करवा चौथ से जुड़ी 30 ज़रूरी बातें (30 Important Things About Karwa Chauth)

इस साल 8 अक्टूबर 2017 को करवाचौथ मनाया जाएगा. पूर्णिमा के चांद के बाद जो चौथ पड़ती है, उस दिन करवाचौथ मनाया जाता है. देशभर और विदेशों में भी भारतीय महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए करवा चौथ का व्रत करती हैं. करवा चौथ से जुड़ी 30 ज़रूरी बातें बता रही हैं एस्ट्रो-टैरो, न्यूमरोलॉजिस्ट, नेम थेरेपी, वास्तु-फेंगशुई एक्सपर्ट मनीषा कौशिक.

क्यों मनाया जाता है करवा चौथ?
* स्त्री को शक्ति का रूप माना जाता है इसीलिए उसे ये वरदान मिला है कि वो जिस चीज़ के लिए भी तप करेगी, उसे उसका फल अवश्य मिलेगा.
* हमारी पौराणिक कथाओं में सावित्री अपने पति को यमराज से वापस ले आती है यानी स्त्री में इतनी शक्ति होती है कि वो यदि चाहे, तो कुछ भी हासिल कर सकती है. इसीलिए महिलाएं करवा चौथ के व्रत के रूप में अपने पति की लंबी उम्र के लिए एक तरह से तप करती हैं. तप का मतलब होता है किसी चीज़ को त्यागना और किसी एक दिशा में आगे बढ़ना, पहले के ज़माने में ऋषि-मुनी इसीलिए तप करते थे और सिद्धि प्राप्त करते थे. महिलाएं इस दिन निर्जल व्रत करती हैं.
* चौथ का चांद हमेशा देर से निकलता है, ये एक तरह से महिलाओं की परिक्षा होती है कि वो अपने पति के लिए कितना त्याग कर सकती हैं. कई बार तो देर रात तक चांद नहीं दिखता. ये मौसम ऐसा होता है कि कई बार बादल घिर जाते हैं और चांद नज़र ही नहीं आता. ऐसे में महिलाएं देर रात या अगले दिन तक अपना व्रत नहीं तोड़ती हैं.

कैसे करें व्रत की शुरुआत?
* सुबह सूरज उगने से पहले सास अपनी बहू को सरगी देती है, जिसमें बहू के लिए कपड़े, उसके सुहान की चीज़ें जैसे चूड़ी, बिंदी, सिंदूर आदि, साथ ही फेनिया, फ्रूट, ड्राईफ्रूट, नारियल आदि रखा जाता है.
* सास द्वारा दी हुई सरगी से बहू अपने व्रत की शुरुआत करती है. अगर सास साथ में नहीं हैं, तो वो बहू को पैसे भिजवा सकती हैं, ताकि वो अपने लिए सारा सामान ख़रीद सके.
* सुबह सूरज निकलने से पहले सास की दी हुई फेनिया बनाकर पहले अपने पित्रों, गाय, कुत्ते और कौए का हिस्सा अलग रख लें. फिर अपने पति और परिवार के लोगों के लिए भी अलग निकाल दें. उसके बाद फेनिया और सास के दिए हुए फ्रूट, ड्राईफ्रूट, नारियल खाकर ही व्रत की शुरुआत करें.
* फिर सास का दिए हुए कपड़े और शृंगार की चीज़ें पहनें.

