थी.
“आज करवा चौथ के त्योहार के दिन भी रजिस्ट्रार ऑफिस खुला हुआ है, अजीब बात है… हां, सभी प्रैक्टिकल हैं आजकल. घर बेचे- ख़रीदे जा रहे हैं!” मैंने बेटे को घूरते हुए एक और ताना मारा!
“घर नहीं मां, मकान! और आप प्लीज़ इतना भावुक मत हुआ करिए पुरानी चीज़ों को लेकर… यादें कभी-कभी बेड़ियां हो जाती हैं.” बेटे ने मेरी चूड़ियां देखते हुए ये बोला या मुझे ऐसा लगा, वो पता नहीं, लेकिन मैंने झट से हाथ ढक लिया.
लगभग एक महीने से बहस चल रही है इसी बात पर! पुणे से हैदराबाद स्थानांतरण हो रहा है, तो यहां का घर, मतलब मकान किराए पर उठा दे, इसे बेच क्यों रहा है? यहीं तो शादी करके आई थी मैं, यहीं ये पैदा हुआ… कैसे मोह भंग हो जाता है इतनी जल्दी? मैं तो तलाक़ के इतने सालों बाद भी अभी तक एकतरफ़ा रिश्ता माने बैठी हूं, चूड़ियां, बिछुए, सिंदूर के साथ… और निभाए जा रही हूं करवा चौथ के उपवास के साथ!


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“तीन फोटो लगेंगी माताजी की, इन्हीं के नाम घर है ना!” ऑफिस का एक आदमी आकर कार्यवाही शुरू करा रहा था, ऐसा लगा जैसे एक डोरी टूट गई, इस घर से और उस रिश्ते से… कि तभी अचानक सिंदूर से बालों में खुजली-सी होने लगी.
“एक साइन इधर, और एक इधर… बाएं अंगूठे का निशान चाहिए माताजी!” मैं यंत्रवत करती जा रही थी. बेटे ने प्यार से कंधे पर हाथ रख दिया… इतना सशक्त बंधन तो मुझे संभाले हुए है, उस बेनामी रिश्ते को निभाती ये चूड़ियां हथकड़ियाँ ही तो हैं… उतारकर पर्स में रख लीं!
“चश्मा उतारकर इधर देखिए, हां… बस हो गया!” फोटो खींचने का नया तरीक़ा, सब कुछ नया है… पुराना सब जा रहा है, रिश्ता भी, घर भी… बस यादें क्यों रुकी हुई हैं बासी, बदबू मारती हुई? बिछुए कई दिनों से चुभ रहे थे. कार्यालय से बाहर आते हुए बहाने से झुककर वो‌ भी उतार दिए.
बेटे ने मुस्कुराते हुए घर के, मतलब मकान के नए मालिक से हाथ मिलाया, “आप चेक मां के हाथ में दे दीजिए… मां! इन्हें चाभियां और पेपर्स दे दीजिए!” मैंने महसूस किया, काग़ज़ों और चाभियों का मुश्किल से किलो भर का वज़न था, लेकिन मेरे लिए पहाड़ जैसा भारी था… उनको नए मालिक को थमाकर मन फूल-सा हो गया.
“चलिए, ये काम तो निपटा, भूख लग रही है… आप तो कुछ खाएंगी नहीं?” बेटे ने मेरा मन टटोला.
“क्यों नहीं खाऊंगी बेटा!” मैंने गहरी सांस लेकर कहा, “पुराना सब ख़त्म! आज सब कुछ नया हो गया है… किसी नई जगह चलकर कुछ नया खाएंगे, तुम क्या कहते हो.. हां, लेट्स सेलिब्रेट!”

लकी राजीव


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Published by
Usha Gupta

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