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कब सुनें करवा चौथ की कथा?
करवा चौथ की पूजा या कथा सूर्यास्त से पहले ही सुन लेनी चाहिए, उसके बाद पूजा और कथा पढ़ने का कोई मतलब नहीं है इसलिए सूर्यास्त से पहले ही पूजा कर लें. शाम के व़क्त जब दिन छुपने और शाम ढलने की शुरुआत होती है, उस समय पूजा नहीं करनी चाहिए, इसलिए करवाचौथ की पूजा सूर्य के ढलने से पहले ही कर लें. सूर्य के रहते ही पूजा कर लेनी चाहिए, कथा सुन लेनी चाहिए और बायना निकाल लेना चाहिए.
* कहानी सुनते समय साबूत अनाज और मीठा साथ में रखते हुए कथा सुनी जाती है.
* करवाचौथ में थाली बंटाने का भी विशेष महत्व होता है. इसमें अमूमन सात सुहागन आपस में गाना गाते हुए थालियां बंटाती हैं और वो तब तक गाना गाती रहती हैं, जब तक उनकी थाली उनके पास नहीं पहुंच जाती.
* जो अकेले पूजा करते हैं, वो थालियां नहीं बटां सकते. ऐसे में आप अकेले कहानी पढ़ सकती हैं, मोबाइल या डेस्कटॉप पर कहानी सुन सकती हैं.
* कहानी सुनते समय हुंकारा ज़रूर भरना चाहिए. ये इस बात का प्रमाण माना जाता है कि आपने कथा सुनी है. पहले के ज़माने में बहुएं दिनभर काम करके इतना थक जाती थीं कि जब सास कथा सुनाती थी, तो वो सो जाती थीं. इसीलिए कहानी सुनते समय हुंकारा भरने की रिवाज़ है, ताकि ये प्रमाणित हो सके कि आपने कथा सुनी है.
* बहू को कथा सुनने के बाद सास के लिए बायना निकालना होता है, जिसमें मठियां, गुलगुले आदि (हर कोई अपने हिसाब से कुछ भी मीठा बायने में ज़रूर रखता है), सास के लिए कपड़े, सुहाग का सामान, पानी का लोटा, जिसके ऊपर कुछ अनाज हो (ताकि हमारे घर में हमेशा धनधान्य भरा रहे),  और हां, शगुन का पैसा ज़रूर रखें. जिस तरह सास आपके लिए सुहाग का सामान, कपड़े, मीठा और शगुन रखती हैं, उसी तरह आपको भी सास के लिए बायना निकालते समय उसमें ये सभी चीज़ें रखनी चाहिए. बहू पूजा करने और कथा सुनने के बाद सास का बायना निकालती है.
* जब बहू व्रत शुरू करती है, तो सास उसे करवा देती है, उसी तरह बहू भी सास को करवा देती है. जब आप पूजा करते हो, कथा सुनते हो, उस समय आपको दो करवे रखने होते हैं- एक वो जिससे आप अर्घ्य देते हो यानी जिसे आपकी सास ने दिया था और दूसरा वो जिसमें पानी भरकर आप बायना देते समय अपनी सास को देती हैं. सास उस पानी को किसी पौधे में डाल देती हैं और अपने पानी वाले लोटे से चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं. मिट्टी का करवा महिलाएं इसलिए लेती हैं, क्योंकि आप उसे डिस्पोज़ कर सकती हैं. मिट्टी का करवा न हो तो आप स्टील के लोटे का प्रयोग भी कर सकती हैं. एक ही लोटा अगली बार भी इस्तेमाल कर सकती हैं, स़िर्फ उसमें बंधी मौली बदल दें. उस पर ॐ और स्वस्तिक बना लें.
* सास पूजा करने और कथा सुनने के बाद अपनी बहू को ये इजाज़त देती है कि अब तुम पानी, जूस या चाय आदि पी सकती हो. इसकी एक वजह ये भी है कि पूरा दिन भूखे रहने से एसिडिटी बढ़ सकती है या कोई और हेल्थ प्रॉब्लम हो सकती है. इसी तरह जिन लोगों को कोई दवाई लेनी होती है, उनके लिए भी सुविधा हो जाती है. अत: कथा सुनने के बाद कुछ पी सकती हैं या फल व ड्राईफ्रूट भी खा सकती हैं. जूस या फल का सेवन कथा सुनने के बाद और सास का बायना निकालने के बाद ही करना चाहिए.

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करवा के साथ गणेश जी की कथा क्यों सुनी जाती है?
ऐसा कहा जाता है कि कथा कभी भी अकेले नहीं सुननी चाहिए इसलिए करवा के साथ गणेशजी की कथा भी सुनी जाती है. गणेश जी को बच्चे का रूप माना जाता है और हम उस दिन ख़ुद को पार्वती का रूप मानते हैं. करवाचौथ का व्रत स्त्री के पति और मां के बेटे के लिए रखा जाता है यानी सास अपनी बहू से कहती है कि तुम मेरे बेटे की लंबी उम्र के लिए व्रत रखो. फिर आगे चलकर आप भी अपने बेटे के लिए अपनी बहू से व्रत रखने को कहेंगी, इसीलिए गणेशजी की पूजा की जाती है, ताकि हमें एक पत्नी और एक मां की शक्ति भी मिल सके.

वर्किंग वुमन कैसे रखें करवाचौथ का व्रत?
* जो महिलाएं वर्किंग हैं, वो एक साफ़ बोटल में सास के दिए हुए करवे का पानी ऑफ़िस में ले जाएं. हां, सास का दिया हुआ करवा एकदम खाली न करें यानी उसमें थोड़ा पानी रहने दें. साथ ही अनाज वाले करवे में से थोड़ा-सा साबूत अनाज और सास के बायने के शगुन का पैसा ले जाएं. जिस समय आप कथा पढ़ या सुन रही हों, उस समय अनाज और पानी अपने पास रखें. कथा सुनते समय सामने एक प्लेट या टीशू पेपर रख लें और हुंकारा भरते हुए अनाज का एक-एक दाना उस प्लेट या टिशू पेपर में रखते जाएं. यदि आपके पास कहानी सुनने की कोई व्यवस्था नहीं है तो आप ख़ुद भी कथा पढ़ सकती हैं. फिर ऑफ़िस से लौटकर करवे में वो पानी डाल दें, जिसे आप ऑफ़िस ले गई थीं और साबूत अनाज को अर्घ्य देने के लिए रख लें. शाम को उसी पानी और साबूत अनाज से चंद्रमा को अर्घ्य दें.
* चंद्रमा को चांदी पसंद है, क्योंकि वो शीतलता प्रदान करता है इसलिए अर्घ्य देते समय चांदी का लोटा, सिक्का या अंगूठी हाथ में ज़रूर रखें. फिर जिस जल और अनाज को साथ में रखकर आपने कथा सुनी, उसी से चांद्रमा को अर्घ्य दें.
* यदि आप ऑफिस में बहुत सारी चूड़ियां पहनकर नहीं जा सकतीं, तो दो-चार-छह इस तरह के ईवन नंबर में चूड़ियां पहनकर जा सकती हैं.

कुवांरी लड़कियां कैसे रखें करवाचौथ का व्रत?
* कई लोगों को ये कन्फ्यूज़न रहती है कि कुवांरी लड़कियां क्या करवाचौथ का व्रत रख सकती हैं? जी हां, कुवांरी लड़कियां भी करवाचौथ का व्रत ज़रूर रख सकती हैं.
* कुवांरी लड़कियां चांद को न देखकर तारों को देखकर अपना व्रत खोल सकती हैं. जिस तरह डोली तारों की छांव में जाती है और दुल्हन तब तक अपने चांद को नहीं देख पाती है, ठीक उसी तरह कुवांरी लड़कियां अपने पति से नहीं मिली होती हैं इसलिए उन्हें तारों को देखकर व्रत खोलना होता है.
* उन्हें किसी से सरगी नहीं मिलती इसलिए उन्हें भी किसी को सुहाग का सामान नहीं देना होता है.
* कुवांरी लड़कियों को तारे देखने के लिए छलनी का इस्तेमाल नहीं करना होता है, क्योंकि उन्हें छलनी में किसी की सूरत भी नहीं देखनी होती है.

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अर्घ्य देते समय पूजा की थाली में क्या-क्या होना ज़रूरी है?
* दिनभर व्रत रखने के बाद, दिन में पूजा और कथा सुनने के बाद शाम को जब महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं, तो उनकी पूजा की थाली में ये चीज़ें होनी बहुत ज़रूरी है. छलनी, आटे का दीपक (देशी घी का दीया और आटे का दीपक इसलिए रखा जाता है, क्योंकि आटा भी अनाज ही है), फल, ड्राईफ्रूट, मिठाई (मिठाई की जगह घर में जो मीठा बना है, उसे भी रख सकती हैं) और दो पानी के लोटे- एक चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए और दूसरा वो जिससे आप पहले पति को पानी पिलाती हैं और फिर वो आपको पिलाते हैं. पति को पहले पानी इसलिए पिलाया जाता है कि हम उन्हें परमेश्‍वर मानकर पहले उन्हें भोग लगाते हैं और फिर उसे ख़ुद भी खाते हैं. जिस तरह हम नवरात्रि, शिवरात्रि आदि व्रत में पहले भगवान को भोग लगाते हैं, फिर उसे ग्रहण करते हैं, ठीक उसी तरह करवाचौथ के दिन पति को परमेश्‍वर मानकर पहले उन्हें भोग लगाया जाता है और फिर ख़ुद उसे ग्रहण किया जाता है. अर्घ्य वाले लोटे का पानी न पीएं. फिर आप पति को फ्रूट, ड्राईफ्रूट और मीठा खिलाएं और पति भी आपको ये सब चीज़ें खिलाएंगे.
* अर्घ्य देते जाते समय वो चुन्नी साथ ज़रूर ले जाएं, जिसे आपने कथा सुनते समय पहना था. चंद्रमा को छलनी में दीया रखकर उसमें से देखें, फिर उसी छलनी से तुरंत अपने पति को देखें. छलनी में दीया रखने का रिवाज़ इसलिए बना, क्योंकि पहले के ज़माने में जब स्ट्रीट लाइट्स नहीं हुआ करती थीं, तो महिलाएं चांद देखने के बाद छलनी में रखे दीये के प्रकाश से अपने पति को देख सकें. कई लोग जलते हुए दीये को पीछे फेंक देते हैं, ऐसा नहीं करना चाहिए. आप उस आटे के दीये को वहीं जलता हुआ छोड़ आएं. कई लोग दीये के बुझने को भी अपशकुन मानते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. यदि तेज़ हवा से दीया बुझ भी जाता है, तो उससे कोई अपशगुन नहीं होता है.
* फिर घर आकर साथ मिलकर खाना खाएं.
* किसी भी पूजा के दिन सात्विक यानी बिना लहसुन-प्याज़ वाला खाना खाया जाता है, इसीलिए करवाचौथ के दिन भी ऐसा ही सात्विक भोजन करें. किसी भी तरह का तामसिक आहार न लें. करवाचौथ को सेलिब्रेट करने के लिए आप अपने पसंद की कोई भी चीज़ बना सकती हैं.

ज़रूरी टिप्स
* हाथों की मेहंदी पर पति का नाम लिखवाया ही जाए ये ज़रूरी नहीं, महिलाएं प्यार बढ़ाने के लिए ऐसा करती हैं, लेकिन मेहंदी से पति का नाम लिखवाना ही चाहिए, ऐसा कोई नियम नहीं है.
* पीरियड्स में भी करवाचौथ का व्रत रख सकती हैं.
* आप चाहें तो घर के मंदिर में पूजा कर सकती हैं या फिर अलग से चौकी लगाकर भी पूजा कर सकती हैं.
* आजकल करवाचौथ के कैलेंडर भी आते हैं, यदि आपके पास वो नहीं है तो भी कोई बात नहीं. पहले के ज़माने में लोग दीवार पर इसका प्रतीक बना लेते थे. भगवान श्रद्धा के भूखे हैं, नियमों के नहीं.
* पूजा करते समय आपका चेहरा पूर्व की तरफ होना चाहिए.
* करवाचौथ के दिन सेक्स से दूर रहें.

– कमला बडोनी